संत लालदास के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए एवं निम्नांकित में से सही विकल्प चुनिए : A. संत लालदास आजीवन अविवाहित रहे । B. संत लालदास की मृत्यु के पश्चात् उनके समाधि स्थान पर मन्दिर का निर्माण करवाया गया ।
- (1)केवल A सत्य है ।
- (2)केवल B सत्य है ।
- (3)A और B दोनों सत्य हैं ।
- (4)A और B दोनों असत्य हैं ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (2), केवल B सत्य है ।
कथन A असत्य है। साहित्य अकादेमी का ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन लिटरेचर’ (खण्ड III) लालदास को एक गृहस्थ बताता है, जो शारीरिक श्रम से अपनी जीविका कमाते थे।
अलवर का राजस्थान ज़िला गज़ेटियर उनके पुत्र पहाड़ा और पुत्री सरूपा का नाम देता है। गंगा राम गर्ग का ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ वर्ल्ड हिन्दी लिटरेचर’ (1985) एक दूसरे पुत्र, कुतब, का नाम देता है।
कथन B सत्य है। लालदास की मृत्यु भरतपुर के नगला गाँव में हुई, और उन्हें पुराने अलवर राज्य में रामगढ़ से नौ मील उत्तर-पूर्व में शेरपुर में दफ़नाया गया।
मेजर पी.डब्ल्यू. पाउलेट का ‘गज़ेटियर ऑफ़ उलवर’ (1878) शेरपुर के मकबरे को ऊँचे गुंबद वाली, 100 फ़ुट लंबी, अत्यंत ठोस चिनाई की इमारत बताता है; उनका शरीर नीचे एक तहखाने में है। उनके सम्मान में शेरपुर में मेले लगते थे।
A असत्य और B सत्य है, इसलिए कूट विकल्प (2) है, केवल B सत्य है।
याद रखने की बात: लालदास गृहस्थ संत थे, और उनका गुंबद वाला समाधि-स्थल शेरपुर में है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)केवल A सत्य है । — यह कूट दोनों कथनों पर गलत है। A असत्य है: लालदास गृहस्थ थे, और अलवर ज़िला गज़ेटियर उनके पुत्र पहाड़ा और पुत्री सरूपा का नाम देता है।
B सत्य है: पाउलेट का 1878 का ‘गज़ेटियर ऑफ़ उलवर’ शेरपुर में उनके दफ़न-स्थल पर चिनाई से बने गुंबद वाले बड़े मकबरे का वर्णन करता है। केवल A सत्य है ऐसे संत पर लागू होता जिसने कभी विवाह नहीं किया और जिसकी समाधि पर कोई देवालय नहीं बना।
- (3)A और B दोनों सत्य हैं । — यह कूट A को स्वीकार करता है, जो असत्य है। गर्ग और साहित्य अकादेमी का एनसाइक्लोपीडिया, दोनों लालदास को गृहस्थ बताते हैं, और स्रोतों में उनकी संतानों के नाम हैं।
A और B दोनों सत्य हैं के लिए ऐसा संत चाहिए जो आजीवन अविवाहित रहा हो और जिसकी समाधि पर देवालय भी हो। लालदास केवल दूसरी बात पर खरे उतरते हैं।
- (4)A और B दोनों असत्य हैं । — यह कूट A को सही ढंग से नकारता है, पर B को भी नकार देता है, जो सत्य है। पाउलेट शेरपुर में लालदास के मकबरे को गुंबद वाली ठोस इमारत के रूप में दर्ज करते हैं, जहाँ उनके सम्मान में मेले लगते थे।
दोनों असत्य के लिए यह आवश्यक होता कि उनके दफ़न-स्थल पर कुछ भी न बना हो, जिसका 1878 का गज़ेटियर खंडन करता है।
अवधारणा
लालदास (1540–1648) ने लालदासी सम्प्रदाय की स्थापना की, जिसे लालपंथ भी कहते हैं। अलवर ज़िला गज़ेटियर कहता है कि उनका जन्म मेव माता-पिता के यहाँ हुआ और, नाम मात्र के मुसलमान होते हुए भी, वे हिन्दू धर्म के सिद्धांतों का पालन करते थे।
उनका मार्ग निर्गुण भक्ति का था। गर्ग राम-स्मरण और कीर्तन को सम्प्रदाय की मुख्य साधना बताते हैं, जिसमें राम निराकार हैं, और गज़ेटियर कहता है कि लालदास ने भिक्षा माँगने की कड़ी निंदा की।
वे वर्षों तक लकड़हारे के रूप में रहे और अलवर की पहाड़ियों से इकट्ठी की गई लकड़ियाँ बेचते रहे। गज़ेटियर के अनुसार उनके अनुयायी लालदासी साध कहलाते हैं, और बहुत-से लोग उन्हें पीर मानते हैं।
