निम्नलिखित में से कौन वित्त आयोग के सदस्य के लिए आवश्यक अर्हताओं का निर्धारण करता है ?
- (a)भारत का राष्ट्रपति
- (b)मंत्रिपरिषद्
- (c)संसद विधि द्वारा
- (d)संघीय कैबिनेट
सही — C, ‘संसद विधि द्वारा’। प्रश्न-वाक्य लगभग शब्दशः उसी खंड से उठाया गया है जो उसका उत्तर देता है। अनुच्छेद 280(2) कहता है : “संसद विधि द्वारा उन अर्हताओं का, जो आयोग के सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिए आवश्यक होंगी, तथा उस रीति का, जिससे उनका चयन किया जाएगा, अवधारण कर सकेगी।” प्रश्न में आया ‘आवश्यक अर्हताओं’ वही संवैधानिक पदावली है, और वह संसद वाले खंड की है, राष्ट्रपति वाले की नहीं। संसद ने वास्तव में यह शक्ति पहले ही अवसर पर प्रयोग की, वित्त आयोग (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1951 के माध्यम से। उस अधिनियम की धारा 3 आज भी प्रवृत्त अर्हता-सूची है : अध्यक्ष उन व्यक्तियों में से चुने जाते हैं जिन्हें लोक कार्यों का अनुभव रहा हो, और शेष चार सदस्य उन व्यक्तियों में से जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं, रह चुके हैं या नियुक्त होने के लिए अर्हित हैं, अथवा जिन्हें सरकार के वित्त और लेखा का विशेष ज्ञान है, अथवा जिन्हें वित्तीय विषयों तथा प्रशासन का व्यापक अनुभव रहा है, अथवा जिन्हें अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञान है। अनुच्छेद 280 जानबूझकर दो प्राधिकारियों में बँटा है और यह प्रश्न उसी विभाजन पर खड़ा है। खंड (1) राष्ट्रपति का है : वे आदेश द्वारा आयोग का गठन करते हैं — संविधान के प्रारम्भ से दो वर्ष के भीतर और उसके बाद प्रत्येक पाँचवें वर्ष की समाप्ति पर या उससे पहले जब वे आवश्यक समझें — और वे ही अध्यक्ष तथा चार अन्य सदस्यों की नियुक्ति करते हैं। खंड (2) संसद का है : वह तय करता है कि नियुक्ति के लिए कौन पात्र है और चयन किस रीति से होगा। खंड (4) फिर संसद का है — आयोग अपनी प्रक्रिया स्वयं निर्धारित करता है, पर अपने कृत्यों के निष्पादन में उसे वही शक्तियाँ प्राप्त होती हैं जो संसद विधि द्वारा प्रदान करे, और 1951 का अधिनियम वे शक्तियाँ देता है, जिनमें साक्षियों को समन करने तथा दस्तावेज़ पेश कराने की सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ शामिल हैं। इसलिए राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं; संसद वह कसौटी तय करती है जिस पर नियुक्त व्यक्ति को खरा उतरना है। इस परीक्षा की तिथि, 13 सितम्बर 2025, को सम्बन्धित निकाय सोलहवाँ वित्त आयोग था, जो 31 दिसम्बर 2023 को अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में 2026–31 की अवधि के लिए गठित हुआ, जिसके सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त हुए और चौहत्तर वर्ष पहले बने एक अधिनियम के अधीन अर्हित थे।
- (a)भारत का राष्ट्रपति — सबसे प्रबल गलत उत्तर, क्योंकि यहाँ की अधिकांश दिखाई देने वाली शक्तियाँ सचमुच राष्ट्रपति के पास ही हैं : वे अनुच्छेद 280(1) के अधीन आदेश द्वारा आयोग का गठन करते हैं, तय करते हैं कि पाँच वर्ष से पहले गठन करना है या नहीं, अध्यक्ष तथा चारों सदस्यों की नियुक्ति करते हैं, अनुच्छेद 280(3)(d) के अधीन सुदृढ़ वित्त के हित में अतिरिक्त विषय निर्दिष्ट करते हैं, और अनुच्छेद 281 के अधीन प्रत्येक संस्तुति को की गई कार्रवाई के ज्ञापन सहित दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं। जो वे नहीं करते, वह है अर्हताएँ विहित करना, क्योंकि खंड (2) यह काम संसद को सौंपता है। अभ्यर्थियों को फँसाने वाला सामान्यीकरण संविधान के किसी और हिस्से से आता है — अनुच्छेद 318 सचमुच राष्ट्रपति को विनियम द्वारा संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा-शर्तें अवधारित करने देता है। प्रतिमान के बजाय विशिष्ट अनुच्छेद पढ़िए।
