‘टोटी’ आभूषण शरीर के किस हिस्से में पहना जाता है?
- (1)नाक
- (2)हाथ
- (3)कटि
- (4)कान
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — विकल्प (4), कान.
टोटी कान का आभूषण है। बदरीप्रसाद साकरिया और भूपतिराम साकरिया द्वारा संपादित राजस्थानी–हिन्दी शब्द कोश टोटी को स्त्रियों के कान का एक गहना बताता है।
यही शब्द कोश टोटी पर आधारित कान के अन्य आभूषण भी बताता है। उसके अनुसार टोटी-झूमर घुंघरूदार लटकन वाली टोटी है, और डुरगलो छतरी और घुंघरू वाली टोटी है।
एक पुराना अंग्रेज़ी स्रोत भी यही कहता है। टी. एन. मुखर्जी की आर्ट-मैन्युफैक्चर्स ऑफ़ इंडिया (1888) बहुमूल्य रत्नों से जड़ी एक बड़ी कर्णबाली का वर्णन करती है, जिसे टोटी कहा गया है और जिसे राजपूत स्त्रियाँ पहनती थीं; वह आभूषण भावनगर राज्य से आया था।
टोटी कान में पहनी जाती है, अर्थात विकल्प (4), कान।
याद रखने की बात: टोटी = कान का आभूषण; नथ, कांटा और लौंग नाक के आभूषण हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (1)नाक — टोटी नाक का आभूषण नहीं है। साकरिया शब्द कोश इसे स्त्रियों के कान का गहना बताता है।
चूरू ज़िला गज़ेटियर (1970) उस ज़िले में स्त्रियों के आभूषणों का वर्णन करते हुए कांटा, फूलराज, नथ और लौंग को नाक के आभूषण बताता है। साकरिया शब्द कोश नकफुली को भी स्त्री की नाक में पहना जाने वाला आभूषण बताता है।
- (2)हाथ — टोटी हाथ में नहीं पहनी जाती। साकरिया शब्द कोश इसे स्त्रियों के कान का गहना बताता है।
हाथों के लिए चूरू ज़िला गज़ेटियर (1970) कहता है कि सोने की पट्टियों सहित या उनके बिना चूड़ा पहना जाता है, साथ में बाजूबंद जैसे आभूषण भी। साकरिया शब्द कोश गजरो को हाथ में पहना जाने वाला आभूषण बताता है।
- (3)कटि — टोटी कटि (कमर) का आभूषण नहीं है। साकरिया शब्द कोश इसे स्त्रियों के कान का गहना बताता है।
कमर के लिए चूरू ज़िला गज़ेटियर (1970) कहता है कि कमर में कनकती नामक एक सांकल पहनी जाती है। टखनों और पैरों के लिए वह कड़ला, नेवरी और पायल गिनाता है।
अवधारणा
राजस्थानी आभूषणों के विवरण उन्हें शरीर के उस अंग के अनुसार गिनाते हैं जिसे वे सजाते हैं। बदरीप्रसाद और भूपतिराम साकरिया का राजस्थानी–हिन्दी शब्द कोश टोटी को स्त्रियों के कान का गहना बताता है।
शब्द कोश टोटी पर आधारित कान के आभूषण भी बताता है। टोटी-झूमर में घुंघरूदार लटकन जुड़ी होती है, और डुरगलो छतरी और घुंघरू वाली टोटी है।
चूरू ज़िला गज़ेटियर (1970) उस ज़िले में स्त्रियों के आभूषणों का अंग-अंग से वर्णन करता है। खुरबा, झुमर और दामणी कानों में; कांटा, फूलराज, नथ और लौंग नाक में; चूड़ा हाथों में; और कनकती नामक सांकल कमर में पहनी जाती है।
एक ज़िले के विवरण से दूसरे ज़िले के विवरण में नाम बदल जाते हैं। अजमेर ज़िला गज़ेटियर (1966) कानों के लिए बेड़ला, दुगला, झुमर और दामणी, और नाक के लिए कांटा, फूलरी, बूली, नथ और फिनी के नाम देता है।
RPSC के प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम में राजस्थान का इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य, परम्परा एवं विरासत के अंतर्गत "राजस्थान में सामाजिक जीवन : मेले एवं त्योहार; सामाजिक रीति–रिवाज तथा परम्पराये; वेशभूषा एवं आभूषण।" सूचीबद्ध है।
