कम्पनी अधिनियम, 2013 की किस अनुसूची के अंतर्गत वित्तीय विवरणों के प्रपत्र निर्धारित किए जाते हैं?
- (a)अनुसूची I
- (b)अनुसूची II
- (c)अनुसूची III
- (d)अनुसूची IV
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) अनुसूची III। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 129 कहती है कि कंपनी के वित्तीय विवरण सही और उचित चित्र प्रस्तुत करें, लेखा मानकों के अनुरूप हों, और उस प्रपत्र में हों जो अनुसूची III में दिया गया है। यही अनुसूची कंपनी के तुलनपत्र तथा लाभ और हानि विवरण का ढाँचा निर्धारित करती है और उसके साथ सामान्य अनुदेश भी देती है। ढाँचा खड़े रूप में है और उसमें शीर्षकों का क्रम तय है — तुलनपत्र के एक ओर इक्विटी और देयताएँ, जिनमें अंशधारी निधियाँ, दीर्घकालिक देयताएँ तथा चालू देयताएँ आती हैं, और दूसरी ओर परिसंपत्तियाँ, जिनमें ग़ैर-चालू और चालू परिसंपत्तियाँ आती हैं; लाभ और हानि विवरण भी खड़े रूप में ही बनता है, जिसमें पहले कुल आय, फिर व्यय, फिर कर से पहले का लाभ और अंत में कर के बाद का लाभ आता है। इसी अनुसूची में यह भी लिखा है कि पिछले वर्ष के तुलनात्मक आँकड़े देने होंगे, कि प्रत्येक मद के विवरण टिप्पणियों में दिए जाएँगे, और आँकड़ों को किस प्रकार पूर्णांकित किया जाएगा। एक ऐतिहासिक बात याद रखने योग्य है, क्योंकि वह इस प्रश्न की एक बड़ी उलझन दूर करती है: पुराने कंपनी अधिनियम, 1956 में यही प्रपत्र अनुसूची VI में थे और 2011 में संशोधित अनुसूची VI लागू हुई थी। 2013 के अधिनियम में वही सामग्री अनुसूची III में आ गई। इसलिए जिन्हें ‘अनुसूची VI’ स्मरण रहती है, वे पुराने अधिनियम की बात याद कर रहे होते हैं। प्रश्न 2013 के अधिनियम का नाम लेकर पूछ रहा है, अतः उत्तर अनुसूची III ही है। एक और उपयोगी बात: अनुसूची III केवल प्रपत्र ही नहीं देती, वह प्रस्तुतीकरण के कुछ बुनियादी नियम भी तय करती है — कि परिसंपत्तियों और देयताओं को चालू तथा ग़ैर-चालू में बाँटकर दिखाया जाएगा, कि प्रत्येक मद का विस्तृत विवरण अलग टिप्पणियों में जाएगा, और कि विवरणों के साथ पिछले वर्ष के तुलनात्मक आँकड़े अनिवार्य रूप से दिए जाएँगे। ये नियम ही किसी कंपनी के विवरण को दूसरी कंपनी के विवरण से तुलनीय बनाते हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)अनुसूची I — अनुसूची I में सारणी A से F तक के आदर्श प्रपत्र हैं, जो कंपनी के संगम-ज्ञापन और अंतर्नियमों से संबंधित हैं। इनमें सबसे अधिक प्रयोग में आने वाली सारणी F है, जो अंशों द्वारा सीमित कंपनी के आदर्श अंतर्नियम देती है; जो कंपनी अपने अलग अंतर्नियम नहीं बनाती, उस पर यही आदर्श अंतर्नियम लागू हो जाते हैं। स्पष्ट है कि यह अनुसूची कंपनी के गठन तथा आंतरिक शासन से जुड़ी है, उसके वार्षिक लेखों से नहीं। परीक्षा में अनुसूचियों की संख्या पूछने वाले प्रश्न प्रायः पहली अनुसूची को इसीलिए विकल्प में रखते हैं कि ‘पहली’ होने के कारण वह सबसे बुनियादी लगती है — पर संख्या का क्रम विषय की महत्ता से नहीं, अधिनियम की संरचना से तय होता है।
