हार्मोन किसके द्वारा स्रावित होते है ?
- (a)तैलीय ग्रंथियां
- (b)प्रजनन ग्रंथियां
- (c)बहि:स्रावी ग्रंथियां
- (d)अंत:स्रावी ग्रंथियां
सही — D, अंत:स्रावी ग्रंथियां। अंतःस्रावी ग्रंथि की परिभाषा इस बात से बनती है कि उसमें क्या नहीं होता : वाहिनी (duct)। वह अपना उत्पाद चारों ओर के अंतराली द्रव में छोड़ती है और वहाँ से वह रक्तधारा में जाता है, जो उस अणु को दूर बैठी उन कोशिकाओं तक पहुँचा देती है जिन पर मेल खाता ग्राही मौजूद हो। आयोग की इस प्रश्न पर प्रकाशित टिप्पणी ठीक यही कहती है — अंतःस्रावी ग्रंथियाँ वाहिनीरहित ग्रंथियाँ हैं जो हॉर्मोन सीधे रक्तधारा में स्रावित करती हैं — और फिर वह बाक़ी तीनों विकल्पों को एक-एक कर बाहर कर देती है : बहिःस्रावी ग्रंथियाँ लक्ष्य अंग पर वाहिनी के ज़रिए एंज़ाइम स्रावित करती हैं, तैलीय ग्रंथियाँ सीबम स्रावित करती हैं, और प्रजनन ग्रंथियाँ, जिन्हें जनद (gonads) भी कहते हैं, अंतःस्रावी ग्रंथियों का ही एक प्रकार हैं जो नर तथा मादा लिंग-हॉर्मोन स्रावित करती हैं। शब्दावली भी इसी भेद पर खड़ी है : ‘endocrine’ यूनानी endon यानी भीतर और krinein यानी अलग करना से बना है, जबकि exo का अर्थ बाहर है। रक्तधारा से परिवहन तो स्वयं हॉर्मोन की परिभाषा में लिखा है। अर्नेस्ट स्टार्लिंग ने 1905 में यूनानी के ‘उत्तेजित करना’ से यह शब्द गढ़ा और हॉर्मोनों को ‘वे रासायनिक संदेशवाहक बताया जो रक्तधारा के साथ एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक दौड़ते हुए शरीर के भिन्न-भिन्न हिस्सों की क्रियाओं तथा वृद्धि में तालमेल बिठा सकते हैं।’ मानव अंतःस्रावी समुच्चय इतना छोटा है कि याद किया जा सके : हाइपोथैलेमस, पीयूष, पीनियल, अवटु (थायरॉइड), चार परावटु (पैराथायरॉइड), थाइमस, दो अधिवृक्क, अग्न्याशय में धँसे लैंगरहैंस के द्वीपिकाएँ, और जनद — अंडाशय तथा वृषण। गर्भावस्था में इनमें अपरा (placenta) जुड़ जाती है, और इसके आगे उन अंगों की एक सूची और है जिनमें अंतःस्रावी ऊतक होता है पर जिन्हें ग्रंथि नहीं कहा जाता : वृक्क (एरिथ्रोपोइटिन, रेनिन, कैल्सीट्रिऑल), हृदय (आलिंद नैट्रियूरेटिक पेप्टाइड), आमाशय तथा आँत (गैस्ट्रिन, सीक्रेटिन, कोलेसिस्टोकाइनिन), यकृत और यहाँ तक कि वसा ऊतक (लेप्टिन)। इनमें से हर स्रोत ‘अंतःस्रावी’ के वर्णन पर खरा उतरता है, और मानव शरीर का कोई हॉर्मोन इनके सिवा कहीं से नहीं आता। कुंजी इसी पूर्णता को पुरस्कृत करती है। विकल्प (d) केवल कोई सच्चा उदाहरण नहीं देता — वह उस पूरी कोटि का नाम लेता है जिसमें शरीर की हर हॉर्मोन-स्रावी संरचना आती है, विकल्प (b) के जनद भी।
- (a)तैलीय ग्रंथियां — तैलीय (सीबेशियस) ग्रंथियाँ त्वचा की सूक्ष्मदर्शीय बहिःस्रावी ग्रंथियाँ हैं, जो किसी रोम-कूप में खुलती हैं और होलोक्राइन मार्ग से सीबम छोड़ती हैं — लगभग 41% ट्राइग्लिसराइड, 26% मोम एस्टर और 12% स्क्वैलीन — जिसमें पूरी सीबोसाइट कोशिका फटकर अपनी सामग्री के साथ ही स्रावित हो जाती है। ये हथेलियों और तलवों को छोड़कर सारी त्वचा पर मिलती हैं, और पलक की माइबोमियन ग्रंथियाँ इन्हीं का विशिष्ट प्रकार हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि ये हॉर्मोनों का लक्ष्य हैं, स्रोत नहीं : इन्हें एंड्रोजन चलाते हैं, इसीलिए मुँहासे यौवनारम्भ के साथ चलते हैं।