- (b)मंत्रिपरिषद् — अनुच्छेद 280 में मंत्रिपरिषद् की कोई स्वतंत्र संवैधानिक भूमिका है ही नहीं। अनुच्छेद 74(1) के अधीन वह राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देती है, और व्यवहार में उसी की सलाह पर राष्ट्रपति आयोग का गठन करते और उसके विचारार्थ विषय तय करते हैं — पर सलाह विधि नहीं होती। खंड (2) ‘विधि द्वारा’ अवधारण की अपेक्षा करता है, जिसका अर्थ है दोनों सदनों से पारित और अनुच्छेद 111 के अधीन अनुमति प्राप्त कोई विधेयक। कोई कार्यपालिका निकाय, चाहे कितना ही वरिष्ठ हो, यह पूरा नहीं कर सकता, और जो अभ्यर्थी (b) पर निशान लगाता है उसने राजनीतिक निर्णय के स्रोत को विधिक शक्ति के स्रोत से गड्डमड्ड कर दिया है।
- (d)संघीय कैबिनेट — कैबिनेट व्यवहार में यह तय करती ही है कि वित्त आयोग कब गठित हो, अध्यक्ष के लिए किसका नाम प्रस्तावित हो और उसे कौन-से अतिरिक्त प्रश्न निर्दिष्ट किए जाएँ — और ठीक इसीलिए यह विकल्प रखा गया है। पर कैबिनेट का निर्णय कार्यपालिका कार्य है, अधिनियमन नहीं, और वह उस खंड को संतुष्ट नहीं कर सकता जो कहता है ‘संसद विधि द्वारा अवधारण कर सकेगी’। यह याद रखने योग्य है कि स्वयं कैबिनेट का संवैधानिक आधार कितना पतला है : ‘कैबिनेट’ शब्द संविधान में केवल अनुच्छेद 352(3) में आता है, जिसे चौवालीसवें संशोधन, 1978 ने जोड़ा और जो आपात की उद्घोषणा जारी करने से पहले संघीय कैबिनेट की लिखित संस्तुति की अपेक्षा करता है।
वित्त आयोग भारतीय राजकोषीय संघवाद का संवैधानिक संतुलन-चक्र है, जिसे भाग 12 के वित्त अध्याय में अनुच्छेद 280 ने रचा। जिस बनावटी समस्या को यह हल करता है वह संरचनागत है : सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले कर संघ इकट्ठा करता है जबकि सबसे भारी व्यय-दायित्व राज्यों पर हैं, इसलिए किसी तटस्थ निकाय को समय-समय पर यह संस्तुति करनी पड़ती है कि धन किस तरह चले। अनुच्छेद 280 अपने चार खंड अलग-अलग प्राधिकारियों को बाँटता है। खंड (1) राष्ट्रपति को आदेश द्वारा आयोग गठित करने की शक्ति देता है — प्रारम्भ से दो वर्ष के भीतर और उसके बाद प्रत्येक पाँचवें वर्ष या उससे पहले यदि वे आवश्यक समझें — जिसमें एक अध्यक्ष और उनके द्वारा नियुक्त चार अन्य सदस्य होते हैं। खंड (2) संसद को विधि द्वारा नियुक्ति की अर्हताएँ तथा चयन की रीति अवधारित करने की शक्ति देता है। खंड (3) कर्तव्य गिनाता है : विभाज्य करों की शुद्ध आगमों का संघ और राज्यों के बीच वितरण तथा राज्यों के हिस्सों का आपस में आवंटन; भारत की संचित निधि से राज्यों को दिए जाने वाले सहायता अनुदानों के सिद्धांत; किसी राज्य की संचित निधि को इस प्रकार बढ़ाने के उपाय कि उसकी पंचायतों और नगरपालिकाओं के संसाधनों की पूर्ति हो सके — खंड (3)(bb) और (3)(c), जिन्हें 1992 के तिहत्तरवें तथा चौहत्तरवें संशोधनों ने जोड़ा — और कोई अन्य विषय जो राष्ट्रपति सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट करें। खंड (4) आयोग को अपनी प्रक्रिया स्वयं निर्धारित करने देता है और साथ ही संसद को उसे शक्तियाँ प्रदान करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 281 जवाबदेही का घेरा पूरा करता है, क्योंकि वह राष्ट्रपति से अपेक्षा करता है कि वे प्रत्येक संस्तुति को, की गई कार्रवाई के व्याख्यात्मक ज्ञापन सहित, प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएँ। संस्तुतियाँ स्वयं परामर्शी हैं, बाध्यकारी नहीं; अनिवार्य केवल सदन में रखा जाना है। ठीक यही स्थापत्य एक स्तर नीचे भी दोहराया गया है : अनुच्छेद 243-I के अधीन राज्यपाल पंचायतों के लिए राज्य वित्त आयोग गठित करते हैं, और अनुच्छेद 243-I(2) के अधीन राज्य का विधान-मंडल विधि द्वारा उसकी संरचना, सदस्यों की अर्हताएँ तथा उनके चयन की रीति का उपबंध करता है।
पहले यह देखिए कि आपको किस प्रकार के विकल्प दिए गए हैं। राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद् और संघीय कैबिनेट — ये तीन टोपियाँ पहने एक ही संस्था हैं : औपचारिक प्रमुख, संवैधानिक परामर्शी निकाय, और उसका आंतरिक केन्द्र। ठीक से बने प्रश्न में तीन लगभग अदल-बदल योग्य उत्तर नहीं हो सकते, इसलिए जो चौथा सबसे अलग है वही लगभग निश्चित रूप से कुंजी है। यह संरचनागत पाठ आपको एक भी अनुच्छेद याद किए बिना (c) तक पहुँचा देता है, और यह चाल हर उस प्रश्नपत्र में काम आती है जो आपके सामने लगभग पर्यायवाची कार्यपालिका निकायों का गुच्छा रख दे। फिर उसे शब्दावली से पक्का कीजिए। प्रश्न-वाक्य का ‘आवश्यक अर्हताओं’ कोई भावानुवाद नहीं है; यह अनुच्छेद 280(2) की भाषा है, और जिस खंड में ये शब्द हैं वह ‘संसद विधि द्वारा अवधारण कर सकेगी’ से शुरू होता है। जब भी कोई प्रश्न-वाक्य ‘जो आवश्यक होंगी’, ‘संसद द्वारा विधि द्वारा अवधारित’ या ‘संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन रहते हुए’ जैसी ध्वनि दे, उत्तर विधानमंडल होता है, चाहे नियुक्ति स्वयं राष्ट्रपति की ही क्यों न हो — यही विभाजन अनुच्छेद 148(3) के अधीन नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के वेतन और सेवा-शर्तों पर भी लागू होता है। इसलिए यहाँ का एकमात्र विभेदक तथ्य यह है कि अनुच्छेद 280 एक ही पद को दो प्राधिकारियों में बाँटता है : खंड (1) के अधीन राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं, खंड (2) के अधीन संसद पात्रता की कसौटी तय करती है। यह विभाजन चूक जाइए तो (a) अकाट्य लगता है, क्योंकि वित्त आयोग के बारे में बाकी सब कुछ जो दिखता है — उसका गठन, उसकी नियुक्तियाँ, उसके विचारार्थ विषय, उसकी रिपोर्ट का सदन में रखा जाना — सचमुच राष्ट्रपति का ही काम है।
- अनुच्छेद 280(1) : राष्ट्रपति, संविधान के प्रारम्भ से दो वर्ष के भीतर और उसके बाद प्रत्येक पाँचवें वर्ष की समाप्ति पर या उससे पहले जब वे आवश्यक समझें, आदेश द्वारा एक वित्त आयोग गठित करेंगे, जिसमें एक अध्यक्ष और उनके द्वारा नियुक्त चार अन्य सदस्य होंगे।
- अनुच्छेद 280(2) : संसद विधि द्वारा सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिए आवश्यक अर्हताएँ तथा उनके चयन की रीति अवधारित कर सकेगी — यह शक्ति वित्त आयोग (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1951 के माध्यम से प्रयोग की गई, जिसकी धारा 3 अध्यक्ष के लिए लोक कार्यों का अनुभव अपेक्षित करती है और चारों सदस्यों के लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अर्हता, या सरकार के वित्त और लेखा का विशेष ज्ञान, या वित्तीय विषयों तथा प्रशासन का व्यापक अनुभव, या अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञान।
