ऋग्वेदिक “पणि” किस वर्ग के नागरिक थे ?
- (a)पुरोहित
- (b)लोहार
- (c)स्वर्णकार
- (d)व्यापारी
सही उत्तर — (d) व्यापारी। ऋग्वेद में पणि एक धनी, पशु-स्वामी समुदाय हैं, जिन्हें बार-बार कंजूस (misers) के रूप में चित्रित किया गया है जो धन का संचय करते हैं और यज्ञ में भाग लेने से इनकार करते हैं; इतिहासकार उन्हें व्यापारिक/वणिक समुदाय (trading/merchant community) से जोड़ते हैं (यह शब्द बाद के वणिक/बनिया, अर्थात 'व्यापारी', से संबद्ध माना जाता है)। इस प्रकार वे व्यापारियों के वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, न कि किसी पुरोहित या शिल्पकार वर्ग का।
- (a)पुरोहित — ऋग्वेद का पुरोहित वर्ग ब्राह्मण थे (होतृ व पुरोहित जो यज्ञ संपन्न करते थे); पणि को उनके विपरीत के रूप में दर्शाया गया है — ऐसे लोग जो दान व अर्पण देने से इनकार करते हैं।
- (b)लोहार — लोहा (कृष्ण/श्याम अयस) ऋग्वेद के लिए अज्ञात है और यह केवल उत्तर वैदिक काल में प्रकट होता है, इसलिए ऋग्वैदिक काल में लोहारों का एक पृथक वर्ग कालविपर्यय (anachronistic) है।
- (c)स्वर्णकार — यद्यपि पणि संचित धन से संबद्ध हैं, उन्हें व्यापारी/धन-संग्रहकर्ता के रूप में स्मरण किया जाता है, न कि स्वर्णकारों के किसी संघ (guild) के रूप में।
पणि ऋग्वेद के आवर्ती 'अन्य' (others) में से एक हैं — एक धनी, पशु-स्वामी समुदाय जिसे कंजूस के रूप में दिखाया गया है, जो न तो वैदिक देवताओं की पूजा करते हैं और न ही पुरोहितों के साथ अपना धन साझा करते हैं। अधिकांश इतिहासकार उन्हें व्यापारिक या वणिक समुदाय मानते हैं, और यह नाम बाद के शब्द वणिक ('व्यापारी') में जीवित है। वे वल (Vala) कथा से सर्वाधिक जाने जाते हैं, जिसमें वे गायों को चुराकर छिपा देते हैं।
परीक्षाएँ यह परखती हैं कि क्या आप किसी अपरिचित वैदिक शब्द को सही सामाजिक श्रेणी में रख सकते हैं। 'पणि' सुनने में धार्मिक (ritual) लगता है, परंतु यह पुरोहित-संबंधी शब्द नहीं है — इसे धन-संग्रही व्यापारियों के रूप में दृढ़ता से याद रखें। शेष विकल्प या तो एक भिन्न वर्ग (पुरोहित) हैं या एक ऐसा शिल्प (लोहा) हैं जो बाद के युग का है।
- पणि: ऋग्वेद में एक धनी, पशु-समृद्ध समुदाय, जिसे सामान्यतः व्यापारी/वणिक के रूप में पहचाना जाता है।
- वल कथा में पणि गायों को छिपा देते हैं; इन्द्र उन्हें पुनः प्राप्त करने के लिए अपनी दूती सरमा को भेजते हैं।
- उनकी कंजूसी के लिए आलोचना की जाती है — धन का संचय करना तथा अर्पण व दान रोक लेना।
- लोहा ऋग्वेद में अनुपस्थित है (यह उत्तर वैदिक काल में प्रकट होता है), इसलिए 'लोहार' कालविपर्यय है।
- शब्द के धार्मिक प्रतीत होने के कारण 'पणि' को पुरोहित समझ लेना
- यह मान लेना कि लोहा व लोहार ऋग्वैदिक काल में पहले से ही विद्यमान थे
MPPSC व UPSC एकल वैदिक शब्दों की परख करते हैं — 'X कौन/क्या थे' — इसलिए पणि (व्यापारी), गविष्टि (गाय/युद्ध की खोज) तथा निष्क (धन के रूप में प्रयुक्त स्वर्ण आभूषण) को स्थिर करें।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
ऋग्वेद की वल कथा में, इन्द्र के किस दूत को चुराई गई गायों को वापस लाने हेतु पणियों के पास भेजा गया था ?
- (a)सरमा
- (b)सरण्यू
- (c)वाक्
- (d)उषा
उत्तर(a) सरमा — इन्द्र की दिव्य दूती (एक कुतिया), जो पणियों का पता लगाती है।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
भारत में लोहा (कृष्ण अयस) सबसे पहले स्पष्ट रूप से किस काल में प्रमाणित होता है ?
- (a)ऋग्वैदिक काल
- (b)उत्तर वैदिक काल
- (c)हड़प्पा सभ्यता
- (d)मध्यपाषाण युग
उत्तर(b) उत्तर वैदिक काल — इसीलिए 'लोहार' ऋग्वैदिक वर्ग नहीं हो सकते।