शिशुनाग वंश के बाद मगध (बिहार) पर किस वंश ने शासन किया ?
- (a)मौर्य वंश
- (b)शुंग वंश
- (c)नंद वंश
- (d)उपरोक्त में एक से अधिक
सही — C, नंद वंश। मगध का वंश-क्रम है बृहद्रथ, फिर हर्यक, फिर शिशुनाग, फिर नंद, फिर मौर्य, और यह प्रश्न उसी शृंखला की चौथी कड़ी माँगता है। शिशुनाग लगभग 413 ईसा पूर्व में सत्ता में आए, जब हर्यक दरबार के अधिकारी शिशुनाग ने बिम्बिसार की शाखा के अंतिम शासक को हटा दिया; उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि अवंति के प्रद्योत वंश का विनाश थी, जिसने उत्तर में मगध का अंतिम गंभीर प्रतिद्वंद्वी हटा दिया, और कालाशोक के अधीन राजधानी स्थायी रूप से पाटलिपुत्र लौट आई। इस बात को एक अकेले तथ्य के बजाय एक क्रम के रूप में याद रखना बेहतर है : हर्यक वंश के उदयिन ने पाटलिपुत्र बसाया और राजधानी वहाँ ले गए, फिर शिशुनाग ने उसे वैशाली स्थानांतरित किया, और कालाशोक ने उसे स्थायी रूप से वापस पाटलिपुत्र में स्थापित किया। लगभग 345 ईसा पूर्व में महापद्म नंद ने उन्हें उखाड़कर नंद वंश की नींव रखी। पुराण उन्हें असाधारण शब्दों में बताते हैं — एकराट्, यानी अकेला संप्रभु, और सर्वक्षत्रांतक, यानी सभी क्षत्रियों का नाश करने वाला — और दर्ज करते हैं कि वे निम्न कुल के थे, जिससे नंद गंगा के मैदान का पहला गैर-क्षत्रिय साम्राज्यिक वंश बन जाते हैं। उनकी सेना भारत में तब तक की सबसे बड़ी थी : 326 ईसा पूर्व में व्यास नदी पर सिकंदर के सैनिकों के सामने आ खड़ी हुई शक्ति के बारे में यूनानी विवरण हज़ारों रथों और हाथियों के साथ दसियों हज़ार पैदल तथा घुड़सवार सैनिकों की बात करते हैं, और उसी सेना की ख़बर ने मकदूनियाई सैनिकों को लौटने पर मजबूर किया। अंतिम नंद, धनानंद, को लगभग 322 ईसा पूर्व में चाणक्य की सहायता से चंद्रगुप्त मौर्य ने हटाया। इसलिए मौर्य शिशुनागों के बाद दो क़दम पर हैं, एक पर नहीं — और शुंग तो और भी बाद में आते हैं, 185 ईसा पूर्व में मौर्यों के अंत के बाद।
- (a)मौर्य वंश — क्रम सही, पर क़दम गलत। मौर्य अंततः शिशुनागों के बाद आते तो हैं, पर बीच में लगभग सवा दो दशक तक नंद पड़ते हैं — चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 322 ईसा पूर्व में धनानंद को हटाकर सिंहासन लिया, किसी शिशुनाग राजा को नहीं। यही विकल्प उस अभ्यर्थी को पकड़ता है जिसे केवल प्रसिद्ध वंश याद हैं और जो बीच वाला छोड़ जाता है।
- (b)शुंग वंश — जगह से बहुत दूर। शुंगों की नींव लगभग 185 ईसा पूर्व में पुष्यमित्र शुंग ने रखी, जिन्होंने अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या की — वे मौर्योत्तर काल के हैं, शिशुनागों के पतन के दो सौ से अधिक वर्ष बाद, और उनसे नंदों तथा पूरे मौर्य साम्राज्य, दोनों से अलग होते हैं।
- (d)उपरोक्त में एक से अधिक — प्रश्न पूछता है कि शिशुनागों के तुरंत बाद कौन-सा वंश आया, और वह स्थान केवल एक ही वंश घेर सकता है — उत्तराधिकार बाँटा नहीं जाता। इस विकल्प की स्थायी कसौटी लगाइए : वह तभी सही है जब दी गई मदों में से दो एक साथ सत्य हों, और यहाँ मौर्य तथा शुंग उसी एक शृंखला में अलग-अलग जगहों पर हैं।
मगध की वंश-शृंखला प्राचीन भारतीय राजनीतिक इतिहास की रीढ़ है और उसे अनुमानित तिथियों तथा हर वंश के लिए एक पहचान-तथ्य के साथ क्रम के रूप में थामना चाहिए। बृहद्रथ — जरासंध की महाकाव्य शाखा, गिरिव्रज में आसीन। हर्यक, लगभग 544 ईसा पूर्व से — बिम्बिसार, जिन्होंने अंग मिलाया, अजातशत्रु, जिन्होंने वैशाली तोड़ी और प्रथम बौद्ध संगीति को संरक्षण दिया, तथा उदयिन, जिन्होंने राजधानी पाटलिपुत्र स्थानांतरित की। शिशुनाग, लगभग 413 ईसा पूर्व से — शिशुनाग, जिन्होंने अवंति का प्रद्योत वंश नष्ट किया, और कालाशोक, जिनके अधीन वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति हुई। नंद, लगभग 