नीचे से रात में चमकने वाले वर्णक के रूप में कौन–सा यौगिक जाना जाता है ?
- (a)यूरोपियम डोप्ड स्ट्रोंटियम एलुमिनेट
- (b)कॉपर सल्फाइड डोप्ड जिंक ऑक्साइड
- (c)बेरियम सल्फेट डोप्ड कॉपर कार्बोनेट
- (d)बोरॉन ऑक्साइड डोप्ड कॉपर सल्फेट
सही — A, यूरोपियम डोप्ड स्ट्रोंटियम एलुमिनेट, अर्थात् यूरोपियम-डोपित स्ट्रोंटियम एलुमिनेट। यह पदार्थ स्ट्रोंटियम एलुमिनेट, SrAl₂O₄, है जिसे यूरोपियम की +2 अवस्था से सक्रियित किया गया है और डिस्प्रोसियम से सह-डोपित किया गया है — सूत्र में SrAl₂O₄:Eu²⁺,Dy³⁺। 1990 के दशक के मध्य से बने लगभग हर ग्लो-इन-द-डार्क आपातकालीन निकास-चिह्न, बचाव-मार्ग के निशान, घड़ी के डायल और चमकीले खिलौने के पीछे यही वर्णक है। उत्सर्जन का काम यूरोपियम आयन करता है; याद रखने का काम डिस्प्रोसियम। 200–450 nm पट्टी का दिन का प्रकाश या कमरे की रोशनी Eu²⁺ से इलेक्ट्रॉनों को ऊपर उठा देती है, डिस्प्रोसियम से बने क्रिस्टल-जालक के दोष उस आवेश को फँसा लेते हैं, और फिर कमरे के सामान्य ताप की ऊष्मा उसे मिनटों-घंटों में धीरे-धीरे यूरोपियम को लौटाती रहती है, और हर लौटता इलेक्ट्रॉन लगभग 520 nm पर शिखर वाला हरा फ़ोटॉन छोड़ता है। ऊर्जा को जमा करके धीरे-धीरे छोड़ने का यही क़दम स्थायी संदीप्ति (persistent luminescence) है — स्फुरदीप्ति (phosphorescence), प्रतिदीप्ति (fluorescence) नहीं — और इसी कारण यह वर्णक बिजली गुल हुई सीढ़ियों में भी काम करता रहता है। इस पदार्थ का जन्म तिथि सहित दर्ज है : इसे 1993 में विकसित किया गया, खोज का श्रेय जापानी कम्पनी नेमोटो एंड कंपनी के यासुमित्सु आओकी को जाता है, और उसी कम्पनी ने 1994 में इसे अमेरिकी पेटेंट 5,424,006, ‘Phosphorescent phosphor’ के रूप में पेटेंट कराया। उद्देश्य सुरक्षा था — जिन चमकीले रंगों की जगह इसने ली, वे रेडियोसक्रिय प्रोमीथियम पर निर्भर थे। पुराने कॉपर-सक्रियित ज़िंक सल्फाइड की तुलना में यह मोटे तौर पर दस गुना अधिक चमकीला है, लगभग दस गुना अधिक देर तक चमकता है और लगभग दस गुना महँगा है; आज यह व्यावसायिक रूप से उपलब्ध सबसे चमकीला और सबसे देर टिकने वाला स्फुरदीप्त पदार्थ है, जो Super-LumiNova और सेइको के Lumibrite जैसे नामों से बिकता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि यह प्रकाश के सिवा कुछ जमा नहीं करता : स्ट्रोंटियम एलुमिनेट अविषैला, रासायनिक रूप से निष्क्रिय और अनगिनत बार पुनः-आवेशित होने योग्य है — उन रेडियम डायल-रंगों और ट्रिटियम नलिकाओं के विपरीत जो इससे पहले चलती थीं।
