राजस्थान के रीति – रिवाजों में ‘आंणौ’ क्या है?
- (1)कुँआ पूजन
- (2)दुल्हन के परिवार द्वारा वर की बारात का डेरा देखने जाना
- (3)विवाह के पश्चात् दुल्हन को दूसरी बार ससुराल भेजना
- (4)जलझूलनी की एकादशी पूजा
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (3), विवाह के पश्चात् दुल्हन को दूसरी बार ससुराल भेजना।
‘आंणौ’ विवाह के बाद दुल्हन के पति के घर बाद में जाने का राजस्थानी नाम है; इसी रस्म को मुकलावा या गौना भी कहते हैं। इसलिए उत्तर विवाह के पश्चात् दुल्हन को दूसरी बार ससुराल भेजना है।
सीताराम लालस का राजस्थानी सबद कोस आंणो का अर्थ बहू को उसके पीहर से या बेटी को उसकी ससुराल से लाना, और गौना, बताता है। वह आंणो-मुकलावौ का अर्थ गौना, द्विरागमन (दूसरी बार आना) देता है।
जोधपुर ज़िला गज़ेटियर (1979) मुकलावा या गोना का वर्णन करता है: बहुत छोटी आयु की दुल्हन यौवन तक अपने माता-पिता के साथ रहती है, फिर उसे विवाह के बाद दूसरी बार ससुराल भेजा जाता है।
अलवर ज़िला गज़ेटियर (1968) भी यही कहता है: दुल्हन गोना के बाद ही दूसरी बार पति के घर जाती है।
आंणौ मुकलावा है: दुल्हन का दूसरी बार ससुराल जाना।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)कुँआ पूजन — कुआँ पूजन एक अलग रस्म है, जो शिशु-जन्म से जुड़ी है, दुल्हन की यात्रा से नहीं।
जोधपुर ज़िला गज़ेटियर (1979) कुआँ पूजन को शिशु-जन्म से जुड़े संस्कारों में गिनाता है। अलवर ज़िला गज़ेटियर (1968) के अनुसार जल पूजा, जिसे आम तौर पर जलवा या कुआ पूजन कहा जाता है, जन्म के छह सप्ताह या 40 दिन बाद होती है, जब माता अन्य महिलाओं के साथ कुएँ पर जाती है।
- (2)दुल्हन के परिवार द्वारा वर की बारात का डेरा देखने जाना — यह विवाह के दौरान दुल्हन के पक्ष द्वारा उठाया गया एक कदम है, दुल्हन की बाद की यात्रा नहीं। विकल्प वर की बारात के डेरे को देखने जाने की बात करता है।
अलवर ज़िला गज़ेटियर (1968) दुल्हन के स्थान पर बारात के डेरे को जनवासा कहता है, और बताता है कि दुल्हन के पक्ष के प्रतिनिधि वहाँ आकर बारात को विवाह के लिए दुल्हन के घर ले जाते हैं।
- (4)जलझूलनी की एकादशी पूजा — जलझूलनी एकादशी एक पर्व का दिन है, विवाह की रस्म नहीं।
उदयपुर ज़िला जनगणना पुस्तिका (2011) जलझूलनी एकादशी की उन शोभायात्राओं का वर्णन करती है जो गणगौर घाट पर समाप्त होती हैं, जहाँ बाल गोपाल की प्रतिमाओं को पिछोला झील में झुलाया जाता है। सीकर ज़िला गज़ेटियर भाद्रपद में नीम का थाना में जलझूलनी मेला दर्ज करता है।
अवधारणा
राजस्थानी विवाह के बाद एक दूसरी रस्म हो सकती थी, जो दुल्हन को पति के घर रहने भेजती थी; गज़ेटियरों के अनुसार बहुत छोटी दुल्हन के लिए यह यौवन तक टलती थी। इसके नामों में आंणौ, मुकलावा और गौना (गोना) शामिल हैं।
गज़ेटियर इसका कारण बताते हैं। अलवर गज़ेटियर (1968) के अनुसार पुराने समय में, जब बाल विवाह आम नियम था, गोना का व्यावहारिक महत्व था और यह दुल्हन के यौवन के बाद होता था। वह जोड़ता है कि 1968 तक, बाल विवाह विरल हो जाने से, गोना विवाह के कुछ ही समय बाद होने लगा था।
स्रोत यात्राओं की गिनती अलग-अलग करते हैं। गज़ेटियर विवाह की विदाई को दुल्हन का ससुराल में पहला ठहराव मानते हैं, इसलिए गोना दूसरा है; लालस गौना को वह रस्म बताते हैं जिसमें वर दुल्हन को पहली बार अपने घर लाता है।
