इसरो के GSLV-F15 मिशन के बारे में क्या सत्य है ?
- (a)इससे NVS-02 उपग्रह को ले जाया गया
- (b)यह श्रीहरिकोटा से इसरो का 101 वां प्रक्षेपण था
- (c)यह श्रीहरिकोटा से इसरो का 100 वां प्रक्षेपण था
- (d)उपरोक्त में से एक से अधिक
सही उत्तर — (d), उपरोक्त में से एक से अधिक। GSLV-F15 ने 29 जनवरी 2025 को प्रातः 06:23 IST पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र SHAR, श्रीहरिकोटा के द्वितीय प्रक्षेपण मंच (Second Launch Pad) से उड़ान भरी, और दिए गए तीन कथनों में से दो उस उड़ान के बारे में सत्य हैं। कथन (a) सत्य है: पेलोड NVS-02 था — दूसरी पीढ़ी की NavIC शृंखला का दूसरा उपग्रह, I-2K बस पर 2,250 किग्रा का यान, लगभग 3 kW शक्ति के साथ, जो L1, L5 और S बैंड में नौवहन पेलोड तथा C बैंड में एक रेंजिंग पेलोड ले जाता है, और जिसका उद्देश्य 111.75° पूर्व पर भूमध्य रेखा पार करने वाले झुके हुए भू-तुल्यकाली (inclined geosynchronous) स्लॉट में IRNSS-1E का स्थान लेना था। कथन (c) भी सत्य है: इसरो ने इस उड़ान को श्रीहरिकोटा से 100वें प्रक्षेपण के रूप में अंकित किया — 10 अगस्त 1979 की पहली प्रायोगिक SLV-3 उड़ान के बाद से इस अंतरिक्ष केंद्र से भरी गई सौवीं प्रक्षेपण-यान उड़ान, और यह शतक ही वह शीर्षक था जिसे स्वयं एजेंसी ने आगे रखा। इससे (b) ही इस समुच्चय का एकमात्र असत्य दावा बचता है — 101वां एक अंक आगे है, और वह उस अभ्यर्थी को दंडित करने के लिए रखा गया है जिसे 'श्रीहरिकोटा पर शतक' एक संख्या के रूप में नहीं, एक नारे के रूप में याद है। तीन में से दो कथन टिकते हैं, अर्थात कोई एक अक्षर वाला कथन उत्तर नहीं हो सकता, और केवल (d) दोनों को समाहित करता है। ध्यान से देखिए कि प्रश्न क्या नहीं पूछ रहा, क्योंकि यहीं अच्छी तैयारी वाला अभ्यर्थी अधिक सोच जाता है: यह पूछता है कि मिशन के बारे में क्या सत्य है, यह नहीं कि मिशन सफल रहा या नहीं। वह सफल नहीं रहा। GSLV-F15 ने अपना काम किया और उड़ान के लगभग उन्नीस मिनट बाद NVS-02 को लगभग 165 किमी × 36,577 किमी की भू-स्थैतिक अंतरण कक्षा (geostationary transfer orbit) में स्थापित कर दिया, परंतु उपग्रह के अपने कक्षा-उन्नयन प्रज्वलन कभी नहीं हो सके, क्योंकि उसके मुख्य इंजन में ऑक्सीकारक भेजने वाले वाल्व नहीं खुले, और वह कभी अपने परिचालन स्लॉट तक नहीं पहुँचा। यह विफलता उपग्रह की नियति के बारे में तथ्य है, इस बारे में नहीं कि रॉकेट क्या ले गया या वह कौन-सी संख्या का प्रक्षेपण था — इसलिए यह न (a) को असत्य करती है, न (c) को।
- (a)इससे NVS-02 उपग्रह को ले जाया गया — कथन के रूप में सत्य, उत्तर के रूप में गलत — और यही भेद पूरे प्रश्न का सार है। GSLV-F15 वास्तव में NVS-02 ले गया था, जो 2,250 किग्रा का दूसरी पीढ़ी का NavIC उपग्रह था और IRNSS-1E का स्थान लेने के लिए बना था। परंतु 'उपरोक्त में से एक से अधिक' वाले प्रश्न में एक सत्य कथन स्वतः कुंजी नहीं बन जाता। कथन (c) भी उतना ही सत्य है, इसलिए अकेले (a) पर निशान लगाना तथ्य-समुच्चय का आधा ही बताता है और अंक गँवा देता है।
