तेल को गैल्वनाइज्ड आयरन पॉट में क्यों नहीं रखा जाता है ?
- (a)यह जहरीला यौगिक बनाता है
- (b)यह तेल की गुणवत्ता को कम करता है
- (c)जंग देखी जाती है
- (d)उपरोक्त सभी
सही — D, उपरोक्त सभी। गैल्वनाइज्ड आयरन साधारण लोहा या मृदु इस्पात ही होता है जिस पर धात्विक जस्ते की परत चढ़ी हो; यह परत आमतौर पर साफ़ की हुई और अम्ल-धुली वस्तु को लगभग 450 °C पर पिघले जस्ते के कुंड में डुबोकर चढ़ाई जाती है, जिससे लोहा–जस्ता मिश्रातु की कई परतें आधार धातु से धातुकर्मीय रूप से जुड़ जाती हैं। जस्ता इसलिए चुना जाता है कि वह लोहे के सापेक्ष एनोडी है — Zn²⁺/Zn युग्म का मानक इलेक्ट्रोड विभव −0.76 V है, जबकि Fe²⁺/Fe का −0.44 V — इसलिए किसी भी संक्षारण सेल में जस्ता पहले ख़र्च होता है और नीचे का लोहा बच जाता है। यही बलिदानी (कैथोडी) संरक्षण है, और इसी कारण GI चादरें घरों की छत बनती हैं और GI बाल्टियाँ सादे लोहे की बाल्टियों से अधिक चलती हैं। पर जो क्रियाशीलता जस्ते को अच्छा बलिदानी एनोड बनाती है, वही उसे खाद्य तेल के पात्र के रूप में अयोग्य कर देती है, क्योंकि जस्ता रासायनिक रूप से सक्रिय धातु है और खाद्य तेल उतना निष्क्रिय माध्यम नहीं है जितना दिखता है। रखा हुआ तेल धीरे-धीरे जल-अपघटित होता रहता है, इसलिए उसमें हमेशा मुक्त वसा अम्ल रहते हैं — व्यापार उन्हें अम्ल मान (acid value) के रूप में, प्रति ग्राम मिलीग्राम KOH में, मापता है — और मुक्त वसा अम्ल दुर्बल कार्बोक्सिलिक अम्ल हैं। तेल जो नमी के अंश साथ ले आता है, उनके साथ मिलकर ये अम्ल परत पर हमला करते हैं : Zn + 2RCOOH → (RCOO)₂Zn + H₂, जिससे ज़िंक स्टिएरेट, ज़िंक ओलिएट और ज़िंक पामिटेट जैसे ज़िंक साबुन बनते हैं। आयोग ने इस प्रश्न पर अपनी प्रकाशित टिप्पणी में जिस ‘विषैले ज़िंक लवण’ की बात कही है, वे ठीक यही हैं, इसलिए विकल्प (a) सही है। ये तेल में घुल-मिलकर फैल जाते हैं, उसे धुँधला कर देते हैं और उसका स्वाद बिगाड़ देते हैं, इसलिए विकल्प (b) सही है। और जहाँ-जहाँ बलिदानी परत खा ली जाती है, वहाँ नीचे का लोहा नंगा होकर जंग खाने लगता है, जबकि छूटे हुए लोहे के आयन जाने-पहचाने पूर्व-ऑक्सीकारक उत्प्रेरक हैं जो तेल के पर-ऑक्सीकरण को तेज़ करके उसे विकृतगंधी (rancid) बना देते हैं — आयोग की टिप्पणी जिस संक्षारण और विवर्णन पर समाप्त होती है वह यही है, इसलिए विकल्प (c) भी सही है। तीन छपे हुए प्रभाव, और इनमें से एक भी ग़लत नहीं : अकेला पूर्ण विकल्प (d) है।
