निम्नलिखित में से किस जीवाणु बीमारी को प्लीहा ज्वर कहा जाता है ?
- (a)टाइफाइड
- (b)एन्थ्रेरेक्स
- (c)कोलेरा
- (d)उपरोक्त में से कोई नहीं
सही — B, एन्थ्रेरेक्स, अर्थात् एंथ्रेक्स (Anthrax)। एंथ्रेक्स Bacillus anthracis से होता है, जो एक बड़ा, ग्राम-धनात्मक, छड़ के आकार का, बीजाणु बनाने वाला जीवाणु है, और इस रोग का नाम प्लीहा ज्वर (splenic fever) एक शताब्दी से भी अधिक समय से चला आ रहा है। यह नाम संक्रमित शाकाहारी पशुओं के शव-परीक्षण के चित्र से आया है : प्लीहा भारी रूप से बढ़ी हुई, गहरे रंग की और मुलायम मिलती है — इतनी विशिष्ट रूप से कि पशु-चिकित्सक जीव की पहचान होने से बहुत पहले इसे नैदानिक चिह्न के रूप में प्रयोग करते थे। इस रोग के तीन और ऐतिहासिक नाम हैं, और हर एक किसी अंग का नहीं, संक्रमण के किसी मार्ग का नाम लेता है। 'ऊन छाँटने वालों का रोग' (woolsorter's disease) श्वसन वाला रूप है, जो दूषित ऊन और बालों से बीजाणु साँस में लेने वाले श्रमिकों को होता है; 'चीथड़ा बीनने वालों का रोग' (ragpicker's disease) खालों से वही मार्ग है; और 'दुर्दम फुंसी' (malignant pustule) या दुर्दम कार्बंकल त्वचीय रूप है, जिसमें घाव के बीच कोयले जैसा काला मृत ऊतक बन जाता है — यूनानी शब्द anthrakis, जिसका अर्थ कोयला है, वहीं से रोग का अपना नाम आया है। चिकित्सा के इतिहास में भी एंथ्रेक्स का अनोखा स्थान है। रॉबर्ट कोख़ ने 1876 में इस जीव का पूरा जीवन-चक्र निकाला और उसी से पहली बार यह सिद्ध किया कि एक विशिष्ट सूक्ष्मजीव एक विशिष्ट रोग करता है — यही प्रदर्शन कोख़ के अभिगृहीतों के पीछे है। पाँच वर्ष बाद, 1881 में पुई-ल-फ़ोर में लुई पास्चर ने भेड़ों को क्षीणीकृत संवर्ध से एंथ्रेक्स के विरुद्ध सार्वजनिक रूप से टीका लगाया — किसी जीवाणु-टीके का पहला सार्वजनिक क्षेत्र-परीक्षण। (उनका क्षीणीकृत मुर्गी-हैजा टीका इससे पहले, फ़रवरी 1880 में प्रस्तुत हो चुका था, और उनकी नोटबुकें दिखाती हैं कि पुई-ल-फ़ोर वाली तैयारी जीवित-क्षीणीकृत न होकर रासायनिक रूप से मारी हुई थी।) रोग टिका क्यों रहता है, इसका कारण बीजाणु है : B. anthracis ऐसे बीजाणु बनाता है जो मिट्टी में दशकों जीवित रहते हैं और उन्हें पैदा करने वाले प्रकोप के बहुत बाद तक चरते हुए पशुओं को संक्रमित करते हैं, और इसीलिए एंथ्रेक्स शहरों का भीड़-जन्य रोग न होकर पशुपालक इलाक़ों का पशु-रोग बना हुआ है।
- (a)टाइफाइड — टाइफाइड सच्ची निकट-चूक है और सावधान उत्तर का हक़दार है। यह Salmonella enterica सीरोवार Typhi से होता है, दूषित जल तथा भोजन के ज़रिए मल-मुख मार्ग से फैलता है, और यह प्लीहा को बढ़ाता भी है — दूसरे सप्ताह में प्लीहा-वृद्धि एक मान्य चिह्न है, सीढ़ीनुमा ज्वर और गुलाबी चकत्तों के साथ। पर इसका स्थापित नाम आंत्र ज्वर (enteric fever) है, जो शेषांत्र में पेयर-पिंडों के व्रणन से आया है, और 'प्लीहा ज्वर' इसके लिए कभी प्रयुक्त नहीं हुआ।
