निम्नलिखित किस प्राचीन स्थल के उत्खनन में मालव जनपद की लौह सामग्री के विशाल संग्रह की जानकारी प्राप्त हुई है ?
- (1)नगर (नैनवाँ)
- (2)नगरी (मध्यमिका)
- (3)सांभर
- (4)रैढ़ (टोंक)
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (4), रैढ़ (टोंक)।
ढील नदी के किनारे स्थित रैढ़ का उत्खनन जयपुर राज्य के लिए के.एन. पुरी ने 1938 से 1940 तक किया, डी.आर. साहनी की एक परीक्षण खुदाई के बाद। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की संरक्षित स्मारकों की सूची इस उत्खनित स्थल को रैढ़ (निवाई), टोंक ज़िले में रखती है।
पुरी की रिपोर्ट ‘एक्सकेवेशन्स ऐट रैढ़’ विभिन्न प्रकार के लोहे के औज़ार और उपकरण, और कई मन वज़न का लोहे का कचरा दर्ज करती है, साथ ही खंडहरों में अनेक लोहारखानों और धातुमल (स्लैग) के निशान। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि नगर का मुख्य उद्योग लोहे का धातुकर्म था।
मालव संबंध भी इसी स्थल से आता है: सतह से मालव जनजाति के तीन सौ से अधिक सिक्के, और खाई E से मालव गणराज्य की एक सीसे की मुहर।
याद रखने की बात: रैढ़ = लोहे का काम करने वाला नगर + मालव सिक्के और मुहर।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)नगर (नैनवाँ) — पुरी पुराने जयपुर राज्य के उनियारा ठिकाने में जिस मालव स्थल की चर्चा नगर या कर्कोट नगर नाम से करते हैं, वहाँ से वे लोहे का उद्योग नहीं, सिक्के दर्ज करते हैं। वे याद दिलाते हैं कि ए.सी.एल. कार्लाइल को वहाँ सिक्के समुद्र-तट पर सीपियों की तरह घने बिखरे मिले, और उन्होंने लगभग 6,000 सिक्के प्राप्त किए।
पुरी रैढ़ को नगर के अतिरिक्त एक अन्य मालव बस्ती मानते हैं। जिन लोहे की कार्यशालाओं और लोहारखानों का वे वर्णन करते हैं, वे रैढ़ में हैं।
- (2)नगरी (मध्यमिका) — चित्तौड़गढ़ के पास स्थित नगरी की पहचान मालवों से नहीं, शिवि जनपद की राजधानी मध्यमिका से की जाती है। ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन आर्कियोलॉजी’ वहाँ मिले उन सिक्कों का उल्लेख करती है जिनके लेख में मध्यमिका और शिवि जनपद का नाम है; इसी से यह पहचान हुई।
नगरी में डी.आर. भंडारकर को मिली मूर्तियों में गुप्त काल के दो नक़्क़ाशीदार स्तंभ हैं।
- (3)सांभर — सांभर प्राचीन शाकम्भरी, चाहमानों (चौहानों) की राजधानी है। वहाँ 1884 में हेंडले और 1930 के दशक में डी.आर. साहनी के उत्खननों में तीसरी–दूसरी शताब्दी ई.पू. से दसवीं शताब्दी ई. तक के छह स्तरों पर आवास मिले।
सांभर में लोहे की वस्तुएँ भी मिलीं, पर एनसाइक्लोपीडिया उसके लिए जिन सिक्कों को सूचीबद्ध करती है, वे आहत, हिंद-यवन, कुषाण, यौधेय और इंडो-सासानी हैं। मालव सिक्के और मुहर रैढ़ के हैं।
अवधारणा
मालव एक जनजाति थे, जो गणराज्य के रूप में स्वशासन करते थे। पुरी के वर्णन के अनुसार वे लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. में पूर्वी राजपूताना में बसे और चौथी शताब्दी ई. में समुद्रगुप्त ने उन्हें अधीन किया।
उनके सिक्के छोटे हैं और उन पर सामान्यतः ‘मालवानां जय’ लेख होता है, जिसका अर्थ है मालवों की जय।
पुरातत्वविद किसी स्थल को ऐसी किसी जाति से सिक्कों और मुहरों के आधार पर जोड़ते हैं; औज़ार और धातुमल दिखाते हैं कि नगर में क्या बनता था।
RPSC के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में "राजस्थान का इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य, परम्परा एवं विरासत" के अंतर्गत "ऐतिहासिक राजस्थानः प्रारम्भिक ईस्वी काल के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक केन्द्र।" सूचीबद्ध है।
