निम्नलिखित में से राजस्थान विधान सभा में अधीनस्थ विधान संबंधी कौन सा कथन सही नहीं है ?
- (1)अधीनस्थ विधान समिति संविधान के प्रावधान या ऐसे आदेश बनाने के लिए अधीनस्थ प्राधिकारी को शक्ति सौंपने वाले कानून के प्रावधानों के अनुसरण में बनाए गए सभी “आदेशों” की जाँच करती है ।
- (2)समिति उन विधेयकों के प्रावधानों की जाँच कर सकती है जो आदेश देने के लिए शक्तियाँ सौंपने की माँग करते हैं ।
- (3)अध्यक्ष विधायी शक्तियों के प्रत्यायोजन के प्रावधान वाले विधेयकों को समिति को संदर्भित करता है ।
- (4)यह राजस्थान विधान सभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमों के नियम 240 द्वारा शासित होता है ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (4), यह राजस्थान विधान सभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमों के नियम 240 द्वारा शासित होता है ।
विकल्प (1), (2) और (3) के कथन स्वयं नियमों में नहीं हैं। वे अध्यक्ष के निदेश संख्या 2, दिनांक 3 जून 1959, की भाषा से मेल खाते हैं, जिसे अध्यक्ष ने नियम 243 के अंतर्गत जारी किया था।
उस निदेश का खंड 1 कहता है कि अधीनस्थ विधान समिति संविधान या शक्ति सौंपने वाले किसी कानून के अंतर्गत बनाए गए सभी "आदेशों" की जाँच कर सकती है, और ऐसी शक्तियाँ सौंपने वाले विधेयकों के प्रावधानों की भी।
खंड 2 कहता है कि अध्यक्ष विधायी शक्तियों के प्रत्यायोजन के प्रावधान वाले विधेयक समिति को संदर्भित कर सकता है।
नियम 240 कुछ और करता है। वह अपेक्षा करता है कि संविधान के अंतर्गत या विधान मंडल द्वारा प्रत्यायोजित विधायी कृत्यों के अंतर्गत बना हर विनियम, नियम, उप-नियम, उपविधि आदि — जिनमें से हर एक को "आदेश" कहा गया है — केंद्रीय रूप से क्रमांकित हो और प्रख्यापन के तुरंत बाद राजपत्र में प्रकाशित हो।
इसलिए विकल्प (4) का यह कथन कि विषय नियम 240 द्वारा शासित होता है, समिति के कार्यक्षेत्र को गलत नियम से जोड़ता है। स्रोत नियम 243 और उसके अंतर्गत जारी निदेश है, नियम 240 नहीं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)अधीनस्थ विधान समिति संविधान के प्रावधान या ऐसे आदेश बनाने के लिए अधीनस्थ प्राधिकारी को शक्ति सौंपने वाले कानून के प्रावधानों के अनुसरण में बनाए गए सभी “आदेशों” की जाँच करती है । — यह कथन सही है, इसलिए यह उत्तर नहीं है। यह अध्यक्ष के निदेश संख्या 2 (1959) के खंड 1(1) को दोहराता है: समिति संविधान या अधीनस्थ प्राधिकारी को शक्ति सौंपने वाले कानून के अंतर्गत बनाए गए सभी "आदेशों" की जाँच कर सकती है, चाहे वे सदन के पटल पर रखे गए हों या नहीं।
स्वयं समिति नियम 238 से बनती है, जो उसे यह जाँचने का काम देता है कि नियम बनाने की प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग ठीक से हो रहा है या नहीं।
- (2)समिति उन विधेयकों के प्रावधानों की जाँच कर सकती है जो आदेश देने के लिए शक्तियाँ सौंपने की माँग करते हैं । — यह कथन सही है। निदेश संख्या 2 का खंड 1(2) समिति को उन विधेयकों के प्रावधानों की जाँच करने देता है जो "आदेश" बनाने की शक्तियाँ सौंपने की माँग करते हैं, या जो ऐसी शक्तियाँ सौंपने वाले पहले के अधिनियमों में संशोधन करते हैं।