- (b)यह श्रीहरिकोटा से इसरो का 101 वां प्रक्षेपण था — इस समुच्चय का एकमात्र वास्तव में असत्य कथन, और वही जो जान-बूझकर रखा गया है। GSLV-F15 श्रीहरिकोटा का 100वां प्रक्षेपण था, 101वां नहीं — यह गणना 10 अगस्त 1979 की पहली SLV-3 उड़ान के बाद से SDSC-SHAR से भरी गई प्रक्षेपण-यान उड़ानों की है, और इसरो ने पूरे सौ का प्रचार किया था। '101' वही अभ्यर्थी लिखता है जिसे याद है कि कोई पड़ाव पार हुआ था, पर यह याद नहीं कि कौन-सा पड़ाव; और यह विकल्प ठीक सही संख्या के ऊपर छपा है, ताकि तेज़ी से नज़र दौड़ाने वाला इसे पकड़ ले।
- (c)यह श्रीहरिकोटा से इसरो का 100 वां प्रक्षेपण था — (a) का दर्पण-प्रतिबिंब: सत्य, पर पूरा सत्य नहीं। यह वास्तव में श्रीहरिकोटा से 100वां प्रक्षेपण था, और साथ ही 2025 में इसरो की पहली उड़ान, कुल मिलाकर 17वां GSLV मिशन तथा Mk II संस्करण का 11वां। चूँकि कथन (a) भी सत्य है, अकेले (c) पर निशान लगाना वही आधा उत्तर है, और पेपर का अपना चौथा विकल्प ठीक इसीलिए है कि वह दोनों को समेट सके।
NavIC — Navigation with Indian Constellation, पहले IRNSS — भारत की अपनी क्षेत्रीय उपग्रह-नौवहन प्रणाली है, जो इसलिए बनाई गई कि भारतीय भूभाग पर स्थिति-निर्धारण किसी विदेशी तारामंडल पर निर्भर न रहे जिसे कोई विदेशी सरकार क्षीण कर सके। इसकी संरचना जान-बूझकर वैश्विक न होकर क्षेत्रीय है: सात उपग्रह, जिनमें तीन 32.5° पूर्व, 83° पूर्व और 131.5° पूर्व पर भू-स्थैतिक हैं, तथा चार झुकी हुई भू-तुल्यकाली कक्षाओं में हैं जो भूमध्य रेखा को 55° पूर्व और 111.75° पूर्व पर काटती हैं। चूँकि भारत निम्न अक्षांशों में है, यह ज्यामिति उपमहाद्वीप पर निरंतर दृश्यता उतने ही उपग्रहों के एक अंश से दे देती है जितने किसी विश्वव्यापी प्रणाली को चाहिए — GPS लगभग 24 से 31 उपग्रह चलाता है। घोषित सेवा-क्षेत्र भारत तथा उसके चारों ओर लगभग 1,500 किमी है, जिसमें भारतीय भूभाग पर लगभग 5–10 मीटर और आसपास के महासागर पर लगभग 20 मीटर की स्थिति-परिशुद्धता बताई गई है, और यह दो स्तरों पर दी जाती है: एक खुली Standard Positioning Service, तथा अधिकृत उपयोगकर्ताओं — मुख्यतः सैन्य — के लिए एक कूटबद्ध Restricted Service। दूसरी पीढ़ी की NVS शृंखला — GSLV-F12 पर NVS-01 (29 मई 2023) और GSLV-F15 पर NVS-02 (29 जनवरी 2025) — इसलिए बनी क्योंकि पहली पीढ़ी के IRNSS उपग्रहों पर लगी रुबिडियम परमाणु घड़ियाँ बार-बार विफल हुईं, जिससे तारामंडल की स्थिति-गणना की क्षमता पंगु हो गई। NVS यान अहमदाबाद के अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (Space Applications Centre) द्वारा विकसित स्वदेशी परमाणु घड़ियाँ ले जाते हैं, अभिकल्पित आयु 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष करते हैं, और 1575.42 MHz पर L1 बैंड जोड़ते हैं — वही आवृत्ति जो नागरिक GPS पहले से उपयोग करता है — ताकि साधारण फोन और IoT चिपसेट बिना नए हार्डवेयर के NavIC पकड़ सकें।
