किसने “बाँटो और छोड़ो” के नारे को बुलन्द किया था ?
- (a)एम. ए. अंसारी
- (b)एम. ए. जिन्नाह
- (c)जवाहरलाल नेहरू
- (d)मुहम्मद इकबाल
सही — B, एम. ए. जिन्नाह। यह वाक्यांश एक पलटवार है, और अर्थ भी उसी रूप में रखता है। अगस्त 1942 में कांग्रेस ने माँग की कि अंग्रेज़ भारत छोड़ें और अपने पीछे एक अविभाजित देश छोड़कर जाएँ। मुस्लिम लीग का उत्तर तीन शब्दों में यह था कि पहले बाँटो, फिर छोड़ो — स्वतंत्रता हाँ, पर एक ही उत्तराधिकारी राज्य को नहीं। आयोग ने 31 अक्टूबर 2025 को इस प्रश्न पर आई आपत्तियों का निपटारा करते हुए जिन्नाह के इस पलटवार को कांग्रेस के अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आह्वान के बाद रखा, और उत्तर किसी उद्धरण से नहीं, विलोपन से निकाला : एम. ए. अंसारी और जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के वे नेता थे जो भारत के विभाजन के विरोधी थे, और मुहम्मद इकबाल की मृत्यु 1938 में हो चुकी थी, यानी मुस्लिम लीग द्वारा 1940 में लाहौर प्रस्ताव अपनाए जाने से दो वर्ष पहले। यह कार्ड क्या नहीं करेगा, वह साफ़-साफ़ कह देना चाहिए। जिन्नाह ने ये शब्द किस अधिवेशन में, किस स्थान पर या किस तिथि को कहे — यह किसी भी प्राथमिक या विद्वत्तापूर्ण स्रोत से सत्यापित नहीं हो सका, इसलिए यहाँ ऐसा कोई विवरण नहीं दिया जा रहा; यह श्रेय आयोग की अपनी प्रकाशित तर्क-पंक्ति पर और इस तथ्य पर टिका है कि सूची का कोई दूसरा नाम इसे उठा ही नहीं सकता। विलोपन स्वयं पूरी तरह पक्का है, और तीन में से दो नामों पर वह उतना मज़बूत है जितने की आयोग को ज़रूरत भी नहीं थी। अंसारी केवल विभाजन-विरोधी कांग्रेसी भर नहीं थे — 10 मई 1936 से उनका निधन हो चुका था, यानी भारत छोड़ो आह्वान से छह वर्ष पहले। इकबाल की मृत्यु 21 अप्रैल 1938 को हुई। नेहरू अंत तक विभाजन से लड़े और 1947 की 3 जून योजना पर तभी सहमत हुए जब कोई विकल्प शेष नहीं रह गया। बचता है सूची का वही एक व्यक्ति जिसका 1940 से आगे का पूरा राजनीतिक कार्यक्रम ठीक यही प्रस्ताव था। एक भ्रम से बचिए, जिसमें आधा इंटरनेट फँसता है : Divide and Quit सर पेंडरेल मून की 1961 में छपी विभाजन-संस्मरण पुस्तक का भी नाम है; मून पंजाब और बहावलपुर में सेवा कर चुके ब्रिटिश भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी थे। पुस्तक ने नारा उधार लिया; उसने उसे गढ़ा नहीं।
- (a)एम. ए. अंसारी — दो बार गलत, और दूसरा कारण निर्णायक है। डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी कांग्रेसी राष्ट्रवादी थे — 1927-28 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष, 1920-21 में ही अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के अध्यक्ष, तथा जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक और बाद में उसके कुलाधिपति — जो एक समावेशी भारत के पक्ष में और पृथकतावादी राजनीति के विरुद्ध खड़े थे। वे यह कह भी नहीं सकते थे : 10 मई 1936 को मसूरी से दिल्ली जा रही रेलगाड़ी में हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई थी, यानी उस भारत छोड़ो आह्वान से छह वर्ष पहले जिसका उत्तर यह नारा है।
- (c)जवाहरलाल नेहरू — उनकी अपनी अवस्थिति का ठीक उल्टा। नेहरू कांग्रेस के वे नेता थे जिन्होंने विभाजन की माँग का आरम्भ से अंत तक विरोध किया, लाहौर प्रस्ताव को 'जिन्नाह के विचित्र प्रस्ताव' (Jinnah's fantastic proposals) कहा, और 1947 की 3 जून योजना को केवल अंतिम बचे विकल्प के रूप में स्वीकार किया। वे 9 अगस्त 1942 से शेष कांग्रेस कार्यसमिति के साथ जेल में भी थे, और गिरफ़्तारी ठीक उसी भारत छोड़ो माँग के लिए हुई थी जिसका उत्तर देने के लिए 'बाँटो और छोड़ो' गढ़ा गया था।