- (a)यह जहरीला यौगिक बनाता है — सही है, पर कहानी का केवल एक-तिहाई, इसलिए यह उस प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता जो साथ में ‘उपरोक्त सभी’ भी दे रहा हो। बनने वाले ज़िंक साबुन सचमुच खाद्य-सुरक्षा का ख़तरा हैं — जस्ता एक आवश्यक सूक्ष्म धातु ज़रूर है, अमेरिकी अनुशंसित आहार भत्ता वयस्क पुरुषों के लिए 11 mg और वयस्क महिलाओं के लिए 8 mg प्रतिदिन है, फिर भी एक ही मौखिक खुराक में लगभग 50 mg से ऊपर मिचली, ऐंठन और उल्टी जैसे विषैले प्रभाव दर्ज हुए हैं, और लगातार अधिक मात्रा लेने से कॉपर की कमी हो जाती है। जो अभ्यर्थी (a) पर रुक जाता है, उसने रसायन तो ठीक पढ़ा पर विकल्प-सूची लापरवाही से।
- (b)यह तेल की गुणवत्ता को कम करता है — यह भी सही है और यह भी अधूरा। धातु का सम्पर्क तेल को दो मोर्चों पर बिगाड़ता है : ज़िंक साबुन ख़ुद उसे धुँधला कर देते हैं और धातु जैसा बेस्वादपन दे देते हैं, और परत टूटने के बाद उघड़ा लोहा Fe²⁺/Fe³⁺ छोड़ता है, जो फेंटन-प्रकार की अभिक्रियाओं में लिपिड हाइड्रोपरॉक्साइडों को तोड़कर विकृतगंध, दुर्गंध और कालेपन को तेज़ कर देते हैं। खाद्य-प्रौद्योगिकी का विद्यार्थी स्वाभाविक रूप से इसी विकल्प की ओर खिंचता है, और यही वह जाल है जिस पर यह प्रश्न खड़ा है।
- (c)जंग देखी जाती है — यह भी सही है, और आयोग इसी का नाम सबसे अंत में लेता है : उसकी टिप्पणी ‘पात्र के संक्षारण और विवर्णन’ पर समाप्त होती है। अम्ल का हमला जस्ता उतार देता है, लोहा उघाड़ देता है, और उसके बाद जंग आती है। (c) उत्तर के रूप में जिस कारण विफल होता है वह रासायनिक नहीं, अंकगणितीय है — यह पात्र को हुई हानि का हिसाब देता है पर उस विषैले लवण और बिगड़े तेल के बारे में कुछ नहीं कहता, जिन दोनों का दावा आयोग भी करता है।
पात्र कभी रासायनिक रूप से उदासीन नहीं होता; वह एक अभिकर्मक है जो संयोगवश बर्तन के आकार में ढला है। गैल्वनीकरण एक ही ख़ास समस्या हल करने के लिए है — लोहे का वायुमंडलीय जंग खाना — और वह उसे इस तरह हल करता है कि बाहर की ओर अधिक क्रियाशील धातु रख देता है ताकि संक्षारण उसी का हो। हवा के सम्पर्क में आया जस्ता ज़िंक ऑक्साइड बनाता है, जो फिर कार्बन डाइऑक्साइड लेकर धूसर ज़िंक कार्बोनेट की मलिन परत बना देता है और सतह को सील कर देता है; अमेरिकन गैल्वनाइज़र्स एसोसिएशन गर्म-डुबकी गैल्वनाइज्ड इस्पात के लिए अनुशंसित अधिकतम सतत सेवा तापमान 200 °C रखता है, जिसके ऊपर जस्ता अंतर्धात्विक परत पर से उखड़ने लगता है। यह पूरा संरक्षण हवा और वर्षा-जल के विरुद्ध डिज़ाइन किया गया है। इसमें कुछ भी किसी कार्बनिक अम्ल माध्यम से नहीं बचाता, और यही वह सामान्य सिद्धांत है जिसे प्रश्न परखता है : कोई भी लेप केवल उसी परिवेश के विरुद्ध रक्षक होता है जिसके लिए उसे बनाया गया था। इसीलिए खाद्य-सम्पर्क वाली धातुएँ मज़बूती या सस्तेपन के बजाय निष्क्रियता देखकर चुनी जाती हैं — डिब्बों के लिए टिन-लेपित इस्पात, टाइप 304 का ऑस्टेनिटिक स्टेनलेस स्टील (लगभग 18% क्रोमियम और 8% निकल, जिस पर निष्क्रिय क्रोमियम-ऑक्साइड की फ़िल्म उग आती है), लाख-लेपित या ऐनोडाइज़ किया एल्युमिनियम, या फिर सादा काँच और चमकीली मिट्टी के बर्तन। गैल्वनाइज्ड इस्पात दूसरी सूची में आता है — छत की चादरें, पानी की बाल्टियाँ, पुलिया, संचरण मीनारें — और भारतीय घरों में तेल हमेशा काँच, पत्थर के बर्तन या कलई किए पात्रों में ठीक इसी कारण रखा जाता रहा है।
