'गरीबी की संस्कृति' का विचार प्रस्तुत किया गया
- (a)आस्कर लूईस द्वारा
- (b)गुन्नार मिरडल द्वारा
- (c)आशीष बोस द्वारा
- (d)अमर्त्य सेन द्वारा
सही उत्तर — (a) आस्कर लूईस द्वारा। अमेरिकी मानवविज्ञानी आस्कर लूईस ने 'गरीबी की संस्कृति' (culture of poverty) का विचार अपनी कृतियों जैसे फाइव फैमिलीज़ (1959) और ला विडा (1966) में गढ़ा। उन्होंने गरीब मैक्सिकन व प्युर्तो रिकन परिवारों में किए गए क्षेत्र-कार्य के आधार पर तर्क दिया कि अत्यन्त निर्धन लोग एक विशिष्ट उप-संस्कृति विकसित कर लेते हैं — जो नियतिवाद, वर्तमान-केन्द्रित दृष्टिकोण व हाशिए पर होने के बोध से चिह्नित होती है — जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होकर उनकी गरीबी को बनाए रखने में सहायक बनती है।
- (b)गुन्नार मिरडल द्वारा — गलत — यह स्वीडिश अर्थशास्त्री एशियन ड्रामा: एन इन्क्वायरी इन्टु द पॉवर्टी ऑफ नेशंस (1968), 'सॉफ्ट स्टेट' की अवधारणा तथा 'सर्कुलर क्युमुलेटिव कॉज़ेशन' के लिए जाने जाते हैं, न कि गरीबी की संस्कृति के लिए।
- (c)आशीष बोस द्वारा — गलत — भारतीय जनसांख्यिकीविद् आशीष बोस को जनसांख्यिकीय रूप से पिछड़े राज्यों (बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश) के लिए 'बीमारू' संक्षिप्त नाम गढ़ने हेतु याद किया जाता है, न कि गरीबी-संस्कृति के किसी सिद्धान्त के लिए।
- (d)अमर्त्य सेन द्वारा — गलत — सेन क्षमता उपागम (capability approach), अकालों के हक-सिद्धान्त (पॉवर्टी एंड फैमिन्स, 1981) व मानव-विकास चिन्तन से जुड़े हैं, न कि गरीबी-की-संस्कृति सिद्धान्त से।
'गरीबी की संस्कृति' एक मानवशास्त्रीय सिद्धान्त है जो मानता है कि लगातार बनी रहने वाली गरीबी अपने स्वयं के मूल्यों व व्यवहारों का सृजन करती है, जिन्हें एक बार आत्मसात कर लेने पर वे अगली पीढ़ी को हस्तांतरित होते हैं और बाहर निकलना और कठिन बना देते हैं। यह एक बहुचर्चित विचार है — आलोचकों का तर्क है कि यह संरचनात्मक अभाव के लिए 'गरीबों को दोष देने' का जोखिम रखता है — परन्तु स्वयं यह वाक्यांश दृढ़ता से आस्कर लूईस का है।
यहाँ जाल यह है कि मिरडल व सेन दोनों ही गरीबी के विशाल विद्वान हैं, अतः केवल संगति के आधार पर तर्क करने वाला छात्र इन्हें चुन सकता है। पहचान का बिन्दु सटीक वाक्यांश है: 'गरीबी की संस्कृति' एक मानवशास्त्रीय पद है (लूईस), जबकि मिरडल व सेन विकास अर्थशास्त्र में काफी भिन्न विशिष्ट अवधारणाओं के साथ कार्यरत थे।
- 'गरीबी की संस्कृति' मानवविज्ञानी आस्कर लूईस द्वारा गढ़ी गई (1959, फाइव फैमिलीज़)
- गुन्नार मिरडल — 'सॉफ्ट स्टेट', 'सर्कुलर क्युमुलेटिव कॉज़ेशन', एशियन ड्रामा (1968)
- आशीष बोस — 1980 के दशक में 'बीमारू' संक्षिप्त नाम गढ़ा
- अमर्त्य सेन — क्षमता उपागम व अकालों का हक-सिद्धान्त
सटीक वाक्यांश को उसके रचयिता से मिलाइए — केवल आस्कर लूईस 'गरीबी की संस्कृति' से जुड़े हैं।
- सटीक वाक्यांश के बजाय केवल 'गरीबी' से संगति के आधार पर सेन या मिरडल चुन लेना
- 'गरीबी की संस्कृति' (लूईस) को 'गरीबी के चक्र' या 'गरीबी जाल' से गड्डमड्ड करना
UPPSC/UPSC पूछते हैं 'किसने X अवधारणा प्रस्तुत/गढ़ी' — एक विचारक↔गढ़े गए शब्द फ्लैशकार्ड सेट बनाएँ ताकि सटीक रचयिता तत्काल याद आ सके।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
जनसांख्यिकीय रूप से पिछड़े चार भारतीय राज्यों को वर्णित करने वाला संक्षिप्त नाम 'बीमारू' किसने गढ़ा था ?
- (a)अमर्त्य सेन
- (b)आशीष बोस
- (c)आस्कर लूईस
- (d)गुन्नार मिरडल
उत्तर(b) आशीष बोस — जनसांख्यिकीविद् जिन्होंने 'बीमारू' (बिहार, म.प्र., राजस्थान, उ.प्र.) गढ़ा।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
'गरीबी की संस्कृति' सिद्धान्त मुख्यतः यह तर्क देता है कि
- (a)गरीबी केवल राष्ट्रीय आय की कमी से उत्पन्न होती है
- (b)गरीब लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली एक स्वयं-सतत उप-संस्कृति विकसित करते हैं
- (c)गरीबी को केवल कैलोरी सेवन से मापा जा सकता है
- (d)आर्थिक वृद्धि के साथ गरीबी स्वतः समाप्त हो जाती है
उत्तर(b) गरीब लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली एक स्वयं-सतत उप-संस्कृति विकसित करते हैं — लूईस का मूल दावा।