निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिएः
सही प्रकार का समाजीकरण होने पर समाज के सदस्य सामाजिक नियमों के अनुकूल व्यवहार करते हैं। यदि गलत समाजीकरण हो जाता है तो विपथगामी व्यवहार में वृद्धि होती है। इसलिए समाजीकरण के दायित्व से सम्बन्धित जो व्यक्ति होते हैं, उन पर सामाजिक नियंत्रण का बहुत बड़ा दायित्व होता है। बॉटोमोर के अनुसार शिक्षा बच्चे के प्रारम्भिक समाजीकरण का सबसे दृढ़ आधार है। शैक्षिक व्यवस्था नैतिक विचारों को स्पष्ट करके और अनुकूल, व्यक्ति का बौद्धिक विकास करके सामाजिक नियमों में योगदान देती है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को समाज की विभिन्न इकाइयों से परिचित कराना है। शिक्षा का केवल वैज्ञानिक महत्व ही नहीं, अपितु उसकी व्यावहारिक उपयोगिता भी है। सामाजिक नियंत्रण के अन्य साधन जहाँ व्यक्ति को दण्डात्मक ढंग से सामाजिक नियमों को मानने के लिए बाध्य करते हैं, वहीं शिक्षा उसे स्वतः आत्म-विश्लेषण द्वारा अनुप्राणित ढंग से सामाजिक नियमों का पालन करने की प्रेरणा देती है। एक तो समाजीकरण हमें करुणामय व्यवहार की जानकारी कराता है, दूसरी व्यवहार की प्रगति की निगरानी भी हमसे सम्पादित कराता है। अतः करणीय व्यवहार के प्रति सन्तुलन रखकर समाजीकरण, जो शिक्षा का एक भाग है, समाज की सबसे बड़ी नियंत्रण शक्ति के रूप में कार्य करता है। समाजीकरण अन्यावस्था की अन्तर्गत परिवर्तित स्थिति से स्वतंत्र सामान्य रूप से सामूहिक क्रियाओं के संचालन में सहायक होता है। परिणामस्वरूप सामाजिक नियंत्रण बना रहता है। शिक्षा के सामाजिक नियंत्रण का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य हमारे जीवन में ज्ञान का विकास करना है। जब हमारे ज्ञान का विकास होगा तब हम इस स्थिति में होंगे कि अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित की पहचान कर सकें। जब हम उचित को अनुचित से अलग कर लेंगे तब हम अनुचित व्यवहार को जीवन से हटा देंगे तथा उचित व्यवहार का प्रयोग करेंगे। उचित व्यवहार वही होगा जो सामाजिक मानदण्डों के अनुरूप है। अतः हम ज्ञान के विकास के साथ उचित व्यवहार को समझेंगे तथा उसका पालन करेंगे जिससे सामाजिक नियंत्रण स्वतः बना रहेगा। शिक्षा हमें तर्क प्रदान करती है तथा भावुक, आत्मकेन्द्रित एवं व्यक्तिगत निर्णयों से मुक्त होने की प्रेरणा देती है। इसलिए हम देखते हैं कि एक अशिक्षित व्यक्ति आवेगों में आकर कुछ भी अनुचित कर बैठता है, जबकि शिक्षित व्यक्ति कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी धैर्यपूर्ण निर्णय लेकर अपने विवेक का परिचय देता है। संक्षेप में, शिक्षा व्यक्ति को आत्म-संयम सिखाती है। चूँकि व्यक्ति समाज की इकाई है, अतः व्यक्ति के स्तर पर नियंत्रण रहने से सामाजिक नियंत्रण स्वतः हो जाता है।