भारत में अपना समाजशास्त्र रचने की आवश्यकता है। पश्चिम का समाजशास्त्र जिस मानव-केन्द्रित सामाजिकता और उसकी आध्यात्मरहित सत्ता की बात करता है, वह हिन्दू उपादेयता है। मनुष्य तक ही जीवन सीमित नहीं है। मनुष्य जब अपने आसपास के चर-अचर जीवन के साथ ओतप्रोत है, आवश्यकता की क्षीणता से जब उसकी भी क्षीणता होती है, तो उसका दायित्व भी बढ़ जाता है। यह सही है कि जिस प्रकार की तर्क-प्रज्ञा मनुष्य को प्राप्त है, वह अन्य प्राणी को नहीं; पर उस अन्य ने भी कुछ ऐसा प्राप्त किया है, जो मनुष्य को नहीं है और उस प्राप्त के प्रति मनुष्य को श्रद्धा होनी चाहिए। हमारा संगठन उनकी सत्ता को नकार कर चले, जैसा पिछले तीन-चार वर्षों से हुआ है, तो यह जितनी उनकी क्षति करेगा, उससे अधिक मनुष्य को क्षति होगी, यह बात तो अब प्रमाणित हो चुकी है। इसलिए समाजशास्त्र की मानव-केन्द्रित दृष्टि का ध्यान सर्वभूतत्व पर जाना चाहिए। दूसरी बात समानता की है। ‘सम’ शब्द का व्युत्पत्ति से प्राप्त अर्थ—जो ‘सम्’ मात्र हो, अर्थात् युद्ध सत्ता हो, इसलिए समता को अर्थात् युद्ध सत्ता को सर्वत्र देना। समता इस प्रकार एकत्व है, एकत्व बुद्धि है, बराबरी नहीं है, क्योंकि पृथकत्क के बिना बराबरी की बात ही नहीं सोची जा सकती। दो वस्तुएँ अलग होंगी, तभी वे बराबर या गैर-बराबर दिखेंगी; जब एक हैं तो फिर बराबरी या गैर-बराबरी का सवाल ही नहीं उठता।