RPSC के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में राजस्थान के इतिहास, कला और संस्कृति के अंतर्गत "राजस्थान में सामाजिक जीवन : मेले एवं त्योहार; सामाजिक रीति–रिवाज तथा परम्पराये; वेशभूषा एवं आभूषण।" सूचीबद्ध है।
ज़िला गज़ेटियर इन रीति-रिवाजों को जीवन की अवस्था-दर-अवस्था दर्ज करते हैं, कुआँ पूजन जैसे जन्म संस्कारों से लेकर तोरण, फेरे, विदा और मुकलावा जैसी विवाह की रस्मों तक। किसी रिवाज का नाम उसे जीवन की एक अवस्था से जोड़ता है।
मुख्य तथ्य
- लालस का राजस्थानी सबद कोस आंणो-मुकलावौ का अर्थ गौना, द्विरागमन देता है।
- जोधपुर ज़िला गज़ेटियर (1979): मुकलावा या गोना में दुल्हन को विवाह के बाद दूसरी बार ससुराल भेजा जाता है।
- अलवर ज़िला गज़ेटियर (1968): जब बाल विवाह आम नियम था, गोना दुल्हन के यौवन प्राप्त करने के बाद ही होता था।
- जोधपुर ज़िला गज़ेटियर (1979) कुआँ पूजन को शिशु-जन्म के संस्कारों में गिनाता है।
- अलवर गज़ेटियर (1968) दुल्हन के स्थान पर बारात के डेरे को जनवासा कहता है।
आंणौ विकल्प (3) है। स्रोत: लालस का राजस्थानी सबद कोस; जोधपुर (1979) और अलवर (1968) ज़िला गज़ेटियर; उदयपुर ज़िला जनगणना पुस्तिका (2011)।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- आंणौ, मुकलावा और गौना एक ही रस्म के नाम हैं; प्रश्न में इनमें से कोई भी नाम आ सकता है।
- कुआँ पूजन विवाह की रस्म जैसा लगता है, पर गज़ेटियर इसे शिशु-जन्म के संस्कारों में रखते हैं।
- यात्राओं की गिनती स्रोत पर निर्भर है: गज़ेटियर गोना को दुल्हन का दूसरी बार ससुराल जाना कहते हैं, क्योंकि विवाह के बाद वह पहले कुछ समय वहाँ रह चुकी होती है।
कोई प्रश्न किसी रिवाज का राजस्थानी नाम देकर उसका अर्थ पूछ सकता है, जैसा यहाँ है।
कोई प्रश्न रिवाजों को जन्म या विवाह जैसी जीवन की अवस्थाओं से सुमेलित भी करवा सकता है, या कोई वर्णन देकर रिवाज का स्थानीय नाम पूछ सकता है।
संबंधित PYQ
UnlockIAS ने इस प्रश्न की तुलना अन्य RAS प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न-पत्रों के प्रश्नों से की; कोई भी जोड़ने लायक मिलता-जुलता प्रश्न नहीं मिला।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
राजस्थान के सामाजिक रीति-रिवाजों में ‘कुआँ पूजन’ किस अवसर से जुड़ा है?
- (a)शिशु का जन्म
- (b)सगाई
- (c)बारात की रवानगी
- (d)परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु
उत्तर(1) — जोधपुर ज़िला गज़ेटियर (1979) कुआँ पूजन को शिशु-जन्म से जुड़े संस्कारों में गिनाता है, और अलवर ज़िला गज़ेटियर (1968) के अनुसार कुआ पूजन जन्म के कुछ सप्ताह बाद होता है। विकल्प (2), विकल्प (3) और विकल्प (4) ऐसे अन्य अवसर हैं जिनके लिए ये गज़ेटियर अलग रस्मों का वर्णन करते हैं। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
राजस्थान में दुल्हन के स्थान पर बारात का डेरा क्या कहलाता है?
- (a)मुकलावा
- (b)जनवासा
- (c)तोरण
- (d)आंणौ
उत्तर(2) — अलवर ज़िला गज़ेटियर (1968) के अनुसार दुल्हन के स्थान पर बारात का डेरा जनवासा कहलाता है। विकल्प (1), मुकलावा, और विकल्प (4), आंणौ, दुल्हन के बाद में ससुराल जाने के नाम हैं; विकल्प (3), तोरण, दुल्हन के द्वार का वह मेहराब है जिसे वर पहुँचने पर छूता है, जैसा जोधपुर गज़ेटियर (1979) बताता है।