मेनका गांधी वाद, 1978 में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद अनुच्छेद 21 के न्यायिक निर्वचन के संबंध में त्रुटिपूर्ण कथन को पहचानिए ।
- (1)यह भार याचिकाकर्ता पर है, कि वह सिद्ध करे कि जिस कानून की प्रक्रिया से उसे उसके जीवन या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित किया गया है, वह स्वेच्छाचारी है ।
- (2)‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ संयुक्त राज्य अमरीका में विद्यमान ‘उचित प्रक्रिया’ के मोटे तौर पर समानार्थक है ।
- (3)अनुच्छेद 21, 19 व 14 परस्पर अनन्य नहीं हैं ।
- (4)‘जीवन का अधिकार’ में ‘गरिमा के साथ जीने का अधिकार’ शामिल है ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (1), यह भार याचिकाकर्ता पर है, कि वह सिद्ध करे कि जिस कानून की प्रक्रिया से उसे उसके जीवन या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित किया गया है, वह स्वेच्छाचारी है ।
प्रश्न त्रुटिपूर्ण कथन पूछता है। अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को उसके जीवन या दैहिक स्वतंत्रता से ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है, अन्यथा नहीं।
25 जनवरी 1978 को निर्णीत मेनका गांधी बनाम भारत संघ में उच्चतम न्यायालय ने माना कि किसी कानून में प्रक्रिया लिख देना पर्याप्त नहीं है। न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ के शब्दों का आशय था कि कानून द्वारा विहित प्रक्रिया उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होनी चाहिए, न कि काल्पनिक, दमनकारी या स्वेच्छाचारी।
विकल्प (1) कहता है कि प्रक्रिया को स्वेच्छाचारी सिद्ध करने का भार याचिकाकर्ता पर है। RPSC की कुंजी इसे त्रुटिपूर्ण कथन मानती है।
यहाँ उद्धृत, भार को राज्य पर रखने वाला तर्क एक असहमति-मत का है। बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1982 में प्रतिवेदित) में न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती ने लिखा कि जहाँ भी जीवन या दैहिक स्वतंत्रता छीनी जाए, वहाँ यह दिखाने का भार राज्य पर होना चाहिए कि प्रक्रिया स्वेच्छाचारी नहीं, बल्कि युक्तियुक्त, उचित और न्यायसंगत है।
उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं में न्यायालय के सुसंगत रुख का भी स्मरण कराया: किसी निरोध को वैध सिद्ध करने का भार सदैव राज्य पर रहता है।
उसी मामले में 1980 में निर्णय देते हुए बहुमत ने, अनुच्छेद 19 के अंतर्गत सबूत के भार की चर्चा में, कहा कि निर्णीत मामलों से भार के विषय में सभी स्थितियों में सार्वभौमिक रूप से लागू होने वाला कोई कठोर और निश्चित नियम नहीं निकाला जा सकता।
न्यायमूर्ति भगवती का बचन सिंह असहमति-मत, बंदी प्रत्यक्षीकरण के नियम का सहारा लेकर, भार राज्य पर रखता है; यह बहुमत का निर्णय नहीं है।
बाकी तीनों कथन सही हैं। विकल्प (2) उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त प्रक्रिया की अपेक्षा बताता है, विकल्प (3) अनुच्छेद 14, 19 और 21 को साथ पढ़ने की व्याख्या, और विकल्प (4) अनुच्छेद 21 में पढ़ा गया गरिमा के साथ जीने का अधिकार।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (2)‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ संयुक्त राज्य अमरीका में विद्यमान ‘उचित प्रक्रिया’ के मोटे तौर पर समानार्थक है । — यह कथन सही है, इसलिए उत्तर नहीं है। मेनका गांधी के बाद दैहिक स्वतंत्रता छीनने वाले कानून को ऐसी प्रक्रिया रखनी होती है जो स्वयं उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त हो, और यह उसके निकट है जिसकी अपेक्षा संयुक्त राज्य अमरीका में प्रक्रियात्मक उचित प्रक्रिया करती है। इस विकल्प का अंग्रेज़ी पाठ यहाँ ‘Procedural due process’ छापता है।