- (d)मुहम्मद इकबाल — सबसे लुभावना गलत उत्तर, क्योंकि मुस्लिम लीग को दिया गया उनका 1930 का इलाहाबाद अभिभाषण आम तौर पर एक अलग मुस्लिम मातृभूमि के विचार का बौद्धिक बीज बताया जाता है, इसलिए 'पाकिस्तान के विचार के पीछे का आदमी' खोजता अभ्यर्थी उन्हीं पर आ टिकता है। पर वे कवि और दार्शनिक थे, लीग के वार्ताकार नहीं, और कालक्रम इसकी अनुमति नहीं देता : सर मुहम्मद इकबाल का निधन 21 अप्रैल 1938 को हुआ — 1940 के लाहौर प्रस्ताव से लगभग दो वर्ष पहले और अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आह्वान से चार वर्ष से भी अधिक पहले।
राज के अंतिम दशक की लड़ाई नारों में लड़ी गई, और हर नारा किसी दूसरे नारे के विरुद्ध लिखा गया था। 'बाँटो और राज करो' ब्रिटिश नीति पर राष्ट्रवादियों का आरोप था — 1905 के बंगाल विभाजन से लेकर 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम के अंतर्गत पृथक निर्वाचक मंडलों और 1932 के साम्प्रदायिक पंचाट तक। 'भारत छोड़ो' 8 अगस्त 1942 की कांग्रेस की माँग थी : चले जाओ, और एक ही अविभाजित देश छोड़कर जाओ। 'बाँटो और छोड़ो' उसकी प्रति-माँग थी — वही प्रस्थान स्वीकार, पर जाते-जाते विभाजन कर जाओ। इन तीन शब्दों के पीछे वही द्वि-राष्ट्र तर्क खड़ा है जिसे मुस्लिम लीग 1920 के दशक में जिन्नाह के कांग्रेस से अलग होने के बाद से गढ़ रही थी : 1929 के उनके चौदह सूत्र, जो 1928 की नेहरू रिपोर्ट के मुस्लिम उत्तर के रूप में रखे गए थे और जिस रिपोर्ट को उन्होंने 'हिन्दू दस्तावेज़' कहकर खारिज किया था; 1930 का इकबाल का इलाहाबाद अभिभाषण; और फिर 1940 का लाहौर प्रस्ताव, जिसने लीग को उत्तर-पश्चिम तथा पूर्व के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में स्वतंत्र राज्यों के लिए वचनबद्ध किया। 1940 से दोनों माँगें साथ-साथ चलीं और दोनों एक साथ पूरी नहीं की जा सकती थीं, इसीलिए जब अंग्रेज़ों ने जाने का निश्चय कर लिया तो अंतिम चरण इतनी तेज़ी से बीता : 16 अगस्त 1946 को प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस, अक्टूबर 1946 में लीग का अंतरिम मंत्रिमंडल में प्रवेश, 20 फरवरी 1947 की एटली की घोषणा, 1947 की माउंटबेटन की 3 जून योजना, और अंततः भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, जिसे 18 जुलाई 1947 को शाही स्वीकृति मिली और जिसने 15 अगस्त को देश को बाँट दिया। जिन्नाह पाकिस्तान के पहले गवर्नर-जनरल बने।
यह विशुद्ध विलोपन का प्रश्न है, इसलिए प्रसिद्ध नाम की ओर लपकने के बजाय विलोपन ठीक से कीजिए। मृत्यु-तिथियों से शुरू कीजिए, क्योंकि चार में से दो विकल्प केवल उन्हीं पर गिर जाते हैं। भारत छोड़ो के उत्तर के रूप में गढ़ा गया नारा अगस्त 1942 से पहले का हो ही नहीं सकता, और सबसे उदार पाठ भी उसे 1940 के लाहौर प्रस्ताव से पहले नहीं ले जा सकता — जबकि एम. ए. अंसारी की मृत्यु 10 मई 1936 को और मुहम्मद इकबाल की 21 अप्रैल 1938 को हो चुकी थी। एक ही चाल में आधा प्रश्न हट जाता है, और इसे एक सामान्य आदत के रूप में उतार लेना चाहिए : किसी भी श्रेय-प्रश्न में पहले यह जाँचिए कि वर्णित क्षण पर वह व्यक्ति जीवित था या नहीं। इसके बाद अवस्थिति पर हटाइए। नेहरू ने अपना पूरा राजनीतिक जीवन विभाजन के विरुद्ध तर्क करते हुए बिताया और 9 अगस्त 1942 से ठीक उसी माँग के लिए जेल में थे जिसका यह वाक्यांश खंडन करता है। एक नाम बचता है, और वह चूक से नहीं, विषयवस्तु के आधार पर बैठता है, क्योंकि प्रस्थान से पहले विभाजन की माँग ठीक 1940 से आगे की मुस्लिम लीग का कार्यक्रम है। तब एकमात्र विभेदक तथ्य इस वाक्यांश का कोई प्रलेखित अवसर नहीं है — कोई सत्यापनीय अवसर है ही नहीं — बल्कि यह जोड़ी है : 'भारत छोड़ो' अगस्त 1942 में कांग्रेस का है, और 'बाँटो और छोड़ो' उसी का लीग-पक्षीय जुड़वाँ। बचने योग्य दूसरा जाल ग्रंथ-सूची का है। सर पेंडरेल मून का 1961 का विभाजन-संस्मरण Divide and Quit नाम से छपा है, इसलिए इन तीन शब्दों की खोज नारे से पहले एक पुस्तक ले आती है; पुस्तक इस नारे का स्रोत नहीं है।
