आजीवक सम्प्रदाय के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : A. नियतिवाद में विश्वास B. उनके पुनर्जन्म के क्रम में बदलाव किया जा सकता है । C. कठोर तपस्या में विश्वास नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये : कूट :
- (1)केवल A सही हैं ।
- (2)केवल B सही है ।
- (3)A और B सही हैं ।
- (4)A और C सही हैं ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (4), A और C सही हैं ।
A सही है। ए. एल. बाशम की 'हिस्ट्री एंड डॉक्ट्रिन्स ऑफ़ द आजीविकाज़' (1951) मक्खलि गोसाल की शिक्षा का मूल बिंदु नियति में विश्वास बताती है: व्यवस्था का ऐसा सिद्धांत जो हर कर्म को नियंत्रित करता था और प्रभावी मानवीय इच्छा के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ता था, यानी कठोर नियतिवाद।
B सही नहीं है। बाशम के अनुवाद के अनुसार सामञ्ञफल सुत्त में मूर्ख और ज्ञानी दोनों 84 लाख महाकल्पों से गुजरते हैं और तभी दुःख का अंत करते हैं।
कोई सदाचार, व्रत, तप या ब्रह्मचर्य कर्म को समय से पहले पका नहीं सकता, न उसे क्षीण कर सकता है: 'ऐसा नहीं किया जा सकता।' संसार 'न घटाया जा सकता है, न बढ़ाया'; फेंके गए सूत के गोले की तरह वह अपनी पूरी लम्बाई तक खुलता है।
C सही है। बाशम आजीवकों की कठोर तपस्याओं के उल्लेखों की ओर संकेत करते हैं और कहते हैं कि आजीवक सामान्यतः कष्ट, उपवास और सौम्यता के मार्ग पर चलते थे। भगवती सूत्र में आजीवक तपस्वी कभी-कभी अत्यंत कठोर तपस्या से अपना जीवन समाप्त करते दिखते हैं।
A और C सही ठहरते हैं, इसलिए उत्तर विकल्प (4) है: A और C सही हैं ।
याद रखने की बात: आजीवक = नियति (निश्चित भाग्य) और कठोर तपस्या; पुनर्जन्म का चक्र अपने निश्चित क्रम में ही चलता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)केवल A सही हैं । — A सही है, पर विकल्प (1) C को छोड़ देता है, जो भी सही है। बाशम आजीवकों की कठोर तपस्याओं की ओर संकेत करते हैं और उनके धार्मिक मार्ग को कष्ट, उपवास और सौम्यता का मार्ग बताते हैं।
केवल A सही किसी ऐसे नियतिवादी सम्प्रदाय पर ठीक बैठता जो तपस्या न करता हो, और आजीवक ऐसे नहीं थे।
- (2)केवल B सही है । — B ही एकमात्र गलत कथन है। गोसाल का संसार 'मानो पैमाने से नपा हुआ' है और 'न घटाया जा सकता है, न बढ़ाया'; कोई व्रत या तप उसका क्रम नहीं बदलता।
केवल B सही उस शिक्षा का वर्णन होता जिसमें प्रयास से पुनर्जन्मों का क्रम बदल जाता है, और ठीक इसी विचार को गोसाल सामञ्ञफल सुत्त में नकारते हैं।
- (3)A और B सही हैं । — A सही है, पर B गलत है, और C छूट जाता है। निश्चित भाग्य में विश्वास और यह विश्वास कि पुनर्जन्म का क्रम बदला जा सकता है, एक-दूसरे की विपरीत दिशाओं में जाते हैं।
A और B सही नियति को उसी दावे के साथ जोड़ता है जिसे नियति खारिज करती है।
अवधारणा
आजीवक एक तपस्वी सम्प्रदाय था जिसके संस्थापक मक्खलि गोसाल थे। बाशम आजीवक मत को बौद्ध और जैन धर्म के साथ तीसरा विधर्मी सम्प्रदाय कहते हैं, जिसके दोनों से सम्बन्ध प्रायः अच्छे नहीं थे।
इसका मूल नियति था: जो कुछ होता है वह एक सर्वव्यापी व्यवस्था से निश्चित है, और मानवीय प्रयास कुछ नहीं बदलता। प्राणी मुक्ति से पहले निश्चित संख्या में जन्मों से गुजरते हैं, जैसे फेंका गया सूत का गोला खुलता जाता है।
फिर भी यह सम्प्रदाय कठोर तपस्या करता था। बाशम लिखते हैं कि यह अपने संस्थापक की मृत्यु के बाद लगभग दो हज़ार वर्षों तक बना रहा और, कम-से-कम स्थानीय रूप में, प्राचीन भारतीय धार्मिक जीवन का एक महत्वपूर्ण कारक था।