RPSC के 2024 के पाठ्यक्रम में "राजस्थान का इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य, परम्परा एवं विरासत" के अंतर्गत "धार्मिक जीवन" में "धार्मिक समुदाय, राजस्थान में संत एवं सम्प्रदाय" सूचीबद्ध है।
लालदास मेवात, यानी अलवर–भरतपुर क्षेत्र, से और भक्ति की उस धारा से जुड़े हैं जिसने हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को आकर्षित किया। साहित्य अकादेमी का एनसाइक्लोपीडिया उनके शिष्यों और उनके शिष्यों के शिष्यों में हरिदास, डूंगरसी साध, प्राणी साध और भीखण साध के नाम देता है।
डूंगरसी साध ने 580 छंदों में ‘श्री लालदास महाराज की परचावली’ लिखी, जिसे गर्ग लालदास की एकमात्र पुरानी जीवनी बताते हैं।
मुख्य तथ्य
- लालदास (1540–1648) का जन्म अलवर के पास धोली दूब (धौली धूब) में मेव माता-पिता के यहाँ हुआ, और उन्होंने लालदासी सम्प्रदाय (लालपंथ) की स्थापना की।
- अलवर ज़िला गज़ेटियर दर्ज करता है कि वि.सं. 1705 (1648 ई.) में 108 वर्ष की आयु में भरतपुर के नगला गाँव में उनकी मृत्यु हुई।
- वे गृहस्थ थे; अलवर ज़िला गज़ेटियर उनके पुत्र पहाड़ा और पुत्री सरूपा का नाम देता है।
- पाउलेट का ‘गज़ेटियर ऑफ़ उलवर’ (1878) शेरपुर में उनके मकबरे को चिनाई से बनी, गुंबद वाली, 100 फ़ुट लंबी इमारत बताता है।
- गर्ग राम-स्मरण और कीर्तन को सम्प्रदाय की मुख्य साधना बताते हैं, जिसमें राम की उपासना निराकार रूप में होती है।
स्रोत: अलवर ज़िला गज़ेटियर; पाउलेट, ‘गज़ेटियर ऑफ़ उलवर’ (1878); साहित्य अकादेमी, ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन लिटरेचर’, खण्ड III।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- ‘संत’ को ‘संन्यासी’ के बराबर मान लेना: लालदास अपने श्रम से जीविका चलाने वाले गृहस्थ थे, और स्रोतों में उनकी संतानों के नाम हैं।
- उनके तीन स्थानों को मिला देना: जन्म धोली दूब (अलवर) में, मृत्यु नगला (भरतपुर) में, दफ़न शेरपुर (अलवर) में।
- लालदास नाम के दो कवियों को मिला देना: साहित्य अकादेमी का एनसाइक्लोपीडिया कहता है कि कभी इनके नाम से जोड़ी गई ‘चितावनी’ दादू सम्प्रदाय के लालदास की रचना है।
कोई प्रश्न किसी संत के परिवार, उपदेश या समाधि के बारे में कथन देकर पूछ सकता है कि कौन-से सत्य हैं, या उसके शिष्यों के नाम देकर सम्प्रदाय पूछ सकता है।
कोई प्रश्न संत का जन्मस्थान, वह गाँव जहाँ उसकी मृत्यु हुई, या उसकी समाधि का स्थान भी पूछ सकता है।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2021 और 2018 के मिलते-जुलते प्रश्न, उन प्रश्न-पत्रों के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
लालदासी सम्प्रदाय के संस्थापक संत लालदास की समाधि कहाँ है ?
- (a)शेरपुर
- (b)धोली दूब
- (c)नगला
- (d)शाहपुरा
उत्तर(1) — लालदास को अलवर में रामगढ़ के पास शेरपुर में दफ़नाया गया, जहाँ गुंबद वाला एक बड़ा मकबरा है। विकल्प (2) उनका जन्मस्थान है; विकल्प (3) भरतपुर का वह गाँव है जहाँ उनकी मृत्यु हुई; और विकल्प (4) रामस्नेही सम्प्रदाय की एक पीठ है। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
हरिदास, डूंगरसी साध, प्राणी साध और भीखण साध किस सम्प्रदाय से संबंधित थे ?
- (a)दादू पंथ
- (b)लालदासी सम्प्रदाय
- (c)जसनाथी सम्प्रदाय
- (d)रामस्नेही सम्प्रदाय
उत्तर(2) — साहित्य अकादेमी का एनसाइक्लोपीडिया चारों को लालदास के शिष्यों और उनके शिष्यों में गिनाता है। विकल्प (1) बखनाजी और रज्जब का सम्प्रदाय है; विकल्प (3) RPSC की 2023 की कुंजी में अग्नि नृत्य से जुड़ा है; और विकल्प (4) शाहपुरा के रामचरण का सम्प्रदाय है।