- इस प्रश्न पर आयोग की अपनी प्रकाशित तर्क-पंक्ति : जिन्नाह ही एकमात्र सही विकल्प हैं, क्योंकि एम. ए. अंसारी और जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के वे नेता थे जो विभाजन के विरोधी थे, और मुहम्मद इकबाल की मृत्यु 1938 में हो चुकी थी, यानी मुस्लिम लीग द्वारा 1940 में लाहौर प्रस्ताव अपनाए जाने से दो वर्ष पहले; आयोग जिन्नाह के इस पलटवार को कांग्रेस के अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आह्वान के बाद रखता है।
- डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी (25 दिसम्बर 1880 - 10 मई 1936) 1927-28 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष, 1920-21 में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के अध्यक्ष, तथा जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक और 1928 से अपनी मृत्यु तक उसके कुलाधिपति रहे — एक समावेशी राष्ट्रवादी, और भारत छोड़ो से छह वर्ष पहले ही दिवंगत।
- सर मुहम्मद इकबाल (9 नवम्बर 1877 - 21 अप्रैल 1938) ने 1930 में मुस्लिम लीग को इलाहाबाद अभिभाषण दिया, जिस पाठ को आम तौर पर एक अलग मुस्लिम मातृभूमि के विचार का बौद्धिक उद्गम माना जाता है; उनकी मृत्यु 1940 के लाहौर प्रस्ताव से लगभग दो वर्ष पहले हो गई।
- जिन्नाह ने 1928 की नेहरू रिपोर्ट का, जिसे वे 'हिन्दू दस्तावेज़' कहते थे, उत्तर 1929 के अपने चौदह सूत्रों से दिया; उनके नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने 1940 में लाहौर प्रस्ताव पारित किया, और 15 अगस्त 1947 को वे पाकिस्तान के पहले गवर्नर-जनरल बने।
- Divide and Quit (1961) सर एडवर्ड पेंडरेल मून का विभाजन-संस्मरण है; मून ब्रिटिश भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी थे, जिन्होंने पंजाब में तथा बहावलपुर रियासत के वित्त मंत्री के रूप में सेवा की और 1947 के बाद भी हिमाचल प्रदेश तथा मणिपुर के मुख्य आयुक्त के रूप में भारत में बने रहे। पुस्तक ने नारे को शीर्षक बनाया; वह उसका स्रोत नहीं है।
- जिन्नाह ने यह वाक्यांश किस अधिवेशन में, किस स्थान पर और किस तिथि को कहा, यह इस कार्ड के लिए किसी प्राथमिक या विद्वत्तापूर्ण स्रोत से सत्यापित नहीं हो सका, इसलिए यहाँ ऐसा कोई दावा नहीं किया गया — यह उन विरल स्थितियों में से एक है जहाँ उत्तर निश्चित है और उसका अवसर नहीं।
रेखांकित पंक्ति ही उत्तर है। ये तीन शब्द केवल अपने ऊपर वाली पंक्ति के उत्तर के रूप में ही अर्थ रखते हैं, इसीलिए आयोग इस पलटवार को अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आह्वान के बाद रखता है — और इसीलिए वे दो विकल्प, जिनका निधन पहले ही हो चुका था, 1936 में अंसारी और 1938 में इकबाल, इसे उठा नहीं सकते।
- मुहम्मद इकबाल को चुन लेना क्योंकि 1930 के इलाहाबाद अभिभाषण को पाकिस्तान के विचार का उद्गम कहा जाता है — उनकी मृत्यु 21 अप्रैल 1938 को हुई, लाहौर प्रस्ताव से पहले और भारत छोड़ो से बहुत पहले
- इस नारे को सर पेंडरेल मून के इसी नाम वाले 1961 के विभाजन-संस्मरण से मिला देना, जो एक ब्रिटिश सिविल सेवक की पुस्तक है और इस वाक्यांश का उद्गम नहीं
- नाम के कारण एम. ए. अंसारी को मुस्लिम लीग का व्यक्ति मान लेना — वे 1927-28 में कांग्रेस अध्यक्ष और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों में से थे, और उनकी मृत्यु 1936 में हो गई थी