रैढ़ चाँदी में भी समृद्ध था: पुरी पाँच गड़ी हुई निधियों की गिनती करते हैं, जिनमें 3,075 आहत सिक्के थे।
उनके सतह से मिले सिक्कों में मित्र राजाओं के 14 सिक्के, छह ‘सेनापति’ सिक्के, और एक टूटा सिक्का भी था, जिसे पुरी हिंद-यवन राजा अपोलोडोटस के अंतर्गत सूचीबद्ध करते हैं, यद्यपि उनकी सिक्का-तालिका इस पहचान को अनिश्चित बताती है।
मुख्य तथ्य
- ढील नदी के किनारे स्थित रैढ़ का उत्खनन के.एन. पुरी ने जयपुर राज्य के लिए 1938–40 में किया; ASI उत्खनित स्थल को रैढ़ (निवाई), टोंक ज़िले में सूचीबद्ध करता है।
- पुरी ने अनेक प्रकार के लोहे के औज़ार, कई मन वज़न का लोहे का कचरा और अनेक लोहारखानों के निशान दर्ज किए।
- उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि रैढ़ का मुख्य उद्योग लोहे का धातुकर्म और लोहे के औज़ार बनाना था।
- रैढ़ को मालवों से जोड़ने वाली खोजें: सतह से 300 से अधिक मालव सिक्के और मालव गणराज्य की एक सीसे की मुहर।
- रैढ़ से पाँच निधियाँ मिलीं, जिनमें कुल 3,075 चाँदी के आहत सिक्के थे।
केवल रैढ़ में लोहे का बड़ा अभिलेख और मालव खोजें साथ मिलती हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- नगर को इसलिए चुन लेना कि पुरी नगर या कर्कोट नगर को मालव स्थल बताते हैं: वहाँ का अभिलेख हज़ारों सिक्कों का है; लोहारखाने रैढ़ के हैं।
- नगर को नगरी से मिला देना: पुरी का ‘नगर या कर्कोट नगर’ मालव सिक्कों का स्थल है, जबकि नगरी चित्तौड़गढ़ के पास शिवियों की मध्यमिका है।
- सांभर को इसलिए चुन लेना कि वहाँ भी लोहे की वस्तुएँ मिलीं: सांभर चाहमानों की राजधानी शाकम्भरी है, और उसके सूचीबद्ध सिक्के मालव सिक्के नहीं हैं।
कोई प्रश्न किसी खोज, जैसे लोहे की कार्यशालाएँ, सिक्कों की निधि या किसी जनपद की मुहर, का वर्णन करके स्थल पूछ सकता है।
कोई प्रश्न प्राचीन स्थलों को उनसे जुड़े जनपद या राजवंश से सुमेलित करवा सकता है, या पूछ सकता है कि किसी नामित शासक के सिक्के किस स्थल से मिले।
संबंधित PYQ
RAS प्री 2018 और 2016 के मिलते-जुलते प्रश्न, उन प्रश्न-पत्रों के इस साइट पर प्रकाशित होने पर UnlockIAS यहाँ जोड़ेगा।
अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
मध्यमिका, जिसके सिक्कों पर शिवि जनपद का लेख है, की पहचान किस वर्तमान स्थल से की जाती है ?
- (a)कर्कोट नगर
- (b)रैढ़
- (c)नगरी
- (d)सांभर
उत्तर(3) — चित्तौड़गढ़ के पास स्थित नगरी की पहचान मध्यमिका से उन सिक्कों के आधार पर होती है जिनके लेख में मध्यमिका और शिवि जनपद का नाम है। विकल्प (1) और (2) के.एन. पुरी की रिपोर्ट में मालव बस्तियाँ हैं; विकल्प (4) प्राचीन शाकम्भरी है। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
रैढ़ के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : A. के.एन. पुरी ने 1938–40 में जयपुर राज्य के लिए इसका उत्खनन किया। B. यहाँ से चाँदी के आहत सिक्कों की निधियाँ मिलीं। सही विकल्प चुनिए :
- (a)केवल A सही है।
- (b)केवल B सही है।
- (c)A और B दोनों सही हैं।
- (d)न तो A और न ही B सही है।
उत्तर(3) — पुरी की रिपोर्ट 1938–39 और 1939–40 के उनके उत्खननों को समेटती है, और चाँदी के आहत सिक्कों की पाँच निधियाँ दर्ज करती है, जिनमें कुल 3,075 सिक्के थे। दोनों कथन सही हैं, इसलिए विकल्प (1), (2) और (4) गलत हैं।