राजस्थान में किस संप्रदाय के पुरुषों द्वारा अग्नि नृत्य किया जाता है ?
- (1)बिश्नोई संप्रदाय
- (2)रामस्नेही संप्रदाय
- (3)जसनाथी सिद्ध
- (4)दादू पंथ
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (3), जसनाथी सिद्ध.
गंगा राम गर्ग का एन इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ वर्ल्ड हिन्दी लिटरेचर (1985) जसनाथजी का काल 1482–1506 बताता है। उसके अनुसार उन्होंने लगभग 1500 में बीकानेर के कतरियासर में जसनाथी संप्रदाय की स्थापना की, जो अब इसकी प्रमुख पीठ है, और जसनाथ का अग्नि नृत्य प्रसिद्ध है।
राजस्थान पर्यटन का बीकानेर पृष्ठ यही संबंध गाँव की ओर से जोड़ता है। वह कतरियासर को बीकानेर से जयपुर मार्ग पर 45 किमी दूर बताता है, और उसका प्रमुख आकर्षण वहाँ के निवासियों, जसनाथजी के अनुयायियों, को बताता है, जो अग्नि नर्तक हैं।
के. के. सहगल द्वारा संकलित बीकानेर ज़िला गज़ेटियर नर्तकों का नाम देता है: थार मरुस्थल के सिद्ध जाट मार्च–अप्रैल में कतरियासर में गुरु जसनाथ के सम्मान में भरने वाले मेले में आग के चारों ओर नृत्य करते हैं। इसलिए अग्नि नृत्य करने वाला संप्रदाय विकल्प (3), जसनाथी सिद्ध, है।
याद रखने की बात: अग्नि नृत्य = कतरियासर (बीकानेर) के जसनाथी सिद्ध, जो जसनाथजी (1482–1506) के अनुयायी हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)बिश्नोई संप्रदाय — गर्ग बिश्नोई (विश्नोई) संप्रदाय के संस्थापक जाम्भोजी का काल 1451–1536 बताते हैं और स्थापना 1485 में रखते हैं। नागौर और बाड़मेर गज़ेटियर कहते हैं कि बिश्नोई नाम उनके आचरण के 29 (बीस-नौ) नियमों से पड़ा।
दोनों संप्रदाय निकट हैं: गर्ग बताते हैं कि जाम्भोजी की तरह जसनाथजी भी दैनिक हवन में विश्वास रखते थे। पर अग्नि नृत्य जसनाथियों का है। बिश्नोई संप्रदाय जाम्भोजी के 29 नियमों वाले प्रश्न का उत्तर है।
- (2)रामस्नेही संप्रदाय — गर्ग रामचरण का काल 1719–98 बताते हैं और उन्हें शाहपुरा के रामस्नेही संप्रदाय का प्रवर्तक कहते हैं। उन्होंने 1760 में भीलवाड़ा में इसकी स्थापना की और 1769 में शाहपुरा में बस गए, जो इसकी प्रमुख पीठ बना।
अग्नि नृत्य कतरियासर के जसनाथियों का है। रामस्नेही संप्रदाय रामचरण या शाहपुरा की पीठ वाले प्रश्न का उत्तर है।
- (4)दादू पंथ — गर्ग दादू पंथ के संस्थापक दादूदयाल का काल 1543–1603 बताते हैं। अहमदाबाद में जन्मे दादू ने जीवन का अधिकांश भाग राजस्थान में बिताया और जयपुर के निकट नरैना में उनका देहांत हुआ।
अग्नि नृत्य जसनाथ की परम्परा है, दादू की नहीं। दादू पंथ दादूदयाल के संप्रदाय वाले प्रश्न का उत्तर है, जिनका देहांत नरैना में हुआ।
अवधारणा
जसनाथी संप्रदाय अपनी परम्परा जसनाथजी (1482–1506) से जोड़ता है। हीरालाल माहेश्वरी की हिस्ट्री ऑफ़ राजस्थानी लिटरेचर (साहित्य अकादेमी, 1980) कहती है कि उनकी अधिकांश शिक्षा जाम्भोजी की शिक्षा से मिलती-जुलती है, और संप्रदाय के 35 नियम गिनाती है, जिनमें दैनिक हवन भी है।
बीकानेर ज़िला गज़ेटियर अग्नि नर्तकों को थार मरुस्थल के सिद्ध जाट बताता है, जो कतरियासर में गुरु जसनाथ के सम्मान में भरने वाले मेले में नृत्य करते हैं।
जसनाथ की परम्परा पर स्रोत एकमत नहीं हैं। गर्ग कहते हैं कि वे नाथ परम्परा के बजाय वैष्णव विचारधारा और योग के अनुयायी थे, और माहेश्वरी लिखते हैं कि वे नाथ परम्परा के अनुयायी नहीं थे, यद्यपि कुछ लोग ऐसा मानते हैं। बीकानेर गज़ेटियर कहता है कि यह नृत्य गुरु गोरखनाथ की स्मृति में होता है।
