मौर्य कालीन मूर्तियों में, मणिभद्र (यक्ष) नाम से अंकित मूर्ति किस स्थान से प्राप्त हुई है?
- (1)झींग–का–नगरा
- (2)नोह ग्राम
- (3)बेसनगर
- (4)परखम
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (4), परखम.
वह विशाल यक्ष प्रतिमा, जिसका अभिलेख मणिभद्र का नाम देता है, वर्तमान उत्तर प्रदेश के मथुरा क्षेत्र के गाँव परखम से मिली। यह अब मथुरा संग्रहालय में है।
राधाकुमुद मुखर्जी की हिन्दू सिविलाइज़ेशन (भाग II) ग्यारह विशाल यक्ष और यक्षी प्रतिमाओं की सूची देती है। उनके अनुसार इनमें से परखम यक्ष और पवाया (ग्वालियर) के एक यक्ष के अभिलेख इन प्रतिमाओं के लिए मणिभद्र (कुबेर के सेनापति) नाम का उल्लेख करते हैं।
वी. एस. अग्रवाल की स्टडीज़ इन इंडियन आर्ट मौर्य काल की लोक-कला परम्परा की यक्ष आकृतियों में मथुरा ज़िले के परखम गाँव की अभिलिखित यक्ष प्रतिमा को पहले स्थान पर रखती है।
प्रतिमा का काल विवादित है। अग्रवाल इसे मौर्य काल में रखते हैं, जैसा प्रश्न भी करता है। मुखर्जी पूरे समूह को उत्तर भारत, लगभग 650–325 ई. पू., वाले अपने अध्याय में रखते हैं, जो अशोक की दरबारी कला से पहले का है।
प्रतिमा पर विकिपीडिया का लेख हाइनरिख़ ल्यूडर्स द्वारा दूसरी शताब्दी ई. पू. के मध्य का और सोन्या री क्विंटानिला द्वारा लगभग 150 ई. पू. का काल-निर्धारण बताता है। हर काल-निर्धारण में प्राप्ति-स्थान वही है।
परखम यक्ष: मणिभद्र नाम से अंकित।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)झींग–का–नगरा — मथुरा ज़िले के ही झींग–का–नगरा से मिली प्रतिमा एक यक्षी है, मणिभद्र यक्ष नहीं।
अग्रवाल मनसा देवी के रूप में पूजी जाने वाली इस यक्षी को झींग–का–नगरा में बताते हैं। मुखर्जी के अनुसार मनसा देवी यक्षी के अभिलेख में यक्षी लयवा नाम है और मूर्तिकार नाक का नाम है, मणिभद्र का नहीं।
- (2)नोह ग्राम — विकल्पों में नोह राजस्थान का स्थल है। अग्रवाल उसी मौर्यकालीन समूह में भरतपुर ज़िले के गाँव नोह से मिली एक यक्ष प्रतिमा को गिनाते हैं।
वे परखम, पवाया और पटना की प्रतिमाओं को अभिलिखित बताते हैं, नोह यक्ष को नहीं, और मणिभद्र नाम परखम और पवाया के लिए दर्ज है।
- (3)बेसनगर — बेसनगर से स्त्री प्रतिमाएँ मिलीं, अभिलिखित मणिभद्र यक्ष नहीं।
अग्रवाल भोपाल के निकट बेसनगर की एक यक्षी को गिनाते हैं, जो अब इंडियन म्यूज़ियम में है, और बेसनगर की एक और यक्षी को, जो स्थानीय रूप से तेलिन कहलाती है। मुखर्जी भी बेसनगर की दो स्त्री प्रतिमाएँ गिनाते हैं।
अवधारणा
अग्रवाल यक्षों और यक्षियों को प्राचीन भारत में प्रचलित लोक-पंथों के अंग के रूप में पूजी जाने वाली आकृतियाँ बताते हैं। उनकी बड़ी स्वतंत्र पाषाण प्रतिमाएँ मथुरा, पटना, पवाया, बेसनगर, नोह और अन्य स्थलों से मिली हैं।
अग्रवाल मौर्य काल की दो कला परम्पराओं का वर्णन करते हैं: दरबारी कला, जो अशोक के स्मारकों में दिखती है, और लोक परम्परा, जो इन यक्ष और यक्षी प्रतिमाओं में दिखती है।
विकिपीडिया पर उद्धृत हाइनरिख़ ल्यूडर्स के अनुवाद के अनुसार परखम अभिलेख आकृति को भगवत् (पूज्य) कहता है, जिसे मणिभद गोष्ठी के सदस्य आठ भाइयों ने बनवाया।
अभिलिखित पवाया यक्ष मणिभद्र नाम वाली दूसरी प्रतिमा है। के. पी. जायसवाल ने कभी परखम प्रतिमा को राजा अजातशत्रु का चित्रण माना था; रायचौधुरी के अनुसार इस मत को सामान्य स्वीकृति नहीं मिली।
RPSC के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में भारत के इतिहास के प्राचीनकाल एवं मध्यकाल के अंतर्गत "प्राचीन भारत में कला एवं वास्तु।" सूचीबद्ध है।