- (b)अनुसूची II — अनुसूची II अवमूल्यन से संबंधित है — वह परिसंपत्तियों के उपयोगी जीवन की सारणी देती है, जिसके आधार पर कंपनियाँ अवमूल्यन की गणना करती हैं। यही इस प्रश्न का सबसे निकट का प्रतिद्वंद्वी है, क्योंकि अवमूल्यन भी वित्तीय विवरणों में ही दिखता है और दोनों अनुसूचियाँ पास-पास हैं। भेद इस प्रकार रखिए: अनुसूची II बताती है कि कोई एक संख्या किस प्रकार निकाली जाएगी, जबकि अनुसूची III बताती है कि सब संख्याएँ किस प्रपत्र में और किस क्रम में प्रस्तुत होंगी। एक और अंतर ध्यान देने योग्य है — 1956 के अधिनियम में अवमूल्यन की दरें अनुसूची XIV में दी जाती थीं और वे दरें थीं; 2013 के अधिनियम ने दरों के स्थान पर उपयोगी जीवन का दृष्टिकोण अपनाया, जो लेखा मानकों के अधिक अनुरूप है।
- (d)अनुसूची IV — अनुसूची IV स्वतंत्र निदेशकों की आचार-संहिता है। उसमें स्वतंत्र निदेशक से अपेक्षित आचरण के मानक, उनकी भूमिका और कर्तव्य, उनकी नियुक्ति तथा पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया, इस्तीफ़े और हटाए जाने की व्यवस्था, तथा केवल स्वतंत्र निदेशकों की अलग बैठक जैसी बातें दी गई हैं। यह निगमित अभिशासन का विषय है, प्रस्तुतीकरण का नहीं। इसी क्रम में शेष अनुसूचियाँ भी जान लीजिए, क्योंकि वे विकल्पों में लौटती रहती हैं — अनुसूची V प्रबंध निदेशक तथा प्रबंधक की नियुक्ति और प्रबंधकीय पारिश्रमिक की शर्तें देती है, अनुसूची VI अवसंरचना परियोजनाओं तथा सुविधाओं की सूची देती है, और अनुसूची VII उन गतिविधियों की सूची देती है जिन्हें कंपनियाँ अपनी निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व नीति में सम्मिलित कर सकती हैं।
अवधारणा
किसी भी अधिनियम में अनुसूचियाँ वह सामग्री रखने के लिए होती हैं जो विस्तृत, सारणीबद्ध या तकनीकी हो और जिसे मुख्य धाराओं में डालने से पाठ बोझिल हो जाए — प्रपत्र, सूचियाँ, सारणियाँ, दरें और संहिताएँ। अनुसूची का दर्जा उस धारा जितना ही होता है जो उसे संदर्भित करती है, इसलिए उसका पालन अनिवार्य होता है। कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूचियाँ इस प्रकार बँटी हैं — अनुसूची I में संगम-ज्ञापन और अंतर्नियमों के आदर्श प्रपत्र, अनुसूची II में अवमूल्यन के लिए उपयोगी जीवन, अनुसूची III में वित्तीय विवरणों का प्रपत्र, अनुसूची IV में स्वतंत्र निदेशकों की आचार-संहिता, अनुसूची V में प्रबंधकीय नियुक्ति तथा पारिश्रमिक की शर्तें, अनुसूची VI में अवसंरचना परियोजनाओं की सूची, और अनुसूची VII में निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व की गतिविधियाँ। इस क्रम को एक बार देख लेने पर ऐसे प्रश्न बिना अनुमान के निकल जाते हैं, क्योंकि प्रश्न सदा किसी एक अनुसूची का विषय पूछता है और विकल्प उसके पड़ोसियों के होते हैं।
अनुसूची III स्वयं भी भागों में बँटी है, और यह विभाजन लेखा मानकों के दो परिवारों के कारण है। पहला भाग उन कंपनियों के लिए है जो पुराने लेखा मानकों के अनुसार अपने विवरण बनाती हैं। दूसरा भाग उन कंपनियों के लिए है जिन पर भारतीय लेखा मानक अर्थात् Ind AS लागू हो चुके हैं और जो ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ नहीं हैं। तीसरा भाग उन ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए है जिन पर Ind AS लागू हैं। तीनों भागों का उद्देश्य एक ही है — प्रस्तुतीकरण में एकरूपता, ताकि अलग-अलग कंपनियों के विवरण आपस में तुलनीय हों — पर उनकी शब्दावली और शीर्षक उस मानक-परिवार के अनुसार बदल जाते हैं जिसे वे मानते हैं। यही कारण है कि इस अनुसूची में समय-समय पर संशोधन होते रहे हैं, विशेषतः तब जब भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मानकों से अभिसरण करते हुए Ind AS लागू किए। इसी पेपर का प्रश्न 60 उन्हीं अंतर्राष्ट्रीय मानकों के संक्षेपाक्षर पर है, इसलिए दोनों प्रश्न एक ही शृंखला के दो सिरे हैं।
