ऑक्टेन रेटिंग बढ़ाने के लिए किस यौगिक का उपयोग किया जाता है ?
- (a)ट्राइमेथिल हेक्सेन
- (b)टेट्रामिथाइल ऑक्साइड
- (c)टेट्राएथिललेड
- (d)ट्राइएथिल टोल्यूनि
सही — C, टेट्राएथिललेड। टेट्राएथिललेड, Pb(C₂H₅)₄, पेट्रोल-युग का शास्त्रीय अपस्फोटरोधी (anti-knock) योजक है। इसका पहला संश्लेषण 1853 में कार्ल याकोब लोविग ने किया, पर वह सत्तर वर्ष अनछुआ पड़ा रहा, जब तक जनरल मोटर्स की अनुसंधान प्रयोगशाला में काम करते हुए थॉमस मिजली जूनियर ने 9 दिसम्बर 1921 को यह नहीं पाया कि उसकी नन्ही-सी मात्रा इंजनों की खटखट रोक देती है। ऑक्टेन रेटिंग यह मापती है कि कोई ईंधन बिना स्वतःप्रज्वलित हुए कितना संपीड़न सह सकता है — संख्या जितनी बड़ी, ईंधन उतना ही अधिक दबाया जा सकता है, इससे पहले कि वह चिनगारी की प्रतीक्षा करने के बजाय अपने आप फट पड़े। यह पैमाना दो संदर्भ हाइड्रोकार्बनों के सहारे परिभाषित है : 2,2,4-ट्राइमेथिलपेंटेन, जिसे आइसो-ऑक्टेन कहते हैं, 100 पर नियत है और n-हेप्टेन 0 पर, इसलिए 91 रेटिंग वाला पेट्रोल उतनी ही खटखट करता है जितना 91 भाग आइसो-ऑक्टेन और 9 भाग n-हेप्टेन का मिश्रण। टेट्राएथिललेड यह संख्या इसलिए बढ़ा देता है कि वह ऊष्मीय दृष्टि से नाज़ुक है : दहन के तापमानों पर उसके लेड–कार्बन बंध टूट जाते हैं, और बने हुए बारीक बँटे सीसे तथा लेड ऑक्साइड उन परॉक्साइड और हाइड्रोपरॉक्साइड मूलकों को समेट लेते हैं जो ज्वाला-पूर्व शृंखला अभिक्रिया चलाते हैं। शृंखला-वाहक मार दीजिए और ज्वाला-अग्रांत से आगे की बची गैस ख़ुद जल नहीं सकती, इसलिए पूरा भरण चिनगारी से ही सहजता से जलता है। व्यावसायिक आकर्षण यह था कि प्रति लीटर एक ग्राम का अंश भर ऑक्टेन संख्या कई अंक ऊपर उठा देता था — ईंधन को ही नए सिरे से गढ़ने की तुलना में कहीं सस्ता — और इसीलिए सीसायुक्त पेट्रोल पचास वर्ष से अधिक छाया रहा और उसने संपीड़न अनुपातों को, और उनके साथ शक्ति तथा दक्षता को, ऊपर चढ़ने दिया। पीछे मुड़कर देखें तो यह बीसवीं सदी के सबसे हानिकारक उत्पादों में भी था : सीसा संचयी तंत्रिकाविष है, ख़ासकर विकसित हो रहे मस्तिष्क के लिए, और वह उत्प्रेरक परिवर्तक (catalytic converter) में लगे प्लेटिनम-समूह उत्प्रेरकों को भी विषाक्त कर देता है, इसलिए सीसा और आधुनिक उत्सर्जन नियंत्रण साथ नहीं रह सकते। इसे चरणबद्ध ढंग से हटाना 1970 के दशक में शुरू हुआ; भारत ने मार्च 2000 में सीसायुक्त पेट्रोल पर प्रतिबंध लगाया, और अल्जीरिया — अंतिम उत्पादक — के जुलाई 2021 में बिक्री रोक देने के बाद UNEP ने 30 अगस्त 2021 को कारों के लिए सीसायुक्त पेट्रोल के विश्वव्यापी अंत की घोषणा कर दी। इसलिए ध्यान रखिए कि प्रश्न का वर्तमान काल पाठ्यपुस्तकीय सम्बन्ध को सुरक्षित रखता है, भारत के आज के व्यवहार को नहीं।
