झाड़ोल (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर) और साबणिया (बीकानेर) में क्या समानता है ?
- (1)ताम्रपाषाण संस्कृति के केन्द्र
- (2)पुरा-पाषाण युग के केन्द्र
- (3)लघु पाषाण उपकरण मिले हैं
- (4)ताम्र उपकरणों के भण्डार
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (4), ताम्र उपकरणों के भण्डार।
कुराड़ा और साबणिया, दोनों तांबे की प्राप्तियों के लिए दर्ज हैं। आर.सी. अग्रवाल और विजय कुमार, ‘हड़प्पन सिविलाइज़ेशन: अ कंटेम्पररी पर्सपेक्टिव’ (संपादक जी.एल. पोसेल, 1982) में, कुराड़ा (ज़िला नागौर) की एक निधि का वर्णन करते हैं, जिसमें मूलतः तांबे की 103 वस्तुएँ थीं।
ये थीं सात चपटे सेल्ट, 11 छेनियाँ, 21 घुमावदार फलक, 55 छल्ले, चार सादे कटोरे और नालीदार टोंटी वाले पाँच कटोरे। साबणिया के बारे में ‘इंडियन आर्कियोलॉजी 1968–69’ दर्ज करती है कि एक किसान को अपना खेत जोतते समय तांबे के दो चपटे सेल्ट मिले।
उदयपुर के लिए अग्रवाल और कुमार अंग्रेज़ी में Jhadol नाम का स्थल सूचीबद्ध करते हैं, ज़िला उदयपुर, जयसमंद झील के पास, जहाँ आहड़ मृद्भांडों के साथ तांबे के अवशेष मिले। वे इसे Jhadol लिखते हैं, और यहाँ उद्धृत कोई स्रोत यह नहीं बताता कि यह प्रश्न का झाड़ोल है या नहीं।
याद रखने की बात: कुराड़ा (नागौर) और साबणिया (बीकानेर) तांबे की प्राप्ति के स्थल हैं; RPSC की कुंजी झाड़ोल (उदयपुर) को इनके साथ रखती है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)ताम्रपाषाण संस्कृति के केन्द्र — समानता तांबे की प्राप्तियों की है, किसी बसी हुई ताम्रपाषाण संस्कृति की नहीं। कुराड़ा एक निधि के रूप में और साबणिया हल चलाते समय मिले दो सेल्ट के रूप में दर्ज है; कोई भी रिपोर्ट किसी बस्ती का वर्णन नहीं करती।
ताम्रपाषाण संस्कृति का केन्द्र उदयपुर के पास आहड़ जैसे स्थल के लिए ठीक बैठता है, जिसके निचले काल को ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन आर्कियोलॉजी’ ताम्रपाषाण वर्ग में रखती है। अग्रवाल और कुमार के Jhadol का तांबा आहड़ मृद्भांडों के साथ मिला अवश्य, पर यह वर्णन कुराड़ा या साबणिया पर लागू नहीं होता।
- (2)पुरा-पाषाण युग के केन्द्र — पुरापाषाण स्थल पत्थर के औज़ारों के लिए जाने जाते हैं, और कुराड़ा और साबणिया की रिपोर्टें तांबे की वस्तुओं का वर्णन करती हैं।
राजस्थान में पुरापाषाण प्राप्ति-स्थल का एक उदाहरण उदयपुर ज़िले का डबोक है, जिसे ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन आर्कियोलॉजी’ निम्न पुरापाषाण (सीरीज़ I) औज़ारों के साथ-साथ लघुपाषाण उपकरणों के लिए भी सूचीबद्ध करती है।
- (3)लघु पाषाण उपकरण मिले हैं — लघु पाषाण उपकरण, यानी माइक्रोलिथ, मध्यपाषाण काल के विशिष्ट छोटे पत्थर के औज़ार हैं। कुराड़ा और साबणिया तांबे के लिए दर्ज हैं।
लघु पाषाण उपकरणों के लिए ज्ञात राजस्थान का एक स्थल भीलवाड़ा ज़िले का बागोर है। ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन आर्कियोलॉजी’ के अनुसार वहाँ लघु पाषाण उपकरण चरण I में सबसे सघन हैं, और उसकी तांबे की पाँच वस्तुएँ चरण II की समाधियों से मिलीं।
अवधारणा
ताम्र निधि तांबे की वस्तुओं का वह समूह है जो एक साथ मिला हो। कुराड़ा निधि और साबणिया के सेल्ट प्राप्तियों के रूप में दर्ज हुए, उत्खनित बस्तियों के रूप में नहीं।
अग्रवाल और कुमार सीकर–झुंझुनूं क्षेत्र के प्राचीन स्थलों को वहाँ, खेतड़ी पट्टी में, उपलब्ध तांबे से जोड़ते हैं।
वे यह तर्क भी देते हैं कि गणेश्वर के पास बनी तैयार तांबे की वस्तुएँ दूसरे स्थानों को भेजी जाती थीं, इसलिए ज़रूरी नहीं कि प्राप्ति-स्थल वही हो जहाँ वस्तुएँ बनीं।
