निम्नलिखित में से कौन काँग्रेस पार्टी में ‘अपरिवर्तनवादी’ समूह में शामिल नहीं थे ?
- (a)सरदार वल्लभभाई पटेल
- (b)डॉक्टर अंसारी
- (c)बाबू राजेन्द्र प्रसाद
- (d)मोतीलाल नेहरू
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) मोतीलाल नेहरू । स्टेम में निषेध मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है, अतः यहाँ वह नाम ढूँढ़ना है जो अपरिवर्तनवादी समूह में नहीं था । पृष्ठभूमि यह है कि फ़रवरी 1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया और कांग्रेस के भीतर यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि अब आगे क्या किया जाए । इस पर दो मत बने । एक पक्ष चाहता था कि कांग्रेस विधान परिषदों के चुनाव लड़े और भीतर जाकर सरकार के कामकाज में बाधा डाले, ताकि यह दिखाया जा सके कि ये संस्थाएँ खोखली हैं ; इन्हें परिवर्तनवादी कहा गया और इन्हीं ने 1923 के आरंभ में स्वराज पार्टी बनाई, जिसके अध्यक्ष चित्तरंजन दास और मंत्री मोतीलाल नेहरू थे । दूसरा पक्ष परिषदों के बहिष्कार पर अड़ा रहा और उसका कहना था कि शक्ति गाँव में रचनात्मक कार्यक्रम से बनेगी — ख़ादी और चरख़ा, राष्ट्रीय शिक्षा, हिंदू-मुस्लिम एकता और अस्पृश्यता निवारण ; इन्हें अपरिवर्तनवादी कहा गया । इस दूसरे समूह में वल्लभभाई पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी और डॉक्टर एम.ए. अंसारी जैसे नाम आते हैं । मोतीलाल नेहरू इसके ठीक विपरीत पक्ष के थे । वे स्वराज पार्टी के संस्थापकों में थे और केंद्रीय विधान सभा में उसके नेता रहे, जहाँ उन्होंने बजट और विधेयकों का विरोध करके सरकार को बार-बार असहज किया । बाद में 1928 की उस समिति के अध्यक्ष भी वही बने जिसकी रिपोर्ट को नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है । अतः इस सूची में बाहरी नाम उन्हीं का है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)सरदार वल्लभभाई पटेल — वल्लभभाई पटेल अपरिवर्तनवादी समूह के प्रमुख नामों में थे, इसलिए वे निषेध का उत्तर नहीं बनते । उनकी राजनीति का आधार संगठन और ज़मीनी कार्य था, विधान परिषदों की बहस नहीं । 1928 का बारदोली सत्याग्रह उसी शैली का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है, जहाँ बढ़े हुए भू-राजस्व के विरुद्ध किसानों का संगठित आंदोलन चला और उसी की सफलता से उन्हें सरदार कहा जाने लगा । रचनात्मक कार्यक्रम पर बल देने वाले इस समूह का तर्क यह था कि परिषदों में जाने से जनता का ध्यान बँटेगा और कांग्रेस का संगठन ढीला पड़ेगा । पटेल का पूरा कार्यकाल इसी सोच के अनुरूप रहा, और स्वतंत्रता के बाद भी उनकी पहचान संगठन तथा प्रशासन के व्यक्ति की ही बनी ।
- (b)डॉक्टर अंसारी — डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी भी इसी अपरिवर्तनवादी धारा से जुड़े थे, इसलिए यह विकल्प भी उत्तर नहीं हो सकता । वे चिकित्सक थे, ख़िलाफ़त और असहयोग के दौर में सक्रिय रहे, हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे और कांग्रेस के अध्यक्ष पद तक पहुँचे । रचनात्मक कार्यक्रम में जो हिंदू-मुस्लिम एकता का अंग था, उसमें उनकी भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है । जामिया मिल्लिया इस्लामिया से भी उनका गहरा संबंध रहा, जो असहयोग आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा के विचार से निकली संस्था थी । अर्थात् उनका काम ठीक उन्हीं क्षेत्रों में था जिन्हें अपरिवर्तनवादी समूह अपना कार्यक्रम मानता था ।
