'तुर्रा कलंगी' लोकनाट्य किस क्षेत्र में प्रसिद्ध है ?
- (a)मालवा
- (b)निमाड़
- (c)बुन्देलखण्ड
- (d)बघेलखण्ड
ग्रेस उत्तर — (a), (b) व (c) तीनों स्वीकृत: मालवा, निमाड़ व बुन्देलखण्ड। तुर्रा-कलंगी एक लोकनाट्य 'दंगल' (काव्य-द्वंद्व) परंपरा है, जो दो प्रतिद्वंद्वी मंडलियों — तुर्रा और कलंगी पंथों — द्वारा प्रस्तुत की जाती है, जो तात्कालिक (extempore) पद्य रचकर भक्ति, बुद्धि-चातुर्य व व्यंग्य का मिश्रण प्रस्तुत करते हैं। यह सर्वाधिक निमाड़ व मालवा क्षेत्रों में दस्तावेज़ीकृत है, साथ ही बुन्देलखण्ड में भी इसकी प्रस्तुति परंपरा पाई जाती है; चूँकि संदर्भ स्रोत इसके लिए ठीक-ठीक किन क्षेत्रों को श्रेय दिया जाए, इस पर भिन्न मत रखते हैं, इसलिए आयोग ने तीनों को स्वीकार किया।
- (d)बघेलखण्ड — गलत — बघेलखण्ड, मध्य प्रदेश की पूर्वी रीवा-सतना पट्टी, तुर्रा-कलंगी परंपरा के लिए श्रेय प्राप्त क्षेत्रों में शामिल नहीं है।
तुर्रा-कलंगी मध्य प्रदेश की सदियों पुरानी लोक-रंगमंच 'दंगल' (काव्य-द्वंद्व) परंपरा है, जिसे दो प्रतिस्पर्धी मंडलियों/पंथों — तुर्रा और कलंगी — द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, जो रातभर तात्कालिक पद्य रचकर एक-दूसरे का सामना करते हैं। इसकी गहरी जड़ें निमाड़ व मालवा क्षेत्रों में हैं, यद्यपि इसकी प्रस्तुति परंपरा राज्य के अन्य भागों तक भी फैली हुई है।
यह प्रश्न MPPSC की क्षेत्रीय-संस्कृति संबंधी अनिश्चितता का एक अच्छा उदाहरण है: विभिन्न संदर्भ स्रोत तुर्रा-कलंगी को अलग-अलग क्षेत्रों का श्रेय देते हैं, इसलिए आयोग ने एक ही 'सही' क्षेत्र के बजाय कई विकल्पों को ग्रेस दिया — यह एक अनुस्मारक है कि एक 'केवल' उत्तर रटने के बजाय मूल क्षेत्र (निमाड़/मालवा) को दृढ़ता से सीखें।
- तुर्रा-कलंगी: दो मंडलियों, तुर्रा व कलंगी पंथों, के बीच एक लोकनाट्य 'दंगल' (काव्य-द्वंद्व)
- सर्वाधिक निमाड़ व मालवा क्षेत्रों से संबद्ध
- स्वरूप: दोनों पंथों के बीच तात्कालिक पद्य-प्रतियोगिताएँ, अक्सर रातभर चलने वाली
- MPPSC की आधिकारिक उत्तर-कुंजी ने मालवा, निमाड़ और बुन्देलखण्ड — तीनों को सही (ग्रेस) माना — केवल बघेलखण्ड को बाहर रखा गया
- जब परीक्षा की अपनी उत्तर-कुंजी ने तीन क्षेत्रों को स्वीकार किया हो, तब केवल एक क्षेत्र चुन लेना — एक ही 'सही' क्षेत्र के बजाय व्यापकता सीखें
- तुर्रा-कलंगी (निमाड़/मालवा दंगल) को माच (मध्य प्रदेश का एक अन्य लोक-रंगमंच रूप) से गड्डमड्ड करना
MPPSC मुख्य परीक्षा ने अलग से 'लोकनाट्य तुर्रा कलंगी का वर्णन कीजिए' (2023) पूछा है — केवल क्षेत्र नहीं, स्वरूप (दंगल/पद्य-द्वंद्व) और पंथों (तुर्रा, कलंगी) को भी जानें।
लोकनाट्य तुर्रा कलंगी का वर्णन कीजिए।
उत्तरवर्णनात्मक (5 अंक) — अपेक्षित कवरेज: तुर्रा और कलंगी पंथों का तात्कालिक पद्य-द्वंद्व (दंगल) स्वरूप और इसकी निमाड़/मालवा जड़ें।
वही लोकनाट्य, तुर्रा-कलंगी, MPPSC मुख्य परीक्षा 2023 में सीधे वर्णनात्मक प्रश्न के रूप में पूछा गया — यह प्रारंभिक परीक्षा MCQ उसी विषय को क्षेत्र-पहचान के कोण से परखता है।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
लोक-रंगमंच परंपरा 'तुर्रा-कलंगी' किन दो समूहों के बीच काव्य-प्रतियोगिता का रूप लेती है?
- (a)तुर्रा और कलंगी पंथ
- (b)निमाड़ और मालवा मंडलियाँ
- (c)गोंड और भील समुदाय
- (d)राम और कृष्ण लीला मंडलियाँ
उत्तर(a) तुर्रा और कलंगी पंथ — प्रतिद्वंद्वी मंडलियाँ जो तात्कालिक पद्य रचकर एक-दूसरे का सामना करती हैं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
निम्नलिखित में से कौन मध्य प्रदेश की लोक-रंगमंच (नाट्य) परंपरा है?
- (a)तुर्रा-कलंगी
- (b)यक्षगान
- (c)थेरुक्कूथु
- (d)भवाई
उत्तर(a) तुर्रा-कलंगी — मध्य प्रदेश का लोकनाट्य; शेष क्रमशः कर्नाटक, तमिलनाडु और गुजरात/राजस्थान से संबंधित हैं।