- अनुच्छेद 280(3) के कर्तव्य : विभाज्य करों की शुद्ध आगमों का संघ और राज्यों के बीच तथा राज्यों में आपस में वितरण; भारत की संचित निधि से सहायता अनुदानों के सिद्धांत; किसी राज्य की संचित निधि को बढ़ाकर पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के संसाधनों की पूर्ति के उपाय — उप-खंड (bb) और (c), जिन्हें तिहत्तरवें तथा चौहत्तरवें संशोधन, 1992 ने जोड़ा; और कोई अन्य विषय जो राष्ट्रपति सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट करें।
- अनुच्छेद 280(4) आयोग को अपनी प्रक्रिया स्वयं निर्धारित करने देता है और साथ ही संसद को उसे शक्तियाँ प्रदान करने की अनुमति देता है; अनुच्छेद 281 राष्ट्रपति से अपेक्षा करता है कि वे प्रत्येक संस्तुति को, की गई कार्रवाई के ज्ञापन सहित, प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएँ। संस्तुतियाँ परामर्शी हैं — अनिवार्य केवल उनका सदन में रखा जाना है।
- 13 सितम्बर 2025 की परीक्षा की तिथि तक : एन. के. सिंह की अध्यक्षता वाले पंद्रहवें वित्त आयोग ने 2021–26 के लिए विभाज्य पूल का 41% ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण राज्यों को देने की संस्तुति की थी, जबकि चौदहवें आयोग ने 42% कहा था, और सोलहवाँ वित्त आयोग 31 दिसम्बर 2023 को अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में 2026–31 की अवधि के लिए गठित हो चुका था। राज्य स्तर पर समानांतर उपबंध अनुच्छेद 243-I है : राज्यपाल राज्य वित्त आयोग गठित करते हैं और राज्य का विधान-मंडल विधि द्वारा उसकी संरचना तथा अर्हताएँ नियत करता है।

- यह मान लेना कि अर्हताएँ राष्ट्रपति नियत करते हैं क्योंकि नियुक्तियाँ वे करते हैं — अनुच्छेद 280 के खंड (1) और खंड (2) अलग-अलग प्राधिकारियों में निहित अलग शक्तियाँ हैं
- अनुच्छेद 318 से सामान्यीकरण कर लेना, जहाँ राष्ट्रपति सचमुच विनियम द्वारा संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की संख्या और सेवा-शर्तें अवधारित करते हैं
- अनुच्छेद 280 वाले संघीय वित्त आयोग को अनुच्छेद 243-I वाले राज्य वित्त आयोग से गड्डमड्ड कर देना, जिसका गठन राज्यपाल करते हैं और विनियमन राज्य का विधान-मंडल
- यह भूल जाना कि आयोग की संस्तुतियाँ परामर्शी हैं; अनिवार्य केवल अनुच्छेद 281 के अधीन प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाना है
- कैबिनेट के निर्णय को उस खंड के लिए पर्याप्त मान लेना जो ‘विधि द्वारा’ अवधारण की अपेक्षा करता है
BPSC इसे सपाट ‘कौन निर्धारित करता है’ वाली एक पंक्ति में पूछता है और फिर विकल्पों में कार्यपालिका के तीन चेहरे भर देता है, इसलिए अंक इस बात पर टिकता है कि आप देख लें कि इनमें केवल एक विकल्प विधानमंडल है — यह श्रेणी का पाठ है, स्मृति का नहीं। UPSC वही अनुच्छेद कर्तव्यों की ओर से चलाता है और पूछता है कि आयोग क्या कर सकता है और क्या नहीं, या उसकी रिपोर्ट सदन में कौन रखवाएगा, और उसे बहु-कथन वाली बनावट पसंद है जो आपसे संचित निधि से आहरण प्राधिकृत करने जैसे प्रशंसनीय-से लगने वाले कृत्यों को अस्वीकार करवाती है। अनुच्छेद 280 को खंड-दर-खंड सीखिए और दोनों शैलियाँ सध जाती हैं; उसे ‘राष्ट्रपति का निकाय’ मानकर सीखिए और आप दोनों में से जो भी मिले उसमें चूक जाएँगे।
निम्नलिखित में से कौन वित्त आयोग द्वारा की गई प्रत्येक संस्तुति को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा ?