- (a)ट्राइमेथिल हेक्सेन — पूरे प्रश्नपत्र का सबसे चतुर छलावा, क्योंकि यह रासायनिक रूप से आधा सही है। शाखित ऐल्केन सचमुच सीधी शृंखलाओं से कहीं बेहतर खटखट रोकते हैं — रिफ़ाइनरी में समावयवीकरण (isomerisation) का पूरा मक़सद यही है — और ट्राइमेथिलहेक्सेन असली C₉ समावयवी हैं। पर कोई भी ट्राइमेथिलहेक्सेन ईंधन-योजक नहीं है, और ऑक्टेन-100 वाला संदर्भ यौगिक 2,2,4-ट्राइमेथिलपेंटेन है, यानी C₈। जिस तथ्य को अभ्यर्थी आधा-अधूरा याद रखता है, उससे इस विकल्प को केवल एक शब्दांश अलग करता है।
- (b)टेट्रामिथाइल ऑक्साइड — इस नाम का कोई यौगिक ईंधन-योजक के रूप में इस्तेमाल नहीं होता, और मानक नामपद्धति में यह नाम बनता भी नहीं — सबसे सरल मेथिल ईथर डाइमेथिल ईथर, (CH₃)₂O है। इसका खिंचाव यह है कि यह दो असली चीज़ों से एक शब्दांश की दूरी पर बैठा है : टेट्रामिथाइललेड, जो टेट्राएथिललेड के साथ-साथ सचमुच अपस्फोटरोधी के रूप में इस्तेमाल होता था, और MTBE (मेथिल टर्शियरी-ब्यूटिल ईथर), वह ईथर जिसने सीसा हटने के बाद उसकी जगह भरने में मदद की।
- (d)ट्राइएथिल टोल्यूनि — झूठे नाम में लिपटा हुआ सच्चा तथ्य। टोल्यूनि स्वयं एक मानक ऑक्टेन वर्धक है — 100 से काफ़ी ऊपर ऑक्टेन संख्या वाला ऐरोमैटिक, जो रेसिंग ईंधनों में मिलाया जाता है और रिफ़ाइनरी के रिफ़ॉर्मेट में स्वाभाविक रूप से मिलता है, और यह भी एक कारण है कि रिफ़ॉर्मिंग ने सीसे की जगह ले ली। पर वर्धक सादा टोल्यूनि है; ‘ट्राइएथिल टोल्यूनि’ व्यावसायिक उपयोग वाला कोई ईंधन-रसायन नहीं है, और किसी असली यौगिक में काल्पनिक ऐल्किल समूह जोड़ देना BPSC की बार-बार दिखने वाली रचना है।
खटखट (knocking) वह है जो पेट्रोल इंजन में तब होता है जब बढ़ती ज्वाला-अग्रांत से आगे बची अनजली गैस अपने स्वतःप्रज्वलन तापमान पर पहुँचकर अपने आप फट पड़ती है। एक सहज दाब-वृद्धि के बजाय आपस में टकराती दाब-तरंगें बनती हैं, जो धातु जैसी ‘पिंग’ के रूप में सुनाई देती हैं, और लगातार खटखट पिस्टन जला देती है तथा बेयरिंग चौपट कर देती है। चूँकि ऊँचा संपीड़न अनुपात भरण को अधिक ज़ोर से दबाता है, वह ईंधन की हर इकाई से अधिक काम निकालता है — पर वही खटखट की सम्भावना भी बढ़ा देता है, इसलिए इंजन की दक्षता की छत खटखट-प्रतिरोध ही है। ऑक्टेन रेटिंग वही संख्या है जो इस प्रतिरोध को मापती है। यह ऊर्जा-मात्रा या शक्ति का माप नहीं है : ऊँची ऑक्टेन वाला पेट्रोल अधिक जूल नहीं ढोता, वह बस अधिक संपीड़न पर फटने से इनकार कर देता है — इसीलिए कम संपीड़न वाले इंजन में प्रीमियम ईंधन डालने से कुछ नहीं मिलता। दो प्रयोगशाला संख्याएँ बताई जाती हैं। रिसर्च ऑक्टेन नंबर परिवर्ती-संपीड़न परीक्षण इंजन में 600 rpm पर मापा जाता है; मोटर ऑक्टेन नंबर उसी इंजन में 900 rpm पर, पहले से गरम किए भरण और परिवर्ती