पहले के अधिनियमों में संशोधन करने वाले विधेयकों के लिए निदेश उद्देश्य भी बताता है: यह देखना कि आदेशों को सदन के पटल पर रखने का उपयुक्त प्रावधान किया गया है या नहीं।
- (3)अध्यक्ष विधायी शक्तियों के प्रत्यायोजन के प्रावधान वाले विधेयकों को समिति को संदर्भित करता है । — यह कथन सही है। निदेश संख्या 2 का खंड 2(1) कहता है कि अध्यक्ष विधायी शक्तियों के प्रत्यायोजन के प्रावधान वाले विधेयक भी समिति को संदर्भित कर सकता है।
ऐसे विधेयक पर समिति जाँचती है कि शक्तियाँ किस सीमा तक सौंपी जा रही हैं। यदि उसे लगे कि शक्ति सौंपने वाले प्रावधान निरस्त या संशोधित होने चाहिए, तो वह विधेयक पर विचार शुरू होने से पहले सदन को इसका प्रतिवेदन दे सकती है।
अवधारणा
अधीनस्थ (या प्रत्यायोजित) विधान वह विधि है जिसे कार्यपालिका किसी अधिनियम या संविधान से मिली शक्ति के अंतर्गत बनाती है — नियम, विनियम, उप-नियम और उपविधियाँ। विधायिका मूल विधि पारित करती है और विवरण किसी अधीनस्थ प्राधिकारी पर छोड़ देती है।
विधान सभा इन नियमों पर एक-एक करके मतदान नहीं करती, इसलिए वह एक समिति के माध्यम से इन पर निगरानी रखती है। राजस्थान में नियम 238 अधीनस्थ विधान समिति बनाता है, जो प्रतिवेदन देती है कि प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग प्रत्यायोजन की सीमा में ठीक से हो रहा है या नहीं।
समिति "आदेशों" पर काम करती है। नियम 240 के अंतर्गत हर आदेश केंद्रीय रूप से क्रमांकित होकर राजपत्र में प्रकाशित होता है।
नियम 241 बताता है कि समिति क्या जाँचती है: उदाहरण के लिए, क्या कोई आदेश कर लगाता है, न्यायालयों का क्षेत्राधिकार वर्जित करता है, या स्पष्ट शक्ति के बिना भूतलक्षी प्रभाव देता है।
RPSC के 2024 के पाठ्यक्रम में "राजस्थान की राजनीतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था" के अंतर्गत "राज्य की राजनीतिक व्यवस्था" में ये शामिल हैं: "राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद्, विधानसभा, उच्च न्यायालय।" विधान सभा की समितियाँ और उसके प्रक्रिया नियम इसी का हिस्सा हैं।
हर समिति नियमों के एक छोटे खंड के रूप में समझी जा सकती है: उसे कौन-सा नियम बनाता है, उसका गठन कैसे होता है, वह क्या जाँचती है, और प्रतिवेदन कैसे देती है।
इस समिति के लिए वह खंड विधान सभा की वेबसाइट पर प्रकाशित नियमों के नियम 238 से 243 हैं। दो निकट के प्रावधान इसे पूरा करते हैं: नियम 62, जो विधायी शक्तियाँ सौंपने वाले विधेयक के साथ ज्ञापन की अपेक्षा करता है, और अध्यक्ष का 1959 का निदेश संख्या 2।
कार्यपालिका पर विधायी नियंत्रण का यही तर्क वित्तीय समितियों और सरकारी आश्वासन समिति में भी दिखता है।
मुख्य तथ्य
- नियम 238 अधीनस्थ विधान समिति बनाता है, जो जाँचती है कि नियम और विनियम बनाने की प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग ठीक से हो रहा है या नहीं।
- नियम 239 के अंतर्गत समिति में अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित पंद्रह से अधिक सदस्य नहीं होते; कोई मंत्री सदस्य नहीं हो सकता, और सदस्य का कार्यकाल एक वर्ष से अधिक नहीं हो सकता।
- नियम 240 के अनुसार प्रत्यायोजित शक्ति के अंतर्गत बना हर आदेश केंद्रीय रूप से क्रमांकित होकर प्रख्यापन के तुरंत बाद राजपत्र में प्रकाशित होना चाहिए।
