साझेदारी करार में कोई प्रावधान न होने की स्थिति में साझेदारों द्वारा लाभ और हानियाँ बाँटी जाती हैं
- (a)साझेदारों की पूँजी के अनुपात में
- (b)बराबर-बराबर
- (c)उनके द्वारा साझीदारी फ़र्म को दिए गए ऋण के अनुपात में
- (d)साझेदारों द्वारा लगायी गयी प्रारंभिक पूँजी के अनुपात में
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) बराबर-बराबर। साझेदारी की पहली और सबसे बड़ी बात यह है कि उसे चलाने वाला दस्तावेज़ साझेदारों का अपना करार होता है; जो कुछ करार में लिखा है वही लागू होगा। भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 13 उसी के आगे की स्थिति के लिए है — वह कहती है कि साझेदारों के बीच किसी विपरीत संविदा के अधीन रहते हुए कुछ बातें इस प्रकार मानी जाएँगी, अर्थात् वे तभी लागू होती हैं जब करार मौन हो। उसी धारा का खंड (b) कहता है कि साझेदार अर्जित लाभों में बराबर-बराबर भागी होंगे और फ़र्म को हुई हानियों में भी बराबर-बराबर अंशदान करेंगे। ध्यान दीजिए कि यह नियम पूँजी की मात्रा, काम में लगाए गए समय, अनुभव या लाए गए ग्राहक — किसी भी बात को नहीं देखता। इसका कारण भी समझने योग्य है: विधि यह अनुमान नहीं लगा सकती कि साझेदारों ने आपस में क्या तौल-मोल किया होगा, और कोई भी असमान अनुपात मानने के लिए उसके पास कोई आधार नहीं है; इसलिए वह सबसे तटस्थ नियम अपनाती है, जो समानता का है। इसी धारा के दूसरे खंड इसी तर्क पर चलते हैं — करार न होने पर साझेदार को कारोबार चलाने के लिए कोई पारिश्रमिक नहीं मिलेगा, पूँजी पर ब्याज नहीं मिलेगा, पर फ़र्म को दिए गए ऋण अथवा अग्रिम पर छह प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज मिलेगा। यह अंतिम बात इस प्रश्न के विकल्प (c) को समझने की कुंजी है। इसलिए उत्तर विकल्प (b) है। इस नियम की एक और परत ध्यान देने योग्य है। धारा 13 का यह खंड लाभ और हानि दोनों के लिए एक ही व्यवस्था करता है — अर्थात् जो साझेदार लाभ में बराबर के भागी हैं, वे हानि में भी बराबर के अंशदाता होंगे, चाहे उनकी पूँजी कितनी भी असमान क्यों न हो। यही समरूपता इस नियम को याद रखने में सहायक है, और यही उसे उन विशेष स्थितियों से भी अलग करती है जहाँ पूँजी के अनुपात का प्रयोग होता है, जैसे विघटन के समय किसी दिवालिया साझेदार की कमी का वहन।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)साझेदारों की पूँजी के अनुपात में — यह सबसे स्वाभाविक लगने वाली और इसीलिए सबसे भ्रामक धारणा है, क्योंकि कंपनी में लाभांश वास्तव में अंशधारिता के अनुपात में ही बँटता है और वही समझ साझेदारी पर लगा दी जाती है। पर साझेदारी कंपनी नहीं है; उसमें पूँजी के साथ-साथ श्रम, कौशल, संपर्क और उत्तरदायित्व भी लगते हैं, और विधि इन सबका तौल नहीं कर सकती, इसलिए वह समानता पर टिक जाती है। दूसरी ओर, यदि साझेदार चाहें तो करार में पूँजी के अनुपात में बँटवारा लिख सकते हैं और तब वही लागू होगा — पर प्रश्न ठीक उसी स्थिति की बात कर रहा है जहाँ करार में कोई प्रावधान है ही नहीं। यह भी जान लीजिए कि पूँजी का अनुपात साझेदारी में एक विशेष स्थान पर सचमुच काम आता है: गार्नर बनाम मरे के नियम के अंतर्गत, विघटन के समय दिवालिया साझेदार की कमी सामान्यतः शेष सधन साझेदार अपनी पूँजी के अनुपात में वहन करते हैं। पर वह हानि-वहन की विशेष स्थिति है, सामान्य लाभ-बँटवारे का नियम नहीं।