345 ईसा पूर्व से — महापद्म नंद, निम्न कुल के, सभी क्षत्रियों का नाश करने वाले कहे गए, और वह विशाल सेना जिसने सिकंदर के सैनिकों को रोक दिया। मौर्य, लगभग 322 ईसा पूर्व से — चंद्रगुप्त, बिंदुसार और अशोक, पहला अखिल भारतीय साम्राज्य। फिर 185 ईसा पूर्व के बाद मौर्योत्तर क्रम शुरू होता है : पुष्यमित्र के अधीन शुंग, वासुदेव के अधीन कण्व, और सातवाहन। बार-बार लौटती क्रियाविधि पर ध्यान दीजिए : इस शृंखला में सत्ता तब बदलती है जब कोई मंत्री या सेनापति अपने राजा को हटा देता है, और शिशुनाग, नंद, मौर्य, शुंग तथा कण्व, सबकी शुरुआत इसी तरह हुई।
भरोसेमंद विधि यह है कि शृंखला एक बार क्रम से लिख डाली जाए और स्थान-संबंधी प्रश्नों का उत्तर किसी एक तथ्य की स्मृति के बजाय गिनकर दिया जाए। बृहद्रथ, हर्यक, शिशुनाग, नंद, मौर्य, फिर एक अंतराल के बाद शुंग और कण्व। यह लिखा हो तो 'शिशुनाग के बाद' दाईं ओर एक क़दम है और उत्तर नंद है, जबकि 'मौर्य' दो क़दम हैं और 'शुंग' चार। स्मृति से सबसे अधिक नंद वंश ही छूटता है, ठीक इसलिए कि उसने कोई अशोक नहीं दिया और कोई स्मारक नहीं छोड़ा — वह मुख्यतः पुराणों की शत्रुतापूर्ण टिप्पणियों, अपनी सेना के यूनानी विवरणों और मुद्राराक्षस में मिलने वाली उसके पतन की कथा से बचा है। यही अप्रसिद्धि उसे 'बीच में कौन-सा वंश आया' वाले प्रश्नों का प्रिय उत्तर बनाती है, और जो अभ्यर्थी केवल प्रसिद्ध वंश तैयार करेगा वह यह अंक बार-बार गँवाएगा। एक नाम पर नज़र रखिए : बृहद्रथ प्राचीन भारतीय इतिहास में दो बार आता है, एक बार मगध के सबसे पुराने वंश के संस्थापक के रूप में और एक बार उस अंतिम मौर्य सम्राट के रूप में जिसकी हत्या पुष्यमित्र ने 185 ईसा पूर्व में की। ये पाँच सदी के अंतर वाले भिन्न व्यक्ति हैं, और दोनों राज्य-स्तरीय प्रश्नपत्रों में विकल्प बनकर आते हैं।
- मगध का वंश-क्रम : बृहद्रथ → हर्यक (लगभग 544 ईसा पूर्व से) → शिशुनाग (लगभग 413 ईसा पूर्व से) → नंद (लगभग 345 ईसा पूर्व से) → मौर्य (लगभग 322 ईसा पूर्व से)।
- शिशुनागों की बड़ी उपलब्धि अवंति के प्रद्योत वंश का विनाश थी; कालाशोक के अधीन वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति हुई।
- नंद वंश के संस्थापक महापद्म नंद को पुराणों में एकराट् और सर्वक्षत्रांतक कहा गया है, और वे निम्न कुल के थे।
- नंद सेना — हज़ारों रथों और हाथियों के साथ दसियों हज़ार पैदल तथा घुड़सवार सैनिक — वही है जिसने 326 ईसा पूर्व में व्यास नदी पर सिकंदर के सैनिकों को लौटा दिया।
- अंतिम नंद, धनानंद, को लगभग 322 ईसा पूर्व में चाणक्य के साथ चंद्रगुप्त मौर्य ने हटाया; शुंग तो केवल 185 ईसा पूर्व में आए, जब पुष्यमित्र ने अंतिम मौर्य बृहद्रथ को मारा।

- नंदों को छोड़कर शिशुनाग से सीधे मौर्य पर कूद जाना — बीच में नंदों ने लगभग सवा दो दशक मगध सँभाला
- शुंगों को मौर्यों से पहले कहीं रख देना; पुष्यमित्र ने 185 ईसा पूर्व में अंतिम मौर्य सम्राट को मारकर उनकी नींव रखी
- दो बृहद्रथों को गड्डमड्ड करना — मगध के सबसे पुराने वंश का संस्थापक और अंतिम मौर्य शासक पाँच सदी के अंतर वाले भिन्न व्यक्ति हैं
BPSC प्राचीन बिहार को क्रम में स्थान के रूप में पूछता है — कौन-सा वंश किसके पहले या बाद आया — और साथ में 'उपरोक्त में एक से अधिक' जोड़ देता है, इसलिए प्रश्नपत्र लिखी हुई शृंखला को पुरस्कृत करता है और केवल प्रसिद्ध नामों की स्मृति को दंडित। UPSC उसी शृंखला को उसकी क्रियाविधि से पूछता है : किसने किसकी हत्या की, किस मंत्री ने कौन-सा सिंहासन हड़पा, सिकंदर के आक्रमण के समय कौन-सा वंश शासन कर रहा था। दोनों का उत्तर एक ही सूची से आता है, जिसे तिथियों और हर वंश के एक पहचान-प्रसंग के साथ सीखा गया हो।
सिकंदर के आक्रमण के समय उत्तर भारत पर निम्नलिखित में से कौन-सा वंश शासन कर रहा था ?