- (c)बाबू राजेन्द्र प्रसाद — राजेन्द्र प्रसाद अपरिवर्तनवादी समूह के जाने-माने नाम हैं, इसलिए वे भी उत्तर नहीं बनते । बिहार से आने वाले इस गाँधीवादी नेता का सार्वजनिक जीवन 1917 के चंपारण सत्याग्रह से गाँधीजी के साथ जुड़ा और उसके बाद वे रचनात्मक कार्यक्रम तथा कांग्रेस संगठन के काम में लगे रहे । 1934 के बिहार भूकंप के बाद राहत कार्य में उनकी भूमिका इसी शैली का उदाहरण है । वे कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, संविधान सभा के अध्यक्ष बने और स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति चुने गए । ध्यान रखने योग्य बात यह है कि इसी पेपर में एक और प्रश्न उन्हीं को समाजवादी गुट के संदर्भ में रखता है — दोनों जगह उत्तर एक ही तथ्य से निकलता है, कि उनकी पहचान गाँधीवादी वरिष्ठ नेतृत्व की थी ।
अवधारणा
फ़रवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया और कुछ ही समय बाद वे बंदी बना लिए गए । इसके बाद कांग्रेस के भीतर आगे की रणनीति पर मतभेद उभरा और दो समूह बने । परिवर्तनवादी अथवा स्वराजवादी चाहते थे कि विधान परिषदों के चुनाव लड़े जाएँ और भीतर जाकर सरकार की योजनाओं में बाधा डाली जाए ; उनका तर्क था कि आंदोलन के ठहराव के दौर में परिषदें ही वह मंच हैं जहाँ से जनता के सामने बात रखी जा सकती है । स्वराज पार्टी की स्थापना 1923 के आरंभ में हुई, जिसमें चित्तरंजन दास अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू मंत्री बने । अपरिवर्तनवादी परिषदों के बहिष्कार पर अड़े रहे और उनका बल रचनात्मक कार्यक्रम पर था — ख़ादी और चरख़े का प्रचार, राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाएँ, हिंदू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता का निवारण और मद्यनिषेध । इस समूह में वल्लभभाई पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी और डॉक्टर अंसारी प्रमुख थे । 1923 में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ जिसके अंतर्गत स्वराजवादियों को कांग्रेस के भीतर रहते हुए चुनाव लड़ने की छूट मिली, और उसी वर्ष हुए चुनावों में स्वराज पार्टी ने केंद्रीय विधान सभा तथा कई प्रांतों में उल्लेखनीय सफलता पाई ।
कांग्रेस के भीतर के गुटों को काल के साथ जोड़कर याद रखना इस विषय की सबसे बड़ी आवश्यकता है, क्योंकि विभाजन की रेखा हर दशक में बदलती रही । 1907 में विभाजन नरमपंथी और गरमपंथी का था ; 1922 के बाद परिवर्तनवादी और अपरिवर्तनवादी का ; 1930 के दशक में समाजवादी वामपक्ष और गाँधीवादी वरिष्ठ नेतृत्व का ; और 1939 में सुभाषचंद्र बोस के प्रसंग में एक और विभाजन उभरा । एक ही व्यक्ति अलग-अलग दशकों में अलग-अलग गुटों के संदर्भ में पूछा जा सकता है, इसलिए नाम के साथ काल अवश्य जोड़िए । इस प्रश्नपत्र में यह ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस के गुटों पर तीन प्रश्न हैं — समाजवादी गुट, अतिवादी धारा और अपरिवर्तनवादी समूह — और तीनों निषेधात्मक रूप में पूछे गए हैं ।
मुख्य तथ्य
- चौरी-चौरा की घटना के बाद फ़रवरी 1922 में असहयोग आंदोलन स्थगित हुआ और कांग्रेस के भीतर आगे की रणनीति पर मतभेद उभरा ।
- परिवर्तनवादी अथवा स्वराजवादी विधान परिषदों में जाकर भीतर से बाधा डालने के पक्ष में थे ।
- स्वराज पार्टी की स्थापना 1923 के आरंभ में हुई ; चित्तरंजन दास उसके अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू मंत्री बने ।