यह 'उपरोक्त में से एक से अधिक' प्रकार का प्रश्न है, और BPSC ऐसे बहुत प्रश्न बनाता है, इसलिए पहले प्रारूप को ही एक सूचना के रूप में पढ़िए। जब विकल्प (a), (b) और (c) तीन प्रतिद्वंद्वी उत्तर न होकर तीन स्वतंत्र दावे हों, तो काम सर्वोत्तम को चुनना नहीं है — काम तीनों की जाँच करना और यह गिनना है कि कितने टिकते हैं। जो अभ्यर्थी पहले पहचाने गए सत्य कथन पर रुक जाता है, उसने प्रश्न का प्रकार ही गलत पढ़ा है, और यही — इसरो की अनभिज्ञता नहीं — वह चूक है जिसे यह प्रश्न वास्तव में दंडित करता है। क्रम से जाँचिए। (a) GSLV-F15 पर NVS-02 सत्य है, और मिशन का नाम जाने बिना भी वहाँ पहुँचा जा सकता है, क्योंकि GSLV ठीक वही यान है जिससे भारत भू-तुल्यकाली कक्षा की ओर पेलोड भेजता है, जबकि PSLV ध्रुवीय और सूर्य-तुल्यकाली मिशन उड़ाता है — 111.75° पूर्व के स्लॉट की ओर जाता नौवहन उपग्रह GSLV पर ही बैठता है। (b) और (c) दोनों सत्य नहीं हो सकते; वे ठीक एक से भिन्न हैं। इसलिए पूरा प्रश्न एक ही तथ्य पर सिमट जाता है — यह श्रीहरिकोटा का 100वां प्रक्षेपण था या 101वां? यह 100वां था, और इसरो का अपना शतक-प्रचार ही वह कारण है जिससे यह संख्या स्मरणीय है। दो कथन बचने का अर्थ है (d)। अतः एकमात्र विभेदक 100 की संख्या है, और जाल स्थानगत है: गलत संख्या सही संख्या के ठीक ऊपर छपी है, इसलिए 'श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण पड़ाव' खोजता हुआ जल्दबाज़ पाठक (b) पर निशान लगाकर (c) से उसकी तुलना ही नहीं करता। दूसरा जाल यह है कि ज्ञान आपके विरुद्ध काम करता है — जिस अभ्यर्थी को याद है कि NVS-02 अंतरण कक्षा में ही अटक गया था, वह ऐसे 'इनमें से कोई नहीं' विकल्प की तलाश करने लगता है जो यह प्रश्न देता ही नहीं।
- GSLV-F15 ने 29 जनवरी 2025 को 06:23 IST पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र SHAR, श्रीहरिकोटा के द्वितीय प्रक्षेपण मंच से उड़ान भरी — 2025 में इसरो का पहला प्रक्षेपण, 17वीं GSLV उड़ान, Mk II संस्करण की 11वीं, और 10 अगस्त 1979 की SLV-3 की पहली उड़ान के बाद से इस अंतरिक्ष केंद्र से 100वां प्रक्षेपण।
- NVS-02 का उड्डयन द्रव्यमान I-2K बस पर 2,250 किग्रा है, शक्ति लगभग 3 kW, यह L1, L5 और S बैंड में नौवहन पेलोड तथा C-बैंड रेंजिंग पेलोड ले जाता है, और इसे 111.75° पूर्व के झुके हुए भू-तुल्यकाली स्लॉट पर IRNSS-1E का स्थान लेने के लिए बनाया गया था।