- (a) नंद
- (b) मौर्य
- (c) शुंग
- (d) कण्व
उत्तर(a) नंद
वही वंश शृंखला में उसके स्थान के बजाय किसी बाहरी तिथि से बाँधा गया — 326 ईसा पूर्व नंद शासन के भीतर पड़ता है, और यही वह पुष्टि है कि नंद सचमुच शिशुनागों और मौर्यों के बीच बैठते हैं।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : 1. अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या उनके प्रधान सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की। 2. अंतिम शुंग राजा देवभूति की हत्या उनके ब्राह्मण मंत्री वासुदेव कण्व ने की, जिन्होंने सिंहासन हड़प लिया। 3. कण्व वंश के अंतिम शासक को आंध्रों ने अपदस्थ किया। इनमें से कौन-सा/से कथन सही है/हैं ?
- (a) 1 और 2
- (b) केवल 2
- (c) केवल 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर(d) 1, 2 और 3
यह उसी शृंखला को मौर्यों के आगे तक ले जाता है और दिखाता है कि यहाँ शुंग उत्तर क्यों नहीं हो सकते — पुष्यमित्र ने 185 ईसा पूर्व में अंतिम मौर्य को मारकर उनकी नींव रखी, यानी शिशुनागों के पतन के दो सौ से अधिक वर्ष बाद।
प्राचीन भारत के निम्नलिखित वंशों पर विचार कीजिए : 1) शुंग 2) मौर्य 3) कुषाण 4) कण्व उनके शासन का सही कालानुक्रम निम्नलिखित में से कौन-सा है ?
- (a) 2-1-4-3
- (b) 1-2-3-4
- (c) 2-3-1-4
- (d) 2-1-3-4
उत्तर(a) 2-1-4-3
आयोग ने 2024 में उत्तराधिकार वाला प्रश्न पूछा और 2025 में पूरा कालानुक्रम — वही वंश-सूची, पहले एक-एक कड़ी करके जाँची गई और फिर पूरी एक साथ, और शृंखला लिखकर पूरी सीख लेने का इससे स्पष्ट तर्क और क्या होगा।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
पुराणों में महापद्म नंद का वर्णन किस रूप में मिलता है ?
- (a)देवानांप्रिय प्रियदर्शी
- (b)सर्वक्षत्रांतक, सभी क्षत्रियों का नाश करने वाला
- (c)अमित्रघात, शत्रुओं का संहारक
- (d)विक्रमादित्य
उत्तर(b) सर्वक्षत्रांतक, सभी क्षत्रियों का नाश करने वाला — उन्हें एकराट्, यानी अकेला संप्रभु, भी कहा गया है। देवानांप्रिय प्रियदर्शी अशोक के अभिलेखों में उनकी उपाधि है और अमित्रघात बिंदुसार के लिए प्रयुक्त होता है।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
326 ईसा पूर्व में सिकंदर के उत्तर-पश्चिमी भारत पर आक्रमण के समय मगध पर किस वंश का शासन था ?
- (a)शिशुनाग
- (b)नंद
- (c)मौर्य
- (d)शुंग
उत्तर(b) नंद — मगध धनानंद के पास था, और नंद सेना के बताए गए आकार ने ही सिकंदर के सैनिकों को व्यास नदी पर लौटा दिया; चंद्रगुप्त मौर्य ने उन्हें लगभग 322 ईसा पूर्व में ही हटाया।