बीसवीं सदी के अस्सी के दशक के मध्य विकास के नकारात्मक पक्षों पर विस्तार से चर्चा की गयी । निम्नलिखित में से कौन-सा एक उनमें महत्वपूर्ण नहीं था ?
- (a)प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण
- (b)पर्यावरण प्रदूषण
- (c)राजनीति एवं विकास
- (d)जनसामान्य का विस्थापन एवं पुनर्वास
सही उत्तर — (c) राजनीति एवं विकास। 1980 के दशक के मध्य तक विकास के प्रभावी, वृद्धि-प्रथम मॉडल की आलोचना उसके पारिस्थितिक व मानवीय मूल्यों पर केन्द्रित थी — प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण, पर्यावरण प्रदूषण, और बड़ी परियोजनाओं द्वारा उजड़े लोगों का विस्थापन व पुनर्वास। 'राजनीति एवं विकास' यह अध्ययन का एक तटस्थ अकादमिक क्षेत्र है कि राजनीतिक व्यवस्थाएँ विकास को कैसे आकार देती हैं; यह स्वयं इन मान्यता-प्राप्त 'नकारात्मक पक्षों' में से एक नहीं है, अतः यही वह विषम विकल्प है जो प्रश्न में पूछा गया है।
- (a)प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण — गलत (अर्थात यह वस्तुतः एक नकारात्मक पक्ष है) — वनों, मृदा व जल के अति-दोहन 1980 के दशक की विकास-आलोचना का केन्द्रीय सरोकार था, अतः यह उस सूची में सम्मिलित है।
- (b)पर्यावरण प्रदूषण — गलत (यह वस्तुतः एक नकारात्मक पक्ष है) — औद्योगिक व नगरीय वायु/जल प्रदूषण उस काल का एक परिभाषित नकारात्मक परिणाम था (1984 की भोपाल आपदा ने इसे और रेखांकित किया)।
- (d)जनसामान्य का विस्थापन एवं पुनर्वास — गलत (यह वस्तुतः एक नकारात्मक पक्ष है) — बाँधों, खदानों व उद्योगों से विकास-प्रेरित विस्थापन, तथा विस्थापितों के पुनर्वास में विफलता उस युग की एक प्रमुख आलोचना थी।
1980 के दशक तक 'विकास' पर वैश्विक स्तर पर पुनर्विचार यह रेखांकित करने लगा कि तीव्र, संसाधन-गहन वृद्धि भारी लागतें वहन करती है: प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास व क्षरण, प्रदूषण, और समुदायों का उजड़ना। यह आलोचना सीधे 'धारणीय विकास' (sustainable development) के उस विचार में परिवर्तित हुई जिसे ब्रुण्टलैंड आयोग की 1987 की रिपोर्ट, अवर कॉमन फ्यूचर, ने लोकप्रिय बनाया।
यह एक 'विषम खोजिए' प्रकार का प्रश्न है: तीन विकल्प विकास के वास्तविक मूल्यों/परिणामों के नाम हैं, जबकि एक एक अकादमिक उप-क्षेत्र का नाम है। प्रत्येक को यह पूछकर परखें 'क्या यह विकास का एक नकारात्मक पक्ष है?' — संसाधन-क्षरण, प्रदूषण व विस्थापन स्पष्टतः हैं; 'राजनीति एवं विकास' का अध्ययन नहीं है, अतः यही अपवाद है।
- 1980 के दशक की विकास-आलोचना पर्यावरणीय व सामाजिक लागतों पर बल देती थी
- विकास-प्रेरित विस्थापन (बड़े बाँध, खदानें) व अपर्याप्त पुनर्वास एक प्रमुख शिकायत थी
- 1984 की भोपाल गैस त्रासदी ने औद्योगिक प्रदूषण की चिन्ता को तीक्ष्ण किया
- यह बहस 'धारणीय विकास' — ब्रुण्टलैंड रिपोर्ट, अवर कॉमन फ्यूचर (1987) — की ओर ले गई

- 'नहीं' शब्द को गलत पढ़कर किसी वास्तविक नकारात्मक पक्ष को चुन लेना
- यह मान लेना कि हर विकास-सम्बन्धी विषय (जैसे 'राजनीति एवं विकास') स्वतः ही विकास की एक 'लागत' है
UPPSC/UPSC विकास-आलोचनाओं पर 'कौन-सा नहीं है' ढाँचे का प्रयोग करते हैं — स्टेम को सावधानी से पढ़ें और प्रत्येक विकल्प को पूछे गए सटीक वर्ग के विरुद्ध परखें।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
1987 की रिपोर्ट 'अवर कॉमन फ्यूचर', जिसने धारणीय विकास की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया, किसके द्वारा तैयार की गई थी ?
- (a)क्लब ऑफ रोम
- (b)पर्यावरण व विकास पर विश्व आयोग (ब्रुण्टलैंड आयोग)
- (c)जलवायु परिवर्तन पर अन्तर-सरकारी पैनल
- (d)संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम
उत्तर(b) पर्यावरण व विकास पर विश्व आयोग (ब्रुण्टलैंड आयोग)।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
भारतीय सन्दर्भ में, 'विकास-प्रेरित विस्थापन' सर्वाधिक सीधे किससे जुड़ा है ?
- (a)बड़े बाँध व खनन परियोजनाएँ
- (b)प्राथमिक शिक्षा का प्रसार
- (c)हरित क्रान्ति में HYV बीजों का प्रयोग
- (d)केवल नगरीय मेट्रो-रेल नेटवर्क
उत्तर(a) बड़े बाँध व खनन परियोजनाएँ — सामूहिक विस्थापन व पुनर्वास बहसों का शास्त्रीय कारण।