- नियम 243 अध्यक्ष को अधीनस्थ विधान पर निदेश जारी करने देता है; 3 जून 1959 का निदेश संख्या 2 समिति का कार्यक्षेत्र तय करता है।
- नियम 62 के अनुसार विधायी शक्तियाँ सौंपने वाले विधेयक के साथ ज्ञापन होना चाहिए, जो प्रस्ताव समझाए और बताए कि वे सामान्य हैं या असाधारण।
विकल्प (4) नियम 240 का नाम लेता है, जो आदेशों के प्रकाशन से संबंधित है, समिति के कार्यक्षेत्र से नहीं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- नियम 240 "आदेश" को विकल्प (1) के निकट शब्दों में परिभाषित करता है, इसलिए वह समिति के कार्यक्षेत्र का स्रोत लगता है। वह केवल क्रमांकन और राजपत्र में प्रकाशन से संबंधित है; कार्यक्षेत्र नियम 243 के अंतर्गत जारी निदेश से आता है।
- आदेशों और विधेयकों की जाँच अलग-अलग चरणों पर होती है। आदेशों की जाँच उनके प्रकाशित होने के बाद होती है; विधेयकों में समिति उन प्रावधानों की जाँच कर सकती है जो शक्ति सौंपते हैं या ऐसी शक्ति सौंपने वाले पहले के अधिनियमों में संशोधन करते हैं, और अध्यक्ष ऐसे विधेयक समिति को संदर्भित कर सकता है।
- संसद के नियमों में समकक्ष प्रावधानों की संख्या अलग है। लोक सभा या राज्य सभा के लिए याद की गई नियम संख्या राजस्थान विधान सभा पर लागू नहीं होती।
राजस्थान विधान सभा के प्रक्रिया नियमों पर प्रश्न किसी समिति के गठन, उसके कार्यक्षेत्र और उसके पीछे के नियम या निदेश की परख कर सकता है।
वह "कौन सा कथन सही नहीं है" के रूप में बन सकता है, जहाँ तीन कथन नियमों या अध्यक्ष के निदेशों से सही लिए गए हों और एक में गलत संख्या या गलत शक्ति जुड़ी हो। प्रश्न सदस्यों की संख्या, मंत्रियों पर रोक, या जाँच के आधार भी पूछ सकता है।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2021 और 2018 के मिलते-जुलते प्रश्न, उन प्रश्न-पत्रों के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
राजस्थान विधान सभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमों के अंतर्गत अधीनस्थ विधान समिति में अधिकतम कितने सदस्य हो सकते हैं?
- (a)10
- (b)12
- (c)15
- (d)22
उत्तर(3) — नियम 239(1) कहता है कि समिति में अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित पंद्रह से अधिक सदस्य नहीं होंगे। विकल्प (1), (2) और (4) नियम 239 में लिखी सीमा से मेल नहीं खाते। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
निम्नलिखित में से कौन-सा बिंदु उन बिंदुओं में नहीं है जिन पर नियम 241 अधीनस्थ विधान समिति से किसी आदेश के बारे में विचार करने को कहता है?
- (a)क्या उसमें कोई कर लगाया गया है
- (b)क्या वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से न्यायालय के क्षेत्राधिकार को वर्जित करता है
- (c)क्या वह ऐसा भूतलक्षी प्रभाव देता है जिसकी शक्ति संविधान या अधिनियम स्पष्ट रूप से नहीं देता
- (d)क्या उसे पटल पर रखे जाते समय संबंधित मंत्री सदन में उपस्थित था
उत्तर(4) — नियम 241 नौ बिंदु गिनाता है, जिनमें कर (1), न्यायालय के क्षेत्राधिकार पर रोक (2) और बिना अधिकार भूतलक्षी प्रभाव (3) शामिल हैं। सदन में मंत्री की उपस्थिति उनमें नहीं है।