BPSC नारे-से-वक्ता वाला सीधा श्रेय-प्रश्न पसंद करता है और विकल्प-सूची एक ही समुदाय या एक ही दशक के नामों से बनाता है, ताकि अभ्यर्थी समुदाय या कालखंड से शॉर्टकट न ले सके और उसे तिथियों तथा घोषित अवस्थितियों पर विलोपन करना पड़े। UPSC नारा लगभग कभी सीधे नहीं पूछता; वह उसके आसपास की चालें पूछता है — 2002 में यह कि किसकी अस्वीकृति ने विभाजन टालने का अंतिम अवसर छीन लिया, 2000 में यह कि गांधी ने माउंटबेटन को उसके विकल्प के रूप में क्या सुझाया, 1998 में यह कि माउंटबेटन वास्तव में किन निर्देशों के साथ आए थे। UPSC से क्रम और मोल-भाव की अपेक्षा कीजिए, BPSC से वाक्यांश की।
भारत के विभाजन को टालने का अंतिम अवसर किसकी अस्वीकृति के साथ खो गया ?
- (a) क्रिप्स मिशन
- (b) राजगोपालाचारी फॉर्मूला
- (c) कैबिनेट मिशन
- (d) वेवेल योजना
उत्तर(c) कैबिनेट मिशन
वही टकराव, नारे के बजाय उसके निर्णायक मोड़ से पूछा गया। 'बाँटो और छोड़ो' वही माँग है जिसने एक अकेले उत्तराधिकारी राज्य को असम्भव बना दिया, और 1946 की कैबिनेट मिशन की त्रि-स्तरीय योजना वह अंतिम रचना थी जिसने उसे और एक अखंड भारत की कांग्रेस की माँग, दोनों को साथ साधने का प्रयास किया।
भारत के विभाजन के विकल्प के रूप में गांधीजी ने माउंटबेटन को सुझाव दिया कि वे
- (a) स्वतंत्रता प्रदान करना स्थगित कर दें
- (b) जिन्नाह को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें
- (c) नेहरू और जिन्नाह को मिलकर सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें
- (d) कुछ समय के लिए सेना को शासन सँभालने के लिए बुला लें
उत्तर(b) जिन्नाह को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें
उसी बहस का दूसरा छोर। गांधी की अंतिम पेशकश — देश को बाँटने के बजाय पूरा अविभाजित देश जिन्नाह को सौंप दो — ठीक-ठीक दिखाती है कि विभाजन टालने के लिए कांग्रेस क्या तक देने को तैयार थी, और इसलिए यह भी कि 1947 तक 'बाँटो और छोड़ो' में समाई माँग कितनी निरपेक्ष हो चुकी थी।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
मार्च 1940 में प्रस्तुत अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का लाहौर प्रस्ताव सीधे किससे जुड़ा हुआ है ?
- (a)मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडलों की माँग
- (b)ब्रिटिश भारत के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में स्वतंत्र राज्यों की माँग
- (c)कैबिनेट मिशन की समूहीकरण योजना की स्वीकृति
- (d)1946 की अंतरिम सरकार का गठन
उत्तर(b) ब्रिटिश भारत के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में स्वतंत्र राज्यों की माँग — यह प्रस्ताव 1940 में जिन्नाह के नेतृत्व में पारित हुआ। पृथक निर्वाचक मंडल 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम से आते हैं, समूहीकरण योजना 16 मई 1946 की कैबिनेट मिशन योजना की है, और अंतरिम सरकार ने 2 सितम्बर 1946 को पदभार सँभाला।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
निम्नलिखित में से कौन 1927 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष तथा जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक थे ?
- (a)हकीम अजमल खान
- (b)एम. ए. अंसारी
- (c)मौलाना हसरत मोहानी
- (d)अब्दुल मजीद ख्वाजा
उत्तर(b) एम. ए. अंसारी — डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी ने 1927-28 में कांग्रेस की अध्यक्षता की, इससे पहले 1920-21 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष रह चुके थे, और 1928 से 10 मई 1936 को अपनी मृत्यु तक जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलाधिपति रहे। हकीम अजमल खान कुलाधिपति के रूप में उनके पूर्ववर्ती थे।