निम्नलिखित में से किस पुरास्थल की पहचान पुरातत्त्वविद् टी.एच. हैण्डले ने एक बौद्ध कस्बे के रूप में की थी ?
- (1)भाण्डारेज
- (2)बूढ़ा पुष्कर
- (3)बैराठ
- (4)नलियासर
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (4), नलियासर.
कर्नल टी.एच. हैण्डले ने मि. लायन की सहायता से 1884 की सर्दियों में सांभर के निकट एक प्राचीन टीले पर परीक्षणात्मक उत्खनन किया। उस टीले पर डी.आर. साहनी की रिपोर्ट दर्ज करती है कि हैण्डले ने अपने लेख "Buddhist remains near Sambhur" में निष्कर्ष निकाला था कि यह एक महत्वपूर्ण बौद्ध कस्बे का स्थल था।
राजस्थान पर्यटन विभाग सांभर कस्बे से लगभग 4 किमी दक्षिण स्थित पुरास्थल का नाम नलियासर बताता है। वह वहाँ उत्खनन में मिली मृण्मूर्तियों, सिक्कों और मुहरों को कुषाण और गुप्त काल की बस्तियों का प्रमाण बताता है, और वहाँ की मूर्तिकला को बौद्ध धर्म से प्रभावित।
साहनी ने हैण्डले की व्याख्या स्वीकार नहीं की। 1936–37 और 1937–38 के अपने उत्खननों के बाद उन्होंने लिखा कि प्रमाण इस स्थल के ब्राह्मण धर्म से संबंधित होने को दर्शाते हैं। ASI का जयपुर मंडल वहाँ छह स्तरों पर 45 छोटे आवास दर्ज करता है, ईसा पूर्व तीसरी–दूसरी शताब्दी से ईसा की दसवीं शताब्दी तक।
याद रखने की बात: हैण्डले (1884) ने सांभर के निकट के टीले को बौद्ध कस्बा कहा; डी.आर. साहनी (1936–38) ने उसे ब्राह्मण धर्म से संबंधित माना।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)भाण्डारेज — दौसा के निकट का भाण्डारेज इस प्रश्न वाले स्थल से अलग स्थल है। साहनी की रिपोर्ट हैण्डले का बौद्ध कस्बे वाला निष्कर्ष सांभर के निकट के टीले के लिए दर्ज करती है।
डी.आर. साहनी की रिपोर्ट में वर्णित हैण्डले का उत्खनन सांभर के निकट एक सूखी झील के किनारे के टीले पर था, भाण्डारेज में नहीं।
- (2)बूढ़ा पुष्कर — बूढ़ा पुष्कर, पुष्कर के निकट है — हैण्डले द्वारा 1884 में खोदे गए टीले से अलग स्थान। साहनी के दर्ज किए अनुसार, हैण्डले का बौद्ध कस्बे वाला निष्कर्ष सांभर के निकट के टीले के बारे में था।
हैण्डले से जोड़ने वाला स्थल सांभर के निकट का टीला है, जिसका डी.आर. साहनी ने 1936–38 में फिर से उत्खनन किया।
- (3)बैराठ — बैराठ, यानी प्राचीन विराटनगर, स्वयं में एक बौद्ध स्थल है। ASI का जयपुर मंडल वहाँ अशोक के दो अभिलेखों का, और बीजक की पहाड़ी पर एक मौर्यकालीन वृत्ताकार स्तूप-मंदिर तथा विहार के अवशेषों का उल्लेख करता है।
वह बौद्ध पहचान इन्हीं खोजों से है; इस स्थल के लिए ASI के संदर्भों में कनिंघम की सर्वेक्षण रिपोर्टें और डी.आर. साहनी शामिल हैं। साहनी के दर्ज किए अनुसार, हैण्डले का बौद्ध कस्बे वाला निष्कर्ष सांभर के निकट के टीले के बारे में था, बैराठ के बारे में नहीं।
अवधारणा
एक ही प्राचीन स्थल की पहचान अलग-अलग उत्खननकर्ता अलग-अलग ढंग से कर सकते हैं। सांभर के निकट के टीले पर कर्नल टी.एच. हैण्डले ने 1884 में चार खाइयाँ खोदीं। उनकी खोजों में हड्डी की नुकीली कीलें, अलंकृत मिट्टी के घड़े, मृण्मूर्तियाँ, ताँबे के सिक्के, मनके और मिट्टी की एक मुहर शामिल थीं।
जयपुर राज्य के पुरातत्व एवं ऐतिहासिक अनुसंधान निदेशक डी.आर. साहनी ने उसी टीले का दो सत्रों, 1936–37 और 1937–38, में उत्खनन किया।
साहनी, हैण्डले के बौद्ध कस्बे वाले मत से असहमत थे। उन्होंने लिखा कि उनके उत्खननों से इस स्थल के ब्राह्मण धर्म से संबंधित होने का अकाट्य प्रमाण मिला। दूसरी ओर, राजस्थान पर्यटन विभाग नलियासर की मूर्तिकला में बौद्ध प्रभाव बताता है।
RPSC के 2024 के पाठ्यक्रम में "राजस्थान का इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य, परम्परा एवं विरासत" के अंतर्गत "ऐतिहासिक राजस्थानः प्रारम्भिक ईस्वी काल के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक केन्द्र। प्राचीन राजस्थान में समाज, धर्म एवं संस्कृति।" सूचीबद्ध है।