- (c)कोलेरा — कोलेरा Vibrio cholerae से होता है, जो अल्पविराम के आकार का ग्राम-ऋणात्मक जीवाणु है और जिसका विष भारी स्रावी अतिसार चलाता है — वही पीड़ारहित 'चावल के पानी जैसा' मल, जो अंग-वृद्धि से नहीं, निर्जलीकरण से मारता है। इसका ऐतिहासिक नाता जल-आपूर्ति से है, 1854 में जॉन स्नो के ब्रॉड स्ट्रीट पंप से लेकर 1883 में रॉबर्ट कोख़ द्वारा जीव को अलग करने तक, और प्लीहा वाला कोई नाम इसका नहीं है।
- (d)उपरोक्त में से कोई नहीं — यह विकल्प तभी टिकता जब नामित तीनों रोगों में से कोई भी प्लीहा ज्वर न होता। एंथ्रेक्स है, और वह भी ऐसे नाम से जो पशु-चिकित्सा तथा चिकित्सा के ग्रंथों में लगातार प्रयोग में है, इसलिए यह बचाव वाला विकल्प विफल हो जाता है। 'उपरोक्त में से कोई नहीं' तक तभी हाथ बढ़ाइए जब आप हर नामित विकल्प को सकारात्मक रूप से अस्वीकार कर चुके हों, कभी इसलिए नहीं कि उनमें से कोई एक अपरिचित लग रहा है।
बहुत-से रोग किसी पुराने लोकप्रिय नाम से जाने जाते हैं जो किसी लक्षण, किसी अंग या किसी पेशे का वर्णन करता है, और परीक्षक उस नाम तथा आधुनिक नाम के बीच की खाई का लाभ उठाते हैं। अकेले एंथ्रेक्स के चार नाम हैं : शव-परीक्षण में सूजी हुई प्लीहा से प्लीहा ज्वर, ऊन में साँस से गए बीजाणुओं से ऊन छाँटने वालों का रोग, खालों से चीथड़ा बीनने वालों का रोग, और त्वचा की काली पपड़ी से दुर्दम फुंसी। इसके नैदानिक रूप प्रवेश-मार्ग के अनुसार चलते हैं। त्वचीय एंथ्रेक्स मनुष्यों के प्राकृतिक मामलों का अत्यधिक बहुमत है और सबसे हल्का है; श्वसन वाला एंथ्रेक्स सबसे दुर्लभ और सबसे घातक है; जठरांत्रीय एंथ्रेक्स कम पका हुआ संक्रमित माँस खाने से होता है। चूँकि Bacillus anthracis हवा के संपर्क में आते ही बीजाणु बना लेता है और उसके बीजाणु मिट्टी में दशकों टिके रहते हैं, इसलिए एंथ्रेक्स चरने वाले पशुओं का मृदा-जनित पशुजन्य रोग बनकर व्यवहार करता है — गाय-बैल, भेड़ और बकरियाँ चरागाह में स्वयं संक्रमित होती हैं और मनुष्य उनसे संक्रमित होते हैं, सामान्यतः एक-दूसरे से नहीं। वही टिकाऊ बीजाणु एंथ्रेक्स को जैविक युद्ध का उत्कृष्ट कारक भी बनाते हैं, जैसा 2001 में संयुक्त राज्य अमेरिका में डाक से भेजे गए पत्रों वाले हमलों ने दिखाया।