- (b)प्रजनन ग्रंथियां — यह ग़लत नहीं है — और यही इसे इस प्रश्न का असली जाल बनाता है। अंडाशय और वृषण सचमुच हॉर्मोन स्रावित करते हैं : एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन, टेस्टोस्टेरोन और इनहिबिन, सब उन्हीं से रक्त तक पहुँचते हैं। पर प्रजनन ग्रंथियाँ अंतःस्रावी ग्रंथियों का उपसमुच्चय हैं, उनका विकल्प नहीं, और आयोग इसे अपने ही शब्दों में तय कर देता है : जनद ‘अंतःस्रावी ग्रंथियों का एक प्रकार हैं जो नर तथा मादा लिंग-हॉर्मोन स्रावित करती हैं’। UPSC का 2000 वाला मिलान-प्रश्न भी चुपचाप यही करता है, जिसमें ‘अंतःस्रावी ग्रंथियाँ’ शीर्षक के नीचे पहली प्रविष्टि ही ‘जनद’ है। जनद मिश्रित ग्रंथियाँ भी हैं, क्योंकि वे अंडाणु और शुक्राणु वाहिनियों से बाहर भेजती हैं, इसलिए एक कोटि के रूप में वे (d) से संकरी भी हैं और कम शुद्ध भी। इन्हें चुनने पर पीयूष, अवटु, अधिवृक्क और लैंगरहैंस की द्वीपिकाएँ बेहिसाब रह जाती हैं।
- (c)बहि:स्रावी ग्रंथियां — उत्तर का ठीक उल्टा, और परिभाषा का दर्पण-प्रतिबिम्ब। बहिःस्रावी ग्रंथियाँ अपना स्राव वाहिनियों के ज़रिए किसी उपकला सतह पर या शरीर की किसी गुहा में भेजती हैं — लार, जठर, स्वेद, अश्रु, स्तन ग्रंथियाँ और अग्न्याशय की एसिनाई — और उनके उत्पाद एंज़ाइम, म्यूकस, दूध, आँसू, पसीना और तेल होते हैं, हॉर्मोन कभी नहीं। यह इसलिए लुभाता है कि अग्न्याशय मिश्रित ग्रंथि है : उसकी एसिनाई बहिःस्रावी हैं और अग्न्याशयी वाहिनी से अग्न्याशयी रस उँड़ेलती हैं, जबकि उसकी लैंगरहैंस द्वीपिकाएँ अंतःस्रावी हैं और इंसुलिन तथा ग्लूकागॉन रक्त में डालती हैं। वाहिनी की मौजूदगी ही पूरी कसौटी है।
ग्रंथियों का वर्गीकरण इस आधार पर होता है कि उनका स्राव जाता कहाँ है, इस आधार पर नहीं कि वह है क्या। बहिःस्रावी ग्रंथियाँ अपनी वाहिनी बनाए रखती हैं और किसी सतह पर पहुँचाती हैं : त्वचा पर पसीना, मुँह में लार, ग्रहणी में पित्त तथा अग्न्याशयी रस, चुचुक से दूध, कंजंक्टाइवा पर आँसू। इन्हें आगे इस आधार पर बाँटा जाता है कि कोशिका अपने उत्पाद से अलग कैसे होती है — मीरोक्राइन, जिसमें पुटिकाएँ झिल्ली से जुड़ जाती हैं और कोशिका बची रहती है (लार ग्रंथियाँ, स्वेद ग्रंथियाँ); एपोक्राइन, जिसमें कोशिका का शीर्ष भाग टूटकर अलग होता है; और होलोक्राइन, जिसमें पूरी कोशिका बिखरकर स्राव में मिल जाती है, और इसका पाठ्यपुस्तकीय उदाहरण तैलीय ग्रंथि है। इसके विपरीत अंतःस्रावी ग्रंथियाँ अपनी भ्रूणीय वाहिनी खो चुकी होती हैं और अंतराली द्रव तथा रक्त में छोड़ती हैं। उनके उत्पाद अत्यधिक तनुता पर काम करते हैं, ऐसी कोशिकाओं पर जो एक मीटर दूर भी हो