राजस्थान के किस जिले में ‘खड़ीन’ जल संरक्षण की प्रचलित विधि है ?
- (1)नागौर
- (2)बीकानेर
- (3)जैसलमेर
- (4)पाली
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (3), जैसलमेर.
खड़ीन थार की अपवाह-आधारित खेती की पद्धति है। बजरीली या चट्टानी ऊँची भूमि के नीचे, निचले ढलान के आर-पार मिट्टी का एक लम्बा तटबंध बनाया जाता है। ऊँची भूमि के जलग्रहण क्षेत्र से बहकर आया वर्षा जल इस बाँध के पीछे रुकता है और खेत में रिस जाता है।
अतिरिक्त पानी एक निकास द्वार या अधिप्लव मार्ग से निकल जाता है। रुका हुआ पानी उतरने पर मिट्टी में संचित नमी पर फसल उगाई जाती है — गेहूँ और चना खड़ीन की पारम्परिक फसलें हैं। इस पद्धति का श्रेय 15वीं शताब्दी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों को दिया जाता है।
यह विधि जैसलमेर की परिस्थितियों के अनुकूल है: बहुत कम वर्षा, और ऐसी चट्टानी ऊँची भूमि जो थोड़ी-सी वर्षा को भी अपवाह के रूप में बहा देती है, जिसे तटबंध रोक सकता है।
खड़ीन पानी को टांके में नहीं, खेत की मिट्टी में संचित करता है। यही इसे टांका, कुंड और नाडी से अलग करता है, जो पानी मुख्यतः पीने और पशुओं के लिए रखते हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)नागौर — नागौर में नाडी कहलाने वाले गाँव के तालाब बहुत हैं, जो ग्रामीणों और पशुओं के लिए अपवाह जल जमा करते हैं: शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI), जोधपुर की शुष्क भूमि से जुड़ी एक पुस्तिका वहाँ लगभग 1,436 नाडियाँ गिनती है। नाडियाँ केवल नागौर की विशेषता नहीं हैं — वही पुस्तिका जैसलमेर में लगभग 1,822 नाडियाँ गिनती है।
खड़ीन अलग विधि है, संचित मिट्टी की नमी पर खेती, और यह जैसलमेर से जुड़ी है, जहाँ के पालीवाल ब्राह्मणों को इसका श्रेय दिया जाता है।
- (2)बीकानेर — बीकानेर थार में है, जहाँ पीने के लिए वर्षा जल टांकों और कुंडों — जलग्रहण क्षेत्र से भरने वाले ढके हुए भूमिगत टैंकों — में रखा जाता है।
ये पेयजल की संरचनाएँ हैं। अपवाह को फसल के लिए मिट्टी की नमी में बदलने वाली पद्धति, खड़ीन, जैसलमेर से जुड़ी है।
- (4)पाली — पाली अर्ध-शुष्क लूनी बेसिन में है, जहाँ एनीकट — नालों के आर-पार बने छोटे चिनाई वाले बाँध — आसपास के कुओं में भू-जल पुनर्भरण के लिए अध्ययन किए गए हैं।
एनीकट किसी नाले को रोकता है; खड़ीन ऊँची भूमि से आने वाले चादरी अपवाह को खेत को नम करने के लिए पकड़ता है। खड़ीन सुदूर पश्चिम के शुष्क जैसलमेर का है।
अवधारणा
पश्चिमी राजस्थान ने बहुत कम वर्षा के अनुकूल जल संग्रहण विधियाँ विकसित कीं। ये विधियाँ मोटे तौर पर दो समूहों में आती हैं।
कुछ पानी को पीने और पशुओं के लिए संचित करती हैं: टांका और कुंड (ढके हुए भूमिगत टैंक), नाडी (गाँव का तालाब) और कुई (किसी गड्ढे या तालाब की तली में खोदा गया छोटा उथला कुआँ)। अन्य पानी को खेती के लिए मिट्टी में संचित करती हैं, और खड़ीन इसका मुख्य उदाहरण है।
खड़ीन का जलग्रहण क्षेत्र उसके खेत से कई गुना बड़ा होता है। वर्षा और ढलान के अनुसार जलग्रहण और खेत का बताया गया अनुपात जोधपुर के पास लगभग 12:1 से लेकर अधिक शुष्क जैसलमेर में 15:1 या उससे अधिक तक है। फसल बोने से पहले पानी खेत पर प्रायः दो से तीन महीने भरा रहता है।
RPSC के 2024 के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में "राजस्थान का भूगोल" के अंतर्गत "प्रमुख सिंचाई परियोजनाएँ एवं जल संरक्षण तकनीकें" शामिल है। इस शीर्षक में नहरों और बाँधों के साथ पारम्परिक तकनीकें भी आती हैं।
