निम्नलिखित में से कौन – कौन से सिद्धांत जैन धर्म से संबंधित हैं? (i) अनेकान्तवाद (ii) सर्वस्तिवाद (iii) शून्यवाद (iv) स्यादवाद नीचे दिये गये कूट का उपयोग कर सही उत्तर चुनिए –
- (1)(i) एवं (iv)
- (2)(ii) एवं (iv)
- (3)(i), (ii) एवं (iii)
- (4)(ii) एवं (iii)
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (1), (i) एवं (iv).
चारों सिद्धांतों में (i) अनेकान्तवाद और (iv) स्यादवाद जैन हैं; (ii) सर्वस्तिवाद और (iii) शून्यवाद बौद्ध हैं। ठीक दोनों जैन सिद्धांतों को चुनने वाला कूट (i) एवं (iv) है।
(i) अनेकान्तवाद अनेक-पक्षीयता का जैन सिद्धांत है: यथार्थ के अनेक पहलू हैं, और कोई एक कथन पूरे सत्य को नहीं समेटता। इसका उद्गम महावीर की शिक्षाओं में माना जाता है।
(iv) स्यादवाद सापेक्ष कथन का जैन सिद्धांत है। हर कथन ‘स्यात्’ (किसी अपेक्षा से) से सीमित होता है, और बाद के जैन ग्रंथ इसे सात भागों वाली योजना, सप्तभंगी, के रूप में रखते हैं। ए. एल. बाशम रूढ़िवादी जैन स्यादवाद और नयवाद का उल्लेख करते हैं।
(ii) सर्वस्तिवाद, यानी सब कुछ विद्यमान होने का सिद्धांत, एक प्रारंभिक बौद्ध सम्प्रदाय था। (iii) शून्यवाद, शून्यता का सिद्धांत, नागार्जुन से जुड़े बौद्ध दर्शन के माध्यमिक सम्प्रदाय का ही दूसरा नाम है।
अनेकान्तवाद और स्यादवाद जैन हैं; सर्वस्तिवाद और शून्यवाद बौद्ध हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (2)(ii) एवं (iv) — यह कूट जैन सिद्धांत स्यादवाद को रखता है, पर (ii) सर्वस्तिवाद, एक प्रारंभिक बौद्ध सम्प्रदाय, को जोड़ देता है। बाशम बौद्ध धर्म के सर्वस्तिवादी सम्प्रदाय और उसके परमाणु सिद्धांत की चर्चा करते हैं।
यह (i) अनेकान्तवाद, अनेक-पक्षीयता के जैन सिद्धांत, को भी छोड़ देता है, इसलिए दो बार चूकता है।
- (3)(i), (ii) एवं (iii) — यह कूट अनेकान्तवाद को रखता है, पर दो बौद्ध सिद्धांत जोड़ देता है: (ii) सर्वस्तिवाद और (iii) शून्यवाद, शून्यता का बौद्ध सिद्धांत।
यह (iv) स्यादवाद, सापेक्ष कथन के जैन सिद्धांत, को भी छोड़ देता है। इसके तीन चुनावों में से केवल एक जैन है।
- (4)(ii) एवं (iii) — यह कूट दोनों बौद्ध सिद्धांत चुनता है और कोई भी जैन सिद्धांत नहीं। यह उस प्रश्न का उत्तर होता जो पूछे कि इनमें से कौन-से सिद्धांत बौद्ध धर्म से संबंधित हैं।
सर्वस्तिवाद एक प्रारंभिक बौद्ध सम्प्रदाय था, और शून्यवाद शून्यता की माध्यमिक शिक्षा है।
अवधारणा
अनेकान्तवाद मानता है कि सत्य और यथार्थ जटिल हैं और उनके अनेक पहलू हैं। जैन चिंतकों ने इस पर दो उपकरण बनाए। स्यादवाद हर कथन को ‘स्यात्’ (किसी अपेक्षा से) से सीमित करता है, और नयवाद हर कथन को एक आंशिक दृष्टिकोण मानता है।
स्यादवाद की सात भागों वाली योजना (सप्तभंगी) इस क्रम में चलती है: किसी अपेक्षा से है; किसी अपेक्षा से नहीं है; किसी अपेक्षा से है और नहीं है; और चार अन्य संयोजन।
यहाँ के बौद्ध सिद्धांत अलग-अलग सम्प्रदायों से आते हैं। सर्वस्तिवाद मानता था कि धर्म (घटनाएँ) भूत, वर्तमान और भविष्य में विद्यमान रहते हैं। शून्यवाद, नागार्जुन से जुड़ा माध्यमिक सम्प्रदाय, शून्यता का बौद्ध सिद्धांत है।
RPSC के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में भारत के इतिहास के प्राचीनकाल एवं मध्यकाल के अंतर्गत "छठी शताब्दी ई. पू. की श्रमण परम्परा और नये धार्मिक विचार– आजीवक, बौद्ध तथा जैन।" सूचीबद्ध है।
