भारत के संविधान के अनुच्छेद 103 के तहत, राष्ट्रपति लोकसभा सदस्यों की निरर्हताओं से संबंधित किसी भी प्रश्न पर कोई निर्णय देने से पूर्व निम्नांकित में से किसकी राय लेगा?
- (1)लोकसभाध्यक्ष
- (2)निर्वाचन आयोग
- (3)उच्चतम न्यायालय
- (4)महान्यायवादी
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (2), निर्वाचन आयोग.
अनुच्छेद 103(1) संसद् के किसी सदन के ऐसे वर्तमान सदस्य से संबंधित है जो अनुच्छेद 102(1) में वर्णित किसी निरर्हता से ग्रस्त हो गया हो। इसके अनुसार "वह प्रश्न राष्ट्रपति को विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा।"
इसके बाद अनुच्छेद 103(2) राष्ट्रपति को बाँधता है: "ऐसे किसी प्रश्न पर विनिश्चय करने के पहले राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय लेगा और ऐसी राय के अनुसार कार्य करेगा।"
इसलिए जिस प्राधिकारी की राय आवश्यक है, वह निर्वाचन आयोग है। निर्णय राष्ट्रपति जारी करते हैं, पर "ऐसी राय के अनुसार कार्य करेगा" शब्द आयोग की राय को बाध्यकारी बना देते हैं।
वर्तमान अनुच्छेद 103 संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 द्वारा 20 जून 1979 से प्रतिस्थापित किया गया था, और अक्टूबर 2021 में यही पाठ प्रवृत्त था।
याद रखने का विचार: अनुच्छेद 102(1) की निरर्हता का निर्णय राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की बाध्यकारी राय पर करते हैं; दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल परिवर्तन का निर्णय अध्यक्ष या सभापति करते हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)लोकसभाध्यक्ष — अध्यक्ष एक दूसरी निरर्हता का निर्णय करते हैं: दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल परिवर्तन। उस अनुसूची का पैरा 6(1) ऐसा प्रश्न "ऐसे सदन के, यथास्थिति, सभापति या अध्यक्ष के विनिश्चय के लिए" निर्देशित करता है, "और उसका विनिश्चय अंतिम होगा"।
अनुच्छेद 102(2) दसवीं अनुसूची की निरर्हता को एक अलग आधार बनाता है, जबकि अनुच्छेद 103 अनुच्छेद 102(1) के आधारों पर लागू होता है।
- (3)उच्चतम न्यायालय — उच्चतम न्यायालय राष्ट्रपति को एक दूसरे अनुच्छेद के अंतर्गत राय देता है। अनुच्छेद 143(1) के अंतर्गत राष्ट्रपति व्यापक महत्व का विधि या तथ्य का कोई प्रश्न न्यायालय को निर्देशित कर सकते हैं, और न्यायालय उस पर अपनी राय प्रतिवेदित कर सकता है।
न्यायालय अनुच्छेद 71(1) के अंतर्गत राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित विवादों का निर्णय भी करता है। अनुच्छेद 103(2) इसके स्थान पर निर्वाचन आयोग का नाम लेता है।
- (4)महान्यायवादी — महान्यायवादी भारत सरकार को सलाह देते हैं। अनुच्छेद 76(2) उनका यह कर्तव्य बनाता है कि वे भारत सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दें, और विधिक स्वरूप के ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करें, जो राष्ट्रपति उन्हें निर्देशित करें या सौंपें।
अनुच्छेद 103(2) निर्वाचन आयोग को वह प्राधिकारी बताता है जिसकी राय राष्ट्रपति को लेनी और माननी होती है।
अवधारणा
अनुच्छेद 102(1) बताता है कि कोई व्यक्ति कब संसद् के किसी सदन का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा।
इसके पाँच आधार हैं: भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करना, उस पद को छोड़कर जिसे संसद् ने विधि द्वारा छूट दी है; सक्षम न्यायालय द्वारा घोषित विकृतचित्त होना; अनुन्मोचित दिवालिया होना; भारत का नागरिक न होना, या विदेशी नागरिकता अथवा निष्ठा अर्जित करना; और संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन निरर्हित होना।
इसका स्पष्टीकरण जोड़ता है कि संघ या किसी राज्य का मंत्री केवल मंत्री होने के कारण लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा। अनुच्छेद 102(2) दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता जोड़ता है, जिसका निर्णय करने वाला अलग है।
RPSC के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत "राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद्, संसद, उच्चतम न्यायालय और न्यायिक पुनरावलोकन।" सूचीबद्ध है, और उसी शीर्षक में "भारत निर्वाचन आयोग" भी।
अनुच्छेद 192 इसका राज्य-स्तरीय समकक्ष है। किसी राज्य के विधान-मंडल के सदस्य, जैसे राजस्थान विधानसभा के सदस्य, की अनुच्छेद 191(1) के अंतर्गत निरर्हता का निर्णय राज्यपाल करते हैं, जिन्हें इसी प्रकार निर्वाचन आयोग की राय लेकर उसके अनुसार कार्य करना होता है।
यहाँ अभिप्रेत निर्वाचन आयोग अनुच्छेद 324 का निकाय है, जो संसद्, राज्य विधान-मंडलों और राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों का अधीक्षण करता है। अनुच्छेद 243ट का राज्य निर्वाचन आयोग अलग है।
मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 103(1): संसद् सदस्य अनुच्छेद 102(1) की निरर्हता से ग्रस्त हुआ है या नहीं, इसका विनिश्चय राष्ट्रपति करते हैं, और उनका विनिश्चय अंतिम होता है।
- अनुच्छेद 103(2): विनिश्चय से पहले राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय लेंगे और उसके अनुसार कार्य करेंगे।
- अनुच्छेद 192(2): राज्य विधान-मंडल के सदस्य की निरर्हता के लिए राज्यपाल को निर्वाचन आयोग की राय लेकर उसके अनुसार कार्य करना होता है।
- दसवीं अनुसूची, पैरा 6(1): दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता का विनिश्चय सदन के सभापति या अध्यक्ष करते हैं।
- वर्तमान अनुच्छेद 103 चवालीसवें संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा 20 जून 1979 से प्रतिस्थापित किया गया।
स्रोत: भारत का संविधान, अनुच्छेद 71, 102, 103, 191, 192 और दसवीं अनुसूची।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- हर निरर्हता अध्यक्ष के पास भेज देना: दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल परिवर्तन की निरर्हता का निर्णय अध्यक्ष या सभापति करते हैं, जबकि अनुच्छेद 102(1) के आधार राष्ट्रपति के पास जाते हैं।
- 'राय' को ऐसी सलाह समझ लेना जिसे राष्ट्रपति अनदेखा कर सकें: अनुच्छेद 103(2) कहता है कि राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करेंगे।
- अनुच्छेद 324 के निर्वाचन आयोग को अनुच्छेद 243ट के राज्य निर्वाचन आयोग से मिला देना, जो पंचायत और नगरपालिका निर्वाचन कराता है।
कोई प्रश्न किसी अनुच्छेद का नाम देकर पूछ सकता है कि उसमें किसकी राय या निर्णय आवश्यक है, जैसा यहाँ अनुच्छेद 103 के साथ है।
कोई प्रश्न यह भी पूछ सकता है कि दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता का निर्णय कौन करता है, या अनुच्छेद 192 के अंतर्गत राज्यपाल को कौन-सा प्राधिकारी राय देता है।
संबंधित PYQ
भारत के चुनाव आयोग के संबंध में सही कथन पहचानें ।
- (1) भारत का चुनाव आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है और इसकी स्थापना 25 जनवरी, 1952 को संविधान के अनुसार की गई थी ।
- (2) बहुमत द्वारा निर्णय लेने की शक्ति के साथ बहु–सदस्यीय आयोग की अवधारणा 1995 से लागू है ।
- (3) संविधान के अंतर्गत संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की निर्वाचन पश्चात् निर्योग्यता के मामले में आयोग के पास परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार भी है ।
- (4) राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करता है और उनका कार्यकाल पाँच वर्ष या 60 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है ।
उत्तर(3)
वही संवैधानिक भूमिका, आयोग की ओर से: वह प्रश्न भारत के चुनाव आयोग के संबंध में सही कथन पहचानने को कहता है (RPSC की कुंजी: विकल्प (3), संविधान के अंतर्गत संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की निर्वाचन पश्चात् निर्योग्यता के मामले में आयोग के पास परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार भी है)। यह प्रश्न पूछता है कि अनुच्छेद 103 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसकी राय लेनी होती है।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
भारत के संविधान के अनुच्छेद 192 के अंतर्गत, राजस्थान विधानसभा का कोई सदस्य अनुच्छेद 191(1) के अधीन निरर्हित हुआ है या नहीं, इसका निर्णय करने से पहले राज्यपाल किसकी राय लेंगे?
- (a)विधानसभा अध्यक्ष
- (b)राज्य निर्वाचन आयोग
- (c)निर्वाचन आयोग
- (d)उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश
उत्तर(3) — अनुच्छेद 192(2) राज्यपाल से निर्वाचन आयोग की राय लेने और उसके अनुसार कार्य करने की अपेक्षा करता है। विकल्प (1), अध्यक्ष, दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल परिवर्तन के मामलों का निर्णय करते हैं। विकल्प (2) स्थानीय निर्वाचनों के लिए अनुच्छेद 243ट का निकाय है। विकल्प (4) की अनुच्छेद 192 के अंतर्गत कोई भूमिका नहीं है। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
लोकसभा का कोई सदस्य दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हित हुआ है या नहीं, इस प्रश्न का निर्णय कौन करता है?
- (a)राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग की राय पर
- (b)लोकसभाध्यक्ष
- (c)उच्चतम न्यायालय
- (d)महान्यायवादी
उत्तर(2) — दसवीं अनुसूची का पैरा 6(1) यह प्रश्न अध्यक्ष को निर्देशित करता है, जिनका विनिश्चय अंतिम होता है। विकल्प (1) अनुच्छेद 102(1) के आधारों के लिए अनुच्छेद 103 का मार्ग है। विकल्प (3) और (4) पैरा 6 के अंतर्गत निर्णय करने वाले प्राधिकारी नहीं हैं।