विद्युत्-शक्ति की लागत विभिन्न विभागों में किसके अनुसार प्रभाजित की जानी चाहिए?
- (a)मोटरों का हॉर्सपावर
- (b)प्रकाश बिन्दुओं की संख्या
- (c)हॉर्सपावर का यंत्र घंटों से गुणन
- (d)यंत्र घंटे
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) हॉर्सपावर का यंत्र घंटों से गुणन। प्रभाजन का सिद्धांत एक ही है — साझा उपरिव्यय को विभागों में उस आधार पर बाँटिए जो उस व्यय के होने के कारण से सबसे अधिक मेल खाता हो। इसलिए पहले पूछिए कि विद्युत् शक्ति की खपत किस चीज़ से बढ़ती-घटती है। उत्तर दो बातों से मिलकर बनता है: मशीन कितनी बड़ी है, और वह कितनी देर चली। बड़ी मशीन प्रति घंटा अधिक बिजली खींचती है, और कोई भी मशीन जितनी देर चलेगी उतनी अधिक बिजली खाएगी। मशीन के आकार या भार-क्षमता का माप हॉर्सपावर है और चलने की अवधि का माप यंत्र घंटे; इसलिए खपत का सबसे निकट का माप इन दोनों का गुणनफल है। यही विकल्प (c) कह रहा है, और इसी कारण लागत लेखांकन में इसे विद्युत् शक्ति के प्रभाजन का सबसे उपयुक्त आधार माना जाता है। एक बात और जोड़ लीजिए, क्योंकि वह इस पूरे विषय की तार्किक नींव है: यदि प्रत्येक विभाग में अलग मीटर लगा हो तो प्रभाजन की आवश्यकता ही नहीं रहती — तब वास्तविक इकाइयाँ पढ़कर व्यय सीधे उसी विभाग पर भारित कर दिया जाता है, और उस क्रिया को प्रभाजन नहीं, आबंटन कहते हैं। प्रभाजन का प्रश्न वहीं उठता है जहाँ मीटर अलग-अलग नहीं हैं और एक ही बिल को न्यायसंगत ढंग से बाँटना है; ऐसी स्थिति में हॉर्सपावर और यंत्र घंटों का गुणनफल वास्तविक खपत का सबसे अच्छा निकटतम माप देता है। इस विषय की एक और बात इसी प्रश्न से जुड़ती है, इसलिए उसे यहीं जोड़ लीजिए। प्रभाजन के बाद भी काम पूरा नहीं होता — सेवा विभागों, जैसे भंडार, मरम्मत और कैंटीन, पर आया व्यय आगे उत्पादन विभागों पर बाँटना पड़ता है, जिसे द्वितीयक वितरण कहते हैं; और उसके बाद उत्पादन विभाग का कुल उपरिव्यय किसी दर से इकाइयों पर डाला जाता है, जिसे अवशोषण कहते हैं। आबंटन, प्रभाजन और अवशोषण — ये तीन शब्द एक ही यात्रा के तीन पड़ाव हैं, और परीक्षा प्रायः यही जाँचती है कि अभ्यर्थी उन्हें अलग-अलग पहचानता है या नहीं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)मोटरों का हॉर्सपावर — यह आधा सही आधार है और इसीलिए सबसे आकर्षक ग़लत विकल्प है। हॉर्सपावर मशीन की भार-क्षमता बताता है, पर यह नहीं बताता कि वह मशीन महीने भर में कितने घंटे चली। मान लीजिए दो विभागों में एक ही हॉर्सपावर की मोटरें लगी हैं, पर एक विभाग की मोटर रोज़ आठ घंटे चलती है और दूसरे की केवल एक घंटा; केवल हॉर्सपावर के आधार पर बाँटने पर दोनों पर बराबर व्यय पड़ जाएगा, जो स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण है। यही कारण है कि पाठ्यपुस्तकें इसे तभी स्वीकार करती हैं जब यंत्र घंटों का आँकड़ा उपलब्ध न हो — अर्थात् वह विवशता का आधार है, उपयुक्त आधार नहीं। प्रश्न-वाक्य ‘किसके अनुसार प्रभाजित की जानी चाहिए’ पूछकर उपयुक्त आधार ही माँग रहा है।
