राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रथम चरण में कांग्रेस की निम्न में से कौन-सी माँग नहीं थी ?
- (a)लेजिस्लेटिव कौंसिलों के सदस्यों की संख्या में वृद्धि
- (b)कौंसिलों में जनप्रतिनिधियों की संख्या में वृद्धि
- (c)कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का पृथक्करण
- (d)कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का एकीकरण
सही उत्तर — (d) कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का एकीकरण। अपने प्रारंभिक/नरम चरण (1885 से लगभग 1905 तक) में, कांग्रेस ने संवैधानिक, क्रमिकतावादी सुधारों की माँग की: विधान परिषदों का विस्तार, परिषदों में निर्वाचित/जनप्रतिनिधियों की अधिक हिस्सेदारी, तथा — सबसे महत्वपूर्ण — कार्यपालिका को न्यायपालिका से अलग करना, ताकि एक ही अधिकारी प्रशासक तथा न्यायाधीश दोनों के रूप में कार्य न करे। दोनों का 'एकीकरण' वास्तव में उस बात के विपरीत है जो नरम दल ने वास्तव में माँगी थी।
- (a)लेजिस्लेटिव कौंसिलों के सदस्यों की संख्या में वृद्धि — यह प्रारंभिक कांग्रेस की एक वास्तविक माँग थी — परिषदों का विस्तार नरम दल के संवैधानिक आंदोलन का केंद्रीय भाग था।
- (b)कौंसिलों में जनप्रतिनिधियों की संख्या में वृद्धि — यह एक वास्तविक प्रारंभिक माँग थी — केवल कुल सीटों की नहीं, बल्कि उन परिषदों में अधिक निर्वाचित/गैर-सरकारी भारतीय सदस्यों की।
- (c)कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का पृथक्करण — यह एक वास्तविक प्रारंभिक माँग थी — नरम दल निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने हेतु कार्यपालिक अधिकारियों से न्यायिक कार्यों को अलग करना चाहते थे; यह अंततः दशकों बाद लागू हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक/नरम चरण (1885–1905) ने सीमित सुधारों हेतु संवैधानिक तरीके — याचिकाएँ, प्रस्ताव, प्रतिनिधिमंडल — अपनाए, न कि स्वराज्य की माँग। इसकी मूल माँगों में शामिल थीं: विधान परिषदों का विस्तार व सुधार, परिषदों में निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाना, सैन्य व्यय घटाना, सिविल सेवाओं का भारतीयकरण, तथा न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियंत्रण से अलग करना। इसने कार्यपालिका व न्यायिक कार्यों को मिलाने (एकीकृत करने) की माँग कभी नहीं की — यह पूरी सुधार-माँग के तर्क के ही विपरीत होता।
यह एक 'उलटा विकल्प पहचानिए' प्रकार का प्रश्न है — तीन विकल्प वास्तविक नरम-दल-युगीन माँगें हैं, तथा चौथा केवल किसी एक को उलट देता है (पृथक्करण, एकीकरण बन जाता है)। किसी अस्पष्ट चौथी माँग को याद करने के बजाय इस तार्किक उलटफेर को पहचानना ही यहाँ तक पहुँचने का तेज़ रास्ता है।
- नरम-चरण (1885–1905) की INC माँगें: विधान परिषदों का विस्तार, अधिक निर्वाचित/जनप्रतिनिधि, कार्यपालिका को न्यायपालिका से अलग करना, सिविल सेवाओं का भारतीयकरण
- कार्यपालिका व न्यायपालिका का पृथक्करण — न कि एकीकरण — एक मूल नरम दल माँग थी
- नरम दल संवैधानिक साधनों से कार्य करते थे; इस चरण में उन्होंने स्वराज्य या पूर्ण स्वराज की माँग नहीं की
- न्यायपालिका का कार्यपालिका से पूर्ण पृथक्करण औपचारिक रूप से बहुत बाद में, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत लागू हुआ
नरम-चरण की कांग्रेस कार्यपालिका व न्यायपालिका को अलग रखना चाहती थी, न कि मिलाना।
- किसी अस्पष्ट 'वास्तविक' चौथी माँग को याद करने के प्रलोभन में पड़ना, बजाय यह पहचानने के कि एक विकल्प केवल दूसरे को उलट देता है
- यह मान लेना कि नरम दल ने इस प्रारंभिक चरण में ही स्वराज्य माँगा था — उन्होंने ऐसा नहीं किया
MPPSC/UPSC प्रायः इसे 'कौन-सी माँग नहीं थी' प्रकार के नकारात्मक प्रश्न के रूप में तैयार करते हैं, जिसमें एक विकल्प दूसरे का सीधा उलटफेर होता है — उत्तर देने से पहले चारों विकल्पों को एक समूह के रूप में पढ़ें।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम चरण (1885–1905) के दौरान निम्नलिखित में से कौन-सी एक वास्तविक माँग थी ?
- (a)पूर्ण स्वराज
- (b)विधान परिषदों का विस्तार
- (c)ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार
- (d)सशस्त्र क्रांति
उत्तर(b) विधान परिषदों का विस्तार — शेष विकल्प आंदोलन के बाद के गरम दल/गांधीवादी चरणों से संबंधित हैं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
नरम-चरण की 'सेवाओं के भारतीयकरण' माँग मुख्यतः किसे लक्षित करती थी ?
- (a)न्यायपालिका
- (b)उच्च सिविल सेवाएँ (ICS)
- (c)पुलिस
- (d)सेना
उत्तर(b) उच्च सिविल सेवाएँ (ICS) — नरम दल ने ICS में अधिक भारतीय प्रवेश हेतु ज़ोर दिया, जिसमें भारत में एक साथ परीक्षाएँ आयोजित करना भी शामिल था।