दो चालों से आप सुरक्षित रूप से (d) तक पहुँच जाते हैं। पहली, ‘उपरोक्त सभी’ वाले विकल्प को सबसे अच्छा कथन चुनने का नहीं, बल्कि एक ग़लत कथन ढूँढ़ने का निर्देश मानिए। (a), (b) और (c) को तीन अलग-अलग सही-या-ग़लत दावों की तरह पढ़िए। इनमें से एक भी ग़लत हुआ तो ‘उपरोक्त सभी’ ढह जाता है और आप बाक़ी में से चुनते हैं; कोई ग़लत नहीं हुआ तो उत्तर मजबूर हो जाता है। यहाँ कोई ग़लत नहीं है, और आयोग की अपनी टिप्पणी तीनों बातों का दावा एक ही वाक्य में करती है — विषैला ज़िंक लवण, तेल की घटी गुणवत्ता, तथा संक्षारण और विवर्णन। दूसरी, निर्णायक तथ्य यह है कि खाद्य तेल शुद्ध, उदासीन ट्राइग्लिसराइड नहीं होता। लगातार चलते जल-अपघटन से उसमें मुक्त वसा अम्ल आते रहते हैं, और मुक्त वसा अम्ल अम्ल ही हैं : यह क्रिया तेल-पर-धातु नहीं, अम्ल-पर-धातु है। यह एक तथ्य चूक जाइए और पूरा प्रश्न चालबाज़ी लगने लगता है, क्योंकि शुद्ध ट्राइग्लिसराइड तो सचमुच जस्ता-मढ़े बर्तन में निष्क्रिय पड़ा रहता। इसे पकड़ लीजिए और हर शाखा यंत्रवत् निकल आती है — अम्ल और जस्ता मिलकर ज़िंक लवण देते हैं (विषैला), वह लवण तेल में चला जाता है (गुणवत्ता), और उतरा हुआ जस्ता लोहे को नंगा कर देता है (संक्षारण)। अंकों का गणित भी देखिए। BPSC की पुस्तिका सही उत्तर पर +1 देती है और, अपने निर्देश 9 के अनुसार, ग़लत उत्तर पर −1/3 काटती है, इसलिए ‘उपरोक्त सभी’ वाले ऐसे प्रश्न में जहाँ आप तीन में से दो उप-दावों की सकारात्मक पुष्टि कर सकते हैं और तीसरे में कोई दोष नहीं निकाल पाते, प्रत्याशित मान ज़ोरदार ढंग से (d) भरने के पक्ष में है, छोड़ देने के नहीं।
- गर्म-डुबकी गैल्वनीकरण में साफ़ की हुई, अम्ल-धुली इस्पात को लगभग 450 °C पर पिघले जस्ते में डुबोया जाता है, जिससे लोहा–जस्ता मिश्रातु की क्रमिक परतों के ज़रिए धातुकर्मीय बंधन बनता है; अमेरिकन गैल्वनाइज़र्स एसोसिएशन सतत सेवा की सीमा 200 °C रखता है, जिसके ऊपर लेप अंतर्धात्विक परत से उखड़ जाता है।
- जस्ता बलिदानी संरक्षण इसलिए देता है कि वह लोहे के सापेक्ष एनोडी है : Zn²⁺/Zn का E° −0.76 V है, जबकि Fe²⁺/Fe का −0.44 V। खुला जस्ता मौसम खाकर पहले ज़िंक ऑक्साइड और फिर ज़िंक कार्बोनेट बनता है — वही धूसर मलिन परत जो गैल्वनाइज्ड सतह को सील कर देती है।