RPSC के 2024 के पाठ्यक्रम में "छठी शताब्दी ई. पू. की श्रमण परम्परा और नये धार्मिक विचार– आजीवक, बौद्ध तथा जैन।" का नाम है।
बाशम गोसाल के सिद्धांत का पुनर्निर्माण प्रतिद्वंद्वी परम्पराओं से करते हैं: सामञ्ञफल सुत्त जैसे बौद्ध ग्रन्थों और भगवती सूत्र जैसे जैन ग्रन्थों से।
आजीवकों को राजकीय संरक्षण भी मिला। बाशम दर्ज करते हैं कि गया से पंद्रह मील उत्तर में बराबर पहाड़ी की गुफाएँ अशोक ने उन्हें दीं, और पास की नागार्जुनी पहाड़ी की गुफाएँ अशोक के उत्तराधिकारी दशरथ ने समर्पित कीं।
मुख्य तथ्य
- मक्खलि गोसाल ने आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना की; बाशम इसे बौद्ध और जैन धर्म के साथ तीसरा विधर्मी सम्प्रदाय कहते हैं।
- आजीवकों का मूल सिद्धांत नियति था, व्यवस्था का सर्वव्यापी सिद्धांत जिसने मानवीय इच्छा-शक्ति को निष्प्रभावी बना दिया।
- सामञ्ञफल सुत्त में मूर्ख और ज्ञानी दोनों दुःख का अंत करने से पहले 84 लाख महाकल्पों से गुजरते हैं।
- बाशम आजीवकों की कठोर तपस्याओं का उल्लेख करते हैं; भगवती सूत्र में आजीवक तपस्वी कभी-कभी अत्यंत कठोर तपस्या से जीवन समाप्त करते दिखते हैं।
- अशोक ने गया के निकट बराबर पहाड़ी की गुफाएँ आजीवकों को दीं; दशरथ ने नागार्जुनी पहाड़ी की गुफाएँ समर्पित कीं।
A और C सही हैं: विकल्प (4)। स्रोत: ए. एल. बाशम, हिस्ट्री एंड डॉक्ट्रिन्स ऑफ़ द आजीविकाज़ (1951)।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- नियतिवाद और तपस्या को परस्पर असंगत मानना: बाशम नियति और आजीवकों की कठोर तपस्याओं, दोनों को दर्ज करते हैं, इसलिए इस आधार पर न A गिरता है, न C।
- कथन B को बौद्ध या जैन कर्म-सिद्धांत की दृष्टि से पढ़ना: गोसाल की शिक्षा के विवरण में कोई व्रत या तप संसार का क्रम नहीं बदलता।
- छठी शताब्दी ई. पू. के सिद्धांतों को मिलाना: नियति मक्खलि गोसाल की है, जबकि RPSC की 2021 की कुंजी अनेकान्तवाद और स्यादवाद को जैन धर्म का बताती है।
कोई प्रश्न किसी सम्प्रदाय के सिद्धांत पर कथन देकर पूछ सकता है कि कौन-से सही हैं, या नियति जैसा कोई सिद्धांत बताकर पूछ सकता है कि उसे किस सम्प्रदाय ने माना।
कोई प्रश्न यह भी पूछ सकता है कि आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना किसने की, या किन मौर्य शासकों ने उन्हें गुफाएँ दीं।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2021 और 2013 के मिलते-जुलते प्रश्न, उन प्रश्न-पत्रों के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
गया के निकट बराबर पहाड़ी की गुफाएँ अशोक ने किस सम्प्रदाय को समर्पित कीं?
- (a)बौद्ध
- (b)जैन
- (c)आजीवक
- (d)चार्वाक
उत्तर(3) — बाशम अशोक के उन दान-अभिलेखों को दर्ज करते हैं जिनसे बराबर पहाड़ी की गुफाएँ आजीवकों को दी गईं। विकल्प (1), (2) और (4) अन्य परम्पराएँ हैं, वह सम्प्रदाय नहीं जिसे दान पाने वाला बताया गया है। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
मक्खलि गोसाल किस सिद्धांत से सम्बन्धित हैं?
- (a)नियतिवाद
- (b)स्यादवाद
- (c)शून्यवाद
- (d)अनेकान्तवाद
उत्तर(1) — बाशम सर्वव्यापी व्यवस्था के सिद्धांत, नियति, को गोसाल की शिक्षा का मूल बिंदु बताते हैं। विकल्प (2) और (4) RPSC की 2021 की कुंजी में जैन सिद्धांत हैं, और विकल्प (3) महायान बौद्ध दर्शन का है।