- (b)प्रकाश बिन्दुओं की संख्या — यह आधार है, पर दूसरे उपरिव्यय का। प्रकाश बिन्दुओं की संख्या प्रकाश-व्यय के प्रभाजन का मानक आधार है, क्योंकि किसी विभाग में जितने बल्ब या ट्यूब लगे हों, प्रकाश पर उतना ही व्यय उस पर पड़ना चाहिए; कहीं-कहीं इसके स्थान पर फ़र्श क्षेत्रफल भी लिया जाता है। पर प्रश्न प्रकाश का नहीं, विद्युत् शक्ति का है — अर्थात् वह बिजली जो मशीनें चलाने में खर्च होती है। दोनों के परिमाण में भी बड़ा अंतर है: किसी कारखाने में मशीनों की बिजली प्रकाश की बिजली से कई गुना अधिक होती है, इसलिए दोनों को एक आधार पर बाँटना गंभीर विकृति पैदा करेगा। यह विकल्प यह जाँचता है कि अभ्यर्थी उपरिव्ययों और उनके आधारों की सूची को मद-दर-मद जानता है या केवल मोटे तौर पर।
- (d)यंत्र घंटे — यह दूसरा आधा सही आधार है और विकल्प (a) की ठीक उलटी भूल है। यंत्र घंटे बताते हैं कि मशीन कितनी देर चली, पर यह नहीं बताते कि वह कितनी बड़ी थी। एक विभाग में छोटी मशीनें हों और दूसरे में भारी, और दोनों समान घंटे चलें, तो केवल यंत्र घंटों के आधार पर बाँटने पर दोनों पर बराबर व्यय पड़ जाएगा, जबकि भारी मशीनों वाले विभाग ने कहीं अधिक बिजली खींची होगी। यंत्र घंटे स्वयं में एक बहुत उपयोगी आधार हैं — मशीन के अवमूल्यन, उसकी मरम्मत तथा मशीन-घंटा दर से उपरिव्यय के अवशोषण में उन्हीं का प्रयोग होता है — पर विद्युत् शक्ति के लिए उन्हें अकेले लेना अधूरा है। दोनों अधूरे आधारों का गुणनफल ही पूरा आधार बनाता है, और वही विकल्प (c) है।
अवधारणा
उपरिव्यय वे व्यय हैं जिन्हें किसी एक उत्पाद या इकाई से सीधे नहीं जोड़ा जा सकता — कारखाने का किराया, बिजली, पर्यवेक्षण, मरम्मत, बीमा। इन्हें लागत तक पहुँचाने की तीन क्रियाएँ हैं और तीनों के नाम अलग हैं। पहली, आबंटन — जब कोई पूरा व्यय किसी एक ही विभाग या लागत केंद्र से पहचाना जा सके, तब वह पूरा का पूरा उसी पर भारित कर दिया जाता है, जैसे किसी विभाग के अपने पर्यवेक्षक का वेतन या अलग मीटर वाली बिजली। दूसरी, प्रभाजन — जब व्यय कई विभागों में साझा हो, तब उसे किसी न्यायसंगत आधार पर बाँटा जाता है; यही इस प्रश्न का विषय है। तीसरी, अवशोषण — विभाग पर आए कुल उपरिव्यय को किसी दर के माध्यम से उत्पादित इकाइयों पर डालना, जिसके लिए मशीन-घंटा दर, श्रम-घंटा दर या प्रत्यक्ष श्रम-लागत का प्रतिशत जैसी दरें प्रयोग होती हैं। इनके अलावा सेवा विभागों — भंडार, मरम्मत, कैंटीन — का व्यय उत्पादन विभागों पर पुनः बाँटना पड़ता है, जिसे द्वितीयक वितरण कहते हैं, और उसके लिए प्रत्यक्ष, चरणबद्ध तथा पारस्परिक जैसी पद्धतियाँ हैं।
प्रभाजन के मानक आधारों की सूची इस अध्याय का सबसे अधिक पूछा जाने वाला भाग है और उसे मद-दर-मद याद रखना चाहिए, क्योंकि हर आधार अपने व्यय के कारण से निकला है। किराया, नगरपालिका कर, भवन की मरम्मत और भवन का अवमूल्यन — फ़र्श क्षेत्रफल के आधार पर, क्योंकि ये सब जगह घेरने से जुड़े हैं। प्रकाश-व्यय — प्रकाश बिन्दुओं की संख्या या फ़र्श क्षेत्रफल पर। संयंत्र का अवमूल्यन, बीमा तथा मरम्मत — संयंत्र के मूल्य पर, क्योंकि महँगी मशीन पर अधिक भार पड़ना चाहिए। कैंटीन, कल्याण, चिकित्सा, कर्मचारी भविष्य निधि तथा राज्य बीमा का अंशदान, तथा कार्मिक विभाग का व्यय — कर्मचारियों की संख्या या मजदूरी पर। भंडार-गृह का व्यय — निर्गमित सामग्री के मूल्य या माँग-पत्रों की संख्या पर। ढुलाई तथा वितरण व्यय — भार अथवा आयतन और दूरी पर। और विद्युत् शक्ति — जहाँ अलग मीटर हों वहाँ वास्तविक इकाइयों पर, अन्यथा हॉर्सपावर और यंत्र घंटों के गुणनफल पर। इस सूची का तर्क समझ लेने पर उसे रटने की आवश्यकता नहीं रहती।