सकती हैं, और केवल उन्हीं पर जिन पर सही ग्राही हो — विशिष्टता ग्राही से आती है, नलसाज़ी से नहीं। हॉर्मोन स्वयं तीन रासायनिक वर्गों में आते हैं : पेप्टाइड और प्रोटीन (इंसुलिन, वृद्धि हॉर्मोन, ADH), कोलेस्टेरॉल से बने स्टेरॉइड (कॉर्टिसोल, ऐल्डोस्टेरोन, एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरोन), और टायरोसिन से बने ऐमीन (थायरॉक्सिन, एड्रिनैलिन)। दो अंग एक साथ दोनों खेमों में बैठते हैं। अग्न्याशय मानक मिश्रित ग्रंथि है, और दूसरा है जनद — और यही दोहरी पहचान विकल्प (b) को स्पष्ट भूल के बजाय सम्भावित उत्तर बना देती है।
पहले प्रश्न की क्रिया पकड़िए, फिर समुच्चयों का सम्बन्ध। ‘हार्मोन किसके द्वारा स्रावित होते है’ आम तौर पर हॉर्मोनों की स्रोत-कोटि पूछता है, किसी तंत्र या किसी लिंग तक सीमित किए बिना। दो विकल्प केवल परिभाषा से हट जाते हैं : बहिःस्रावी ग्रंथियाँ परिभाषा से ही वाहिनी वाली हैं और हॉर्मोन नहीं बनातीं, और तैलीय ग्रंथियाँ ठीक उसी वर्ग का एक नामित उदाहरण हैं। इसके बाद (b) और (d) के बीच जो मुक़ाबला बचता है वह सच्चाई का मुक़ाबला नहीं — दोनों कथन सच हैं — बल्कि समुच्चय-सदस्यता का है। प्रजनन ग्रंथियाँ अंतःस्रावी कोटि के भीतर हैं; अंतःस्रावी कोटि उनके भीतर नहीं। जब दोनों विकल्प सच हों और एक दूसरे का उचित उपसमुच्चय हो, तो बिना किसी सीमा वाला प्रश्न बड़े समुच्चय को लेता है, क्योंकि उपसमुच्चय चुनने पर परिघटना का अधिकांश हिस्सा अनसुलझा रह जाता है : ‘प्रजनन ग्रंथियाँ’ चुनिए और इंसुलिन, थायरॉक्सिन, कॉर्टिसोल, ADH या वृद्धि हॉर्मोन का कोई हिसाब आपके पास नहीं बचता। यदि प्रश्न ‘टेस्टोस्टेरोन किसके द्वारा स्रावित होता है’ होता, तो उत्तर उपसमुच्चय ही होता। इसलिए अकेला निर्णायक तथ्य ‘वाहिनीरहित’ शब्द है — वही उस वर्ग को परिभाषित करता है जिसका नाम प्रश्न असल में ले रहा है, और वही आयोग की टिप्पणी में लिखा है। परीक्षा-कौशल की एक बात और : BPSC सही उत्तर पर +1 देता है और, अपनी पुस्तिका के निर्देश 9 के अनुसार, ग़लत उत्तर पर −1/3 काटता है, इसलिए ऐसे दो-तरफ़ा उपसमुच्चय/अधिसमुच्चय चुनाव में व्यापक कोटि पर निशान लगाना बेहतर शरीर-क्रिया विज्ञान भी है और बेहतर अंकगणित भी।
- अंतःस्रावी ग्रंथियाँ वाहिनीरहित होती हैं और हॉर्मोन सीधे अंतराली द्रव तथा रक्त में छोड़ती हैं, जो उन्हें विशिष्ट ग्राही वाली दूरस्थ लक्ष्य कोशिकाओं तक पहुँचाता है; बहिःस्रावी ग्रंथियाँ अपनी वाहिनी बनाए रखती हैं और एंज़ाइम, म्यूकस, पसीना, दूध या तेल किसी सतह पर अथवा गुहा में पहुँचाती हैं।
- अर्नेस्ट स्टार्लिंग ने 1905 में यूनानी के ‘उत्तेजित करना’ से ‘हॉर्मोन’ शब्द गढ़ा और हॉर्मोनों को ऐसे रासायनिक संदेशवाहक बताया जो रक्तधारा से चलकर शरीर के दूरस्थ हिस्सों में तालमेल बिठाते हैं। 1902 में विलियम बेलिस और स्टार्लिंग द्वारा पृथक् किया गया सीक्रेटिन परम्परा से पहला पहचाना गया हॉर्मोन कहलाता है, यद्यपि ऑलिवर तथा शेफ़र का 1894 का अधिवृक्क सत् — जिसमें एड्रिनैलिन था — पहले का दावेदार है।