आभूषणों का सामाजिक अर्थ भी होता है। चूरू ज़िला गज़ेटियर (1970) बताता है कि बोरला, लौंग, चूड़ा और टखनों के आभूषण विवाहित जीवन के चिह्न के रूप में पहने जाते हैं।
साकरिया शब्द कोश की अष्ट सौभाग्य (विवाहित स्त्री के आठ सौभाग्य-चिह्न) वाली प्रविष्टि भी कुंडल और टोटी को कानों में और नथ को नाक में रखती है।
आभूषण राज्य की चित्रकला परंपराओं में भी दिखते हैं। प्रेमचन्द्र गोस्वामी द्वारा संपादित राजस्थान ललित कला अकादमी की पुस्तक राजस्थान की लघु चित्र शैलियाँ (भूमिका जनवरी 1972 की) मारवाड़ शैली के चित्रों में स्त्रियों के मुख्य आभूषणों में टीका, बाली, बेसर और लूंग के साथ टोटी का नाम देती है।
मुख्य तथ्य
- राजस्थानी–हिन्दी शब्द कोश (बदरीप्रसाद और भूपतिराम साकरिया) टोटी को स्त्रियों के कान में पहना जाने वाला गहना बताता है।
- यही शब्द कोश टोटी-झूमर को कान का आभूषण बताता है: घुंघरूदार लटकन वाली टोटी।
- चूरू ज़िला गज़ेटियर (1970): खुरबा, झुमर और दामणी कानों में; कांटा, फूलराज, नथ और लौंग नाक में पहने जाते हैं।
- चूरू ज़िला गज़ेटियर (1970): चूड़ा हाथों में और कनकती नामक सांकल कमर में पहनी जाती है।
- टी. एन. मुखर्जी (1888) भावनगर राज्य के आभूषणों में बहुमूल्य रत्नों से जड़ी एक बड़ी कर्णबाली, टोटी, का वर्णन करते हैं, जिसे राजपूत स्त्रियाँ पहनती थीं।
टोटी कान का आभूषण है। स्रोत: साकरिया, राजस्थानी–हिन्दी शब्द कोश; चूरू ज़िला गज़ेटियर (1970)।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- टोटी को नथ और लौंग के साथ नाक में रख देना। साकरिया शब्द कोश इसे स्त्रियों के कान का गहना बताता है।
- टोटी-झूमर या डुरगलो को शरीर के किसी अन्य अंग का आभूषण मान लेना। शब्द कोश दोनों को टोटी पर आधारित कान के आभूषण बताता है।
- एक ज़िले की सूची को पूरे राजस्थान की सूची मान लेना। चूरू (1970) और अजमेर (1966) के गज़ेटियर कान और नाक के आभूषणों के अलग-अलग नाम देते हैं।
कोई प्रश्न एक आभूषण का नाम देकर पूछ सकता है कि वह शरीर के किस अंग पर पहना जाता है, जैसा यहाँ है।
कोई प्रश्न आभूषणों की सूची देकर यह भी पूछ सकता है कि उनमें से कौन-सा शरीर के किसी अलग अंग पर पहना जाता है, या दो सूचियों में आभूषणों को अंगों से सुमेलित करवा सकता है।
संबंधित PYQ
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अभ्यास
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
चूरू ज़िला गज़ेटियर (1970) के अनुसार 'कनकती' नामक सांकल कहाँ पहनी जाती है?
- (a)गले में
- (b)कमर में
- (c)टखनों पर
- (d)माथे पर
उत्तर(2) — चूरू ज़िला गज़ेटियर के अनुसार कनकती नामक सांकल कमर में पहनी जाती है। गले (1) के लिए वह हँसली, कंठी, तुस्सी, तिमणिया और डोरा गिनाता है; टखनों और पैरों (3) के लिए कड़ला, नेवरी और पायल। माथा (4) वह स्थान नहीं है जहाँ वह कनकती को रखता है। - अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
चूरू ज़िला गज़ेटियर (1970) के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा आभूषण कानों में पहना जाता है?
- (a)नथ
- (b)लौंग
- (c)झुमर
- (d)चूड़ा
उत्तर(3) — गज़ेटियर खुरबा, झुमर और दामणी को कानों में पहने जाने वाले आभूषण बताता है। नथ (1) और लौंग (2) उसके बताए नाक के आभूषणों में हैं, और चूड़ा (4) हाथों में पहना जाता है।