पारम्परिक विधियों को उद्देश्य के अनुसार छाँटा जा सकता है। टांके, कुंड, नाडियाँ और कुइयाँ पीने का पानी सुरक्षित करती हैं; खड़ीन फसल सुरक्षित करते हैं। जगह भी अलग होती है: खड़ीन को चट्टानी या बजरीली ऊँची भूमि का जलग्रहण क्षेत्र चाहिए, जबकि कुइयाँ सूखी नदी-तल, तालाब की तली या गड्ढों में खोदी जाती हैं।
खड़ीन का एक सामाजिक इतिहास भी है। इसका श्रेय जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों को दिया जाता है, जो इसे क्षेत्र के भूगोल के साथ-साथ उसकी बसावट के इतिहास से भी जोड़ता है।
मुख्य तथ्य
- खड़ीन अपवाह-आधारित खेती की एक पद्धति है, जिसका श्रेय 15वीं शताब्दी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों को दिया जाता है।
- खड़ीन का 100–300 मीटर लम्बा मिट्टी का तटबंध ऊपर की ऊँची भूमि से आने वाले अपवाह को रोकने के लिए पहाड़ी के निचले ढलानों के आर-पार बनाया जाता है।
- खड़ीन के तटबंध के पीछे रुका अपवाह मिट्टी को तर करता है; अतिरिक्त पानी निकास द्वार या अधिप्लव मार्ग से निकल जाता है।
- रुका हुआ पानी उतरने के बाद खड़ीन की मिट्टी में संचित नमी पर उगाई जाने वाली पारम्परिक फसलें गेहूँ और चना हैं।
- कुंड पक्के (प्लास्टर किए) जलग्रहण क्षेत्र वाले ढके हुए भूमिगत टैंक हैं, जिनका उपयोग पश्चिमी राजस्थान में वर्षा जल संचित करने में होता है।
पानी टांके में नहीं, खेत की मिट्टी में संचित होता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- खड़ीन खेत की मिट्टी में फसल के लिए पानी संचित करता है; टांके और कुंड बंद टैंक में पीने के लिए पानी रखते हैं। जाँचिए कि प्रश्न खेती के बारे में है या पेयजल के बारे में।
- चारों विकल्प अरावली के पश्चिम में हैं, इसलिए "सूखा जिला" मानकर चुनाव सीमित नहीं होता। खड़ीन को जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों से जोड़िए।
- नाडी और खड़ीन दोनों तटबंध के पीछे अपवाह पकड़ते हैं। नाडी पानी को लोगों और पशुओं के लिए तालाब के रूप में रखती है; खड़ीन उसे फसल के लिए खेत में रिसने देता है।
कोई प्रश्न किसी पारम्परिक जल संग्रहण विधि का नाम देकर उसका जिला या क्षेत्र पूछ सकता है, जैसा यह प्रश्न करता है। कोई प्रश्न यह भी पूछ सकता है कि वह विधि किस काम आती है।
कोई प्रश्न टांका, कुंड, नाडी और बावड़ी जैसी संरचनाओं को उनके विवरण से सुमेलित करवा सकता है, या पूछ सकता है कि किसी पद्धति को किस समुदाय ने विकसित किया।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2013 के मिलते-जुलते प्रश्न, उस प्रश्न-पत्र के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
पश्चिमी राजस्थान की जल संग्रहण परम्पराओं में 'कुंड' है —
- (a)पक्के जलग्रहण क्षेत्र से वर्षा जल संचित करने वाला ढका हुआ भूमिगत टैंक
- (b)फसल के लिए खेत को नम करने हेतु अपवाह रोकने वाला मिट्टी का तटबंध
- (c)किसी नाले के आर-पार बना छोटा चिनाई वाला बाँध
- (d)सीढ़ियों की लम्बी कतार से पहुँचने वाला सीढ़ीदार कुआँ
उत्तर(1) — कुंड पक्के जलग्रहण क्षेत्र से भरने वाला ढका हुआ भूमिगत टैंक है। विकल्प (2) खड़ीन का वर्णन है। विकल्प (3) एनीकट का वर्णन है। विकल्प (4) बावड़ी का वर्णन है। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
अपवाह-आधारित खेती की खड़ीन पद्धति का श्रेय किस समुदाय को दिया जाता है?
- (a)बिश्नोई
- (b)पालीवाल ब्राह्मण
- (c)रेबारी
- (d)मीणा
उत्तर(2) — खड़ीन का श्रेय 15वीं शताब्दी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों को दिया जाता है। विकल्प (1), बिश्नोई, पेड़ों और वन्यजीवों की रक्षा के लिए जाने जाते हैं। विकल्प (3), रेबारी, पशुपालक समुदाय है। विकल्प (4), मीणा, राजस्थान की एक अनुसूचित जनजाति है; खड़ीन का श्रेय पालीवालों को दिया जाता है, उन्हें नहीं।