- मानव अंतःस्रावी ग्रंथियाँ हैं हाइपोथैलेमस, पीयूष, पीनियल, अवटु, चार परावटु, थाइमस, दो अधिवृक्क, अग्न्याशय की लैंगरहैंस द्वीपिकाएँ और जनद, तथा गर्भावस्था में इनके साथ अपरा; वृक्क (एरिथ्रोपोइटिन, रेनिन, कैल्सीट्रिऑल), हृदय (आलिंद नैट्रियूरेटिक पेप्टाइड), आँत (गैस्ट्रिन, सीक्रेटिन, कोलेसिस्टोकाइनिन) और वसा ऊतक (लेप्टिन) में भी अंतःस्रावी ऊतक होता है।
- अग्न्याशय मानक मिश्रित ग्रंथि है — बहिःस्रावी एसिनाई अग्न्याशयी वाहिनी से पाचक रस भेजती हैं, अंतःस्रावी लैंगरहैंस द्वीपिकाएँ इंसुलिन तथा ग्लूकागॉन रक्त में डालती हैं। जनद भी इसी तरह मिश्रित हैं : युग्मक वाहिनियों से बाहर जाते हैं, स्टेरॉइड हॉर्मोन रक्त में जाते हैं।
- तैलीय ग्रंथियाँ रोम-कूपों में खुलने वाली सूक्ष्मदर्शीय बहिःस्रावी ग्रंथियाँ हैं; सीबम में लगभग 41% ट्राइग्लिसराइड, 26% मोम एस्टर और 12% स्क्वैलीन होते हैं, और वह होलोक्राइन ढंग से निकलता है, यानी सीबोसाइट स्वयं फट जाती है। ये हथेलियों और तलवों को छोड़कर सारी त्वचा पर मिलती हैं, पलक की माइबोमियन ग्रंथियाँ इनका विशिष्ट प्रकार हैं, और ये कोई हॉर्मोन बनाने के बजाय एंड्रोजन पर प्रतिक्रिया देती हैं।
उभारी गई पंक्ति ही उत्तर है। तीसरी और चौथी पंक्तियाँ परिभाषा से ही बाहर हो जाती हैं — उनमें वाहिनी है और वे हॉर्मोन बनाती ही नहीं। दूसरी पंक्ति सच है, पर वह पहली पंक्ति के भीतर समाई हुई है, इसीलिए कुंजी पूरी कोटि लेती है : जनद चुन लीजिए और इंसुलिन, थायरॉक्सिन, कॉर्टिसोल तथा वृद्धि हॉर्मोन बिना किसी स्रोत के रह जाते हैं।
- ‘प्रजनन ग्रंथियाँ’ को ग़लत मान लेना। वे सही हैं पर अधूरी — वे अंतःस्रावी वर्ग की एक सदस्य हैं, और चूँकि युग्मक वाहिनियों से बाहर जाते हैं, इसलिए वे बहिःस्रावी भी हैं
- यह भूल जाना कि अग्न्याशय मिश्रित ग्रंथि है, और इससे यह निष्कर्ष निकाल लेना कि बहिःस्रावी ग्रंथियाँ भी कभी-कभी हॉर्मोन बनाती होंगी। एसिनाई रस बनाती हैं, द्वीपिकाएँ इंसुलिन; अंतःस्रावी केवल द्वीपिकाएँ हैं
- हॉर्मोन के लक्ष्य को हॉर्मोन का स्रोत समझ लेना। तैलीय ग्रंथियाँ, रोम-कूप और एंडोमेट्रियम — सब हॉर्मोनों पर प्रतिक्रिया देते हैं, बिना कोई हॉर्मोन स्रावित किए
BPSC वर्गीकरण ही चार सूखे शब्दों में पूछ लेता है और विकल्पों के बीच एक उपसमुच्चय बिठा देता है, ताकि अंक किसी तथ्य की स्मृति पर नहीं, समुच्चय-सम्बन्ध पहचानने पर टिके। UPSC इसे इतना सपाट कभी नहीं पूछता। वह एक स्तर बारीक जाता है — 2000 में जनद, पीयूष, अग्न्याशय और अधिवृक्क को प्रोजेस्टेरोन, वृद्धि हॉर्मोन, इंसुलिन तथा कॉर्टिसोन से मिलाना; 1997 में यह पूछना कि कौन-सी अंतःस्रावी ग्रंथि पीयूष से स्वतंत्र होकर काम करती है; 2007 में यह कि रक्त-कैल्शियम तथा फ़ॉस्फ़ेट का नियमन कौन-सा हॉर्मोन करता है। BPSC के लिए कोटि सीखिए और UPSC के लिए ग्रंथि-हॉर्मोन तालिका।
