निम्न में से कौन सा उपाय चयनात्मक साख नियंत्रण के सम्बन्ध में सही विकल्प नहीं है ?
- (1)उधार सीमा (मार्जिन) में परिवर्तन
- (2)सरकारी प्रतिभूतियों को बेचना
- (3)साख राशनिंग
- (4)नैतिक दबाव
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (2), सरकारी प्रतिभूतियों को बेचना.
केंद्रीय बैंक के नियंत्रण दो प्रकार के होते हैं। NCERT की कक्षा XII की पाठ्यपुस्तक ‘इंट्रोडक्टरी मैक्रोइकोनॉमिक्स’ (अध्याय 3, मुद्रा और बैंकिंग; 2026-27 पुनर्मुद्रण) बताती है कि परिमाणात्मक उपकरण नकद आरक्षित अनुपात (CRR), बैंक दर या खुले बाजार की क्रियाओं में बदलाव करके मुद्रा आपूर्ति की मात्रा नियंत्रित करते हैं।
उसके गुणात्मक उपकरणों का उद्देश्य बैंकों से ऋण देना हतोत्साहित या प्रोत्साहित करवाना है, और NCERT के अनुसार यह नैतिक दबाव, मार्जिन आवश्यकता आदि के माध्यम से होता है। चयनात्मक साख नियंत्रण इसी दूसरे, लक्षित प्रकार में आता है।
सरकारी प्रतिभूतियाँ बेचना खुले बाजार की क्रिया है। NCERT बताती है कि जब RBI बॉण्ड बेचता है तो आरक्षित निधियों की मात्रा घटती है, और इसलिए मुद्रा आपूर्ति भी। यह चुने हुए उपयोगों पर नहीं, पूरी प्रणाली की साख पर असर डालता है, इसलिए यह परिमाणात्मक उपाय है।
उधार सीमा (मार्जिन), साख राशनिंग और नैतिक दबाव, तीनों साख को विशेष उपयोगों की ओर या उनसे दूर मोड़ते हैं, इसलिए विकल्प (2) ही वह है जो चयनात्मक नहीं है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)उधार सीमा (मार्जिन) में परिवर्तन — NCERT मार्जिन आवश्यकता को गुणात्मक उपकरणों में गिनाती है। बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 21(2)(ख) RBI को सुरक्षित अग्रिमों के संबंध में रखे जाने वाले मार्जिन पर बैंकों को निर्देश देने देती है।
अधिक मार्जिन का अर्थ है उसी प्रतिभूति पर छोटा ऋण, इसलिए RBI हर बैंक की आरक्षित निधियों पर असर डाले बिना चुनी हुई वस्तुओं के विरुद्ध साख कड़ी कर सकता है। यही इसे चयनात्मक बनाता है।
- (3)साख राशनिंग — साख राशनिंग यह सीमित करती है कि कितनी साख कहाँ जाए, जो इसे एक चयनात्मक नियंत्रण बनाता है।
RBI की वैधानिक शक्तियाँ भी इसी लक्षित ढंग से काम करती हैं। बैंककारी विनियमन अधिनियम की धारा 21(2) उसे बैंकों को यह निर्देश देने देती है कि किन प्रयोजनों के लिए अग्रिम दिए जा सकते हैं या नहीं, और किसी एक उधारकर्ता को अधिकतम कितना अग्रिम दिया जाए।
- (4)नैतिक दबाव — NCERT गुणात्मक उपकरणों में सबसे पहले नैतिक दबाव को गिनाती है: केंद्रीय बैंक द्वारा वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देना हतोत्साहित या प्रोत्साहित करने के लिए समझाना।
इसमें कोई तय कानूनी अनुपात नहीं होता, पर इसका लक्ष्य ऋण की दिशा है, जो इसे खुले बाजार की क्रियाओं के बजाय चयनात्मक नियंत्रणों के साथ रखता है।
अवधारणा
केंद्रीय बैंक साख की मात्रा पर या उसकी दिशा पर काम कर सकता है। CRR, बैंक दर और खुले बाजार की क्रियाओं जैसे परिमाणात्मक उपकरण सभी बैंकों की आरक्षित निधियाँ और निधियों की लागत एक साथ बदलते हैं।
चयनात्मक, या गुणात्मक, उपकरण साख के विशेष उपयोगों को चुनते हैं। वे किसी वस्तु के विरुद्ध उधार की मात्रा घटा सकते हैं, किसी एक उधारकर्ता को ऋण की सीमा तय कर सकते हैं, या समझाकर बैंकों पर दबाव डाल सकते हैं।
भारत में निर्देशित ऋण का कानूनी आधार बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 21 है। RBI अग्रिमों की नीति तय कर सकता है, और प्रयोजनों, मार्जिन, अधिकतम राशि, गारंटी और ब्याज दरों पर निर्देश दे सकता है; धारा 21(3) हर बैंककारी कंपनी को इनका पालन करने के लिए बाध्य करती है।
NCERT यह भी बताती है कि खुले बाजार की क्रियाएँ एकमुश्त हो सकती हैं, जो स्थायी होती हैं, या रेपो और रिवर्स रेपो समझौतों के माध्यम से।
RPSC के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में "आर्थिक अवधारणाएँ एवं भारतीय अर्थव्यवस्था" के अंतर्गत "राजकोषीय एवं मौद्रिक नीतियाँ" और "मुद्रास्फीति– अवधारणा, प्रभाव एवं नियंत्रण तंत्र" शामिल हैं।