RPSC के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में "धार्मिक जीवन : धार्मिक समुदाय, राजस्थान में संत एवं सम्प्रदाय।" और, अलग से, "लोक नृत्य एवं नाट्य" सूचीबद्ध हैं। अग्नि नृत्य वहाँ है जहाँ ये दोनों मिलते हैं: एक ऐसा नृत्य जो किसी संप्रदाय का है।
इनमें से दो संप्रदायों की शुरुआत लगभग पंद्रह वर्ष के अंतर पर हुई: गर्ग बिश्नोई संप्रदाय की स्थापना 1485 में और जसनाथी संप्रदाय की स्थापना लगभग 1500 में रखते हैं।
नागौर ज़िला गज़ेटियर (1975) एक साझा प्रथा भी दर्ज करता है: जसनाथी और बिश्नोई जैसे संप्रदाय अपने मृतकों को दफ़नाते हैं।
मुख्य तथ्य
- गर्ग (1985) जसनाथजी का काल 1482–1506 बताते हैं और कहते हैं कि उन्होंने लगभग 1500 में बीकानेर के कतरियासर में जसनाथी संप्रदाय की स्थापना की, जो अब इसकी प्रमुख पीठ है।
- गर्ग जसनाथ के अग्नि नृत्य को प्रसिद्ध बताते हैं।
- राजस्थान पर्यटन कतरियासर को बीकानेर से जयपुर मार्ग पर 45 किमी दूर बताता है और वहाँ के निवासियों, जसनाथजी के अनुयायियों, को अग्नि नर्तक कहता है।
- बीकानेर ज़िला गज़ेटियर के अनुसार थार मरुस्थल के सिद्ध जाट मार्च–अप्रैल में कतरियासर में गुरु जसनाथ के मेले में अग्नि नृत्य करते हैं।
- नागौर ज़िला गज़ेटियर (1975) दर्ज करता है कि जसनाथी और बिश्नोई जैसे संप्रदाय अपने मृतकों को दफ़नाते हैं।
अग्नि नृत्य: जसनाथी सिद्ध, विकल्प (3)। तिथियाँ: गर्ग, एन इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ वर्ल्ड हिन्दी लिटरेचर (1985)।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- जाम्भोजी और जसनाथजी की दैनिक हवन जैसी साझा प्रथाओं के कारण अग्नि नृत्य बिश्नोइयों को दे देना; अग्नि नृत्य जसनाथ की परम्परा है।
- 'सिद्ध' शब्द को नाथ संप्रदाय का प्रमाण मान लेना: गर्ग कहते हैं कि जसनाथ नाथ परम्परा के बजाय वैष्णव विचारधारा और योग के अनुयायी थे, और माहेश्वरी लिखते हैं कि वे नाथ परम्परा के अनुयायी नहीं थे, यद्यपि कुछ लोग ऐसा मानते हैं; बीकानेर गज़ेटियर अग्नि नृत्य को गुरु गोरखनाथ से जोड़ता है।
- पीठों को मिला देना: कतरियासर जसनाथी पीठ है, शाहपुरा रामचरण की रामस्नेही पीठ है, और नरैना वह स्थान है जहाँ दादूदयाल का देहांत हुआ।
कोई प्रश्न किसी अनुष्ठानिक नृत्य का नाम देकर पूछ सकता है कि उसे कौन-सा संप्रदाय करता है, या किसी संप्रदाय का नाम देकर उसका संस्थापक या प्रमुख पीठ पूछ सकता है।
कोई प्रश्न लोक नृत्यों का उन समुदायों से मिलान भी करवा सकता है जिनके वे नृत्य हैं।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2021 और 2016 के मिलते-जुलते प्रश्न, उन प्रश्न-पत्रों के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
बीकानेर का कतरियासर किस संप्रदाय की प्रमुख पीठ है?
- (a)बिश्नोई संप्रदाय
- (b)जसनाथी संप्रदाय
- (c)दादू पंथ
- (d)शाहपुरा का रामस्नेही संप्रदाय
उत्तर(2) — गर्ग कतरियासर को जसनाथजी द्वारा स्थापित जसनाथी संप्रदाय की प्रमुख पीठ बताते हैं। वे विकल्प (1) को जाम्भोजी से, विकल्प (3) को दादूदयाल से, जिनका देहांत नरैना में हुआ, और विकल्प (4) को रामचरण से जोड़ते हैं, जो 1769 में शाहपुरा में बस गए। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
1760 में भीलवाड़ा में रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना किसने की, जिसकी पीठ बाद में शाहपुरा में बनी?
- (a)दादूदयाल
- (b)जाम्भोजी
- (c)रामचरण
- (d)जसनाथजी
उत्तर(3) — गर्ग कहते हैं कि रामचरण (1719–98) ने 1760 में भीलवाड़ा में रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना की और 1769 में शाहपुरा चले गए। विकल्प (1) ने दादू पंथ, विकल्प (2) ने 1485 में बिश्नोई संप्रदाय, और विकल्प (4) ने लगभग 1500 में जसनाथी संप्रदाय की स्थापना की।