भारत में 1991 के बाद शुरू हुए वित्तीय क्षेत्र के सुधारों से निम्न में से कौन सा सम्बन्धित नहीं है ?
- (1)पूँजी पर्याप्तता
- (2)गैर–आस्तिकारी परिसम्पत्तियाँ
- (3)एफ.आर.बी.एम. अधिनियम (फिस्कल रिस्पांसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट)
- (4)सरफेसी अधिनियम
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (3), एफ.आर.बी.एम. अधिनियम (फिस्कल रिस्पांसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट).
प्रश्न पूछता है कि कौन-सी मद 1991 के बाद शुरू हुए वित्तीय क्षेत्र के सुधारों — बैंकों और वित्तीय बाज़ारों के सुधारों — से सम्बन्धित नहीं है।
RBI के विवरण के अनुसार, बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र के सुधारों का एजेंडा मुख्यतः एम. नरसिम्हम की अध्यक्षता वाली दो समितियों की 1991 और 1998 की रिपोर्टों से चला। पूँजी पर्याप्तता मानदंड, गैर-निष्पादित आस्तियों (NPA) के विवेकपूर्ण मानदंड और SARFAESI अधिनियम, तीनों इसी पक्ष के हैं।
एफ.आर.बी.एम. अधिनियम — राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 — एक अलग पक्ष का है: राजकोषीय सुधार। यह केंद्र सरकार के अपने घाटे और ऋण के नियम तय करता है, बैंकों के विनियमन के नहीं।
एक जगह दोनों पक्ष मिलते हैं। FRBM अधिनियम के अनुरूप, अप्रैल 2006 से RBI ने सरकारी प्रतिभूतियों के प्राथमिक निर्गमों में अभिदान बंद कर दिया। इससे RBI की भूमिका बदली, पर अधिनियम का उद्देश्य राजकोषीय अनुशासन है।
याद रखने की बात: वित्तीय क्षेत्र के सुधार बैंकों और बाज़ारों से जुड़े हैं; राजकोषीय सुधार सरकार के बजट से।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)पूँजी पर्याप्तता — पूँजी पर्याप्तता वित्तीय क्षेत्र का एक मूल सुधार है। बेसल मानदंडों के अनुरूप, RBI ने अप्रैल 1992 में बैंकों के लिए जोखिम-भारित आस्तियों की तुलना में पूँजी का अनुपात (CRAR) लागू करने का निर्णय लिया।
यह अनुपात पहले 8% तय हुआ और मार्च 2000 में बढ़ाकर 9% किया गया। इससे बैंकों को अपने ऋणों और निवेशों के जोखिम के अनुपात में पूँजी रखनी पड़ती है।
- (2)गैर–आस्तिकारी परिसम्पत्तियाँ — यह मद गैर-निष्पादित आस्तियों (NPA) की है; प्रश्न-पत्र का अंग्रेज़ी रूप इसे नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स कहता है। NPA के नियम उसी सुधार-पक्ष का हिस्सा हैं।
आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण और प्रावधानीकरण के विवेकपूर्ण मानदंड तय करते हैं कि कोई ऋण कब गैर-निष्पादित माना जाएगा और बैंक को उसके लिए कितना अलग रखना होगा।
ये मानदंड समय के साथ कड़े किए गए; NPA वर्गीकरण के लिए 90 दिन का अतिदेय मानदंड मार्च 2004 से लागू हुआ।
- (4)सरफेसी अधिनियम — वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन (SARFAESI) अधिनियम, 2002 खराब ऋणों पर केंद्रित एक वित्तीय क्षेत्र सुधार है।
यह प्रतिभूत लेनदारों को किसी न्यायालय या अधिकरण के हस्तक्षेप के बिना अपना प्रतिभूति हित लागू करने का अधिकार देता है, जिससे ऋणदाताओं को चूककर्ताओं से बकाया वसूलने का तेज़ रास्ता मिलता है।
अवधारणा
1991 के बाद भारत के सुधार कई पक्षों पर चले, और इनमें से दो आपस में आसानी से गड्डमड्ड हो जाते हैं।
वित्तीय क्षेत्र के सुधार बैंकों और वित्तीय बाज़ारों को मज़बूत करते हैं: पूँजी पर्याप्तता मानदंड, खराब ऋणों की पहचान के विवेकपूर्ण नियम, ऋण-जोखिम की सीमाएँ, प्रकटीकरण, और ऐसे कानून जो ऋणदाताओं को बकाया वसूलने में मदद करते हैं, जैसे SARFAESI अधिनियम, 2002।
राजकोषीय सुधार सरकार के अपने वित्त को अनुशासित करते हैं: कर सुधार, सब्सिडी पर नियंत्रण, और घाटे व ऋण पर नियम-आधारित सीमाएँ। केंद्र का FRBM अधिनियम, 2003 मुख्य राजकोषीय नियम है। राज्यों ने अपने-अपने अधिनियम बनाए, जैसे राजस्थान का FRBM अधिनियम, 2005।
RPSC के 2024 के प्रारंभिक पाठ्यक्रम में "आर्थिक अवधारणाएँ एवं भारतीय अर्थव्यवस्था" के अंतर्गत "आर्थिक विकास एवं आयोजन" में "प्रमुख आर्थिक समस्याएं एवं सरकार की पहल, आर्थिक सुधार एवं उदारीकरण" सूचीबद्ध है।