- (a) भारत का राष्ट्रपति
- (b) लोक सभा का अध्यक्ष
- (c) भारत का प्रधानमंत्री
- (d) संघीय वित्त मंत्री
उत्तर(a) भारत का राष्ट्रपति
वही ‘वित्त आयोग की कौन-सी शक्ति किस प्राधिकारी के पास है’ वाली परीक्षा, एक अनुच्छेद आगे बढ़कर : अनुच्छेद 281 रिपोर्ट सदन में रखवाने का काम राष्ट्रपति पर डालता है, ठीक वैसे ही जैसे अनुच्छेद 280(2) अर्हताएँ संसद पर डालता है। ये दोनों प्रश्न मिलकर उसी पूरे कार्य-विभाजन का नक्शा बना देते हैं जिससे BPSC ने यह प्रश्न उठाया है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : वित्त आयोग का/के कार्य है/हैं 1. भारत की संचित निधि से धन के आहरण की अनुमति देना। 2. राज्यों के बीच करों की आगमों के हिस्सों का आवंटन करना। 3. राज्यों से प्राप्त सहायता अनुदान के आवेदनों पर विचार करना। 4. यह पर्यवेक्षण और प्रतिवेदन करना कि संघ तथा राज्य सरकारें बजट उपबंधों के अनुसार कर लगा रही हैं या नहीं। इनमें से कौन-सा/से कथन सही है/हैं ?
- (a) केवल 1
- (b) 2 और 3
- (c) 3 और 4
- (d) 1, 2 और 4
उत्तर(b) 2 और 3
यह तय कर देता है कि अनुच्छेद 280(3) वास्तव में आयोग को क्या करने के लिए प्राधिकृत करता है — करों की आगमों के बँटवारे तथा सहायता अनुदान के सिद्धांतों की संस्तुति, और आहरण प्राधिकृत करने या कर-वसूली की लेखा-परीक्षा से कुछ लेना-देना नहीं — और यही वह पृष्ठभूमि है जिसके बिना यह जानना कठिन है कि आयोग के कौन-से हिस्से राष्ट्रपति के नहीं, संसद के नियंत्रण में हैं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
वित्त आयोग (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1951 के अधीन वित्त आयोग का अध्यक्ष उन व्यक्तियों में से चुना जाता है जिन्हें
- (a)लोक कार्यों का अनुभव रहा हो
- (b)अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञान हो
- (c)उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश हों या रह चुके हों
- (d)वित्तीय विषयों तथा प्रशासन का व्यापक अनुभव हो
उत्तर(a) लोक कार्यों का अनुभव रहा हो — विकल्प (b) और (d) चार अन्य सदस्यों के लिए विहित अर्हताएँ हैं, अध्यक्ष के लिए नहीं, और सदस्य के लिए न्यायिक अर्हता उच्च न्यायालय की है, उच्चतम न्यायालय की नहीं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
अनुच्छेद 280(3) के निम्नलिखित उप-खंडों में से कौन-सा तिहत्तरवें तथा चौहत्तरवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया था ?
- (a)संघ और राज्यों के बीच करों की शुद्ध आगमों का वितरण
- (b)राज्यों को सहायता अनुदान देने के सिद्धांत
- (c)किसी राज्य की संचित निधि को बढ़ाकर पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के संसाधनों की पूर्ति के उपाय
- (d)कोई अन्य विषय जो राष्ट्रपति सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट करें
उत्तर(c) किसी राज्य की संचित निधि को बढ़ाकर पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के संसाधनों की पूर्ति के उपाय — उप-खंड (bb) और (c), जो तब जुड़े जब 73वें और 74वें संशोधनों ने 1992 में स्थानीय शासन का संवैधानिक स्तर बनाया। शेष तीनों कर्तव्य अनुच्छेद 280 में आरम्भ से ही थे।