यह प्रश्न एक ही साहचर्य से तय होता है, इसलिए उसे तर्क से निकालने की कोशिश करने के बजाय साहचर्य बनाइए : प्लीहा ज्वर बराबर एंथ्रेक्स बराबर Bacillus anthracis। जाल यह है कि टाइफाइड भी प्लीहा बढ़ाता है, इसलिए नामों के बजाय लक्षणों से तर्क करने वाला अभ्यर्थी स्वयं को विकल्प (a) पर मना सकता है — और इसीलिए विभेदक तथ्य रोग का पारंपरिक नाम है, उसकी विकृति-विज्ञान नहीं। आंत्र ज्वर टाइफाइड का नाम है, प्लीहा ज्वर एंथ्रेक्स का। यदि नाम याद न आएँ तो दूसरा, तेज़ रास्ता भी काम करता है : दिए गए तीन रोगों में केवल एंथ्रेक्स ही मुख्यतः पशु-रोग है जो मनुष्य को पशुओं से मिलता है, और 'प्लीहा ज्वर' चिकित्सा में गाय-भेड़ों के पशु-चिकित्सकीय शव-परीक्षणों के रास्ते ही आया। अंत में, विकल्प (d) के साथ वही अनुशासन बरतिए जिसका हक़ हर 'उपरोक्त में से कोई नहीं' को है — वह तभी सही होता है जब आप तीनों नामित विकल्पों को सकारात्मक रूप से अस्वीकार कर सकें, और यहाँ उनमें से एक सीधे-सीधे सही है।
- एंथ्रेक्स Bacillus anthracis से होता है, जो ग्राम-धनात्मक, वायुजीवी, बीजाणु बनाने वाली छड़ है; इसके अन्य ऐतिहासिक नाम हैं ऊन छाँटने वालों का रोग, चीथड़ा बीनने वालों का रोग और दुर्दम फुंसी
- 'प्लीहा ज्वर' नाम संक्रमित शाकाहारी पशुओं के शव-परीक्षण में मिलने वाली भारी रूप से बढ़ी हुई, गहरे रंग की, मुलायम प्लीहा से आया है
- रॉबर्ट कोख़ ने 1876 में एंथ्रेक्स बैसिलस को इस रोग का कारण सिद्ध किया — यह पहला प्रमाण था कि कोई विशिष्ट सूक्ष्मजीव कोई विशिष्ट रोग करता है, और यही कोख़ के अभिगृहीतों का आधार है
- 1881 में पुई-ल-फ़ोर में भेड़ों पर लुई पास्चर का एंथ्रेक्स-टीके का परीक्षण किसी जीवाणु-टीके का पहला सार्वजनिक क्षेत्र-परीक्षण था; उनका क्षीणीकृत मुर्गी-हैजा टीका फ़रवरी 1880 में प्रस्तुत हो चुका था, और उनकी नोटबुकें दिखाती हैं कि पुई-ल-फ़ोर वाली तैयारी जीवित-क्षीणीकृत न होकर रासायनिक रूप से मारी हुई थी
- तीन प्राकृतिक नैदानिक रूप हैं — त्वचीय (सबसे आम, काली पपड़ी के साथ), श्वसन वाला (सबसे घातक) और जठरांत्रीय; बीजाणु मिट्टी में दशकों बने रहते हैं, जिससे यह रोग चरागाह वाले क्षेत्रों में स्थानिक बना रहता है

- टाइफाइड चुन लेना क्योंकि वह भी प्लीहा बढ़ाता है; टाइफाइड का स्थापित नाम आंत्र ज्वर है, और प्लीहा ज्वर एंथ्रेक्स का है
- जब कोई विकल्प अपरिचित लगे तब 'उपरोक्त में से कोई नहीं' को सुरक्षित बचाव मान लेना — वह तभी सही है जब हर नामित विकल्प सकारात्मक रूप से अस्वीकार किया जा सके
- एंथ्रेक्स को एंथ्रेकोसिस से गड्डमड्ड करना, जो खनिकों का कोयला-धूल वाला फेफड़ा-रोग है; दोनों के नाम कोयले के लिए यूनानी शब्द से आते हैं, पर उसके सिवा दोनों का कोई संबंध नहीं
BPSC के विज्ञान-प्रश्न प्रायः पहचान के रूप में सजाई गई एक-तथ्य वाली स्मृति होते हैं — किसी रोग का लोकप्रिय नाम, कोई संक्षिप्ति, या कोई उत्कृष्ट उदाहरण — और यहाँ पूरी मद बस यही समीकरण है कि प्लीहा ज्वर बराबर एंथ्रेक्स। UPSC वैकल्पिक नाम लगभग कभी नहीं पूछती; वह रोग को संचरण, वाहक, पशु-भंडार या टीके के प्रकार वाले कथन-समुच्चय में गूँथ देती है, जैसा उसने तब किया जब उसने एंथ्रेक्स को दुधारू पशुओं के संक्रामक रोगों में गिनाया।