- (b)कॉपर सल्फाइड डोप्ड जिंक ऑक्साइड — पूरे पृष्ठ का सबसे चतुर भ्रामक विकल्प, क्योंकि यह किसी बिल्कुल असली चीज़ से केवल एक अदला-बदली की दूरी पर है। 1993 से पहले का मानक ग्लो-इन-द-डार्क वर्णक कॉपर-सक्रियित ज़िंक सल्फाइड, Cu:ZnS था — पुराने चमकीले सितारों और खिलौनों वाला हरियाली लिए पदार्थ। यह विकल्प सल्फाइड को कॉपर पर सरका देता है और मेज़बान का काम ज़िंक ऑक्साइड को सौंप देता है, जो सनस्क्रीन और रबर में काम आने वाला सफ़ेद वर्णक है। कॉपर सल्फाइड एक गहरे रंग का अर्धचालक खनिज है, और इस जोड़ी का स्थायी संदीप्ति में कोई उपयोग है ही नहीं।
- (c)बेरियम सल्फेट डोप्ड कॉपर कार्बोनेट — दो वास्तव में उपयोगी यौगिक, पर ग़लत काम पर लगा दिए गए। बेरियम सल्फेट रंगों और काग़ज़ का निष्क्रिय सफ़ेद भराव है और एक्स-रे कंट्रास्ट के लिए पिलाया जाने वाला ‘बेरियम मील’ भी; क्षारकीय कॉपर कार्बोनेट मैलाकाइट है, एक हरा खनिज वर्णक। इनमें से कोई स्फुरदीप्ति नहीं दिखाता, और रसायन इसे सैद्धांतिक रूप से भी ख़ारिज कर देता है : स्थायी स्फुरदीप्त पदार्थ को रंगहीन, चौड़े बैंड-गैप वाला मेज़बान चाहिए, जबकि Cu²⁺ आयन रंगीन ही इसलिए है कि वह दृश्य प्रकाश सोख लेता है, इसलिए वह उत्सर्जन पैदा करने के बजाय उसे बुझा देता है।
- (d)बोरॉन ऑक्साइड डोप्ड कॉपर सल्फेट — बोरॉन ऑक्साइड, B₂O₃, काँच बनाने वाला और गालक (flux) है — प्रयोगशाला के काँच का बोरोसिलिकेट, बोरेक्स-मनका परीक्षण का मनका — जबकि कॉपर सल्फेट बोर्डो मिश्रण और विद्युत्-लेपन के घोलों का नीला क्रिस्टलीय लवण है। वही घातक आपत्ति यहाँ भी लागू है : कॉपर(II) गहरे रंग का होता है और संदीप्ति को बुझा देता है, और इनमें से कोई भी यौगिक स्फुरदीप्त मेज़बान का काम नहीं करता। असली स्ट्रोंटियम-एलुमिनेट स्फुरदीप्त पदार्थों में बोरॉन आता ज़रूर है, पर केवल एक सूक्ष्म योजक के रूप में जो पश्च-चमक (afterglow) को लम्बा करता है — कभी किसी कॉपर लवण के डोपेंट के रूप में नहीं।
चमकने वाला वर्णक कभी अकेला पदार्थ नहीं होता; वह दो हिस्सों का डिज़ाइन होता है — एक पारदर्शी मेज़बान क्रिस्टल और जान-बूझकर डाली गई अशुद्धि की एक सूक्ष्म मात्रा, जिसे सक्रियक (activator) कहते हैं। डोपिंग का अर्थ है उस अशुद्धि-आयन को जालक में प्रतिशत के अंश भर के स्तर पर बो देना — वही विचार जो सिलिकॉन में फ़ॉस्फ़ोरस डोप करने का है, बस यहाँ लाभ विद्युतीय नहीं, प्रकाशिक होता है। SrAl₂O₄:Eu²⁺,Dy³⁺ में मेज़बान स्ट्रोंटियम एलुमिनेट है, सक्रियक यूरोपियम(II) है, और डिस्प्रोसियम(III) कुछ भी उत्सर्जित नहीं करता : उसका काम जालक में ऐसे दोष बनाना है जो इलेक्ट्रॉन-फंदे का काम करें। आता हुआ प्रकाश यूरोपियम को उत्तेजित करता है, फंदे मुक्त हुए आवेश का एक हिस्सा पकड़कर रोके रखते हैं, और ऊष्मीय ऊर्जा उसे धीरे-धीरे छोड़ती है। इससे दो बातें निकलती हैं जो परीक्षकों को बहुत प्रिय