- पृथक्करण के बाद मिशन विफल हो गया: NVS-02 लगभग 165 किमी × 36,577 किमी की भू-स्थैतिक अंतरण कक्षा तक पहुँचा, परंतु कक्षा-उन्नयन नहीं किया जा सका क्योंकि मुख्य इंजन में ऑक्सीकारक भेजने वाले वाल्व नहीं खुले; विफलता-विश्लेषण समिति ने इसका कारण यह पाया कि कनेक्टर संपर्कों के अलग रह जाने से प्रज्वलन संकेत ऑक्सीकारक-लाइन के पायरो वाल्व तक नहीं पहुँचा।
- NavIC का सात-उपग्रही तारामंडल 32.5° पूर्व, 83° पूर्व और 131.5° पूर्व पर तीन भू-स्थैतिक उपग्रह तथा 55° पूर्व और 111.75° पूर्व पर भूमध्य रेखा काटने वाली झुकी भू-तुल्यकाली कक्षाओं में चार उपग्रह हैं; सेवा-क्षेत्र भारत तथा उससे लगभग 1,500 किमी आगे तक है, जिसमें भूभाग पर लगभग 5–10 मीटर और महासागर पर लगभग 20 मीटर की स्थिति-परिशुद्धता है।
- दूसरी पीढ़ी के NVS उपग्रह अहमदाबाद के अंतरिक्ष उपयोग केंद्र द्वारा निर्मित स्वदेशी परमाणु घड़ियाँ ले जाते हैं, अभिकल्पित आयु 10 से 12 वर्ष कर देते हैं, और नागरिक GPS अभिग्राहकों से अंतर-प्रचालनीयता के लिए 1575.42 MHz पर L1 बैंड जोड़ते हैं; NVS-01 ने 29 मई 2023 को GSLV-F12 पर उड़ान भरी थी।

- (a) या (c) पर केवल इसलिए निशान लगाना कि कथन स्वयं सत्य है — 'उपरोक्त में से एक से अधिक' वाले प्रश्न में सत्य कथन स्वतः कुंजी नहीं होता; शेष की भी जाँच करनी पड़ती है
- 101वां लिख देना: पड़ाव श्रीहरिकोटा का 100वां प्रक्षेपण था, और दोनों विकल्प एक पंक्ति के अंतर पर छपे हैं तथा ठीक एक से भिन्न हैं
- यह मान लेना कि मिशन सफल था क्योंकि प्रक्षेपण का उत्सव मनाया गया — रॉकेट ने अपना काम किया, पर NVS-02 का अपना इंजन उसे अंतरण कक्षा से कभी बाहर नहीं ले जा सका, और यह प्रश्न मिशन के तथ्यों के बारे में है, उसके परिणाम के बारे में नहीं
BPSC अंतरिक्ष से जुड़े समसामयिकी प्रश्न तथ्य-जाँच के रूप में पूछता है: एक नामित हालिया मिशन, उसके बारे में तीन एक-पंक्ति के दावे, और 'उपरोक्त में से एक से अधिक' का निकास द्वार — इसलिए अंक उसे मिलता है जो चालीस सेकंड में तीन कथन सत्यापित कर सके, न कि उसे जो कक्षीय यांत्रिकी समझता हो। UPSC किसी एक हालिया उड़ान का नाम लगभग कभी नहीं लेता। उसके अंतरिक्ष प्रश्न वैचारिक और टिकाऊ होते हैं — 2018 में IRNSS तारामंडल की कक्षीय संरचना, और उसी पेपर में यह कि PSLV का पेलोड GSLV के पेलोड से किस प्रकार अलग है — क्योंकि संरचना पर बना प्रश्न पाँच वर्ष बाद भी वैध रहता है, जबकि सौवें प्रक्षेपण पर बना प्रश्न 101वीं उड़ान भरते ही समाप्त हो जाता है।
भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. IRNSS के तीन उपग्रह भू-स्थैतिक कक्षाओं में और चार उपग्रह भू-तुल्यकाली कक्षाओं में हैं। 2. IRNSS सम्पूर्ण भारत तथा उसकी सीमाओं से लगभग 5500 वर्ग किमी आगे तक के क्षेत्र को आच्छादित करता है। 3. भारत के पास 2019 के मध्य तक पूर्ण वैश्विक आच्छादन वाली अपनी उपग्रह नौवहन प्रणाली होगी। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 1 और 2
- (c) केवल 2 और 3
- (d) कोई नहीं
उत्तर(a) केवल 1
