आहार नाल का कौन-सा भाग यकृत से पित्त प्राप्त करता है ?
- (a)ओसिफेगस
- (b)पेट
- (c)बड़ी आंत्र
- (d)छोटी आंत्र
सही — D, छोटी आंत्र। NCERT की कक्षा 10 के 'जैव प्रक्रम' अध्याय ने इसे एक ही वाक्य में रख दिया है: छोटी आँत कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा के पूर्ण पाचन का स्थल है, और इसी काम के लिए वह यकृत तथा अग्न्याशय के स्राव प्राप्त करती है। और ठीक-ठीक कहें तो यकृत में बना पित्त पित्ताशय में सांद्रित होकर संचित रहता है और सामान्य पित्त वाहिनी से होकर ग्रहणी में पहुँचता है, यानी छोटी आँत के पहले और सबसे छोटे भाग में, जहाँ उसी के बग़ल में अग्न्याशयी वाहिनी भी खुलती है। पित्त वहाँ दो अलग काम करता है, और दोनों बताते हैं कि आहार नाल के किसी और भाग के बजाय ग्रहणी ही उसका गंतव्य क्यों है। पहला, वह उदासीन करता है: NCERT बताता है कि आमाशय से आया भोजन अम्लीय होता है और अग्न्याशयी एंज़ाइमों के काम करने के लिए उसे क्षारीय बनाना पड़ता है, और वसा पर काम करने के अलावा यही काम यकृत का पित्त रस करता है। ट्रिप्सिन और लाइपेज़ जैसे अग्न्याशयी एंज़ाइम क्षारीय माध्यम में काम करते हैं, इसलिए आमाशय से निकले अम्लीय काइम को पहुँचते ही उदासीन करना पड़ता है, बाद में नहीं। दूसरा, वह पायसीकरण करता है: NCERT के शब्दों में, आँत में वसा बड़ी गोलिकाओं के रूप में रहती है जिन पर एंज़ाइमों का काम करना कठिन होता है, और पित्त लवण उन्हें तोड़कर छोटी गोलिकाएँ बना देते हैं जिससे एंज़ाइम की कार्यक्षमता बढ़ जाती है — NCERT की अपनी तुलना मैल पर साबुन की क्रिया से है। यह भी ध्यान रखिए कि पित्त क्या नहीं है: उसमें कोई पाचक एंज़ाइम नहीं होता। वह पित्त लवणों, पित्त वर्णकों, कोलेस्ट्रॉल और जल का स्राव है, जो वसा को लाइपेज़ के लिए तैयार करता है, स्वयं पचाता नहीं। चूँकि इस पूरे पहुँचाने का उद्देश्य ही भोजन को उन एंज़ाइमों के लिए तैयार करना है जो छोटी आँत में काम करते हैं, इसलिए नाल का उससे पहले या बाद का कोई भी भाग बेकार होगा — और तीनों ग़लत विकल्प ठीक यही हैं: दो पहले के और एक बाद का।
- (a)ओसिफेगस — यानी ग्रासनली, और उससे अधिक कुछ नहीं। NCERT उसे बस वह मार्ग बताता है जिससे भोजन मुँह से आमाशय तक जाता है, और उसे आगे बढ़ाती हैं वही क्रमाकुंचन गतियाँ जो पूरी आहार नाल में होती हैं। उसमें कोई ग्रंथि नहीं खुलती और वहाँ कोई उल्लेखनीय पाचन नहीं होता, इसलिए ग्रासनली में पहुँचा पित्त ऐसे भोजन से मिलेगा जो अभी अम्लीय हुआ ही नहीं, काइम बनना तो दूर की बात है।
- (b)पेट — सबसे लुभावना ग़लत उत्तर, क्योंकि चिकना भोजन सबसे भारी आमाशय में ही लगता है और वहाँ पाचन भी ख़ूब चल रहा होता है। पर उसके स्राव उसी की दीवार की जठर ग्रंथियों से आते हैं — हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, प्रोटीन पचाने वाला एंज़ाइम पेप्सिन, और रक्षक श्लेष्मा — और उसका माध्यम जान-बूझकर अम्लीय होता है, जो ठीक उसका उल्टा है जिसे बनाने के लिए पित्त भेजा जाता है। आमाशय में पहुँचा पित्त पेप्सिन के साथ नहीं, उसके विरुद्ध काम करेगा।