मुख्य तथ्य
- कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची III कंपनी के तुलनपत्र तथा लाभ और हानि विवरण का प्रपत्र निर्धारित करती है और उनके साथ सामान्य अनुदेश भी देती है।
- इसी अधिनियम की धारा 129 कहती है कि वित्तीय विवरण सही और उचित चित्र प्रस्तुत करें, लेखा मानकों के अनुरूप हों, और अनुसूची III में दिए गए प्रपत्र में हों।
- अनुसूची I में सारणी A से F तक के आदर्श प्रपत्र हैं, जो संगम-ज्ञापन और अंतर्नियमों से संबंधित हैं; इनमें सारणी F अंशों द्वारा सीमित कंपनी के आदर्श अंतर्नियम देती है।
- अनुसूची II अवमूल्यन की गणना के लिए परिसंपत्तियों का उपयोगी जीवन निर्धारित करती है, जबकि 1956 के अधिनियम में इसके स्थान पर अवमूल्यन की दरें दी जाती थीं।
- अनुसूची IV स्वतंत्र निदेशकों की आचार-संहिता है, और अनुसूची V प्रबंध निदेशक तथा प्रबंधक की नियुक्ति और प्रबंधकीय पारिश्रमिक की शर्तें देती है।
- अनुसूची VII उन गतिविधियों की सूची देती है जिन्हें कंपनियाँ अपनी निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व नीति में सम्मिलित कर सकती हैं।
- पुराने कंपनी अधिनियम, 1956 में वित्तीय विवरणों के प्रपत्र अनुसूची VI में थे और उनका संशोधित रूप 2011 में लागू हुआ था; 2013 के अधिनियम में वही सामग्री अनुसूची III में आ गई।
- अनुसूची III के अलग-अलग भाग हैं — एक पुराने लेखा मानकों वाली कंपनियों के लिए और अन्य भारतीय लेखा मानक अपनाने वाली कंपनियों के लिए।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पुराने अधिनियम की अनुसूची VI को 2013 के अधिनियम पर लगा देना; प्रश्न ने स्पष्ट रूप से 2013 के अधिनियम का नाम लिया है।
- अनुसूची II और अनुसूची III को आपस में बदल देना; पहली बताती है कि कोई संख्या कैसे निकलेगी और दूसरी बताती है कि सब संख्याएँ किस प्रपत्र में दिखेंगी।
- अनुसूची को केवल परिशिष्ट मान लेना; उसका दर्जा उसे संदर्भित करने वाली धारा जितना ही होता है और उसका पालन उतना ही अनिवार्य है।
- एक अधिनियम की अनुसूची-संख्या को दूसरे अधिनियम पर लागू कर देना; हर अधिनियम की अपनी अलग क्रम-संख्या होती है।
‘कौन-सी अनुसूची’ और ‘कौन-सी धारा’ वाले प्रश्न EPFO की भर्तियों में नियमित रूप से आते हैं, और उनका उत्तर अनुमान से नहीं निकलता — या तो संख्या याद है, या नहीं। इसलिए तैयारी का ढंग भी सीधा है: हर महत्त्वपूर्ण अधिनियम की अनुसूचियों की एक छोटी सूची बना लीजिए, जिसमें केवल संख्या और उसका विषय हो। कंपनी अधिनियम, 2013 के लिए सात अनुसूचियाँ याद रखना पर्याप्त है। एक सावधानी और बरतिए: एक अधिनियम की अनुसूची-संख्या दूसरे अधिनियम पर मत लगाइए। इसी परीक्षा-परिवार में फैक्टरी अधिनियम, 1948 की तीसरी अनुसूची पर प्रश्न आ चुका है, और वहाँ तीसरी अनुसूची का विषय बिल्कुल दूसरा है। इसी प्रकार संविधान की सातवीं अनुसूची और कंपनी अधिनियम की सातवीं अनुसूची में कोई संबंध नहीं है। संख्या के साथ अधिनियम का नाम भी स्मृति में बाँधिए, तभी वह काम आती है।
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