हैं। पहली, ऑक्सीकरण अवस्था सजावट नहीं है — Eu²⁺ प्रबल पश्च-चमक देता है जबकि Eu³⁺ लगभग कुछ नहीं। दूसरी, विलम्ब ही शब्दावली का भेद तय करता है। उत्तेजक प्रकाश बंद होते ही प्रतिदीप्ति नैनोसेकंडों में समाप्त हो जाती है, जैसे यूवी लैम्प के नीचे हाइलाइटर पेन; स्फुरदीप्ति, ठीक-ठीक कहें तो स्थायी संदीप्ति, सेकंडों से घंटों तक चलती रहती है क्योंकि ऊर्जा फंदों में बैठी होती है। इन दोनों से एक तीसरी क्रियाविधि को अलग रखिए : सड़क के परावर्ती स्टड और ‘कैट्स आई’ रात में चमकीले दिखते हैं पर अपना कुछ भी उत्सर्जित नहीं करते — वे बस हेडलाइट की किरणें सीधे चालक की ओर लौटा देते हैं।
आपसे यह अपेक्षा नहीं कि आपने SrAl₂O₄ पहले देखा हो। यह प्रश्न दो रासायनिक नियमों के सहारे विलोपन से पूरी तरह हल हो जाता है। पहला नियम : स्फुरदीप्त पदार्थ को रंगहीन, चौड़े बैंड-गैप वाला मेज़बान चाहिए — आमतौर पर किसी मुख्य-समूह या क्षारीय-मृदा धातु का ऑक्साइड, एलुमिनेट, सिलिकेट या सल्फाइड। विकल्प (c) और (d) कॉपर(II) यौगिकों पर खड़े हैं, और कॉपर कार्बोनेट हरा तथा कॉपर सल्फेट नीला ठीक एक ही कारण से है : Cu²⁺ आयन दृश्य प्रकाश सोखता है। जो आयन दृश्य प्रकाश सोखता है वह उसे उत्सर्जित करने वाली चीज़ नहीं हो सकता — वह उसे बुझा देता है। एक ही झटके में दो विकल्प गिर जाते हैं। दूसरा नियम निर्णायक तथ्य है : आधुनिक पदार्थों में दृश्य संदीप्ति पैदा करने वाले सक्रियक अत्यधिक बहुलता से दुर्लभ-मृदा आयन ही होते हैं। यूरोपियम, टर्बियम, डिस्प्रोसियम, सीरियम और यिट्रियम के यौगिक फ़्लोरोसेंट ट्यूबों, सफ़ेद LED की परतों, टेलीविज़न और मॉनिटर के पिक्सेलों तथा एक्स-रे तीव्रक परदों के भीतर बैठे हैं। चारों विकल्पों में दुर्लभ-मृदा तत्त्व केवल (a) में है। जाल (b) है, और वह ख़ूबसूरती से गढ़ा गया है, क्योंकि ग्लो-इन-द-डार्क सितारों को सचमुच चमकाने वाला वर्णक कॉपर-डोपित ज़िंक यौगिक ही था — पर वह कॉपर से सक्रियित ज़िंक सल्फाइड था, न कि ज़िंक ऑक्साइड को डोप करता कॉपर सल्फाइड। जिस अभ्यर्थी को आधा-अधूरा ‘कुछ कॉपर और ज़िंक वाला’ याद है, वह तेज़ी से इसमें जा गिरता है। परीक्षा-कक्ष में ले जाने लायक़ एक पंक्ति यह है कि आधुनिक रात्रि-चमक वर्णक दुर्लभ-मृदा वाला है; कॉपर-और-ज़िंक वाला उसका अप्रचलित पूर्ववर्ती है।
- यह वर्णक SrAl₂O₄ है जिसे Eu²⁺ और Dy³⁺ से डोप किया गया है : यूरोपियम उत्सर्जन-केंद्र है, डिस्प्रोसियम वे इलेक्ट्रॉन-फंदे देता है जो ऊर्जा जमा करके धीरे-धीरे छोड़ते हैं। शिखर उत्सर्जन लगभग 520 nm (हरा) पर है और उत्तेजन 200 से 450 nm तक चलता है, इसलिए सामान्य दिन का प्रकाश या कमरे की रोशनी ही इसे फिर से आवेशित कर देती है।