प्रज्वलन-समय के साथ — कठोर परीक्षण, और वह आमतौर पर 8 से 12 अंक नीचे आता है। भारत, यूरोप और दुनिया का अधिकांश हिस्सा RON बताता है; संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको ऐंटी-नॉक इंडेक्स, (R+M)/2, बताते हैं, जो उसी ईंधन के लिए 4 से 6 अंक कम बैठता है — यही कारण है कि अमेरिकी ‘87 रेगुलर’ और भारतीय ‘91 पेट्रोल’ दिखने से कहीं अधिक पास-पास हैं।
यहाँ तर्क रसायन से नहीं, यथार्थ से विलोपन का है। चार में से तीन नाम ऐसे यौगिक हैं ही नहीं जिन्हें आप ख़रीद सकें : ‘टेट्रामिथाइल ऑक्साइड’ और ‘ट्राइएथिल टोल्यूनि’ व्यावसायिक ईंधन-उपयोग में किसी चीज़ का नाम नहीं हैं, और ट्राइमेथिलहेक्सेन मौजूद तो हैं पर उनमें से कोई योजक नहीं है। केवल एक विकल्प किसी असली, प्रसिद्ध और विशिष्ट ईंधन-रसायन का नाम लेता है, और वह मोटरकार के इतिहास का सबसे कुख्यात योजक है। जब BPSC तीन सम्भावित-सी गढ़ी हुई रचनाओं के बीच एक पहचानने योग्य नाम रखता है, तो कुंजी लगभग हमेशा वही पहचानने योग्य नाम होता है — प्रश्नपत्र किसी नामित यौगिक की स्मृति परख रहा है, आपकी क्रियाविधि गढ़ने की क्षमता नहीं। अकेला निर्णायक तथ्य यह है कि अपस्फोटरोधी अभिकर्ता एक कार्बनिक-सीसा (organo-lead) यौगिक है। ‘सीसा’ को ‘अपस्फोटरोधी’ से जोड़ लीजिए और हर भ्रामक विकल्प एक साथ ढह जाता है, क्योंकि उनमें से एक में भी धातु नहीं है। परीक्षा-कक्ष में ले जाने लायक़ दो ईमानदार टिप्पणियाँ भी हैं। पहली, प्रश्न वर्तमान काल में लिखा है, जबकि टेट्राएथिललेड भारतीय पेट्रोल में मार्च 2000 से और दुनिया भर में 2021 से अवैध है — पाठ्यपुस्तकीय सम्बन्ध का उत्तर दीजिए, आज के बाज़ार का नहीं। दूसरी, योजक और संदर्भ को आपस में मत घोलिए : आइसो-ऑक्टेन ऑक्टेन 100 को परिभाषित करता है और कभी-कभी ख़ुद वर्धक के रूप में मिलाया भी जाता है, पर वह पहले मापदंड है और योजक बाद में, जबकि टेट्राएथिललेड कभी योजक के सिवा कुछ था ही नहीं।
- ऑक्टेन रेटिंग दो संदर्भ हाइड्रोकार्बनों से परिभाषित होती है : 2,2,4-ट्राइमेथिलपेंटेन (आइसो-ऑक्टेन) को 100 और n-हेप्टेन को 0 दिया गया है, इसलिए रेटिंग उस आइसो-ऑक्टेन/n-हेप्टेन मिश्रण में आइसो-ऑक्टेन के प्रतिशत के बराबर होती है जो परीक्षण इंजन में ठीक उतनी ही खटखट करता है।
- रिसर्च ऑक्टेन नंबर परिवर्ती-संपीड़न इंजन में 600 rpm पर मापा जाता है; मोटर ऑक्टेन नंबर 900 rpm पर, पहले से गरम मिश्रण के साथ, और वह लगभग 8 से 12 अंक नीचे रहता है। अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको ऐंटी-नॉक इंडेक्स, (R+M)/2, बताते हैं, जो उसी पेट्रोल के लिए अन्यत्र बताए गए RON से 4 से 6 अंक नीचे होता है।
