कथन (A) : नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का कर्तव्य न केवल व्यय की वैधता सुनिश्चित करना है अपितु औचित्य भी है। कारण (R) : उसे वित्तीय प्रशासन के क्षेत्र में संविधान और संसद के कानूनों को बनाए रखना है।
- (1)(A) गलत है लेकिन (R) सही है
- (2)(A) और (R) दोनों सही हैं एवं (R), (A) की सही व्याख्या है
- (3)(A) सही है लेकिन (R) गलत है
- (4)(A) और (R) दोनों सही हैं किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (2), (A) और (R) दोनों सही हैं एवं (R), (A) की सही व्याख्या है.
कथन (A) सही है। भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्राधिकार से जारी लेखापरीक्षा संहिता (ऑडिट कोड, पहला संस्करण, 1950) लेखापरीक्षा का एक आवश्यक कार्य यह बताती है कि वह स्पष्ट अनियमितता के मामलों के साथ-साथ अनुचित व्यय या लोक धन की बर्बादी को भी सामने लाए, भले ही लेखे स्वयं ठीक हों।
संहिता इसे औचित्य की लेखापरीक्षा कहती है। वह जोड़ती है कि नियमों और आदेशों का पालन हुआ है, इतना देख लेना पर्याप्त नहीं; रूढ़िगत वित्त के व्यापक सिद्धांत भी ध्यान में रखे जाने चाहिए।
नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के लेखापरीक्षा और लेखा विनियम, अगस्त 2020 में प्रतिस्थापित रूप में, औचित्य को लेखापरीक्षा के व्यापक उद्देश्यों में वैधता, विधिमान्यता और नियमितता के साथ बनाए रखते हैं।
कारण (R) सही है। अनुच्छेद 148(2) के अंतर्गत नियंत्रक-महालेखापरीक्षक जो शपथ लेता है, वह तीसरी अनुसूची के प्ररूप 4 में दी गई है और "संविधान और विधियों की मर्यादा बनाए रखूंगा" के वचन पर समाप्त होती है। अनुच्छेद 149 उसे संघ और राज्यों के लेखाओं के संबंध में वे कर्तव्य देता है जो संसद् विधि द्वारा विहित करे।
RPSC की कुंजी (R) को (A) की व्याख्या मानती है: इस पाठ के अनुसार नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की लेखापरीक्षा औचित्य तक इसलिए जाती है क्योंकि इस पद पर वित्तीय प्रशासन में संविधान और विधियों को बनाए रखने का दायित्व है।
कूट विकल्प (2), (A) और (R) दोनों सही हैं एवं (R), (A) की सही व्याख्या है है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)(A) गलत है लेकिन (R) सही है — (A) गलत नहीं है। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की लेखापरीक्षा संहिता (1950) लेखापरीक्षा का यह आवश्यक कार्य बताती है कि वह लेखे ठीक होने पर भी अनुचित व्यय या लोक धन की बर्बादी को सामने लाए — अर्थात केवल वैधता नहीं, औचित्य भी देखे।
नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के लेखापरीक्षा और लेखा विनियम (2020) अब भी औचित्य को लेखापरीक्षा के व्यापक उद्देश्यों में गिनाते हैं, इसलिए (A) को अस्वीकार करने वाला कूट सही नहीं हो सकता।
- (3)(A) सही है लेकिन (R) गलत है — (R) गलत नहीं है। तीसरी अनुसूची के प्ररूप 4 में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की शपथ संविधान और विधियों की मर्यादा बनाए रखने के वचन पर समाप्त होती है, और अनुच्छेद 149 संघ और राज्यों के लेखाओं के संबंध में उसके कर्तव्यों को संसद् द्वारा बनाई गई विधि से जोड़ता है।
दोनों कथन सही ठहरते हैं।
- (4)(A) और (R) दोनों सही हैं किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है — यह कूट दोनों कथनों को मानता है पर उनका संबंध नकारता है, जो RPSC की कुंजी नहीं करती। कुंजी के अनुसार नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का वित्तीय प्रशासन में संविधान और विधियों को बनाए रखने का दायित्व ही वह कारण है जिससे लेखापरीक्षा वैधता से आगे औचित्य तक जाती है।
कुंजी विकल्प (2) को चिह्नित करती है, जो यह संबंध बनाए रखता है।
अवधारणा
भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का संविधान में अपना अलग अध्याय है, अनुच्छेद 148 से 151। अनुच्छेद 148 राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति का, और केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाए जाने का उपबंध करता है जिनसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
नियंत्रक-महालेखापरीक्षक उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों वाली ही शपथ लेता है (तीसरी अनुसूची, प्ररूप 4), जो "संविधान और विधियों की मर्यादा बनाए रखूंगा" पर समाप्त होती है। अनुच्छेद 148(4) उसे पद छोड़ने के बाद भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी और पद के लिए अपात्र बनाता है।
1950 की लेखापरीक्षा संहिता दो कसौटियाँ रखती है। एक यह कि सक्षम प्राधिकारी के नियमों और आदेशों का पालन हुआ या नहीं। दूसरी, औचित्य की लेखापरीक्षा, संहिता के अनुसार लोक वित्तीय नैतिकता के यथोचित ऊँचे स्तर को बढ़ावा देती है।
संहिता वित्तीय औचित्य के मानक गिनाती है: अन्य मानकों के साथ, व्यय प्रथम दृष्टया अवसर की माँग से अधिक न हो, और कोई प्राधिकारी अपने लाभ के लिए व्यय स्वीकृत न करे।
