कुषाण वंश के कैडफिसेस द्वितीय ने निम्नलिखित में से कौन सी उपाधि धारण की ?
- (1)सकारी
- (2)सर्वलोकेश्वर
- (3)महाक्षत्रप
- (4)सिंह चन्द्र
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (2), सर्वलोकेश्वर।
सर्वलोकेश्वर (सर्वलोक-ईश्वर, 'समस्त लोक का स्वामी') कैडफिसेस द्वितीय की उपाधि है, वह कुषाण राजा जो अपने सिक्कों से विम (वेम) कैडफिसेस के नाम से जाना जाता है।
यह उपाधि उसके सिक्कों पर है। पर्सी गार्डनर की ब्रिटिश म्यूज़ियम सूची (1886) खरोष्ठी लेख 'महरजस रजदिरजस, सर्वलोग इश्वरस महिश्वरस … त्रदत' दर्ज करती है और सर्वलोग इश्वरस का अर्थ 'समस्त संसार का अधिपति' बताती है।
एच. सी. रायचौधुरी की 'पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ़ एंशिएंट इंडिया' इस लेख का अनुवाद देती है: कैडफिसेस द्वितीय को 'महान राजा, राजाओं का राजा, समस्त लोक का स्वामी, महीश्वर, रक्षक' कहा गया है।
रायचौधुरी आगे लिखते हैं कि कैडफिसेस द्वितीय ने स्वर्ण सिक्के जारी करना शुरू किया, उसके स्वर्ण और ताँबे के सिक्के द्विभाषी थे, और सिक्कों के पृष्ठ भाग पर शिव की उपासना अंकित थी।
याद रखने की बात: विम कैडफिसेस = महाराज, राजाधिराज, सर्वलोक-ईश्वर, महीश्वर।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)सकारी — सकारी (शकारि) का अर्थ है 'शकों का शत्रु'। डी. सी. सरकार की 'एंशिएंट मालवा एंड द विक्रमादित्य ट्रेडिशन' (1969) बताती है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय, जिसने लगभग चौथी शताब्दी ई. के अंत में उज्जयिनी के शकों का उन्मूलन किया, परम्परा में विक्रमादित्य शकारि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
सकारी उसी विक्रमादित्य परम्परा की उपाधि है, किसी कुषाण राजा की नहीं।
- (3)महाक्षत्रप — महाक्षत्रप, 'महान क्षत्रप', क्षत्रप की उपाधि थी, किसी कुषाण सम्राट की नहीं। रायचौधुरी बताते हैं कि शक शासक रुद्रदामन का वर्ष 72 का जूनागढ़ अभिलेख कहता है कि उसने महाक्षत्रप की उपाधि स्वयं अर्जित की।
वे कनिष्क के साम्राज्य के पूर्वी भाग पर शासन करते एक महाक्षत्रप, खरपल्लान, का भी उल्लेख करते हैं। महाक्षत्रप रुद्रदामन के लिए उत्तर होता, कैडफिसेस द्वितीय के लिए नहीं।
- (4)सिंह चन्द्र — रायचौधुरी सिंहचन्द्र को, नरेन्द्रचन्द्र, नरेन्द्रसिंह और सिंहविक्रम के साथ, गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय के नामों में गिनाते हैं, और सिंहचन्द्र को उसके सिंह-निहन्ता प्रकार के स्वर्ण सिक्कों से जोड़ते हैं।
इसलिए सिंह चन्द्र एक गुप्त नाम है, कुषाण उपाधि नहीं।
अवधारणा
प्राचीन भारतीय राजा उपाधियों के माध्यम से अपनी शक्ति की घोषणा करते थे, और सिक्के उन उपाधियों को हर बाज़ार तक पहुँचाते थे।
विम कैडफिसेस के सिक्कों का लेख कई दावे एक साथ रखता है: महाराज (महान राजा), राजाधिराज (राजाओं का राजा), सर्वलोक-ईश्वर, महीश्वर और त्रदत (रक्षक)। आर. एस. शर्मा महीश्वर का अर्थ 'महान स्वामी' और सर्वलोक-ईश्वर का अर्थ 'समस्त लोक का स्वामी' बताते हैं।
चूँकि उपाधियाँ विशेष शासकों और कालों से जुड़ी होती हैं, कोई उपाधि किसी सिक्के, अभिलेख या राजा का काल-निर्धारण करने में सहायक हो सकती है।
RPSC के 2024 के पाठ्यक्रम में "प्रमुख राजवंशों के महत्वपूर्ण शासकों की उपलब्धियाँ : मौर्य, कुषाण, सातवाहन, गुप्त, चालुक्य, पल्लव एवं चोल।" शामिल है।