- अपरिवर्तनवादी परिषदों के बहिष्कार पर अड़े रहे और उनका बल रचनात्मक कार्यक्रम पर था ।
- रचनात्मक कार्यक्रम में ख़ादी और चरख़ा, राष्ट्रीय शिक्षा, हिंदू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता निवारण तथा मद्यनिषेध आते थे ।
- अपरिवर्तनवादी समूह के प्रमुख नाम थे वल्लभभाई पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी और डॉक्टर एम.ए. अंसारी ।
- मोतीलाल नेहरू केंद्रीय विधान सभा में स्वराज पार्टी के नेता रहे और 1928 की उस समिति के अध्यक्ष बने जिसकी रिपोर्ट नेहरू रिपोर्ट कहलाती है ।
- 1923 के समझौते के बाद स्वराजवादियों को कांग्रेस के भीतर रहते हुए चुनाव लड़ने की छूट मिली ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- परिवर्तनवादी और अपरिवर्तनवादी के अर्थ उलट देना । परिवर्तनवादी परिषदों में जाना चाहते थे, अपरिवर्तनवादी बहिष्कार पर अड़े रहे ।
- स्वराज पार्टी को कांग्रेस से अलग हुआ स्वतंत्र दल मान लेना । समझौते के बाद वह कांग्रेस के भीतर रहते हुए चुनाव लड़ी ।
- मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू के प्रसंग आपस में मिला देना ; यह प्रश्न 1920 के दशक का है ।
- नाम के साथ काल न जोड़ना । वही नेता किसी और दशक में किसी और गुट के संदर्भ में पूछा जा सकता है ।
- निषेध चूक जाना और उस नाम पर निशान लगा देना जो सचमुच उस समूह का था ।
राष्ट्रीय आंदोलन के प्रश्नों में गुट और व्यक्ति का मिलान इस प्रश्नपत्र का सबसे दोहराया जाने वाला ढाँचा है, और यहाँ वह तीन बार आया है । इसका सीधा अर्थ यह है कि तैयारी में इस एक ढाँचे पर विशेष ध्यान देना चाहिए । सबसे उपयोगी अभ्यास यह है कि एक पृष्ठ पर काल-क्रम से गुट लिखे जाएँ और हर गुट के सामने तीन-चार नाम, ताकि पढ़ते समय यह दिखे कि विभाजन की रेखा हर दशक में कैसे बदलती रही । इसके बाद ऐसे प्रश्न पहचान के प्रश्न रह जाते हैं । दूसरी बात, निषेधात्मक प्रश्न को उलटकर हल कीजिए : पहले तीन नामों की श्रेणी तय कीजिए, बचा हुआ नाम उत्तर है । तीसरी बात, यह ध्यान रखिए कि कुछ नेता एक से अधिक प्रश्नों में लौटते हैं — इस पेपर में राजेन्द्र प्रसाद दो बार आए हैं, दोनों बार निषेध के साथ और दोनों बार उत्तर उनकी गाँधीवादी पहचान से निकलता है । ऐसे बार-बार लौटने वाले नामों की एक छोटी सूची बना लेना बहुत लाभदायक होता है ।
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गुट और व्यक्ति के मिलान का तीसरा प्रश्न — अतिवादी राष्ट्रीय विचारधारा का प्रतिनिधित्व कौन नहीं करते थे ।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
स्वराज पार्टी की स्थापना 1923 में हुई थी । उसके अध्यक्ष और मंत्री क्रमशः निम्नलिखित में से कौन थे ?
- (a)मोतीलाल नेहरू और चित्तरंजन दास
- (b)चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू
- (c)वल्लभभाई पटेल और राजेन्द्र प्रसाद
- (d)सी. राजगोपालाचारी और डॉक्टर अंसारी
उत्तर(b) चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू — दास अध्यक्ष थे और मोतीलाल नेहरू मंत्री ।
- practice — not a real PYQ
गाँधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम में निम्नलिखित में से कौन-सा अंग सम्मिलित नहीं था ?
- (a)ख़ादी और चरख़े का प्रचार
- (b)अस्पृश्यता का निवारण
- (c)विधान परिषदों में प्रवेश
- (d)राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं की स्थापना
उत्तर(c) विधान परिषदों में प्रवेश — यही वह प्रश्न था जिस पर परिवर्तनवादी और अपरिवर्तनवादी अलग हुए ।