- टेट्राएथिललेड, Pb(C₂H₅)₄, का संश्लेषण 1853 में कार्ल याकोब लोविग ने किया; उसकी अपस्फोटरोधी क्रिया थॉमस मिजली जूनियर ने 9 दिसम्बर 1921 को जनरल मोटर्स में खोजी। उसी रसायनज्ञ ने आगे चलकर CFC प्रशीतक फ़्रेऑन विकसित किया, जिससे सीसायुक्त पेट्रोल और ओज़ोन-क्षयकारी क्लोरोफ़्लोरोकार्बन दोनों के लिए वही ज़िम्मेदार ठहरते हैं।
- भारत ने मार्च 2000 में सीसायुक्त पेट्रोल पर प्रतिबंध लगाया; संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने 30 अगस्त 2021 को कारों के लिए सीसायुक्त पेट्रोल के वैश्विक अंत की घोषणा की, जब अल्जीरिया — उसे बनाने वाला अंतिम देश — जुलाई 2021 में बिक्री रोक चुका था।
- आधुनिक ऑक्टेन वर्धक MTBE, ETBE, टोल्यूनि और स्वयं आइसो-ऑक्टेन हैं, तथा इथेनॉल भी, जो ऑक्टेन बढ़ाता है पर प्रति लीटर ऊर्जा-मात्रा घटा देता है। भारत में साधारण ग्रेड 91 RON का है, जबकि IS 2796:2017 अलग से 95 RON का प्रीमियम ग्रेड निर्दिष्ट करता है; इस परीक्षा से पहले प्रीमियम ईंधन व्यापक रूप से बिक रहे थे — इंडियनऑयल XP95 और XP100, BPCL स्पीड 97, HPCL पावर 99 — और 10:1 से कम संपीड़न अनुपात पर चलने वाली भारतीय किफ़ायती कारों को ऊँचे ग्रेड से कुछ नहीं मिलता।

- संदर्भ और योजक को घोल देना : आइसो-ऑक्टेन (2,2,4-ट्राइमेथिलपेंटेन) ऑक्टेन 100 को परिभाषित करता है; ऊँची संख्या तक पहुँचने के लिए जो मिलाया जाता था वह टेट्राएथिललेड है
- ऊँची ऑक्टेन संख्या को अधिक ऊर्जा या अधिक शक्ति पढ़ लेना — यह केवल स्वतःप्रज्वलन के प्रतिरोध को मापती है, और कम संपीड़न वाले इंजन में प्रीमियम पेट्रोल से कोई लाभ नहीं मिलता
- बिना यह देखे वर्तमान काल में उत्तर दे देना कि टेट्राएथिललेड भारत में मार्च 2000 से और विश्व भर में 2021 से प्रतिबंधित है; प्रश्न ऐतिहासिक सम्बन्ध की परीक्षा ले रहा है
BPSC पूरा प्रश्न एक ही उपवाक्य में रख देता है और कठिनाई विकल्प-सूची में छिपा देता है — तीन गढ़े हुए या ग़लत नाम वाले यौगिकों के सामने एक असली यौगिक, ताकि अंक तर्क करने पर नहीं, नाम पहचानने पर टिके। UPSC लगभग कभी ‘कौन-सा यौगिक’ नहीं पूछता; वह उसकी जगह परिणाम पूछता है। उसका 2012 वाला प्रश्न सीसायुक्त पेट्रोल के प्रतिबंध को पहले से मान लेता है और पूछता है कि सीसा विषाक्तता के कौन-से स्रोत अब भी बचे हैं, और उसके ईंधन-सम्बन्धी प्रश्न आमतौर पर किसी योजक की पहचान के बजाय उत्सर्जन नियंत्रण, रिफ़ाइनरी उत्पादों या कैलोरी-मान की परीक्षा लेते हैं।
सीसा, चाहे निगला जाए या साँस से भीतर लिया जाए, स्वास्थ्य के लिए संकट है। पेट्रोल में सीसा मिलाने पर प्रतिबंध लग जाने के बाद भी सीसा विषाक्तता के कौन-से स्रोत बचे हुए हैं ? 1. गलन (स्मेल्टिंग) इकाइयाँ 2. क़लम और पेंसिल 3. रंग 4. केश तेल और प्रसाधन सामग्री नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
- (a) केवल 1, 2 और 3
- (b) केवल 1 और 3