रायचौधुरी चीनी इतिहास-ग्रन्थों का अनुसरण करते हुए विम कैडफिसेस को कैडफिसेस प्रथम का पुत्र और उत्तराधिकारी मानते हैं, और लिखते हैं कि उसने भारत के भीतरी भाग को, सम्भवतः तक्षशिला को, जीता।
वे स्टेन कोनो और वी. ए. स्मिथ के इस मत का उल्लेख करते हैं कि कैडफिसेस द्वितीय ने 78 ई. का शक संवत् चलाया, पर कहते हैं कि उसके कोई संवत् चलाने का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है।
मुख्य तथ्य
- कैडफिसेस द्वितीय ही विम (वेम) कैडफिसेस है; रायचौधुरी चीनी इतिहास-ग्रन्थों के आधार पर उसे कैडफिसेस प्रथम का पुत्र और उत्तराधिकारी मानते हैं।
- उसके सिक्कों का खरोष्ठी लेख है: महरजस रजदिरजस, सर्वलोग इश्वरस महिश्वरस … त्रदत।
- रायचौधुरी इसका अनुवाद करते हैं: महान राजा, राजाओं का राजा, समस्त लोक का स्वामी, महीश्वर, रक्षक।
- रायचौधुरी के अनुसार कैडफिसेस द्वितीय ने स्वर्ण सिक्के जारी करना शुरू किया, जिनके पृष्ठ भाग पर शिव की उपासना अंकित है।
- सरकार शकारि नाम को चन्द्रगुप्त द्वितीय से जोड़ते हैं; रायचौधुरी सिंहचन्द्र को चन्द्रगुप्त द्वितीय के नामों में गिनाते हैं।
स्रोत: गार्डनर, ब्रिटिश म्यूज़ियम सूची (1886); रायचौधुरी, पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ़ एंशिएंट इंडिया; सरकार (1969)।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- महाक्षत्रप को कुषाण राजा की उपाधि मान लेना: यह महान क्षत्रप की उपाधि थी, जिसे रुद्रदामन जैसे शक शासकों ने और कनिष्क के अधीन प्रशासक खरपल्लान ने धारण किया।
- सकारी को कुषाण दावा समझ लेना: इसका अर्थ 'शकों का शत्रु' है और यह चन्द्रगुप्त द्वितीय की विक्रमादित्य परम्परा से जुड़ा है।
- दोनों कैडफिसेस को मिलाना: रायचौधुरी कैडफिसेस प्रथम को यवुग, महाराज, रजतिरज और 'सच्चे धर्म में स्थिर' की उपाधियाँ देते हैं, सर्वलोक-ईश्वर वाला लेख नहीं।
कोई प्रश्न कोई उपाधि देकर पूछ सकता है कि उसे किस शासक ने धारण किया, कोई शासक देकर उसकी उपाधि पूछ सकता है, या सर्वलोकेश्वर, सकारी और महाक्षत्रप जैसी उपाधियों का शासकों से मिलान करवा सकता है।
कोई प्रश्न यह भी पूछ सकता है कि किसी शासक के सिक्कों पर क्या अंकित है, जैसे विम कैडफिसेस के सिक्कों के पृष्ठ भाग पर शिव।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2023 के मिलते-जुलते प्रश्न, उस प्रश्न-पत्र के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार किस शासक ने 'महाक्षत्रप' की उपाधि स्वयं अर्जित की?
- (a)रुद्रदामन
- (b)कनिष्क
- (c)गौतमीपुत्र सातकर्णि
- (d)चन्द्रगुप्त द्वितीय
उत्तर(1) — रायचौधुरी बताते हैं कि वर्ष 72 का जूनागढ़ अभिलेख कहता है कि रुद्रदामन ने महाक्षत्रप की उपाधि अर्जित की। विकल्प (2) कुषाण राजा था, विकल्प (3) सातवाहन राजा और विकल्प (4) गुप्त सम्राट; इनमें से कोई उस अभिलेख का महाक्षत्रप नहीं है। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
कौन-सा गुप्त शासक भारतीय परम्परा में 'विक्रमादित्य शकारि' के नाम से प्रसिद्ध हुआ?
- (a)समुद्रगुप्त
- (b)चन्द्रगुप्त द्वितीय
- (c)कुमारगुप्त प्रथम
- (d)स्कन्दगुप्त
उत्तर(2) — सरकार लिखते हैं कि उज्जयिनी के शकों का उन्मूलन करने वाला चन्द्रगुप्त द्वितीय परम्परा में विक्रमादित्य शकारि के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विकल्प (1), (3) और (4) अन्य गुप्त शासक हैं, वह नहीं जिसका नाम सरकार लेते हैं।