उसी शीर्षक की "अर्थशास्त्र की मूलभूत अवधारणाएं" में "बजट निर्माण, बैंकिंग, लोक–वित्त, वस्तु एवं सेवा कर, राष्ट्रीय आय, संवृद्धि एवं विकास का आधारभूत ज्ञान" और "राजकोषीय एवं मौद्रिक नीतियाँ" भी हैं। बैंकिंग सुधार और राजकोषीय नियम इन्हीं दो अलग पक्षों पर बैठते हैं।
1991 के बाद के सुधार एक साथ कई मोर्चों पर चले, और अलग-अलग मोर्चों के उपाय एक ही दौर के हैं। पूँजी पर्याप्तता मानदंड (निर्णय 1992), SARFAESI अधिनियम (2002) और FRBM अधिनियम (2003) समय में पास-पास हैं, पर उद्देश्य में अलग।
राजकोषीय पक्ष राज्य स्तर तक भी पहुँचता है। राजस्थान का FRBM अधिनियम, 2005 राज्य के बजट के लिए घाटे और ऋण के लक्ष्य तय करता है।
मुख्य तथ्य
- एम. नरसिम्हम की अध्यक्षता वाली वित्तीय प्रणाली पर समिति (1991) और बैंकिंग क्षेत्र पर समिति (1998) ने, RBI के विवरण के अनुसार, भारत के बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र के सुधारों का एजेंडा मुख्य रूप से आगे बढ़ाया।
- RBI ने अप्रैल 1992 में बैंकों के लिए जोखिम-भारित आस्तियों की तुलना में पूँजी का अनुपात लागू करने का निर्णय लिया; यह पहले 8% था और मार्च 2000 में बढ़ाकर 9% किया गया।
- गैर-निष्पादित आस्तियों के वर्गीकरण के लिए 90 दिन का अतिदेय मानदंड मार्च 2004 से अपनाया गया।
- SARFAESI अधिनियम, 2002 प्रतिभूत लेनदारों को न्यायालय या अधिकरण के हस्तक्षेप के बिना प्रतिभूति हित लागू करने का अधिकार देता है।
- FRBM अधिनियम के अनुरूप, अप्रैल 2006 तक RBI सरकारी प्रतिभूतियों के प्राथमिक निर्गमों से हट गया।
RBI की भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति और प्रगति रिपोर्ट 2003-04 (अध्याय VII) पूँजी पर्याप्तता, NPA मानदंडों और SARFAESI को वित्तीय क्षेत्र सुधार के उपायों के रूप में बताती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- FRBM अधिनियम ने सरकारी बॉण्ड बाज़ार में RBI की भूमिका बदली, इसलिए वह वित्तीय क्षेत्र का कानून लग सकता है। उसका उद्देश्य राजकोषीय है: सरकार के घाटे और ऋण को सीमित करना।
- NPA मानदंड और SARFAESI अधिनियम, दोनों खराब ऋणों से जुड़े हैं, पर अलग चरणों पर। NPA मानदंड तय करते हैं कि ऋण कब खराब माना जाए और उसके लिए कितना प्रावधान हो; SARFAESI ऋणदाताओं को वसूली के लिए प्रतिभूति लागू करने देता है।
- पूँजी पर्याप्तता बैंक की पूँजी और जोखिम-भारित आस्तियों का अनुपात है। यह FRBM कानूनों के तहत तय होने वाले राजकोषीय घाटा–GDP जैसे सरकारी अनुपात से अलग है।
कोई प्रश्न सुधार की एक श्रेणी का नाम देकर उसी दौर के कई उपाय सूचीबद्ध कर सकता है और पूछ सकता है कि कौन-सा उस श्रेणी से सम्बन्धित नहीं है।
कोई प्रश्न ऐसे विकल्प दे सकता है जो सभी वास्तविक सुधार हों, पर बैंकिंग, राजकोषीय, बाह्य क्षेत्र या औद्योगिक नीति जैसे अलग-अलग पक्षों से लिए गए हों।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2023 के मिलते-जुलते प्रश्न, उस प्रश्न-पत्र के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
निम्नलिखित में से कौन-सा अधिनियम वित्तीय क्षेत्र सुधार के बजाय राजकोषीय सुधार का उपाय है?
- (a)SARFAESI अधिनियम, 2002
- (b)राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003
- (c)दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016
- (d)बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋण वसूली अधिनियम, 1993
उत्तर(2) — FRBM अधिनियम सरकार के घाटे और ऋण की सीमाएँ तय करता है।विकल्प (1), (3) और (4) इस बात से जुड़े हैं कि ऋणदाता बकाया कैसे वसूलें या विफल कर्जदारों का समाधान कैसे हो, जो वित्तीय क्षेत्र का सुधार है।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
अप्रैल 1992 के निर्णय के बाद जब RBI ने बैंकों के लिए जोखिम-भारित आस्तियों की तुलना में पूँजी का अनुपात (CRAR) लागू किया, तब यह अनुपात प्रारंभ में तय किया गया –
- (a)6 प्रतिशत
- (b)8 प्रतिशत
- (c)9 प्रतिशत
- (d)12 प्रतिशत
उत्तर(2) — CRAR अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुरूप 8% से शुरू हुआ।विकल्प (3), 9%, वह स्तर है जिस तक इसे मार्च 2000 में बढ़ाया गया। विकल्प (1) और (4) किसी भी चरण से मेल नहीं खाते।