- (c)उनके द्वारा साझीदारी फ़र्म को दिए गए ऋण के अनुपात में — यह विकल्प दो अलग-अलग चीज़ों को मिला देता है — साझेदार की पूँजी और साझेदार का ऋण। जब कोई साझेदार अपनी सहमत पूँजी से अधिक धन फ़र्म को देता है, तो वह धन ऋण या अग्रिम कहलाता है और उस पर उसका दावा एक ऋणदाता जैसा होता है, स्वामी जैसा नहीं। अधिनियम की धारा 13 का खंड (d) इसी स्थिति के लिए है और वह कहती है कि करार के अभाव में ऐसे ऋण अथवा अग्रिम पर छह प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज मिलेगा। अर्थात् ऋण का प्रतिफल ब्याज है, लाभ का हिस्सा नहीं — और यह ब्याज व्यय की तरह लगता है, इसलिए हानि की स्थिति में भी देय होता है, जबकि पूँजी पर ब्याज करार होने पर भी केवल लाभ में से ही दिया जाता है। इन दोनों को अलग रखना इस अध्याय का सबसे उपयोगी भेद है।
- (d)साझेदारों द्वारा लगायी गयी प्रारंभिक पूँजी के अनुपात में — यह विकल्प (a) का ही संकुचित रूप है और उसी भूल पर टिका है, केवल उसमें एक और परत जोड़ दी गई है — पूँजी को उसके प्रारंभिक स्तर पर स्थिर मान लेना। यह परत स्वयं भी समस्या पैदा करती है, क्योंकि साझेदारों की पूँजी वर्ष भर में बदलती रहती है; कोई और धन लाता है, कोई आहरण करता है, और लाभ जुड़ने पर परिवर्तनशील पूँजी वाले खाते में शेष भी बदलता है। इसीलिए जहाँ पूँजी के अनुपात का प्रश्न सचमुच उठता है, वहाँ भी यह तय करना पड़ता है कि कौन-सी पूँजी ली जाए — प्रारंभिक, अंतिम, या समय-भारित औसत। पर इस प्रश्न में यह पूरी चर्चा अप्रासंगिक है, क्योंकि करार के मौन रहने पर विधि पूँजी को देखती ही नहीं और सीधे समानता का नियम लगा देती है।
अवधारणा
भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 4 साझेदारी को उन व्यक्तियों के बीच का संबंध बताती है जो किसी ऐसे व्यवसाय के लाभों को बाँटने पर सहमत हुए हों जिसे वे सब मिलकर या उनमें से कोई सबकी ओर से चला रहा हो। इसी परिभाषा से तीन तत्त्व निकलते हैं — व्यवसाय का होना, लाभ बाँटने का करार, और पारस्परिक अभिकरण, अर्थात् प्रत्येक साझेदार दूसरों का अभिकर्ता भी है और स्वामी भी। यह अंतिम तत्त्व सबसे निर्णायक माना जाता है, क्योंकि केवल लाभ बाँटना ही साझेदारी सिद्ध नहीं करता। यह अधिनियम 1 अक्टूबर 1932 से प्रवृत्त हुआ, केवल धारा 69 को छोड़कर, जो एक वर्ष बाद प्रवृत्त हुई; वही धारा अपंजीकृत फ़र्म के वाद लाने पर निर्योग्यता लगाती है और इसी कारण पंजीकरण व्यवहार में महत्त्वपूर्ण हो जाता है, यद्यपि अधिनियम उसे अनिवार्य नहीं बनाता। धारा 13 उन सभी बातों की सूची है जो करार के मौन रहने पर लागू होंगी, और परीक्षा में यही धारा सबसे अधिक पूछी जाती है। इसी कारण साझेदारी के प्रश्न प्रायः पहले करार को देखते हैं और उसके मौन रहने पर ही धारा 13 पर जाते हैं।
धारा 13 के सभी चूक-नियम एक साथ याद रखने चाहिए, क्योंकि प्रश्न उनमें से किसी एक को उठाकर बना दिया जाता है। पहला, कारोबार चलाने में भाग लेने के लिए साझेदार को कोई पारिश्रमिक नहीं मिलेगा। दूसरा, साझेदार लाभों में बराबर-बराबर भागी होंगे और हानियों में भी बराबर-बराबर अंशदान करेंगे। तीसरा, यदि करार से पूँजी पर ब्याज देय हो तो वह केवल लाभ में से ही दिया जाएगा — अर्थात् हानि की स्थिति में नहीं। चौथा, सहमत पूँजी से अधिक दिए गए धन पर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिलेगा। पाँचवाँ, फ़र्म साझेदार को उन भुगतानों और दायित्वों के लिए क्षतिपूर्ति देगी जो उसने कारोबार के सामान्य और उचित संचालन में या आपात स्थिति में फ़र्म को हानि से बचाने के लिए किए हों। छठा, साझेदार फ़र्म को उस हानि की क्षतिपूर्ति करेगा जो उसकी जानबूझकर की गई उपेक्षा से हुई हो। ध्यान दीजिए कि इन नियमों की संरचना एक जैसी है — प्रत्येक ‘करार के अधीन रहते हुए’ लागू होता है, इसलिए इनमें से कोई भी नियम करार को नहीं काट सकता।
मुख्य तथ्य
- भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 13 उन चूक-नियमों की सूची देती है जो तभी लागू होते हैं जब साझेदारों के करार में उस विषय पर कोई प्रावधान न हो।