RPSC के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में भारतीय संविधान, राजनीतिक व्यवस्था एवं शासन प्रणाली के अंतर्गत "भारत निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, नीति आयोग, केन्द्रीय सतर्कता आयोग, लोकपाल, केन्द्रीय सूचना आयोग एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग।" सूचीबद्ध है।
नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदन कार्यपालिका प्रमुखों के माध्यम से विधायिकाओं तक पहुँचते हैं। अनुच्छेद 151 के अंतर्गत संघ के लेखाओं संबंधी प्रतिवेदन राष्ट्रपति के समक्ष जाते हैं, जो उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाता है; किसी राज्य के लेखाओं संबंधी प्रतिवेदन राज्यपाल के समक्ष जाते हैं, जो उन्हें राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाता है।
अनुच्छेद 150 जोड़ता है कि संघ और राज्यों के लेखे उस प्ररूप में रखे जाते हैं जो राष्ट्रपति नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की सलाह पर विहित करे।
अनुच्छेद 148(6) नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कार्यालय के प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि पर भारित करता है।
मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 148(1): नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है और उसे केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जाता है जिनसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को।
- तीसरी अनुसूची, प्ररूप 4: नियंत्रक-महालेखापरीक्षक संविधान और विधियों की मर्यादा बनाए रखने की शपथ लेता है।
- अनुच्छेद 149: संघ और राज्यों के लेखाओं के संबंध में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्तव्य और शक्तियाँ वे हैं जो संसद् द्वारा बनाई गई विधि द्वारा विहित हों।
- लेखापरीक्षा संहिता (1950): लेखे ठीक होने पर भी लेखापरीक्षा को अनुचित व्यय या लोक धन की बर्बादी सामने लानी चाहिए।
- लेखापरीक्षा और लेखा विनियम (2020), विनियम 4: लेखापरीक्षा वित्तीय प्रबंधन की वैधता, विधिमान्यता, नियमितता, औचित्य, मितव्ययिता, दक्षता और प्रभावशीलता की जाँच करती है।
(A) और (R) दोनों सही हैं; RPSC की कुंजी उन्हें जोड़ती है: विकल्प (2)।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- लेखापरीक्षा को वैधता तक सीमित मान लेना। लेखापरीक्षा संहिता लेखे ठीक होने पर भी अनुचित व्यय को सामने लाने की अपेक्षा करती है।
- यह मान लेना कि संविधान स्वयं नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सारे लेखापरीक्षा कर्तव्य गिनाता है। अनुच्छेद 149 उन्हें संसद् द्वारा बनाई गई विधि द्वारा विहित किए जाने पर छोड़ता है।
- दोनों कथन सही होते ही कथन–कारण कूट को तय मान लेना। अंतिम चरण यह है कि (R), (A) की व्याख्या करता है या नहीं, जिसे RPSC की कुंजी यहाँ स्वीकार करती है।
कोई प्रश्न नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की लेखापरीक्षा के बारे में एक कथन को पद की संवैधानिक स्थिति से लिए गए कारण के साथ जोड़ सकता है, जैसा यहाँ है।
कोई प्रश्न नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के हटाए जाने, शपथ, अनुच्छेद 151 के अंतर्गत प्रतिवेदनों, या नियमितता और औचित्य लेखापरीक्षा के अंतर के बारे में भी पूछ सकता है।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2018 और 2013 के मिलते-जुलते प्रश्न, उन प्रश्न-पत्रों के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
अनुच्छेद 151(2) के अंतर्गत किसी राज्य के लेखाओं संबंधी नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदन किसके समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं?
- (a)भारत के राष्ट्रपति
- (b)राज्य के राज्यपाल
- (c)विधानसभा अध्यक्ष
- (d)मुख्यमंत्री
उत्तर(2) — अनुच्छेद 151(2) कहता है कि वे राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं, जो उन्हें राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाता है। संघ के लेखाओं संबंधी प्रतिवेदन अनुच्छेद 151(1) के अंतर्गत राष्ट्रपति (1) के समक्ष जाते हैं। विधानसभा अध्यक्ष (3) और मुख्यमंत्री (4) का नाम नहीं है। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को उसके पद से हटाया जा सकता है —
- (a)राष्ट्रपति द्वारा उसकी इच्छा पर
- (b)उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर जिनसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को
- (c)केवल लोक सभा के संकल्प द्वारा
- (d)वित्त मंत्री की सलाह पर प्रधानमंत्री द्वारा
उत्तर(2) — अनुच्छेद 148(1) कहता है कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को उसके पद से केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जाएगा जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इच्छा पर हटाना (1), केवल एक सदन द्वारा (3) या प्रधानमंत्री द्वारा (4) हटाना वह प्रक्रिया नहीं है जो अनुच्छेद निर्धारित करता है।