- (c) केवल 2 और 4
- (d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर(b) केवल 1 और 3
वही विषय, कहानी में एक क़दम आगे से उठाया गया। BPSC पूछता है कि पेट्रोल में कौन-सा यौगिक मिलाया जाता था; UPSC उसी यौगिक पर लगे प्रतिबंध को अपनी शर्त मानकर पूछता है कि सीसे के और कौन-से रास्ते उसके बाद भी बचे रहते हैं। दोनों का उत्तर देने के लिए वही एक तथ्य चाहिए जिस पर यह कार्ड टिका है — अपस्फोटरोधी योजक एक कार्बनिक-सीसा यौगिक, टेट्राएथिललेड था।
सूची I (औद्योगिक प्रक्रियाएँ) को सूची II (सम्बन्धित उद्योग) से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए : सूची I I. भंजन (क्रैकिंग) II. गलन (स्मेल्टिंग) III. हाइड्रोजनीकरण IV. वल्कनीकरण सूची II A) रबर B) पेट्रोलियम C) कॉपर D) खाद्य वसा कूट :
- (a) I-C, II-B, III-A, IV-D
- (b) I-B, II-C, III-D, IV-A
- (c) I-B, II-C, III-A, IV-D
- (d) I-C, II-B, III-D, IV-A
उत्तर(b) I-B, II-C, III-D, IV-A
यह उसी अवधारणा के रिफ़ाइनरी वाले आधे हिस्से की परीक्षा लेता है। भंजन — और उसके साथ रिफ़ॉर्मिंग तथा समावयवीकरण — वही तरीक़े हैं जिनसे रिफ़ाइनरी भारी प्रभागों को खटखट रोकने वाले शाखित और ऐरोमैटिक अणुओं में बदलती है; सीसे पर प्रतिबंध लगने के बाद टेट्राएथिललेड के बिना ऊँची ऑक्टेन तक पहुँचना ठीक इन्हीं प्रक्रियाओं ने सम्भव किया।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
ऑक्टेन रेटिंग के पैमाने पर जिस यौगिक को ऑक्टेन संख्या 100 दी गई है, वह है
- (a)n-हेप्टेन
- (b)2,2,4-ट्राइमेथिलपेंटेन (आइसो-ऑक्टेन)
- (c)टेट्राएथिललेड
- (d)टोल्यूनि
उत्तर(b) 2,2,4-ट्राइमेथिलपेंटेन (आइसो-ऑक्टेन) — परिभाषा से ही इसे 100 पर नियत किया गया है, जबकि n-हेप्टेन 0 पर नियत है। टेट्राएथिललेड योजक है, संदर्भ नहीं, और टोल्यूनि ऐसा ऐरोमैटिक वर्धक है जिसकी ऑक्टेन संख्या 100 से ऊपर पड़ती है।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
सीसायुक्त पेट्रोल को दुनिया भर से मुख्यतः इसलिए हटाया गया कि टेट्राएथिललेड
- (a)पेट्रोल का कैलोरी-मान घटा देता था
- (b)संचयी तंत्रिकाविष है और उत्प्रेरक परिवर्तकों के उत्प्रेरक को नष्ट कर देता है
- (c)ऊँचे संपीड़न अनुपातों पर इंजनों में खटखट पैदा करता था
- (d)आधुनिक वाहनों की ईंधन टंकियों को संक्षारित कर देता था
उत्तर(b) संचयी तंत्रिकाविष है और उत्प्रेरक परिवर्तकों के उत्प्रेरक को नष्ट कर देता है — सीसा विकसित हो रहे तंत्रिका तंत्र को क्षति पहुँचाता है और त्रि-मार्गी उत्प्रेरक की प्लेटिनम-समूह धातुओं को विषाक्त कर देता है, इसलिए सीसायुक्त ईंधन उत्सर्जन नियंत्रण के साथ नहीं चल सकता। भारत ने इसे मार्च 2000 में प्रतिबंधित किया और UNEP ने 30 अगस्त 2021 को इसके वैश्विक अंत की घोषणा की।