मुख्य तथ्य
- विद्युत् शक्ति की लागत का उपयुक्त प्रभाजन-आधार है हॉर्सपावर का यंत्र घंटों से गुणन, क्योंकि खपत मशीन के आकार और चलने की अवधि दोनों पर निर्भर करती है।
- जहाँ प्रत्येक विभाग में अलग मीटर हो, वहाँ वास्तविक इकाइयों के आधार पर व्यय सीधे भारित किया जाता है और वह आबंटन कहलाता है, प्रभाजन नहीं।
- केवल हॉर्सपावर लेने पर मशीन के चलने की अवधि छूट जाती है, और केवल यंत्र घंटे लेने पर मशीन की भार-क्षमता; इसलिए दोनों अकेले अधूरे आधार हैं।
- प्रकाश बिन्दुओं की संख्या प्रकाश-व्यय के प्रभाजन का मानक आधार है, विद्युत् शक्ति का नहीं; कहीं-कहीं उसके स्थान पर फ़र्श क्षेत्रफल भी लिया जाता है।
- किराया, नगरपालिका कर, भवन की मरम्मत और भवन का अवमूल्यन फ़र्श क्षेत्रफल के आधार पर बाँटे जाते हैं, क्योंकि ये सब जगह घेरने से जुड़े व्यय हैं।
- संयंत्र का अवमूल्यन, उसका बीमा और उसकी मरम्मत संयंत्र के मूल्य के आधार पर बाँटे जाते हैं, ताकि महँगी मशीन वाले विभाग पर अधिक भार पड़े।
- कैंटीन, कल्याण, चिकित्सा तथा कार्मिक विभाग के व्यय, और भविष्य निधि व राज्य बीमा के अंशदान, कर्मचारियों की संख्या अथवा मजदूरी के आधार पर बाँटे जाते हैं।
- आबंटन, प्रभाजन और अवशोषण तीन अलग-अलग क्रियाएँ हैं — पहली पूरा व्यय एक ही केंद्र पर डालती है, दूसरी उसे कई केंद्रों में बाँटती है, और तीसरी उसे इकाइयों पर।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- केवल हॉर्सपावर या केवल यंत्र घंटे चुन लेना; दोनों अधूरे आधार हैं और दोनों का गुणनफल ही खपत का पूरा माप देता है।
- प्रकाश-व्यय के आधार को विद्युत् शक्ति पर लगा देना; ये दो अलग उपरिव्यय हैं और कारखाने में उनका परिमाण भी बहुत भिन्न होता है।
- अलग मीटर वाली स्थिति को भी प्रभाजन मान लेना; वहाँ वास्तविक खपत ज्ञात होती है, इसलिए वह आबंटन है और उसमें कोई आधार लगाने की आवश्यकता ही नहीं रहती।
- प्रभाजन और अवशोषण को एक मान लेना; पहला उपरिव्यय को विभागों में बाँटना है और दूसरा विभाग के उपरिव्यय को उत्पादित इकाइयों पर डालना।
लागत लेखांकन का यह भाग EPFO की लेखा-अधिकारी भर्ती में दो रूपों में आता है। पहला रूप यही है — किसी एक उपरिव्यय का नाम देकर उसका प्रभाजन-आधार पूछ लेना, और विकल्पों में उसी सूची के दूसरे आधार रख देना। दूसरा रूप छोटी गणना का है, जिसमें उपरिव्यय की दर निकलवायी जाती है, जैसे APFC 2016 के पेपर में कुल कारखाना उपरिव्यय दर पूछी गई थी। पहले रूप के लिए सबसे अच्छी तैयारी दो-स्तंभ वाली एक सूची है — बाईं ओर व्यय और दाईं ओर उसका आधार — पर उसे रटने से पहले हर पंक्ति का कारण लिख लीजिए, क्योंकि परीक्षा प्रायः सूची में न आने वाला कोई नया व्यय भी पूछ लेती है और तब कारण ही काम आता है। साथ ही प्रश्न-वाक्य के क्रिया-रूप पर ध्यान दीजिए: ‘प्रभाजित की जानी चाहिए’ का अर्थ उपयुक्त आधार है, केवल संभव आधार नहीं — और यहीं आधे-अधूरे आधार वाले विकल्प कटते हैं।
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- (c)अवशोषण
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उत्तर(b) आबंटन