- इसे 1993 में विकसित किया गया — खोज का श्रेय नेमोटो एंड कंपनी के यासुमित्सु आओकी को और पेटेंट उसी कम्पनी का, 1994 में अमेरिकी पेटेंट 5,424,006, ‘Phosphorescent phosphor’ — और स्पष्ट उद्देश्य था उन चमकीले रंगों को हटाना जो रेडियोसक्रिय प्रोमीथियम पर निर्भर थे।
- पुराने कॉपर-सक्रियित ज़िंक सल्फाइड (Cu:ZnS) के मुक़ाबले यह मोटे तौर पर दस गुना अधिक चमकीला है, लगभग दस गुना अधिक देर तक चमकता है और लगभग दस गुना महँगा है; आज यह व्यावसायिक रूप से बिकने वाला सबसे चमकीला और सबसे देर टिकने वाला स्फुरदीप्त पदार्थ है, जो Super-LumiNova और सेइको के Lumibrite के नाम से बेचा जाता है।
- SrAl₂O₄ स्वयं हल्के पीले रंग का एकनताक्ष (मोनोक्लिनिक) चूर्ण है, जिसका मोलर द्रव्यमान 205.58 g/mol और घनत्व 3.559 g/cm³ है, जो जल में अघुलनशील और लगभग pH 8 पर बहुत हल्का क्षारीय होता है। यह अविषैला और रासायनिक रूप से निष्क्रिय है, और इसीलिए खिलौनों, निकास-चिह्नों तथा घड़ी के डायलों पर स्वीकार्य है।
- प्रभाव ऑक्सीकरण अवस्था से तय होता है : Eu²⁺ प्रबल पश्च-चमक देता है, Eu³⁺ लगभग कुछ नहीं। यही पदार्थ यांत्रिक-संदीप्त (mechanoluminescent) भी है — Eu-डोपित स्ट्रोंटियम एलुमिनेट यांत्रिक प्रतिबल पड़ने पर प्रकाश छोड़ता है, और इसे संरचनाओं में दरार तथा प्रतिबल के सूचक के रूप में परखा जा रहा है।
- (b) इसलिए चुन लेना कि पुराने चमकीले वर्णक में कॉपर और ज़िंक याद हैं — वह कॉपर-सक्रियित ज़िंक सल्फाइड, Cu:ZnS था, न कि ज़िंक ऑक्साइड में डोप किया गया कॉपर सल्फाइड
- स्फुरदीप्ति को प्रतिदीप्ति समझ लेना : प्रतिदीप्त पदार्थ उत्तेजक प्रकाश हटते ही बुझ जाता है, स्फुरदीप्त पदार्थ नहीं
- यह मान लेना कि अँधेरे में चमकने वाली हर चीज़ रेडियोसक्रिय होगी — स्ट्रोंटियम एलुमिनेट साधारण प्रकाश के सिवा कुछ जमा नहीं करता और रासायनिक रूप से निष्क्रिय तथा अविषैला है
BPSC इसे सपाट यौगिक-पहचान के रूप में पूछता है — एक पंक्ति, चार सूत्र, पदार्थ का नाम बताइए — और यह प्रश्नपत्र ठीक इसी क़िस्म के रोज़मर्रा के व्यावहारिक पदार्थ-रसायन पर बहुत ज़ोर देता है : यहाँ चमकीला वर्णक, Q133 पर स्मार्ट फिल्म का पारदर्शी चालक, Q137 पर पेट्रोल का अपस्फोटरोधी योजक। UPSC लगभग कभी सीधे यौगिक का नाम नहीं पूछता। वह पूछता है कि कोई पदार्थ करता क्या है या दुर्लभ क्यों है : 2010 में फ़्लोरोसेंट लैम्प में स्फुरदीप्त लेप की भूमिका, 2011 में CFL बनाम LED की तुलना, और 2012 में दुर्लभ-मृदा तत्त्वों को आपूर्ति-शृंखला के प्रश्न में ढालकर।
प्रयुक्त फ़्लोरोसेंट विद्युत् लैम्पों के अंधाधुंध निस्तारण से पर्यावरण में पारद प्रदूषण होता है। इन लैम्पों के निर्माण में पारद का उपयोग क्यों किया जाता है ?