RPSC के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में "राजस्थान का इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य, परम्परा एवं विरासत" के अंतर्गत "राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल–पुरापाषाण से ताम्र पाषाण एवं कांस्य युग तक।" सूचीबद्ध है।
कुराड़ा निधि छपे हुए स्रोतों में दो नामों से मिलती है। ‘इंडियन आर्कियोलॉजी 1960–61’ इसे जोधपुर संग्रहालय में रखी खुर्दी (Khurdi) से प्राप्त ताम्र निधि के रूप में दर्ज करती है; अग्रवाल और कुमार उस नाम को गलत बताते हैं और प्राप्ति-स्थल कुराड़ा देते हैं।
अग्रवाल और कुमार कुराड़ा की 103 वस्तुओं में से केवल दस को राजकीय संग्रहालय, जोधपुर में सुरक्षित गिनते हैं।
मुख्य तथ्य
- अग्रवाल और कुमार (1982) राजस्थान के आद्य-ऐतिहासिक ताम्र स्थलों में Jhadol (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर) और साबणिया (बीकानेर) को सूचीबद्ध करते हैं।
- कुराड़ा निधि में तांबे की 103 वस्तुएँ थीं: 7 चपटे सेल्ट, 11 छेनियाँ, 21 घुमावदार फलक, 55 छल्ले, 4 सादे कटोरे और नालीदार टोंटी वाले 5 कटोरे।
- अग्रवाल और कुमार कुराड़ा की दस वस्तुएँ राजकीय संग्रहालय, जोधपुर में सुरक्षित गिनते हैं; ‘इंडियन आर्कियोलॉजी 1960–61’ ने निधि को खुर्दी नाम से दर्ज किया।
- ‘इंडियन आर्कियोलॉजी 1968–69’: साबणिया से तांबे के दो चपटे सेल्ट, प्रत्येक 23 × 9 सेमी, वज़न 1,350 ग्राम और 1,550 ग्राम, जो बाद में गुरुकुल संग्रहालय, झज्जर को बेचे गए।
- अग्रवाल और कुमार Jhadol को जयसमंद झील के पास रखते हैं और वहाँ आहड़ मृद्भांडों के साथ तांबे के अवशेष बताते हैं।
स्रोत: अग्रवाल और कुमार (1982); ‘इंडियन आर्कियोलॉजी 1968–69’। ये स्रोत यह नहीं बताते कि Jhadol प्रश्न का झाड़ोल है या नहीं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- तांबे की हर प्राप्ति को ताम्रपाषाण संस्कृति का केन्द्र मान लेना: कुराड़ा एक निधि है और साबणिया हल चलाते समय मिले दो सेल्ट, उत्खनित बस्तियाँ नहीं।
- कुराड़ा निधि को दूसरे नाम के कारण न पहचान पाना: ‘इंडियन आर्कियोलॉजी 1960–61’ इसे खुर्दी छापती है, जिस नाम को अग्रवाल और कुमार गलत बताते हैं।
- पत्थर और धातु को मिला देना: पुरापाषाण औज़ार और लघु पाषाण उपकरण पत्थर के हैं, जबकि कुराड़ा और साबणिया तांबे के लिए दर्ज हैं।
कोई प्रश्न कई स्थलों की सूची देकर पूछ सकता है कि उनमें क्या समानता है, जैसे तांबे की प्राप्तियाँ, लघु पाषाण उपकरण या ताम्रपाषाण बस्तियाँ।
कोई प्रश्न स्थलों को ज़िलों या उनकी प्राप्तियों से सुमेलित भी करवा सकता है, या पूछ सकता है कि किस स्थल से ताम्र निधि मिली।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2021 के मिलते-जुलते प्रश्न, उस प्रश्न-पत्र के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
नालीदार टोंटी वाले कटोरों सहित तांबे की 103 वस्तुओं की एक निधि राजस्थान में किस स्थान पर मिली ?
- (a)कुराड़ा (नागौर)
- (b)साबणिया (बीकानेर)
- (c)बागोर (भीलवाड़ा)
- (d)रैढ़ (टोंक)
उत्तर(1) — अग्रवाल और कुमार तांबे की 103 वस्तुओं वाली कुराड़ा निधि का वर्णन करते हैं, जिसमें नालीदार टोंटी वाले पाँच कटोरे शामिल हैं। विकल्प (2) से तांबे के दो सेल्ट मिले; विकल्प (3) लघु पाषाण उपकरणों के लिए जाना जाता है; विकल्प (4) लोहे के काम के लिए। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
‘इंडियन आर्कियोलॉजी 1968–69’ में साबणिया से बताए गए तांबे के दो चपटे सेल्ट किस ज़िले में मिले थे ?
- (a)नागौर
- (b)उदयपुर
- (c)बीकानेर
- (d)टोंक
उत्तर(3) — ‘इंडियन आर्कियोलॉजी 1968–69’ साबणिया के सेल्ट को ज़िला बीकानेर के अंतर्गत दर्ज करती है। विकल्प (1) कुराड़ा का ज़िला है; विकल्प (2) अग्रवाल और कुमार के Jhadol का ज़िला है; विकल्प (4) रैढ़ का।