वही तारामंडल, UPSC के ढंग से परखा गया — तीन भू-स्थैतिक और चार झुके हुए भू-तुल्यकाली उपग्रह, तथा यह तथ्य कि NavIC वैश्विक नहीं, क्षेत्रीय है। NVS-02 उसी तारामंडल की ओर उड़ान भर रहा था, और 111.75° पूर्व का जो स्लॉट उसे लेना था वह उन्हीं चार झुकी कक्षाओं में से एक है जिन्हें यह प्रश्न गिनता है।
भारत के उपग्रह प्रक्षेपण यानों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. PSLV उन उपग्रहों को प्रक्षेपित करते हैं जो भू-संसाधनों की निगरानी के लिए उपयोगी हैं, जबकि GSLV मुख्यतः संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए अभिकल्पित हैं। 2. PSLV द्वारा प्रक्षेपित उपग्रह, पृथ्वी पर किसी विशेष स्थान से देखने पर, आकाश में एक ही स्थिति में स्थायी रूप से स्थिर प्रतीत होते हैं। 3. GSLV Mk III एक चार-चरणीय प्रक्षेपण यान है जिसके पहले और तीसरे चरण में ठोस रॉकेट मोटर तथा दूसरे और चौथे चरण में द्रव रॉकेट इंजन प्रयुक्त होते हैं। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) 2 और 3
- (c) 1 और 2
- (d) केवल 3
उत्तर(a) केवल 1
BPSC वाले प्रश्न का पेलोड GSLV पर सवार था ही क्यों — इसका उत्तर यहाँ है। यह प्रश्न इस जानकारी को पुरस्कृत करता है कि भू-तुल्यकाली कक्षा की ओर जाने वाले पेलोड के लिए भारत का यान GSLV है, जबकि PSLV ध्रुवीय और सूर्य-तुल्यकाली कक्षाओं की सेवा करता है — यही श्रम-विभाजन 'GSLV-F15 एक नौवहन उपग्रह ले गया' को रटने की बात नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक जोड़ी बना देता है।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
NavIC के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है ?
- (a)यह 24 उपग्रहों के तारामंडल वाली एक वैश्विक नौवहन प्रणाली है
- (b)यह भारत तथा भारत की सीमाओं से लगभग 1,500 किमी आगे तक के क्षेत्र को आच्छादित करती है
- (c)इसके उपग्रह नौवहन संकेत केवल L5 बैंड में प्रेषित करते हैं
- (d)इसका स्वामित्व और संचालन भारतीय वायु सेना के पास है
उत्तर(b) यह भारत तथा भारत की सीमाओं से लगभग 1,500 किमी आगे तक के क्षेत्र को आच्छादित करती है — NavIC क्षेत्रीय है, वैश्विक नहीं, और इसका तारामंडल सात उपग्रहों का है; इसके संकेत L5 और S बैंड में हैं, तथा दूसरी पीढ़ी के NVS उपग्रहों पर L1 जोड़ा गया है; और इसका संचालन इसरो करता है, वायु सेना नहीं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
जनवरी 2025 में GSLV-F15 द्वारा प्रक्षेपित NVS-02 भारतीय नौवहन तारामंडल के किस पहली पीढ़ी के उपग्रह का स्थान लेने के लिए बनाया गया था ?
- (a)IRNSS-1A
- (b)IRNSS-1C
- (c)IRNSS-1E
- (d)IRNSS-1G
उत्तर(c) IRNSS-1E — NVS-02 को 111.75° पूर्व पर IRNSS-1E के झुके हुए भू-तुल्यकाली स्लॉट का कार्यभार सँभालना था। IRNSS-1G वह उपग्रह था जिसका स्थान लेने के लिए दूसरी पीढ़ी का पहला उपग्रह NVS-01 मई 2023 में प्रक्षेपित किया गया था।