- धारा 13 के अनुसार, करार के अभाव में साझेदार लाभों में बराबर-बराबर भागी होंगे और हानियों में भी बराबर-बराबर अंशदान करेंगे।
- यह नियम पूँजी की मात्रा, कारोबार में लगाए गए समय, अनुभव अथवा लाए गए ग्राहकों — किसी को नहीं देखता, क्योंकि विधि इनका तौल नहीं कर सकती।
- करार के अभाव में साझेदार को कारोबार के संचालन में भाग लेने के लिए कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता, चाहे वह पूरा काम अकेले ही क्यों न कर रहा हो।
- जब कोई साझेदार अपनी सहमत पूँजी से अधिक धन फ़र्म को देता है, तो वह ऋण अथवा अग्रिम कहलाता है और उस पर छह प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज देय होता है।
- पूँजी पर ब्याज, यदि करार से देय हो, तो केवल लाभ में से ही दिया जाता है — अर्थात् हानि की स्थिति में वह नहीं मिलेगा; ऋण पर ब्याज इससे भिन्न है।
- धारा 4 साझेदारी को परिभाषित करती है और उसके तीन तत्त्व हैं — व्यवसाय, लाभ बाँटने का करार, और पारस्परिक अभिकरण।
- यह अधिनियम 1 अक्टूबर 1932 से प्रवृत्त हुआ, केवल धारा 69 को छोड़कर जो एक वर्ष बाद प्रवृत्त हुई; वही धारा अपंजीकृत फ़र्म के वाद लाने पर निर्योग्यता लगाती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- कंपनी की तरह पूँजी के अनुपात में बँटवारा मान लेना; साझेदारी में करार के अभाव में बँटवारा बराबर-बराबर होता है।
- साझेदार की पूँजी और साझेदार के ऋण को एक मान लेना; ऋण का प्रतिफल ब्याज है, लाभ का हिस्सा नहीं, और वह हानि की स्थिति में भी देय रहता है।
- पूँजी पर ब्याज को स्वतः देय मान लेना; वह करार होने पर भी केवल लाभ में से दिया जाता है, और करार न होने पर बिल्कुल नहीं मिलता।
- यह भूल जाना कि धारा 13 के सभी नियम करार के अधीन हैं; करार में लिखी बात सदा इन चूक-नियमों के ऊपर रहती है।
साझेदारी इस भर्ती में दो कोणों से आती है — विधिक और लेखांकनीय — और दोनों प्रायः एक ही प्रश्न में मिल जाते हैं, जैसे यहाँ। विधिक कोण से प्रश्न धारा का नियम पूछते हैं, और लेखांकनीय कोण से वे उसी नियम का अंकों में प्रयोग करवाते हैं, जैसे लाभ-हानि समायोजन खाता बनवाकर। दोनों के लिए धारा 13 की सूची ही आधार है, इसलिए उसे क्रम से याद कर लेना सबसे अधिक प्रतिफल देता है। एक और आदत उपयोगी है: प्रश्न-वाक्य में ‘करार के अभाव में’, ‘जहाँ कोई प्रावधान न हो’ या ‘संविदा के अधीन रहते हुए’ जैसे वाक्यांश दिखते ही समझ लीजिए कि प्रश्न चूक-नियम पूछ रहा है, न कि वह व्यवस्था जो साझेदार आपस में तय कर सकते हैं। इन शब्दों के बिना वही प्रश्न बिल्कुल दूसरा उत्तर माँग सकता है, इसलिए इन्हें पढ़ते ही रेखांकित कर देना चाहिए।
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अभ्यास
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भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के अनुसार, करार के अभाव में किसी साझेदार द्वारा फ़र्म को दिए गए ऋण अथवा अग्रिम पर ब्याज की दर क्या होगी?
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- (b)छह प्रतिशत वार्षिक
- (c)नौ प्रतिशत वार्षिक
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उत्तर(b) छह प्रतिशत वार्षिक
- practice — not a real PYQ
साझेदारी करार में कोई प्रावधान न होने पर, व्यवसाय के संचालन में भाग लेने वाले साझेदार को पारिश्रमिक के संबंध में क्या व्यवस्था लागू होगी?
- (a)उसे उचित पारिश्रमिक मिलेगा
- (b)उसे कोई पारिश्रमिक नहीं मिलेगा
- (c)उसे लाभ का दस प्रतिशत पारिश्रमिक के रूप में मिलेगा
- (d)उसे केवल हानि की स्थिति में पारिश्रमिक मिलेगा
उत्तर(b) उसे कोई पारिश्रमिक नहीं मिलेगा