भारत के चुनाव आयोग के संबंध में सही कथन पहचानें ।
- (1)भारत का चुनाव आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है और इसकी स्थापना 25 जनवरी, 1952 को संविधान के अनुसार की गई थी ।
- (2)बहुमत द्वारा निर्णय लेने की शक्ति के साथ बहु–सदस्यीय आयोग की अवधारणा 1995 से लागू है ।
- (3)संविधान के अंतर्गत संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की निर्वाचन पश्चात् निर्योग्यता के मामले में आयोग के पास परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार भी है ।
- (4)राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करता है और उनका कार्यकाल पाँच वर्ष या 60 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (3), संविधान के अंतर्गत संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की निर्वाचन पश्चात् निर्योग्यता के मामले में आयोग के पास परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार भी है ।
इसका स्रोत अनुच्छेद 103 और 192 हैं। यदि यह प्रश्न उठे कि कोई वर्तमान सांसद या विधायक अनुच्छेद 102(1) या 191(1) के अंतर्गत निरर्हित हो गया है या नहीं, तो वह प्रश्न राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास जाता है, जिनका निर्णय अंतिम होता है।
पर निर्णय से पहले राष्ट्रपति या राज्यपाल को चुनाव आयोग की राय लेनी होती है और उसी राय के अनुसार कार्य करना होता है। यही निर्वाचन पश्चात् निर्योग्यता के मामले में आयोग का परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार है — और चुनाव आयोग अपनी भूमिका के वर्णन में भी इसे इसी रूप में बताता है।
बाकी तीन कथनों में से हर एक किसी वास्तविक तथ्य की संख्याएँ बदल देता है: स्थापना का वर्ष, आयोग के बहु-सदस्यीय बनने का वर्ष, या कार्यकाल की दोनों सीमाएँ।
तीन संख्याएँ याद रखिए: 25 जनवरी 1950, 1993, और छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)भारत का चुनाव आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है और इसकी स्थापना 25 जनवरी, 1952 को संविधान के अनुसार की गई थी । — पहला भाग सही है — आयोग अनुच्छेद 324 के अंतर्गत एक स्थायी संवैधानिक निकाय है। तिथि गलत है।
चुनाव आयोग के अनुसार इसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई, संविधान लागू होने से एक दिन पहले। 1952 का संबंध पहले आम चुनावों से है, जो 1951–52 में हुए। 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है।
- (2)बहुमत द्वारा निर्णय लेने की शक्ति के साथ बहु–सदस्यीय आयोग की अवधारणा 1995 से लागू है । — विचार सही है, पर वर्ष गलत है। आरंभ में आयोग में केवल मुख्य चुनाव आयुक्त था। 16 अक्टूबर 1989 को दो चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए, पर वे केवल 1 जनवरी 1990 तक रहे।
1 अक्टूबर 1993 को दो और चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए, और आयोग के अनुसार बहुमत से निर्णय वाला बहु-सदस्यीय मॉडल तभी से लागू है।
- (4)राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करता है और उनका कार्यकाल पाँच वर्ष या 60 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है । — नियुक्ति राष्ट्रपति ही करता है (अनुच्छेद 324(2)), पर कार्यकाल गलत है। कार्यकाल छह वर्ष, या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और पदावधि से जुड़े 2023 के अधिनियम में भी यही छह वर्ष और 65 वर्ष की सीमाएँ हैं। पाँच वर्ष और 60 वर्ष किसी से मेल नहीं खाते।
अवधारणा
भारत का चुनाव आयोग अनुच्छेद 324 से बना है, जो संसद, राज्य विधानमंडलों, और राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण उसे सौंपता है।
इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और उतने अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं जितने राष्ट्रपति तय करे। मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को; अन्य आयुक्तों को केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर।
चुनाव कराने के अलावा, यह राष्ट्रपति और राज्यपालों को सलाह देता है कि वर्तमान विधायक या सांसद निरर्हित हुए हैं या नहीं, और यह सलाह उन पर बाध्यकारी है।