दुधारू पशुओं के निम्नलिखित रोगों में से कौन-से संक्रामक हैं? 1. खुरपका-मुँहपका रोग 2. एंथ्रेक्स 3. ब्लैक क्वार्टर 4. गोशीतला नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
- (a) 1, 2 और 3
- (b) 2, 3 और 4
- (c) 1 और 4
- (d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर(d) 1, 2, 3 और 4
एंथ्रेक्स अपने स्वाभाविक परिवेश में पूछा गया — गाय-बैल तथा अन्य दुधारू पशुओं के संक्रामक रोग के रूप में। ठीक इसी कारण उसे प्लीहा ज्वर नाम मिला : निदान पहले-पहल मरे हुए पशुओं की बढ़ी हुई प्लीहा पर ही किया गया था।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : 1. फ़ीमर मानव शरीर की सबसे लंबी हड्डी है। 2. कोलेरा जीवाणुओं से होने वाला रोग है। 3. 'एथलीट फ़ुट' विषाणु से होने वाला रोग है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?
- (a) 1 और 2
- (b) 2 और 3
- (c) 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर(a) 1 और 2
वही अंतर्निहित माँग — किसी रोग को रोगजनक के सही वर्ग से मिलाना — और वह भी कोलेरा के सहारे, जो BPSC के प्रश्न का एक विकर्षक है। कथन 3 उसी चिरपरिचित कारण से विफल होता है : एथलीट फ़ुट कवकजन्य है, विषाणुजन्य नहीं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : 1. टीनियेसिस फ़ीताकृमि की तीन जातियों — टीनिया सोलियम, टीनिया सैजिनेटा और टीनिया एशियाटिका — से होने वाला आंत्र संक्रमण है। 2. जब मस्तिष्क में पुटियाँ विकसित हो जाती हैं, तो उस दशा को न्यूरोसिस्टीसरकोसिस (NCC) कहा जाता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर(c) 1 और 2 दोनों
69वीं ने वही कौशल एक दूसरे जीव पर जाँचा — रोग, उसकी कारक जाति और उसका वैकल्पिक नैदानिक नाम, तीनों को साथ पकड़े रखना। वहाँ टीनियेसिस और न्यूरोसिस्टीसरकोसिस, यहाँ एंथ्रेक्स और प्लीहा ज्वर।
- अभ्यास — वास्तविक विगत वर्ष प्रश्न नहीं
'ऊन छाँटने वालों का रोग' निम्नलिखित में से किसका दूसरा नाम है ?
- (a)सिलिकोसिस
- (b)श्वसन वाला एंथ्रेक्स
- (c)बिसिनोसिस
- (d)एस्बेस्टोसिस
उत्तर(b) श्वसन वाला एंथ्रेक्स — दूषित ऊन या बालों से Bacillus anthracis के बीजाणु साँस में लेने से होता है; बिसिनोसिस कपास-धूल वाला फेफड़ा-रोग है।
- अभ्यास — वास्तविक विगत वर्ष प्रश्न नहीं
1881 में पुई-ल-फ़ोर में भेड़ों पर किसी जीवाणु-टीके का पहला सार्वजनिक क्षेत्र-परीक्षण किस वैज्ञानिक ने किया ?
- (a)रॉबर्ट कोख़
- (b)एडवर्ड जेनर
- (c)लुई पास्चर
- (d)अलेक्ज़ेंडर फ़्लेमिंग
उत्तर(c) लुई पास्चर — कोख़ 1876 में सिद्ध कर चुके थे कि एंथ्रेक्स बैसिलस ही इस रोग का कारण है; जेनर के 1796 के काम में चेचक के विरुद्ध गोशीतला का प्रयोग हुआ, और फ़्लेमिंग ने 1928 में पेनिसिलिन खोजी।