"मोटे तौर पर" अंतर की गुंजाइश छोड़ता है। मेनका मामले में न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ के मत ने उल्लेख किया कि उचित प्रक्रिया खंड अमेरिकी न्यायाधीशों के संवैधानिक गारंटियों को देखने के ढंग में महत्त्वपूर्ण अंतर लाता है, और भारतीय संविधान ने उस अभिव्यक्ति को सोच-समझकर टाला।
- (3)अनुच्छेद 21, 19 व 14 परस्पर अनन्य नहीं हैं । — यह कथन सही है। मेनका गांधी में न्यायमूर्ति भगवती ने तर्क दिया कि दैहिक स्वतंत्रता छीनने वाला कानून, जिसे अनुच्छेद 19 की कसौटी पर खरा उतरना है, अनुच्छेद 14 के संदर्भ में भी परखा जाना चाहिए।
उन्होंने पूर्ण न्यायालय के निर्णय आर. सी. कूपर बनाम भारत संघ का सहारा लिया, जिसके अनुसार भाग III के मूल अधिकार पृथक और परस्पर अनन्य अधिकार नहीं हैं। तीनों अनुच्छेद अलग-अलग खानों में नहीं, साथ-साथ पढ़े जाते हैं।
- (4)‘जीवन का अधिकार’ में ‘गरिमा के साथ जीने का अधिकार’ शामिल है । — यह कथन सही है। फ्रांसिस कोरली मुलिन बनाम प्रशासक, केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली (13 जनवरी 1981) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जीवन के अधिकार में मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार और उसके साथ जुड़ी सभी बातें शामिल हैं।
न्यायालय ने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं — पर्याप्त पोषण, वस्त्र और आश्रय — को उन बातों में गिनाया जो इसके साथ जुड़ी हैं। यह मामला मेनका गांधी के तीन वर्ष बाद आया और उसकी उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त प्रक्रिया वाली व्याख्या पर आगे बढ़ा।
अवधारणा
अनुच्छेद 21 जीवन और दैहिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, पर केवल ऐसे वंचन के विरुद्ध जो ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के अनुसार न हो। शाब्दिक रूप से पढ़ने पर किसी भी वैध कानून में लिखी कोई भी प्रक्रिया पर्याप्त होती।
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) ने इस व्याख्या का अंत किया। याचिकाकर्ता का पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 10(3)(c) के अंतर्गत ज़ब्त किया गया था। न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने लिखा कि किसी भी प्रकार की प्रक्रिया का मात्र विहित कर देना अनुच्छेद 21 के आदेश को कभी पूरा नहीं कर सकता।
इस मामले से निकले विचारों में ये शामिल हैं: प्रक्रिया उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होनी चाहिए; दैहिक स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले कानून को अनुच्छेद 14 और 19 की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा; और न्यायमूर्ति भगवती के शब्दों में ‘दैहिक स्वतंत्रता’ अत्यंत व्यापक विस्तार वाली है।
बाद के निर्णय इसी आधार पर आगे बढ़े। फ्रांसिस कोरली मुलिन (1981) ने जीवन के अधिकार में मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार पढ़ा।
RPSC का प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम "भारतीय संविधान, राजनीतिक व्यवस्था एवं शासन प्रणाली" के अंतर्गत "उद्देशिका, मूल अधिकार, राज्य नीति के निदेशक तत्व, मूल कर्तव्य" को शामिल करता है। अनुच्छेद 21 भाग III का एक मूल अधिकार है।
अनुच्छेद 21 के अंग्रेज़ी पाठ के अठारह शब्दों में कोई संशोधन नहीं हुआ। बदली है उच्चतम न्यायालय की ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ की व्याख्या, और यह परिवर्तन मेनका गांधी (1978) में आया।
यह मामला तीन मूल अधिकारों को जोड़ता है: अनुच्छेद 14, जो न्यायमूर्ति भगवती के शब्दों में राज्य की कार्रवाई में स्वेच्छाचारिता पर प्रहार करता है; अनुच्छेद 19, स्वतंत्रताएँ; और अनुच्छेद 21, जीवन और दैहिक स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 21 में बाद में पढ़े गए अधिकार, जैसे गरिमा के साथ जीना (1981), इसी उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त प्रक्रिया वाली व्याख्या पर आगे बढ़ते हैं।
मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 21: किसी व्यक्ति को उसके जीवन या दैहिक स्वतंत्रता से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ का निर्णय सात न्यायाधीशों की पीठ ने 25 जनवरी 1978 को दिया।
- मेनका गांधी: अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रक्रिया उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होनी चाहिए, न कि काल्पनिक, दमनकारी या स्वेच्छाचारी।
- मेनका गांधी: दैहिक स्वतंत्रता छीनने वाला कानून, जिसे अनुच्छेद 19 पर खरा उतरना है, अनुच्छेद 14 पर भी परखा जाना चाहिए।
- फ्रांसिस कोरली मुलिन (13 जनवरी 1981): जीवन के अधिकार में मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है।
RPSC की कुंजी कथन (1) को त्रुटिपूर्ण कथन मानती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ को किसी कानून में लिखी कोई भी प्रक्रिया मान लेना। मेनका गांधी के बाद प्रक्रिया स्वयं उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होनी चाहिए।
- भार को स्वतंत्रता से वंचित व्यक्ति पर डाल देना। न्यायमूर्ति भगवती का बचन सिंह असहमति-मत, उन बंदी प्रत्यक्षीकरण मामलों का हवाला देते हुए जिनमें राज्य को निरोध वैध सिद्ध करना होता है, भार राज्य पर रखता है।
- मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकार की अभिव्यक्ति का श्रेय मेनका गांधी को देना। ये शब्द बाद के मामले, फ्रांसिस कोरली मुलिन (1981), से आते हैं।
कोई प्रश्न मेनका गांधी के बाद अनुच्छेद 21 के बारे में कथन देकर त्रुटिपूर्ण कथन पूछ सकता है, जैसा यहाँ है।
कोई प्रश्न मामलों को उस विचार से सुमेलित भी करवा सकता है जो उन्होंने अनुच्छेद 21 में जोड़ा, या पूछ सकता है कि दैहिक स्वतंत्रता को सीमित करने वाले कानून को किन अनुच्छेदों पर खरा उतरना होगा।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2013 के मिलते-जुलते प्रश्न, उस प्रश्न-पत्र के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
किस मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जीवन के अधिकार में मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार और पर्याप्त पोषण, वस्त्र और आश्रय जैसी जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ शामिल हैं ?
- (a)ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य
- (b)फ्रांसिस कोरली मुलिन बनाम प्रशासक, केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली
- (c)केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
- (d)मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ
उत्तर(2) — फ्रांसिस कोरली मुलिन (13 जनवरी 1981) में ये शब्द प्रयुक्त हुए। ए. के. गोपालन (1) 1950 का वह मामला है जिसकी अधिकारों को परस्पर अनन्य मानने वाली दृष्टि बाद में हटा दी गई। केशवानंद भारती (3) 1973 का मूल ढाँचे वाला मामला है। मिनर्वा मिल्स (4) निदेशक तत्त्वों और मूल अधिकारों के बीच संतुलन से संबंधित था। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के बाद, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत किसी व्यक्ति को दैहिक स्वतंत्रता से वंचित करने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए :
- (a)विधायिका द्वारा बनाए गए कानून में दी गई कोई भी प्रक्रिया
- (b)उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त
- (c)लागू किए जाने से पहले राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित
- (d)अनुच्छेद 22 के रक्षोपायों के समान
उत्तर(2) — प्रक्रिया उचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होनी चाहिए, न कि काल्पनिक, दमनकारी या स्वेच्छाचारी। विकल्प (1) वह शाब्दिक व्याख्या है जिसे इस मामले ने अस्वीकार किया। विकल्प (3) अनुच्छेद 21 का कोई भाग नहीं है। विकल्प (4) अनुच्छेद 21 को अनुच्छेद 22 से मिला देता है, जो गिरफ्तारी और निरोध से संबंधित है।