संविधान के किस अनुच्छेद के तहत राजस्थान सरकार के अधीन सेवारत व्यक्ति को प्रभावित करने वाले अनुशासनात्मक मामलों पर राजस्थान लोक सेवा आयोग से अनिवार्य परामर्श का प्रावधान है ?
- (1)अनुच्छेद 320(3)
- (2)अनुच्छेद 318(1)
- (3)अनुच्छेद 322(2)
- (4)अनुच्छेद 325(4)
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (1), अनुच्छेद 320(3).
अनुच्छेद 320 लोक सेवा आयोगों के कृत्य बताता है। इसका खंड (3) उन विषयों की सूची देता है जिन पर संघ या राज्य लोक सेवा आयोग से परामर्श किया जाएगा।
उस खंड का उप-खंड (c) उन सभी अनुशासनात्मक मामलों को शामिल करता है जो भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन सिविल हैसियत में सेवारत व्यक्ति को प्रभावित करते हैं, जिनमें ऐसे मामलों से जुड़े ज्ञापन या याचिकाएँ भी हैं।
राजस्थान सरकार के अधीन सेवारत व्यक्ति के लिए राज्य आयोग राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) है। इसलिए अनुशासनात्मक मामलों पर RPSC से परामर्श अनुच्छेद 320(3) से आता है।
इसी खंड में एक परंतुक है: राज्यपाल विनियम बनाकर वे विषय तय कर सकता है जिन पर आयोग से परामर्श आवश्यक नहीं होगा। अनुच्छेद 320(5) ऐसे विनियमों को राज्य विधानमंडल के समक्ष रखना अनिवार्य करता है।
विकल्प (2), (3) और (4) ऐसे खंड बताते हैं जो हैं ही नहीं: अनुच्छेद 318, 322 और 325 क्रमांकित खंडों में बँटे नहीं हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (2)अनुच्छेद 318(1) — अनुच्छेद 318 में कोई खंड (1) नहीं है। यह एक ही प्रावधान है, जो राज्य आयोग के मामले में राज्यपाल को सदस्यों और कर्मचारियों की संख्या तथा उनकी सेवा-शर्तों पर विनियम बनाने देता है।
इसका परंतुक सदस्य की रक्षा करता है: नियुक्ति के बाद उसकी सेवा-शर्तें उसके अहित में नहीं बदली जा सकतीं। यह अनुशासनात्मक मामलों पर परामर्श के बारे में कुछ नहीं कहता।
- (3)अनुच्छेद 322(2) — अनुच्छेद 322 एक ही पैराग्राफ़ का है, उसमें कोई खंड (2) नहीं है। यह प्रावधान करता है कि आयोग के व्यय, जिनमें सदस्यों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और पेंशन शामिल हैं, संचित निधि पर भारित होंगे — राज्य आयोग के लिए राज्य की संचित निधि पर।
यह आयोग के वित्त की रक्षा करता है; अनुशासनात्मक परामर्श से इसका संबंध नहीं है।
- (4)अनुच्छेद 325(4) — अनुच्छेद 325 लोक सेवा आयोगों के बारे में है ही नहीं। यह निर्वाचन से संबंधित भाग XV में है और हर प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक साधारण निर्वाचक नामावली का प्रावधान करता है।
किसी व्यक्ति को केवल धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर उस नामावली से बाहर नहीं रखा जा सकता। यह अनुच्छेद भी एक ही पैराग्राफ़ का है, उसमें कोई खंड (4) नहीं है।
अवधारणा
संविधान के भाग XIV में अनुच्छेद 315 से 323 लोक सेवा आयोगों से संबंधित हैं।
राज्य आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करता है (अनुच्छेद 316), और वे छह वर्ष या 62 वर्ष की आयु तक पद पर रहते हैं। उन्हें हटाने का अधिकार राष्ट्रपति को है (अनुच्छेद 317)। आयोग के व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं (अनुच्छेद 322)।
अनुच्छेद 320(3) आयोग को इन विषयों पर सलाहकार बनाता है: भर्ती की पद्धतियाँ; नियुक्ति, पदोन्नति और स्थानांतरण के सिद्धांत तथा अभ्यर्थियों की उपयुक्तता; अनुशासनात्मक मामले; विधिक खर्च के दावे; क्षति-पेंशन के दावे; और राज्यपाल द्वारा सौंपा गया कोई अन्य विषय।
यह सलाह बाध्यकारी नहीं है। अनुच्छेद 323(2) के अंतर्गत आयोग हर वर्ष राज्यपाल को प्रतिवेदन देता है। राज्यपाल उसे विधानमंडल के समक्ष रखवाता है, और जहाँ आयोग की सलाह नहीं मानी गई, वहाँ उसके कारण भी बताए जाते हैं।
RPSC वही राज्य लोक सेवा आयोग है जो स्वयं RAS परीक्षा आयोजित करता है। पाठ्यक्रम का शीर्षक "राजस्थान की राजनीतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था" इसे "संस्थाएं" के अंतर्गत "राजस्थान लोक सेवा आयोग" के नाम से सूचीबद्ध करता है।