RPSC के 2024 के पाठ्यक्रम में "भारतीय राजनीतिक व्यवस्था" के अंतर्गत "भारत निर्वाचन आयोग" का नाम है। इस प्रश्न के कथन आयोग के अपने वर्णन का अनुसरण करते हैं, और उनमें से तीन में कोई तिथि या संख्या बदली गई है।
राजस्थान के प्रश्नपत्र के लिए राज्य निर्वाचन आयोग को अलग रखिए। यह अनुच्छेद 243K के अंतर्गत एक अलग निकाय है जो पंचायत और नगरपालिका चुनाव कराता है, जबकि भारत का चुनाव आयोग संसद, विधान सभा और दोनों उच्च पदों के चुनाव कराता है।
अनुच्छेद 103 और 192 की परामर्शदात्री भूमिका अनुच्छेद 102(1) और 191(1) की निरर्हताओं से जुड़ी है। दल-बदल के आधार पर निरर्हता का निर्णय इसके बजाय दसवीं अनुसूची के अंतर्गत होता है।
मुख्य तथ्य
- भारत के चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को अनुच्छेद 324 के अंतर्गत हुई।
- 1 अक्टूबर 1993 को दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए; बहुमत से निर्णय लेने वाला बहु-सदस्यीय आयोग तभी से चल रहा है।
- मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त छह वर्ष तक या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, पद पर रहते हैं।
- अनुच्छेद 103(2) और 192(2) के अंतर्गत राष्ट्रपति या राज्यपाल को किसी वर्तमान सदस्य की निरर्हता पर चुनाव आयोग की राय लेनी होती है और उसके अनुसार कार्य करना होता है।
- मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को (अनुच्छेद 324(5))।
तीन कथनों में कोई वर्ष या कार्यकाल की सीमा बदली गई है; जो कथन नहीं बदला, वही उत्तर है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 25 जनवरी 1950 आयोग की स्थापना की तिथि है; 26 जनवरी 1950 संविधान के लागू होने की; 1951–52 पहला आम चुनाव है। तीन पास-पास की तिथियाँ, तीन अलग घटनाएँ।
- आयोग अनुच्छेद 102 और 191 के अंतर्गत निरर्हता पर सलाह देता है, पर निर्णय राष्ट्रपति या राज्यपाल का होता है। दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल-बदल के मामले इसके बजाय अध्यक्ष या सभापति के पास जाते हैं।
- 1989 का पहला बहु-सदस्यीय प्रयोग अल्पकालिक था; बहु-सदस्यीय आयोग 1 अक्टूबर 1993 से है।
एक रूप आयोग के बारे में चार कथन देता है, जिनमें से तीन में तिथि, वर्ष या कार्यकाल बदला होता है, और पूछता है कि कौन-सा सही या गलत है।
दूसरा रूप पूछता है कि किसी सांसद की निरर्हता का प्रश्न तय करने से पहले राष्ट्रपति को किसकी राय लेनी होती है।
तीसरा रूप भारत के चुनाव आयोग की तुलना राज्य निर्वाचन आयोग से करता है — नियुक्ति कौन करता है, हटाया कैसे जाता है, और कौन-से चुनाव कौन कराता है।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2023 और 2021 के मिलते-जुलते प्रश्न, उन प्रश्न-पत्रों के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
यह तय करने से पहले कि राज्य विधान सभा का कोई सदस्य अनुच्छेद 191(1) के अंतर्गत निरर्हित हो गया है या नहीं, राज्यपाल को किसकी राय लेनी होती है?
- (a)मुख्यमंत्री
- (b)भारत का चुनाव आयोग
- (c)राज्य का उच्च न्यायालय
- (d)राज्य निर्वाचन आयोग
उत्तर(2) — अनुच्छेद 192(2) राज्यपाल से अपेक्षा करता है कि वह चुनाव आयोग की राय ले और उसके अनुसार कार्य करे।विकल्प (1) गलत है, क्योंकि इस निर्णय में मुख्यमंत्री की कोई भूमिका नहीं है। विकल्प (3) गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 192 के अंतर्गत उच्च न्यायालय से परामर्श नहीं होता। विकल्प (4) गलत है, क्योंकि राज्य निर्वाचन आयोग स्थानीय निकायों के चुनाव कराता है और यहाँ उसकी कोई भूमिका नहीं है।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
भारत का चुनाव आयोग बहुमत से निर्णय लेने वाले बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में कब से कार्य कर रहा है?
- (a)25 जनवरी 1950
- (b)16 अक्टूबर 1989
- (c)1 जनवरी 1990
- (d)1 अक्टूबर 1993
उत्तर(4) — 1 अक्टूबर 1993 को दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए, और बहु-सदस्यीय आयोग तभी से चल रहा है। विकल्प (1) आयोग की स्थापना की तिथि है, जब उसमें केवल मुख्य चुनाव आयुक्त था। विकल्प (2) दो आयुक्तों की पहली, अल्पकालिक नियुक्ति की तिथि है। विकल्प (3) वह तिथि है जब वह पहली व्यवस्था समाप्त हुई।