नीचे उच्चतम न्यायालय को मौलिक अधिकारों के हनन रोकने के लिए रिट जारी करने की शक्ति के संबंध में दो कथन दिए गए हैं ? (1) उच्चतम न्यायालय को यह शक्ति प्रदत्त है कि वह बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार - पृच्छा और उत्प्रेषण रिट, जो भी मूल अधिकारों को लागू करने के लिए समुचित हो, उस रिट का प्रयोग कर सकती है । (2) संसद को अधिकार है कि वह कानून बना कर किसी अन्य न्यायालय को अपनी आधिकारिक स्थानीय सीमाओं के भीतर उच्चतम न्यायालय की दी गई इन शक्तियों का प्रयोग कर सकता है । उपरोक्त कथनों से कौनसा/से उत्तर सही है/हैं ? नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर का चयन कीजिए - कूट -
- (a)केवल 2
- (b)केवल 1
- (c)न तो 1 ना ही 2
- (d)1 और 2 दोनों
सही उत्तर — (d) 1 और 2 दोनों। कथन 1 अनुच्छेद 32(2) को दोहराता है: उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए निर्देश, आदेश या रिट — बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा एवं उत्प्रेषण — जारी कर सकता है। कथन 2 अनुच्छेद 32(3) को दोहराता है: संसद, विधि द्वारा, किसी अन्य न्यायालय को उसकी स्थानीय अधिकारिता की सीमाओं के भीतर, अनुच्छेद 32(2) के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए सशक्त कर सकती है। दोनों ही सटीक संवैधानिक प्रावधान हैं, इसलिए (d) सही है।
- (a)केवल 2 — कथन 1 भी सही है — यह ठीक अनुच्छेद 32(2) है।
- (b)केवल 1 — कथन 2 भी सही है — अनुच्छेद 32(3) संसद को अन्य न्यायालयों को ये शक्तियाँ देने की अनुमति देता है।
- (c)न तो 1 ना ही 2 — दोनों कथन अनुच्छेद 32 के सही व्याख्यान हैं, इसलिए 'न तो' गलत है।
अनुच्छेद 32 — संवैधानिक उपचारों का अधिकार, जिसे डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान की 'आत्मा एवं हृदय' कहा था। अनुच्छेद 32(1) मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार देता है; 32(2) न्यायालय को पाँच रिट जारी करने की शक्ति देता है; 32(3) संसद को अन्य न्यायालयों को यह शक्ति देने की अनुमति देता है; 32(4) यह प्रावधान करता है कि इस अधिकार को संविधान द्वारा उपबंधित के अतिरिक्त निलंबित नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालयों के पास अनुच्छेद 226 के अंतर्गत और भी व्यापक रिट शक्ति है (मौलिक अधिकारों के लिए और 'किसी अन्य प्रयोजन' के लिए भी)।
दोनों कथन अनुच्छेद 32(2) एवं 32(3) के पाठ्यपुस्तक-सटीक व्याख्यान हैं, इसलिए उत्तर 'दोनों' है। एकमात्र जाल कथन 2 पर संदेह करना है — परन्तु संसद वास्तव में अनुच्छेद 32(3) के अंतर्गत अन्य न्यायालयों को सशक्त कर सकती है।
- अनुच्छेद 32(2): उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट — बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा, उत्प्रेषण — जारी कर सकता है।
- अनुच्छेद 32(3): संसद किसी अन्य न्यायालय को उसकी अधिकारिता के भीतर उच्चतम न्यायालय की रिट शक्तियों का प्रयोग करने हेतु सशक्त कर सकती है।
- अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) — अंबेडकर की 'आत्मा एवं हृदय'।
- उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत वही रिट जारी करते हैं, मौलिक अधिकारों के लिए तथा किसी भी अन्य विधिक अधिकार के लिए।
अनुच्छेद 32(2) उच्चतम न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु सभी पाँच रिट जारी करने देता है; 32(3) संसद को अन्य न्यायालयों को भी यह शक्ति देने देता है — इसलिए दोनों कथन सही हैं।
- यह सोचना कि केवल उच्चतम न्यायालय ही रिट जारी कर सकता है, उच्च न्यायालय नहीं।
- प्रतिषेध (पूर्व में जारी, रोकने हेतु) को उत्प्रेषण (बाद में जारी, रद्द करने हेतु) से भ्रमित करना।
अनुच्छेद 32 के प्रावधानों पर आधारित कथन-आधारित प्रश्न, और रिट-से-कार्य सुमेल (परमादेश, अधिकार-पृच्छा, उत्प्रेषण)।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा संविधान की 'आत्मा एवं हृदय' के रूप में वर्णित निम्नलिखित में से कौन सा अधिकार था ?
- (a) धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार
- (b) संपत्ति का अधिकार
- (c) समानता का अधिकार
- (d) संवैधानिक उपचारों का अधिकार
उत्तर(d) संवैधानिक उपचारों का अधिकार
वही अवधारणा — अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार), वही प्रावधान जो उच्चतम न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति देता है।
भारत में न्यायालयों द्वारा जारी की जाने वाली रिटों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. परमादेश किसी निजी संगठन के विरुद्ध तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि उसे कोई लोक कर्तव्य न सौंपा गया हो। 2. परमादेश किसी कंपनी के विरुद्ध भी लागू नहीं होगा, भले ही वह एक सरकारी कंपनी हो। 3. कोई भी लोकहितैषी व्यक्ति अधिकार-पृच्छा रिट प्राप्त करने के लिए न्यायालय जाने हेतु याचिकाकर्ता हो सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन से सही हैं ?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर(c) केवल 1 और 3
वही अवधारणा — रिट (परमादेश, अधिकार-पृच्छा) जो न्यायालय अधिकारों के प्रवर्तन एवं लोक प्राधिकरणों की जाँच हेतु जारी करते हैं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
किसी निचली अदालत या अधिकरण द्वारा पहले ही पारित किसी आदेश को रद्द करने हेतु जारी की जाने वाली रिट है:
- (a)प्रतिषेध
- (b)उत्प्रेषण
- (c)परमादेश
- (d)अधिकार-पृच्छा
उत्तर(b) उत्प्रेषण — आदेश के बाद जारी की जाती है, उसे रद्द करने हेतु।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
किस अनुच्छेद के अंतर्गत उच्च न्यायालय, मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के अतिरिक्त अन्य प्रयोजनों के लिए भी रिट जारी कर सकते हैं ?
- (a)अनुच्छेद 32
- (b)अनुच्छेद 226
- (c)अनुच्छेद 136
- (d)अनुच्छेद 143
उत्तर(b) अनुच्छेद 226।