- आयोग जिस अभिक्रिया का वर्णन करता है वह है Zn + 2RCOOH → (RCOO)₂Zn + H₂, जिससे ज़िंक साबुन बनते हैं — ज़िंक स्टिएरेट, ज़िंक ओलिएट, ज़िंक पामिटेट। उसकी प्रकाशित टिप्पणी कहती है कि Zn का लेप तेल के मुक्त वसा अम्लों तथा नमी से अभिक्रिया करके विषैला ज़िंक लवण बनाता है, जो तेल की गुणवत्ता घटाता है और पात्र में संक्षारण तथा विवर्णन करता है।
- जस्ता एक आवश्यक सूक्ष्म धातु है — नेशनल एकेडमीज़ के फ़ूड एंड न्यूट्रिशन बोर्ड द्वारा तय अमेरिकी अनुशंसित आहार भत्ता वयस्क पुरुषों के लिए 11 mg और वयस्क महिलाओं के लिए 8 mg प्रतिदिन है, तथा सह्य ऊपरी सीमा 40 mg; जो 15 mg वाला आँकड़ा अब भी चलन में है वह अधिक्रमित पुराना अमेरिकी RDA है — पर लगभग 50 mg से ऊपर की मौखिक खुराकें विषैले प्रभाव पैदा करती हैं, प्रतिदिन लगभग 100 mg के आसपास लगातार सेवन HDL घटाता है, LDL बढ़ाता है और कॉपर की कमी करा देता है, और गैल्वनाइज्ड धातु की वेल्डिंग करते समय ताज़ा बनी ज़िंक-ऑक्साइड धूम्र साँस में जाने से धातु धूम्र ज्वर, यानी ‘ज़िंक चिल्स’, होता है।
- मुक्त वसा अम्ल की मात्रा, जो अम्ल मान के रूप में mg KOH प्रति ग्राम में बताई जाती है, खाद्य-तेल की गुणवत्ता का मानक व्यापारिक सूचकांक है; परिष्कृत तेलों के लिए अम्ल मान की सीमा कच्ची घानी जैसे शीत-पेषित ग्रेडों से कहीं कम रखी जाती है, इसीलिए गैल्वनाइज्ड पात्र में अपरिष्कृत तेल परिष्कृत तेल से जल्दी बिगड़ता है।

- ‘उपरोक्त सभी’ को सिद्धांततः ठुकरा देना, यह मानकर कि वह सस्ता विकल्प है — यहाँ तीनों उप-दावे स्वतंत्र रूप से सही हैं और आयोग हर एक का दावा करता है
- तेल को रासायनिक रूप से निष्क्रिय मान लेना। वह है नहीं : जल-अपघटन लगातार वसा अम्ल मुक्त करता रहता है, इसलिए भंडार में रखा तेल हल्का अम्लीय होता है और क्रियाशील धातुओं पर हमला करता है
- गैल्वनीकरण को कलई (टिनिंग) समझ लेना। टिन लोहे के सापेक्ष कैथोडी है और खाद्य डिब्बों में ठीक इसीलिए इस्तेमाल होता है कि वह अक्रियाशील है; जस्ता एनोडी और क्रियाशील है, और यही उसे बाहर संरक्षक तथा भोजन के लिए अनुपयोगी बनाता है
BPSC रोज़मर्रा की व्यावहारिक रसायन सादे, कभी-कभी व्याकरण से लड़खड़ाते एक-पंक्ति वाक्यों में पूछता है — रसोई या कार्यशाला का कोई अवलोकन और उसके साथ कारण पूछता ‘क्यों’, और अक्सर अंत में ‘उपरोक्त सभी’, ताकि अंक किसी एक नाम की स्मृति पर नहीं बल्कि तीन दावों की जाँच पर टिके। UPSC लगभग कभी इस तरह नहीं पूछता। वह उसी रसायन को उपभोक्ता-जागरूकता के ढाँचे में बिठा देता है — ‘नो ट्रांस-फ़ैट’ का लेबल ख़रीदार को असल में क्या बताता है, खाद्य पैकेजिंग में बिस्फ़ेनॉल A क्या है, ऐनोडीकरण असल में क्या जमाता है — और आपसे सूची पूरी कराने के बजाय कथनों पर निर्णय कराता है।
एल्युमिनियम की सतहों को अक्सर “ऐनोडाइज़” किया जाता है। इसका अर्थ है किसकी परत का जमाव ?