- (c)बड़ी आंत्र — जिस बिंदु की बात है उससे आगे। जब तक सामग्री बड़ी आँत तक पहुँचती है, छोटी आँत में पाचन और अवशोषण हो चुका होता है; NCERT बड़ी आँत के बारे में यही बताता है कि उसकी दीवारें बिना अवशोषित भोजन से और जल सोख लेती हैं, जिसके बाद बचा हुआ अवशेष गुदा द्वार से बाहर निकाल दिया जाता है। पाचन में सहायक कोई स्राव वहाँ भेजना इतनी देर बाद होगा कि उसके काम करने को कुछ बचेगा ही नहीं।
आहार नाल एक अटूट नली है — मुँह, ग्रासनली, आमाशय, छोटी आँत, बड़ी आँत, गुदा — और पाचक ग्रंथियाँ अलग अंग हैं जो नियत बिंदुओं पर अपने स्राव उसमें उँड़ेलती हैं। इस विषय के अधिकांश प्रश्न इसी भेद को जाँचते हैं। लार ग्रंथियाँ मुँह में खुलती हैं और टायलिन देती हैं, जो स्टार्च का पाचन शुरू करता है। जठर ग्रंथियाँ स्वयं आमाशय की दीवार में हैं और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, पेप्सिन तथा श्लेष्मा देती हैं, और अम्लीय माध्यम में काम करती हैं। यकृत और अग्न्याशय नाल के बाहर हैं और दोनों अपना स्राव ग्रहणी में भेजते हैं: यकृत का पित्त, जो पित्ताशय में संचित रहता है, अम्ल को उदासीन करता है और वसा का पायसीकरण करता है, जबकि अग्न्याशयी रस प्रोटीन के लिए ट्रिप्सिन और पायसीकृत वसा के लिए लाइपेज़ देता है। इसके बाद छोटी आँत की दीवार की आंत्रीय ग्रंथियाँ काम पूरा करती हैं और प्रोटीन को अमीनो अम्ल में, जटिल कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज़ में, तथा वसा को वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में बदल देती हैं। अवशोषण भी उसी अंग में होता है, उन अंगुली जैसी दीर्घरोमों (विलाई) के आर-पार जो सतही क्षेत्रफल बढ़ा देती हैं और उत्पादों को रक्त वाहिकाओं के सघन जाल तक पहुँचा देती हैं। बड़ी आँत के लिए केवल जल का अवशोषण और अवशेष का बनना बचता है।
यहाँ तर्क के रास्ते में किसी वाहिनी का नाम याद रखने की ज़रूरत नहीं। इसके बजाय पूछिए कि पित्त किसलिए है, और फिर पूछिए कि वह उद्देश्य कहाँ पूरा हो सकता है। पित्त अम्लीय मिश्रण को क्षारीय बनाता है और वसा की गोलिकाएँ तोड़कर छोटी करता है ताकि एंज़ाइम उन तक पहुँच सकें — इसलिए उसे वहीं पहुँचना चाहिए जहाँ वे एंज़ाइम काम करने वाले हैं। वसा पचाने वाले एंज़ाइम छोटी आँत में काम करते हैं, नाल में और कहीं नहीं, इसलिए पित्त को वहीं पहुँचना ही है। यह एक ही तर्क-शृंखला तीनों ग़लत विकल्प एक साथ हटा देती है: ग्रासनली ऐसा भोजन ढोती है जो अभी अम्लीय हुआ ही नहीं, आमाशय को पेप्सिन के लिए अम्लीय बने रहना है, और बड़ी आँत उस सामग्री को सँभालती है जिसमें से पचने योग्य अंश पहले ही निकाला जा चुका है। दूसरी