अग्रवाल बताते हैं कि ऐसी प्रतिमाएँ उत्तर भारत, बिहार और उड़ीसा के बहुत विस्तृत क्षेत्र में मिली हैं। उनकी सूची का एक स्थल राजस्थान में है: भरतपुर ज़िले का नोह।
मुख्य तथ्य
- परखम यक्ष मथुरा के निकट परखम से मिला और मथुरा संग्रहालय में है।
- मुखर्जी: परखम और पवाया यक्षों के अभिलेख दोनों प्रतिमाओं को मणिभद्र नाम देते हैं।
- अग्रवाल मौर्य काल की लोक परम्परा की यक्ष आकृतियों में भरतपुर ज़िले के नोह गाँव की एक यक्ष प्रतिमा गिनाते हैं।
- मनसा देवी के रूप में पूजी जाने वाली झींग–का–नगरा यक्षी पर यक्षी लयवा नाम और मूर्तिकार नाक का नाम है (मुखर्जी; गाँव का नाम अग्रवाल देते हैं)।
- काल-निर्धारण अलग-अलग हैं: मौर्य (अग्रवाल), लगभग 650–325 ई. पू. (मुखर्जी), दूसरी शताब्दी ई. पू. का मध्य (ल्यूडर्स) और लगभग 150 ई. पू. (क्विंटानिला); अंतिम दो विकिपीडिया के अनुसार।
स्रोत: आर. के. मुखर्जी, हिन्दू सिविलाइज़ेशन (भाग II); वी. एस. अग्रवाल, स्टडीज़ इन इंडियन आर्ट। विकल्प (4) उत्तर है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- मुखर्जी के विवरण में मणिभद्र का नाम दो प्रतिमाओं, परखम और पवाया, पर अंकित है; विकल्पों में केवल परखम है।
- झींग–का–नगरा की प्रतिमा भी अभिलिखित है और मथुरा ज़िले की ही है, पर उसका नाम यक्षी लयवा है।
- परखम यक्ष के कई काल-निर्धारणों में ‘मौर्य’ केवल एक है: अग्रवाल इसे मौर्य काल में, मुखर्जी अशोक से पहले (लगभग 650–325 ई. पू.), और ल्यूडर्स तथा क्विंटानिला दूसरी शताब्दी ई. पू. में रखते हैं।
कोई प्रश्न पूछ सकता है कि कोई अभिलिखित प्रारंभिक मूर्ति कहाँ मिली, जैसा यहाँ है।
कोई प्रश्न यक्ष और यक्षी प्रतिमाओं को उनके प्राप्ति-स्थानों से सुमेलित भी करवा सकता है, या पूछ सकता है कि कोई अभिलेख किस देवता का नाम देता है।
संबंधित PYQ
भरहुत का स्तूप किस राजवंश की कला का सुन्दर उदाहरण है ?
- (1) चोल स्थापत्य
- (2) कुषाणयुगीन स्थापत्य
- (3) गुप्तकाल के स्थापत्य
- (4) शुंगकालीन स्थापत्य
उत्तर(4)
प्राचीन भारतीय कला और राजवंश के अनुसार उसके काल-निर्धारण वाली वही पाठ्यक्रम पंक्ति। वह प्रश्न पूछता है कि भरहुत का स्तूप किस राजवंश की कला का सुन्दर उदाहरण है (RPSC की कुंजी: विकल्प (4), शुंगकालीन स्थापत्य); यह प्रश्न एक अभिलिखित यक्ष प्रतिमा का प्राप्ति-स्थान पूछता है।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
परखम यक्ष के अतिरिक्त कौन-सी प्रारंभिक यक्ष प्रतिमा पर उसे मणिभद्र बताने वाला अभिलेख है?
- (a)पवाया (पद्मावती) यक्ष
- (b)नोह यक्ष
- (c)बेसनगर यक्षी
- (d)झींग–का–नगरा यक्षी
उत्तर(1) — मुखर्जी के अनुसार परखम और पवाया दोनों प्रतिमाओं के अभिलेख मणिभद्र नाम देते हैं। विकल्प (2), नोह यक्ष, अग्रवाल की सूची में अभिलिखित नहीं बताया गया; विकल्प (3), बेसनगर, से स्त्री प्रतिमाएँ मिलीं; विकल्प (4), झींग–का–नगरा की प्रतिमा, का नाम यक्षी लयवा है। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
वी. एस. अग्रवाल की प्रारंभिक यक्ष प्रतिमाओं की सूची में नोह गाँव का यक्ष किस ज़िले में रखा गया है?
- (a)मथुरा
- (b)भरतपुर
- (c)ग्वालियर
- (d)विदिशा
उत्तर(2) — अग्रवाल भरतपुर ज़िले के गाँव नोह से मिली एक यक्ष प्रतिमा गिनाते हैं। विकल्प (1), मथुरा, परखम और झींग–का–नगरा प्रतिमाओं का ज़िला है; विकल्प (3), ग्वालियर, वह स्थान है जहाँ पवाया यक्ष रखा है; विकल्प (4) वह ज़िला नहीं है जो वे नोह के लिए देते हैं।