ASI का जयपुर मंडल इस टीले को प्राचीन शाकम्भरी का प्रतिनिधि बताता है, जो मध्यकाल में साम्राज्यवादी चाहमानों की राजधानी थी। वह यहाँ लगभग 200 सिक्के गिनाता है, जिनमें छह चाँदी के आहत सिक्के और कुछ सिक्के कुषाणों, यौधेयों तथा परवर्ती इंडो-सासानियों के हैं।
एक सिक्का एक हिंद-यवन राजा का है। साहनी की रिपोर्ट उसका नाम एंटीमेकस निकेफोरस देती है; ASI के जयपुर मंडल के पृष्ठ पर "एंटियोकस निकेफोरस" छपा है।
राजस्थान पर्यटन के अनुसार, सांभर से मिली मूर्तियाँ जयपुर के अल्बर्ट हॉल संग्रहालय में रखी हैं।
मुख्य तथ्य
- कर्नल टी.एच. हैण्डले ने मि. लायन की सहायता से 1884 की सर्दियों में सांभर के निकट के टीले पर परीक्षणात्मक उत्खनन किया और चार खाइयाँ खोदीं।
- डी.आर. साहनी ने 1936–37 और 1937–38 में सांभर के टीले का उत्खनन किया; ASI छह स्तरों पर 45 आवास दर्ज करता है, ईसा पूर्व तीसरी–दूसरी शताब्दी से ईसा की दसवीं शताब्दी तक।
- हैण्डले के लेख "Buddhist remains near Sambhur" का निष्कर्ष था कि यह टीला एक महत्वपूर्ण बौद्ध कस्बे का स्थल था; साहनी ने स्थल को ब्राह्मण धर्म से संबंधित माना।
- नलियासर सांभर से लगभग 4 किमी दक्षिण में है; राजस्थान पर्यटन उसकी मूर्तिकला को बौद्ध धर्म से प्रभावित बताता है।
- ASI का जयपुर मंडल बैराठ में बीजक की पहाड़ी पर एक मौर्यकालीन वृत्ताकार स्तूप-मंदिर और विहार के अवशेष दर्ज करता है।
साहनी की रिपोर्ट हैण्डले का बौद्ध कस्बे वाला निष्कर्ष सांभर के निकट के टीले के लिए दर्ज करती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- अधिक प्रसिद्ध बौद्ध स्थल चुन लेना: बैराठ में बौद्ध अवशेष हैं, पर हैण्डले का बौद्ध कस्बे वाला निष्कर्ष सांभर के निकट के टीले के बारे में था।
- बौद्ध कस्बे वाला मत डी.आर. साहनी का मान लेना: साहनी ने 1936–37 और 1937–38 में टीले का फिर से उत्खनन किया और उसे ब्राह्मण धर्म से संबंधित माना।
- सांभर और नलियासर को असंबंधित स्थान मान लेना: उत्खनित टीला सांभर कस्बे से कुछ ही किलोमीटर दूर है।
कोई प्रश्न किसी पुरातत्त्वविद् का नाम देकर पूछ सकता है कि उसने किस स्थल पर काम किया या उसकी पहचान किस रूप में की। कोई प्रश्न किसी स्थल का नाम देकर उसकी खोजें, उसका काल या उसका प्राचीन नाम भी पूछ सकता है।
कोई प्रश्न एक ही स्थल पर दो उत्खननकर्ताओं का क्रम पूछ सकता है, जैसे 1884 में हैण्डले और 1936–38 में साहनी।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2023 और 2018 के मिलते-जुलते प्रश्न, उन प्रश्न-पत्रों के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
1884 में सांभर के निकट प्राचीन टीले पर परीक्षणात्मक उत्खनन किसने किया था ?
- (a)टी.एच. हैण्डले
- (b)डी.आर. साहनी
- (c)अलेक्जेंडर कनिंघम
- (d)बी.आर. मीणा
उत्तर(1) — कर्नल टी.एच. हैण्डले ने मि. लायन की सहायता से 1884 में वहाँ चार खाइयाँ खोदीं। विकल्प (2) ने इस टीले का बाद में, 1936–37 और 1937–38 में, उत्खनन किया; विकल्प (3) का उल्लेख ASI उनकी 1862–65 की सर्वेक्षण रिपोर्टों के लिए करता है, जिन्हें वह बैराठ के संदर्भों में गिनाता है; और विकल्प (4) ने 2000–01 में ओझियाना में ASI के उत्खनन का सह-निर्देशन किया। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
बीजक की पहाड़ी पर मौर्यकालीन वृत्ताकार स्तूप-मंदिर के अवशेष किस स्थल पर मिलते हैं ?
- (a)बैराठ
- (b)नलियासर
- (c)रैढ़
- (d)नगरी
उत्तर(1) — ASI का जयपुर मंडल स्तूप-मंदिर और विहार के अवशेष बैराठ (विराटनगर) में दर्ज करता है। विकल्प (2) सांभर के निकट का टीला है; विकल्प (3) वह स्थल है जिसे RPSC की 2023 की कुंजी मालव गणराज्य की लौह वस्तुओं से जोड़ती है; और विकल्प (4) माध्यमिका है, जिसे RPSC की 2016 की कुंजी महाभारत और महाभाष्य से जोड़ती है।