और उससे भी तेज़ छलनी केवल क्रम से काम करती है। चारों विकल्पों को नाल के क्रम में रखिए — ग्रासनली, आमाशय, छोटी आँत, बड़ी आँत — और पूछिए कि इनमें कौन-सा अम्ल वाली अवस्था और अवशोषण वाली अवस्था के बीच पड़ता है। ऐसी ठीक एक ही स्थिति है, और उदासीन करने वाले स्राव को वहीं प्रवेश करना है। इस विषय पर विकल्पों को शरीर-क्रिया के क्रम में रखकर देखने की आदत वाहिनियों के नाम रटने से अधिक काम की है, क्योंकि इस दायरे में BPSC के जीवविज्ञान प्रश्न लगभग हमेशा इसी बारे में होते हैं कि कौन-सी संरचना कौन-सा काम करती है।
- NCERT, जैव प्रक्रम: छोटी आँत कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा के पूर्ण पाचन का स्थल है, और इसी प्रयोजन से वह यकृत तथा अग्न्याशय के स्राव प्राप्त करती है
- पित्त यकृत में बनता है, पित्ताशय में संचित और सांद्रित होता है, और सामान्य पित्त वाहिनी से होकर छोटी आँत के पहले भाग ग्रहणी में छोड़ा जाता है
- पित्त में अपना कोई पाचक एंज़ाइम नहीं होता; वह अम्लीय काइम को उदासीन करता है ताकि अग्न्याशयी एंज़ाइम काम कर सकें, और उसके पित्त लवण वसा का पायसीकरण करते हैं — NCERT इसकी तुलना मैल पर साबुन की क्रिया से करता है
- आमाशय के अपने स्राव उसकी दीवार की जठर ग्रंथियों से आते हैं: हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, प्रोटीन पचाने वाला एंज़ाइम पेप्सिन, और अस्तर को अम्ल से बचाने वाला श्लेष्मा
- अग्न्याशय भी उसी क्षेत्र में स्राव भेजता है: प्रोटीन के लिए ट्रिप्सिन और पायसीकृत वसा के लिए लाइपेज़, और दोनों को क्षारीय माध्यम चाहिए
- छोटी आँत के भीतरी अस्तर पर दीर्घरोम (विलाई) होते हैं, यानी रक्त वाहिकाओं से भरपूर अंगुली जैसे उभार, जो अवशोषण के लिए सतही क्षेत्रफल बढ़ाते हैं; बड़ी आँत मुख्यतः जल सोखती है
पित्त आहार नाल में ठीक एक ही बिंदु पर प्रवेश करता है, और वह बिंदु रसायन तय करता है — आमाशय से आते अम्ल को अग्न्याशयी एंज़ाइमों के काम करने से पहले क्षारीय बनाना ही पड़ता है।
- यह मान लेना कि पित्त वसा को पचाता है; वह वसा का पायसीकरण करता है, और पाचन अग्न्याशयी लाइपेज़ करता है
- यह मान लेना कि जो अंग वसा-पाचन में शामिल लगता है, जैसे आमाशय, उसे पित्त मिलता ही होगा — आमाशय का माध्यम जान-बूझकर अम्लीय है
- आहार नाल और पाचक ग्रंथियों को गड्डमड्ड कर देना; यकृत और अग्न्याशय नाल के बाहर हैं और केवल उसमें स्राव भेजते हैं
BPSC का जीवविज्ञान खंड ठीक इसी आकार के एक-संरचना, एक-कार्य वाले प्रश्न पूछता है — कौन-सा भाग प्राप्त करता है, कौन-सी ग्रंथि स्रावित करती है, कौन-सा ऊतक परिवहन करता है — और ग़लत विकल्प सदा उसी तंत्र के दूसरे असली भाग होते हैं जो असली पर अलग काम करते हैं। UPSC ने यह सामग्री मुख्यतः अपने पुराने प्रश्नपत्रों में और सुमेलन के रूप में पूछी है, जहाँ एंज़ाइमों को उनके क्रियाधारों से जोड़ना होता है या किसी पदार्थ को विटामिन, एंज़ाइम, हार्मोन या प्रोटीन में वर्गीकृत करना होता है — इसलिए वही तथ्य एक वाक्य के बजाय तालिका के रूप में रखने पड़ते हैं।
सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए कूट से सही उत्तर चुनिए: सूची I (पदार्थ) I. टायलिन II. पेप्सिन III. रेनिन IV. ऑक्सीटोसिन सूची II (शारीरिक भूमिका) A) रक्त में एंजियोटेंसिनोजन को एंजियोटेंसिन में बदलता है B) स्टार्च पचाता है C) प्रोटीन पचाता है D) वसा का जल-अपघटन करता है E) चिकनी पेशियों में संकुचन प्रेरित करता है
- (a) I-B, II-C, III-A, IV-E
- (b) I-C, II-D, III-B, IV-E
- (c) I-B, II-C, III-E, IV-A
- (d) I-C, II-A, III-B, IV-D
उत्तर(a) I-B, II-C, III-A, IV-E
स्राव को उसके स्थान से जोड़ने का वही अनुशासन, सुमेलन के रूप में — मुँह में टायलिन, आमाशय में पेप्सिन — और यही वह तालिका है जो यह तय करने से पहले चाहिए कि यकृत का स्राव कहाँ जाता है।
सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए कूट से सही उत्तर चुनिए: सूची I I. विटामिन II. एंज़ाइम III. हार्मोन IV. प्रोटीन सूची II A. पेप्सिन B. कैरोटीन C. केराटिन D. प्रोजेस्टेरोन
- (a) I – A, II – B, III – C, IV – D
- (b) I – B, II – A, III – D, IV – C
- (c) I – B, II – A, III – C, IV – D
- (d) I – A, II – B, III – D, IV – C
उत्तर(b) I – B, II – A, III – D, IV – C
वही वर्गीकरण की आदत जो पित्त को उसकी जगह पर रखती है — पित्त स्राव तो है पर एंज़ाइम नहीं, और यह प्रश्न ठीक यही भेद एंज़ाइम, हार्मोन, विटामिन और संरचनात्मक प्रोटीन के बीच करवाता है।
हार्मोन स्रावित होते हैं :
- (a) वसामय ग्रंथियों से
- (b) जनन ग्रंथियों से
- (c) बहिःस्रावी ग्रंथियों से
- (d) अंतःस्रावी ग्रंथियों से
उत्तर(d) अंतःस्रावी ग्रंथियों से
एक संस्करण बाद स्राव पर वही एक-पंक्ति प्रश्न, और उसी भेद का पूरक आधा हिस्सा — पित्त वाहिनी से होकर आँत तक पहुँचता है, जो इस भूमिका में यकृत को बहिःस्रावी ग्रंथि बनाता है, जबकि हार्मोन वाहिनीविहीन अंतःस्रावी ग्रंथियों से सीधे रक्त में जाते हैं।
- अभ्यास — वास्तविक विगत वर्ष प्रश्न नहीं
यकृत द्वारा स्रावित पित्त किस अंग में संचित होता है ?
- (a)अग्न्याशय
- (b)पित्ताशय
- (c)प्लीहा
- (d)ग्रहणी
उत्तर(b) पित्ताशय — वह भोजन के बीच के समय में पित्त को संचित और सांद्रित करता है और सामान्य पित्त वाहिनी से उसे ग्रहणी में छोड़ता है।
- अभ्यास — वास्तविक विगत वर्ष प्रश्न नहीं
निम्नलिखित में से कौन आमाशय की जठर ग्रंथियों द्वारा स्रावित होता है ?
- (a)ट्रिप्सिन
- (b)पित्त लवण
- (c)पेप्सिन
- (d)टायलिन
उत्तर(c) पेप्सिन — हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और श्लेष्मा के साथ; ट्रिप्सिन अग्न्याशय से आता है, पित्त लवण यकृत से और टायलिन लार ग्रंथियों से।