सूची I (अंतःस्रावी ग्रंथियाँ) को सूची II (स्रावित हॉर्मोन) से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए : सूची I I. जनद II. पीयूष III. अग्न्याशय IV. अधिवृक्क सूची II A) इंसुलिन B) प्रोजेस्टेरोन C) वृद्धि हॉर्मोन D) कॉर्टिसोन कूट :
- (a) I-C, II-B, III-D, IV-A
- (b) I-B, II-C, III-D, IV-A
- (c) I-B, II-C, III-A, IV-D
- (d) I-C, II-B, III-A, IV-D
उत्तर(c) I-B, II-C, III-A, IV-D
BPSC वाले जाल का सबसे साफ़ निपटारा। UPSC की अपनी सूची I का शीर्षक ही ‘अंतःस्रावी ग्रंथियाँ’ है और उसकी पहली ही प्रविष्टि ‘जनद’ है — यानी विकल्प (b) की प्रजनन ग्रंथियाँ विकल्प (d) की कोटि के भीतर, पीयूष, अग्न्याशय और अधिवृक्क के साथ बैठी हुई। वही अवधारणा, और वह उपसमुच्चय-सम्बन्ध को आयोग की पसंदीदा शब्दावली में दिखा देती है।
पीयूष ग्रंथि अपने ट्रॉपिक हॉर्मोनों के बल पर अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों की स्रावी क्रिया को नियंत्रित करती है। निम्नलिखित में से कौन-सी अंतःस्रावी ग्रंथि पीयूष ग्रंथि से स्वतंत्र होकर काम कर सकती है ?
- (a) अवटु
- (b) जनद
- (c) अधिवृक्क
- (d) परावटु
उत्तर(d) परावटु
वही कोटि, एक स्तर और गहराई में परखी गई। चारों विकल्प — अवटु, जनद, अधिवृक्क, परावटु — अंतःस्रावी ग्रंथियों के रूप में ही रखे गए हैं, जिससे जनद फिर उसी वर्ग के भीतर बैठ जाते हैं; इसके बाद UPSC पूछता है कि इनमें से कौन पीयूष के ट्रॉपिक नियंत्रण से बच निकलती है, क्योंकि परावटु सीधे रक्त-कैल्शियम को उत्तर देती है। यहाँ सदस्यता वाला प्रश्न साध लीजिए और वहाँ नियंत्रण वाला प्रश्न अपने आप सध जाता है।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
निम्नलिखित में से कौन-सी मिश्रित ग्रंथि है, जिसमें बहिःस्रावी और अंतःस्रावी दोनों कार्य होते हैं ?
- (a)अवटु ग्रंथि
- (b)अग्न्याशय
- (c)परावटु ग्रंथि
- (d)पीनियल ग्रंथि
उत्तर(b) अग्न्याशय — इसकी एसिनाई बहिःस्रावी हैं और अग्न्याशयी वाहिनी से ग्रहणी में अग्न्याशयी रस उँड़ेलती हैं, जबकि लैंगरहैंस की द्वीपिकाएँ अंतःस्रावी हैं और इंसुलिन तथा ग्लूकागॉन रक्त में छोड़ती हैं। अवटु, परावटु और पीनियल विशुद्ध रूप से अंतःस्रावी हैं।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
अंतःस्रावी ग्रंथि और बहिःस्रावी ग्रंथि के बीच मूल अंतर यह है कि अंतःस्रावी ग्रंथि
- (a)केवल प्रोटीन स्रावित करती है, जबकि बहिःस्रावी ग्रंथि केवल लिपिड
- (b)वाहिनीरहित होती है और अपना स्राव सीधे रक्त में छोड़ती है
- (c)केवल उदर गुहा में पाई जाती है
- (d)तंत्रिकाओं से नियंत्रित होती है, जबकि बहिःस्रावी ग्रंथि नहीं
उत्तर(b) वाहिनीरहित होती है और अपना स्राव सीधे रक्त में छोड़ती है — यही परिभाषक कसौटी है। दोनों प्रकार की ग्रंथियाँ भिन्न-भिन्न रसायन वाले पदार्थ स्रावित करती हैं, दोनों पूरे शरीर में मिलती हैं, और दोनों तंत्रिकीय या हॉर्मोनी नियंत्रण में हो सकती हैं; उन्हें अलग केवल वाहिनी का होना या न होना करता है।