- (a) लैम्प के भीतरी हिस्से पर पारद की परत प्रकाश को चमकीला सफ़ेद बना देती है
- (b) लैम्प चालू करने पर उसमें मौजूद पारद पराबैंगनी विकिरणों का उत्सर्जन कराता है
- (c) लैम्प चालू करने पर पारद ही पराबैंगनी ऊर्जा को दृश्य प्रकाश में बदलता है
- (d) फ़्लोरोसेंट लैम्पों के निर्माण में पारद के उपयोग के बारे में ऊपर दिया गया कोई भी कथन सही नहीं है
उत्तर(b) लैम्प चालू करने पर उसमें मौजूद पारद पराबैंगनी विकिरणों का उत्सर्जन कराता है
वही भौतिकी, दूसरे सिरे से पूछी गई। फ़्लोरोसेंट ट्यूब इसलिए काम करती है कि पारद वाष्प पराबैंगनी प्रकाश बनाती है और डोपित स्फुरदीप्त लेप उसे दृश्य प्रकाश में बदल देता है; स्ट्रोंटियम एलुमिनेट उसी क़िस्म का डोपित स्फुरदीप्त पदार्थ है, अंतर बस इतना कि वह ऊर्जा को तुरंत छोड़ने के बजाय घंटों थामे रखता है।
हाल ही में ‘दुर्लभ मृदा धातु’ नामक तत्त्वों के एक समूह की आपूर्ति में कमी को लेकर चिंता रही है। क्यों ? 1. चीन, जो इन तत्त्वों का सबसे बड़ा उत्पादक है, ने इनके निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगा दिए हैं। 2. चीन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और चिली के अलावा ये तत्त्व किसी अन्य देश में नहीं पाए जाते। 3. विभिन्न प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के निर्माण के लिए दुर्लभ मृदा धातुएँ अनिवार्य हैं और इन तत्त्वों की माँग बढ़ती जा रही है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर(c) केवल 1 और 3
यूरोपियम और डिस्प्रोसियम — वही दो आयन जो इस वर्णक को चमकाते हैं — दुर्लभ-मृदा तत्त्व हैं, और यह प्रश्न इसी वर्ग के तत्त्वों के महत्त्व तथा उनकी आपूर्ति पर छिड़ी खींचतान के बारे में है। यह जानना कि संदीप्ति के सक्रियक लगभग हमेशा दुर्लभ-मृदा होते हैं, BPSC का उत्तर भी पहचनवाता है और UPSC के इलेक्ट्रॉनिक माँग वाले कथन को स्पष्ट रूप से सही भी बना देता है।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
वह परिघटना जिसमें उत्तेजक विकिरण हटा लेने के बाद भी कोई पदार्थ काफ़ी समय तक प्रकाश उत्सर्जित करता रहता है, कहलाती है
- (a)प्रतिदीप्ति (Fluorescence)
- (b)स्फुरदीप्ति (Phosphorescence)
- (c)तापदीप्ति (Incandescence)
- (d)रासायनिक संदीप्ति (Chemiluminescence)
उत्तर(b) स्फुरदीप्ति (Phosphorescence) — उत्सर्जन इसलिए बना रहता है क्योंकि सोखी गई ऊर्जा फंदों में या किसी दीर्घजीवी उत्तेजित अवस्था में रुकी रहती है। प्रतिदीप्ति स्रोत हटते ही नैनोसेकंडों में रुक जाती है, तापदीप्ति गर्म पिंड से निकला प्रकाश है, और रासायनिक संदीप्ति किसी रासायनिक अभिक्रिया से निकला प्रकाश है, जैसे ग्लो स्टिक में।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
संदीप्त पदार्थों में सक्रियक आयन के रूप में व्यापक रूप से प्रयुक्त यूरोपियम, टर्बियम और डिस्प्रोसियम तत्त्वों के निम्नलिखित में से किस समूह से सम्बन्धित हैं ?
- (a)एक्टिनाइड
- (b)लैंथेनाइड, जिन्हें सामान्यतः दुर्लभ-मृदा तत्त्व कहा जाता है
- (c)3d संक्रमण धातुएँ
- (d)क्षारीय-मृदा धातुएँ
उत्तर(b) लैंथेनाइड, जिन्हें सामान्यतः दुर्लभ-मृदा तत्त्व कहा जाता है — लैंथेनम से ल्यूटीशियम तक के पंद्रह तत्त्व, जिन्हें आमतौर पर स्कैंडियम और यिट्रियम के साथ समूहित किया जाता है। एक्टिनाइड ऐक्टिनियम से आगे की रेडियोसक्रिय शृंखला है, और इस वर्णक की मेज़बान धातु स्ट्रोंटियम क्षारीय-मृदा धातु है।