जैन और बौद्ध धर्म एक ही काल में विकसित हुए, और उनके बाद के दार्शनिक सम्प्रदायों में परस्पर वाद-विवाद हुआ। उनके सिद्धांतों के ‘-वाद’ वाले नाम एक-से दिखते हैं, इसलिए हर नाम को उसकी परम्परा से जोड़कर याद रखना पड़ता है।
मुख्य तथ्य
- अनेक-पक्षीयता के जैन सिद्धांत अनेकान्तवाद का उद्गम 24वें तीर्थंकर महावीर की शिक्षाओं में माना जाता है।
- स्यादवाद सापेक्ष कथन का जैन सिद्धांत है, जिसे बाद के ग्रंथ सात भागों वाली सप्तभंगी के रूप में रखते हैं।
- आंशिक दृष्टिकोणों का सिद्धांत नयवाद स्यादवाद का जैन सहचर है।
- सर्वस्तिवाद एक प्रारंभिक बौद्ध सम्प्रदाय था; इसकी कश्मीरी शाखा ने अभिधर्म महाविभाषा की रचना की, और उस ग्रंथ के रूढ़िवादी अनुयायी वैभाषिक कहलाए।
- शून्यता का सिद्धांत शून्यवाद नागार्जुन के माध्यमिक सम्प्रदाय से जुड़ा है।
दोनों जैन सिद्धांत, (i) और (iv), मिलकर विकल्प (1) बनाते हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- यहाँ के सिद्धांतों के नाम ‘-वाद’ पर समाप्त होते हैं; यह अंत परम्परा के बारे में कुछ नहीं बताता।
- सर्वस्तिवाद (सब कुछ है) और शून्यवाद (शून्यता) विपरीत लगते हैं, फिर भी दोनों बौद्ध हैं।
- स्यादवाद और अनेकान्तवाद प्रतिद्वंद्वी जैन सम्प्रदाय नहीं हैं: स्यादवाद अनेकान्तवाद पर बनी कथन की एक पद्धति है।
कोई प्रश्न दार्शनिक सिद्धांतों की सूची देकर पूछ सकता है कि कौन-से जैन धर्म के हैं, जैसा यहाँ है।
कोई प्रश्न यह भी पूछ सकता है कि कोई एक सिद्धांत किस परम्परा का है, सिद्धांतों को बौद्ध या जैन चिंतकों से सुमेलित करवा सकता है, या स्यादवाद का अर्थ पूछ सकता है।
संबंधित PYQ
आजीवक सम्प्रदाय के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : A. नियतिवाद में विश्वास B. उनके पुनर्जन्म के क्रम में बदलाव किया जा सकता है । C. कठोर तपस्या में विश्वास नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये : कूट :
- (1) केवल A सही हैं ।
- (2) केवल B सही है ।
- (3) A और B सही हैं ।
- (4) A और C सही हैं ।
उत्तर(4)
छठी शताब्दी ई. पू. की श्रमण परम्परा वाली वही पाठ्यक्रम पंक्ति। वह प्रश्न आजीवक सम्प्रदाय की मान्यताओं पर तीन कथनों की जाँच करता है (RPSC की कुंजी: विकल्प (4), A और C सही हैं); यह प्रश्न जैन सिद्धांतों को बौद्ध सिद्धांतों से अलग करता है।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
कथन की सात भागों वाली योजना (सप्तभंगी) किस सिद्धांत से संबंधित है?
- (a)स्यादवाद
- (b)शून्यवाद
- (c)क्षणिकवाद
- (d)सर्वस्तिवाद
उत्तर(1) — स्यादवाद, सापेक्ष कथन का जैन सिद्धांत, बाद के जैन ग्रंथों में सात भागों वाली सप्तभंगी के रूप में रखा गया है। विकल्प (2), शून्यवाद, शून्यता का बौद्ध सिद्धांत है; विकल्प (3), क्षणिकवाद, क्षणिकता का सिद्धांत, भी बौद्ध है; विकल्प (4), सर्वस्तिवाद, एक प्रारंभिक बौद्ध सम्प्रदाय था। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
शून्यता का सिद्धांत शून्यवाद किससे संबंधित है?
- (a)बौद्ध धर्म का माध्यमिक सम्प्रदाय
- (b)जैन धर्म का दिगंबर सम्प्रदाय
- (c)आजीवक
- (d)जैन धर्म का श्वेतांबर सम्प्रदाय
उत्तर(1) — शून्यवाद नागार्जुन से जुड़े बौद्ध दर्शन के माध्यमिक सम्प्रदाय का दूसरा नाम है। विकल्प (2) और विकल्प (4) जैन धर्म के दो सम्प्रदाय हैं, जिनका तर्कशास्त्र स्यादवाद का प्रयोग करता है। विकल्प (3), आजीवक, नियति के सिद्धांत को मानते थे।