परीक्षा से पहले परिमाणात्मक पक्ष सक्रिय उपयोग में था। भारत सरकार की आर्थिक समीक्षा 2022-23 दर्ज करती है कि RBI की मौद्रिक नीति समिति ने मई से दिसम्बर 2022 के बीच नीतिगत रेपो दर 225 आधार अंक बढ़ाकर 4.0 से 6.25 प्रतिशत कर दी।
अंतर पहुँच का है: परिमाणात्मक कदम सभी बैंकों की आरक्षित निधियाँ या दरें बदलता है, जबकि चयनात्मक कदम विशेष ऋणों को लक्ष्य बनाता है।
मुख्य तथ्य
- NCERT: परिमाणात्मक उपकरण CRR, बैंक दर या खुले बाजार की क्रियाओं में बदलाव करके मुद्रा आपूर्ति की मात्रा नियंत्रित करते हैं।
- NCERT: गुणात्मक उपकरण नैतिक दबाव, मार्जिन आवश्यकता आदि के माध्यम से बैंकों से ऋण देना हतोत्साहित या प्रोत्साहित करवाते हैं।
- NCERT: जब RBI सरकारी बॉण्ड बेचता है तो आरक्षित निधियों की मात्रा घटती है, और इसलिए मुद्रा आपूर्ति भी।
- बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949, धारा 21(2): RBI बैंकों को अग्रिमों के प्रयोजन, मार्जिन, अधिकतम राशि, गारंटी और ब्याज दरों पर निर्देश दे सकता है।
- बैंककारी विनियमन अधिनियम की धारा 21(3) हर बैंककारी कंपनी को उस धारा के अंतर्गत दिए गए निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य करती है।
वर्गीकरण NCERT की ‘इंट्रोडक्टरी मैक्रोइकोनॉमिक्स’ के अनुसार; मार्जिन और निर्देशित ऋण बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 21 के अंतर्गत।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री को लक्षित कदम समझ लेना: यह पूरी बैंकिंग प्रणाली की आरक्षित निधियाँ घटाती है, जो इसे परिमाणात्मक बनाता है।
- ऋण मार्जिन को ब्याज दर समझ लेना: मार्जिन किसी सुरक्षित परिसंपत्ति के मूल्य का वह भाग है जिस पर ऋण नहीं दिया जाता, और RBI धारा 21(2)(ख) के अंतर्गत इस पर निर्देश दे सकता है।
- नैतिक दबाव को इसलिए छोड़ देना कि वह कानूनी आदेश नहीं है: NCERT फिर भी उसे गुणात्मक उपकरणों में गिनाती है।
कोई प्रश्न साख नियंत्रण के उपकरणों की सूची देकर पूछ सकता है कि कौन-सा चयनात्मक नहीं है, या कौन-सा परिमाणात्मक है।
कोई प्रश्न यह भी पूछ सकता है कि सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदने या बेचने से मुद्रा आपूर्ति कैसे बदलती है, या कौन-सा कानून RBI को बैंक ऋण पर निर्देश देने देता है।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2016 के मिलते-जुलते प्रश्न, उस प्रश्न-पत्र के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
NCERT की ‘इंट्रोडक्टरी मैक्रोइकोनॉमिक्स’ के अनुसार जब भारतीय रिज़र्व बैंक खुले बाजार में सरकारी बॉण्ड बेचता है, तो
- (a)आरक्षित निधियों की मात्रा और मुद्रा आपूर्ति बढ़ती है
- (b)आरक्षित निधियों की मात्रा और इसलिए मुद्रा आपूर्ति घटती है
- (c)नकद आरक्षित अनुपात अपने आप बढ़ जाता है
- (d)केवल विशेष क्षेत्रों को दिया जाने वाला ऋण घटता है
उत्तर(2) — NCERT कहती है कि बॉण्ड बेचने से आरक्षित निधियों की मात्रा घटती है, और इसलिए मुद्रा आपूर्ति भी। विकल्प (1) बॉण्ड खरीदने का प्रभाव है; विकल्प (3) खुले बाजार की क्रिया को CRR में बदलाव समझ लेता है; विकल्प (4) चयनात्मक नियंत्रण का वर्णन है, खुले बाजार में बिक्री का नहीं। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 21(2) के अंतर्गत रिज़र्व बैंक बैंककारी कंपनियों को निम्नलिखित में से किनके संबंध में निर्देश दे सकता है ? A. वे प्रयोजन जिनके लिए अग्रिम दिए जा सकते हैं या नहीं दिए जा सकते B. सुरक्षित अग्रिमों के संबंध में रखे जाने वाले मार्जिन C. वह ब्याज दर जिस पर अग्रिम दिए जा सकते हैं कूट :
- (a)केवल A और B
- (b)केवल B और C
- (c)केवल A और C
- (d)A, B और C
उत्तर(4) — धारा 21(2) तीनों को सूचीबद्ध करती है: खंड (क) में प्रयोजन, खंड (ख) में मार्जिन, और खंड (ङ) में ब्याज दर और अन्य शर्तें। विकल्प (1), (2) और (3) में से हर एक धारा द्वारा दी गई एक शक्ति छोड़ देता है।