RPSC 22 दिसम्बर 1949 को अस्तित्व में आया, और इसका कार्यालय अजमेर में है। इसके पहले अध्यक्ष सर एस.के. घोष थे, जो उस समय राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश थे।
1951 में राजप्रमुख ने आयोग के लिए दो विनियम जारी किए। इनमें से एक आयोग के कृत्यों की परिसीमा से संबंधित 1951 का विनियम है — उसी प्रकार का विनियम जिसकी अनुमति अनुच्छेद 320(3) का परंतुक देता है।
लोक सेवा आयोग वाले अनुच्छेदों की बनावट अलग-अलग है। अनुच्छेद 316, 317, 320 और 323 क्रमांकित खंडों में बँटे हैं; अनुच्छेद 318 और 322 नहीं।
मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 320(3)(c) राज्य के अधीन सिविल हैसियत में सेवारत व्यक्ति को प्रभावित करने वाले सभी अनुशासनात्मक मामलों पर लोक सेवा आयोग से परामर्श अनिवार्य करता है।
- अनुच्छेद 320(3) का परंतुक राज्यपाल को विनियम द्वारा वे विषय तय करने देता है जिन पर राज्य आयोग से परामर्श आवश्यक नहीं।
- अनुच्छेद 320(5) ऐसे विनियमों को कम से कम चौदह दिन तक राज्य विधानमंडल के समक्ष रखना अनिवार्य करता है।
- अनुच्छेद 323(2) के अंतर्गत राज्य आयोग हर वर्ष राज्यपाल को प्रतिवेदन देता है, जो उसे विधानमंडल के समक्ष रखवाता है।
- RPSC 22 दिसम्बर 1949 को अस्तित्व में आया; इसके पहले अध्यक्ष सर एस.के. घोष थे, जो उस समय राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश थे।
केवल अनुच्छेद 320(3) बताए गए रूप में मौजूद है और अनुशासनात्मक परामर्श से संबंधित है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- गढ़े हुए खंड वाले अनुच्छेद-क्रमांक पर भरोसा कर लेना। अनुच्छेद 318, 322 और 325 में क्रमांकित खंड नहीं हैं, इसलिए 318(1), 322(2) और 325(4) उत्तर नहीं हो सकते।
- अनुच्छेद 320(3) को अनुच्छेद 311 से मिला देना। अनुच्छेद 311 पदच्युति या पद से हटाए जाने के विरुद्ध सिविल सेवक के अपने रक्षोपाय देता है; अनुच्छेद 320(3)(c) आयोग से परामर्श अनिवार्य करता है।
- परामर्श किए जाने को सलाह मानने की बाध्यता समझ लेना। आयोग सलाह देता है; जहाँ सलाह नहीं मानी जाती, अनुच्छेद 323 विधानमंडल के समक्ष कारण रखने की अपेक्षा करता है।
लोक सेवा आयोग पर प्रश्न कोई कृत्य, शक्ति या प्रक्रिया देकर उसका अनुच्छेद या खंड पूछ सकता है, या अनुच्छेद देकर पूछ सकता है कि वह क्या प्रावधान करता है।
वह राज्यपाल द्वारा नियुक्ति, राष्ट्रपति द्वारा हटाया जाना, कार्यकाल या वार्षिक प्रतिवेदन को भी परख सकता है।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2023 और 2016 के मिलते-जुलते प्रश्न, उन प्रश्न-पत्रों के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
राजस्थान लोक सेवा आयोग संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्यपाल को अपना वार्षिक प्रतिवेदन देता है?
- (a)अनुच्छेद 315
- (b)अनुच्छेद 317
- (c)अनुच्छेद 320
- (d)अनुच्छेद 323
उत्तर(4) — अनुच्छेद 323(2) राज्य आयोग से हर वर्ष राज्यपाल को प्रतिवेदन देने की अपेक्षा करता है। अनुच्छेद 315 (1) लोक सेवा आयोगों का प्रावधान करता है, अनुच्छेद 317 (2) सदस्यों को हटाने और निलंबित करने से संबंधित है, और अनुच्छेद 320 (3) उनके कृत्य बताता है। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
राजस्थान लोक सेवा आयोग के व्यय, जिनमें उसके सदस्यों और कर्मचारियों के वेतन और पेंशन शामिल हैं, किस पर भारित होते हैं?
- (a)भारत की संचित निधि
- (b)राज्य की संचित निधि
- (c)राज्य की आकस्मिकता निधि
- (d)राज्य का लोक लेखा
उत्तर(2) — अनुच्छेद 322 राज्य आयोग के व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित करता है। भारत की संचित निधि (1) संघ लोक सेवा आयोग के व्यय वहन करती है। आकस्मिकता निधि (3) और लोक लेखा (4) का अनुच्छेद 322 में नाम नहीं है।