- (a) क्रोमियम ऑक्साइड
- (b) एल्युमिनियम ऑक्साइड
- (c) निकल ऑक्साइड
- (d) ज़िंक ऑक्साइड
उत्तर(b) एल्युमिनियम ऑक्साइड
वही विचार दूसरी ओर से — धातु पर सतह-परत गढ़कर संक्षारण से बचाव। ऐनोडीकरण एक निष्क्रिय एल्युमिनियम-ऑक्साइड फ़िल्म उगाता है जो रासायनिक रूप से अक्रियाशील है; गैल्वनीकरण एक क्रियाशील जस्ता-फ़िल्म जोड़ता है जो ख़ुद ख़र्च होकर बचाती है। आपके पास किस क़िस्म की परत है, यह जानना ही बताता है कि उस पात्र में तेल सुरक्षित रखा जा सकता है या नहीं।
बिस्फ़ेनॉल A (BPA) क्या है ?
- (a) कैंसर का पता लगाने के लिए एक चिकित्सीय परीक्षण
- (b) खिलाड़ियों द्वारा प्रदर्शन सुधारने के लिए दवाओं के उपयोग की जाँच का परीक्षण
- (c) खाद्य-पैकेजिंग सामग्री के विकास में प्रयुक्त एक रसायन
- (d) एक विशेष प्रकार का मिश्रातु इस्पात
उत्तर(c) खाद्य-पैकेजिंग सामग्री के विकास में प्रयुक्त एक रसायन
वही अंतर्निहित अवधारणा — पात्र से उसमें रखे भोजन में किसी रसायन का प्रवास। BPA पॉलीकार्बोनेट तथा एपॉक्सी डिब्बा-अस्तर से रिसता है, ठीक वैसे ही जैसे गैल्वनाइज्ड बर्तन से जस्ता तेल में रिसता है; दोनों प्रश्न इस समझ को पुरस्कृत करते हैं कि पैकेजिंग निष्क्रिय लपेटन भर नहीं, रासायनिक रूप से खेल में शामिल पक्ष है।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
गैल्वनीकरण लोहे को जंग से बचाता है, क्योंकि जस्ता
- (a)लोहे के साथ ऐसा अक्रियाशील मिश्रातु बनाता है जिसमें पानी घुस नहीं सकता
- (b)लोहे से अधिक विद्युत्-धनात्मक है और इसलिए उसकी जगह ख़ुद संक्षारित होता है
- (c)बिजली का ख़राब चालक है और संक्षारण के परिपथ को तोड़ देता है
- (d)वायुमंडलीय नाइट्रोजन से अभिक्रिया करके रक्षक नाइट्राइड फ़िल्म बना लेता है
उत्तर(b) लोहे से अधिक विद्युत्-धनात्मक है और इसलिए उसकी जगह ख़ुद संक्षारित होता है — Zn²⁺/Zn का E° −0.76 V और Fe²⁺/Fe का −0.44 V होने के कारण इस युग्म में जस्ता एनोड है और पहले क़ुर्बान होता है; इसीलिए संरक्षण वहाँ भी चलता रहता है जहाँ लेप खरोंच से टूट चुका हो।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
खाद्य डिब्बों की इस्पात पर परत चढ़ाने के लिए निम्नलिखित में से किस धातु का उपयोग किया जाता है, मुख्यतः इसलिए कि वह भोजन के प्रति अक्रियाशील है ?
- (a)जस्ता
- (b)टिन
- (c)मैग्नीशियम
- (d)कैडमियम
उत्तर(b) टिन — टिन-लेपित इस्पात (‘टिनप्लेट’) खाद्य डिब्बों में इसलिए काम आती है कि टिन लोहे के सापेक्ष कैथोडी और खाद्य पदार्थों के प्रति रासायनिक रूप से अक्रियाशील है। जस्ता और मैग्नीशियम दोनों एनोडी तथा क्रियाशील हैं और बाहरी बलिदानी संरक्षण में काम आते हैं, भोजन के सम्पर्क में नहीं; कैडमियम विषैली भारी धातु है।