सामाजिक विकास की तीन अवस्थाओं का सिद्धान्त मूलतः किसने प्रतिपादित किया था ?
- (a)कार्ल मार्क्स
- (b)टालकॉट पार्सन्स
- (c)हर्बर्ट स्पैन्सर
- (d)आगस्त कॉम्टे
सही उत्तर — (d) आगस्त कॉम्टे। फ्रांसीसी विचारक आगस्त कॉम्टे (1798–1857), जिन्हें व्यापक रूप से समाजशास्त्र और प्रत्यक्षवाद (positivism) का जनक माना जाता है, ने 'तीन अवस्थाओं का नियम' (loi des trois états) प्रतिपादित किया: उनके अनुसार मानव चिंतन — और उसके साथ समाज भी — अनिवार्यतः धार्मिक (या काल्पनिक) अवस्था, तात्त्विक (या अमूर्त) अवस्था, और अंततः प्रत्यक्ष (या वैज्ञानिक) अवस्था से गुज़रता है। प्रत्यक्ष अवस्था में, देवताओं अथवा अमूर्त तत्त्वों द्वारा व्याख्या का स्थान प्राकृतिक नियमों के अवलोकन और तर्क द्वारा व्याख्या ले लेती है, जो उनके 'प्रत्यक्ष दर्शन' का आधार है।
- (a)कार्ल मार्क्स — मार्क्स ने उत्पादन के तरीकों (आदिम साम्यवाद, दासता, सामंतवाद, पूँजीवाद, समाजवाद) पर आधारित ऐतिहासिक अवस्थाओं का एक भौतिकवादी सिद्धांत प्रस्तुत किया — यह कॉम्टे की धार्मिक–तात्त्विक–प्रत्यक्ष 'तीन अवस्थाओं' से भिन्न है।
- (b)टालकॉट पार्सन्स — 20वीं सदी के अमेरिकी समाजशास्त्री पार्सन्स संरचनात्मक प्रकार्यवाद, AGIL प्रतिरूप और प्रतिरूप-चर (pattern variables) से जुड़े हैं — तीन अवस्थाओं के नियम से नहीं।
- (c)हर्बर्ट स्पैन्सर — स्पेंसर ने वास्तव में एक विकासवादी समाजशास्त्र (सैनिक बनाम औद्योगिक समाज) तथा 'योग्यतम की उत्तरजीविता' का विचार विकसित किया, किन्तु बौद्धिक/सामाजिक विकास की तीन अवस्थाओं का विशिष्ट सिद्धांत कॉम्टे का है, स्पेंसर का नहीं।
आगस्त कॉम्टे ने 'सोशियोलॉजी' शब्द गढ़ा और प्रत्यक्षवाद की नींव रखी — यह मत कि वास्तविक ज्ञान अवलोकित, सत्यापन-योग्य तथ्यों तथा उन्हें जोड़ने वाले नियमों से आता है। उनका केन्द्रीय 'तीन अवस्थाओं का नियम' यह दावा करता है कि ज्ञान की प्रत्येक शाखा, तथा सम्पूर्ण मानव समाज, एक धार्मिक अवस्था (अतिप्राकृतिक शक्तियों द्वारा घटनाओं की व्याख्या), एक तात्त्विक अवस्था (अमूर्त शक्तियों या तत्त्वों द्वारा व्याख्या) तथा एक प्रत्यक्ष अवस्था (अवलोकन से व्युत्पन्न वैज्ञानिक नियमों द्वारा व्याख्या) से होकर विकसित होती है।
जाल यह है कि कई विचारकों ने समाज के 'अवस्था' सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। विशिष्ट लेबल पर टिकें: 'तीन अवस्थाएँ — धार्मिक, तात्त्विक, प्रत्यक्ष' = कॉम्टे। मार्क्स की अवस्थाएँ आर्थिक हैं (उत्पादन के तरीके); स्पेंसर की एक विकासवादी सैनिक-से-औद्योगिक योजना है; पार्सन्स प्रकार्यवादी हैं। केवल कॉम्टे का ही 'तीन अवस्थाओं का नियम' है।
- आगस्त कॉम्टे (1798–1857) — फ्रांसीसी दार्शनिक, समाजशास्त्र और प्रत्यक्षवाद के संस्थापक।
- तीन अवस्थाओं का नियम: धार्मिक → तात्त्विक → प्रत्यक्ष (वैज्ञानिक)।
- कॉम्टे ने 'सोशियोलॉजी' शब्द गढ़ा तथा 'प्रत्यक्ष' (वैज्ञानिक) पद्धति का समर्थन किया।
- तुलना: मार्क्स = उत्पादन के तरीकों के अनुसार अवस्थाएँ; स्पेंसर = सैनिक बनाम औद्योगिक समाज; पार्सन्स = संरचनात्मक प्रकार्यवाद।

- कॉम्टे की तीन अवस्थाओं को मार्क्स की आर्थिक अवस्थाओं से भ्रमित करना।
- 'तीन अवस्थाओं के नियम' का श्रेय स्पेंसर (विकासवादी समाजशास्त्र) को दे देना।
UPSC/UPPSC किसी सिद्धांत या शब्द-गढ़न को उसके विचारक के साथ जोड़ते हैं — 'किसने X प्रतिपादित किया / सोशियोलॉजी किसने गढ़ा / तीन अवस्थाओं का नियम किसका है' — जो एक-से-एक श्रेय की परीक्षा लेता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
आगस्त कॉम्टे के 'तीन अवस्थाओं के नियम' की तीन अवस्थाएँ हैं:
- (a)धार्मिक, तात्त्विक, प्रत्यक्ष
- (b)दासता, सामंतवाद, पूँजीवाद
- (c)बर्बरता, असभ्यता, सभ्यता
- (d)सैनिक, संक्रमणकालीन, औद्योगिक
उत्तर(a) धार्मिक, तात्त्विक, प्रत्यक्ष — प्रत्यक्ष (वैज्ञानिक) अवस्था पर पहुँचते हुए।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
'सोशियोलॉजी' शब्द गढ़ने का श्रेय किसे दिया जाता है?
- (a)एमिल दुर्खीम
- (b)हर्बर्ट स्पेंसर
- (c)आगस्त कॉम्टे
- (d)मैक्स वेबर
उत्तर(c) आगस्त कॉम्टे — जिन्होंने इसे गढ़ा (मूलतः 'सोशल फिज़िक्स') और प्रत्यक्षवाद की नींव रखी।