रैयतवाड़ी क्षेत्रों की स्थिति के बारे में, निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा सही है ?
- (a)अधिकांश भूमि साहूकारों, व्यापारियों और धनी किसानों के हाथों में चली गई थी, जिन्होंने सामान्यत: पट्टेदारों की सेवाओं का उपयोग किया था ।
- (b)भूमिहीन श्रमिक भू-स्वामी बन गए थे ।
- (c)इससे पट्टेदारों को उच्च मूल्यों पर भूमि पट्टे पर देने की पद्धति पर रोक लग गई थी ।
- (d)जमींदारी पूरी तरह से विनष्ट हो गई थी ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) अधिकांश भूमि साहूकारों, व्यापारियों और धनी किसानों के हाथों में चली गई थी, जिन्होंने सामान्यत: पट्टेदारों की सेवाओं का उपयोग किया था । रैयतवाड़ी बंदोबस्त का घोषित उद्देश्य यह था कि सरकार बीच के किसी ज़मींदार के बिना सीधे जोतने वाले किसान से — रैयत से — लगान वसूले और जब तक वह लगान देता रहे, भूमि पर उसका अधिकार बना रहे । यह व्यवस्था मुख्यतः मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसियों में लागू हुई और उसे किसान के हित की व्यवस्था कहकर प्रस्तुत किया गया । पर व्यवहार में जो हुआ वह इस उद्देश्य से भिन्न था, और उसका कारण उसी व्यवस्था की तीन विशेषताओं में था । पहली, लगान की माँग ऊँची थी और भूमि की माप तथा अनुमानित उपज के आधार पर तय की जाती थी, न कि वास्तविक फ़सल के आधार पर । दूसरी, वह नक़द में और निश्चित तिथि पर देनी पड़ती थी, इसलिए फ़सल ख़राब होने पर भी माँग वैसी की वैसी बनी रहती थी और किसान को उधार लेने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं बचता था । तीसरी, भूमि अब हस्तांतरणीय संपत्ति बन गई थी, इसलिए उसे बंधक रखा जा सकता था और ऋण न चुकाने पर न्यायालय के आदेश से बेची भी जा सकती थी । इन तीनों के मिलने का परिणाम यही निकला कि भूमि क्रमशः उन लोगों के हाथ में जाती गई जिनके पास पूँजी थी — साहूकार, व्यापारी और गाँव के धनी किसान — और वे स्वयं खेती करने के बजाय उसी भूमि को पट्टे पर देकर लगान वसूलने लगे । जो किसान पहले स्वामी था वह अब उसी खेत पर पट्टेदार या खेतिहर मज़दूर बन गया । अर्थात् बिचौलिया हटाने के लिए बनी व्यवस्था ने एक नए प्रकार का बिचौलिया खड़ा कर दिया, और यही विकल्प (a) कहता है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)भूमिहीन श्रमिक भू-स्वामी बन गए थे । — इस काल में गति ठीक उल्टी दिशा में थी । भूमिहीन श्रमिक भू-स्वामी नहीं बने ; बल्कि जो पहले भूमि के स्वामी थे उनमें से बहुत से ऋण के कारण भूमि खोकर पट्टेदार और फिर खेतिहर मज़दूर बन गए । ऊँची और नक़दी में देय लगान की माँग, उसे समय पर चुकाने की बाध्यता, और भूमि का बंधक रखी जा सकने योग्य संपत्ति बन जाना — तीनों मिलकर भूमि को कर्ज़दार किसान से उसके ऋणदाता की ओर खिसकाते रहे । उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इसी दबाव से दकन के किसानों का असंतोष फूटा, जिसके बाद सरकार को कर्ज़ और भूमि-हस्तांतरण के प्रश्न पर विशेष विधान लाना पड़ा । यह कथन उस युग की मूल प्रवृत्ति को ही उलट देता है, इसलिए यह उत्तर नहीं हो सकता ।
- (c)इससे पट्टेदारों को उच्च मूल्यों पर भूमि पट्टे पर देने की पद्धति पर रोक लग गई थी । — रोक लगना तो दूर, यही पद्धति इस काल में बढ़ी । जब भूमि पूँजी वालों के हाथ में जाने लगी तो उन्होंने प्रायः स्वयं हल चलाने के बजाय उसे उन्हीं किसानों को पट्टे पर दे दिया जो पहले उसके स्वामी थे, और पट्टे की शर्तें उनके पक्ष में रहती थीं क्योंकि किसान के पास कोई विकल्प नहीं था । इससे उपज का एक बड़ा भाग लगान के रूप में निकल जाता था और कृषि में सुधार करने की न प्रेरणा बचती थी और न सामर्थ्य — क्योंकि जो सुधार करता वह उसका फल स्वयं नहीं पाता । यही कारण है कि इस व्यवस्था को कृषि की मंद प्रगति का एक बड़ा कारण माना जाता है । स्वतंत्रता के बाद पट्टेदारी सुधार को भूमि सुधार का एक प्रमुख अंग बनाना पड़ा, और यह स्वयं इस बात का प्रमाण है कि रोक नहीं लगी थी ।
- (d)जमींदारी पूरी तरह से विनष्ट हो गई थी । — यह विकल्प आधा सच लेकर उसे पूरा बना देता है, और वहीं ग़लत हो जाता है । यह सही है कि रैयतवाड़ी क्षेत्रों में सरकार ने ज़मींदार को बीच से हटाकर सीधे रैयत से बंदोबस्त किया, इसलिए वहाँ स्थायी बंदोबस्त वाली ज़मींदारी की व्यवस्था नहीं थी । पर दो बातें इसे पूरी तरह विनष्ट होने से रोकती हैं । पहली, ज़मींदारी व्यवस्था देश के दूसरे बड़े भागों में — बंगाल, बिहार और ओडिशा में — 1793 के स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत चलती रही, और वह स्वतंत्रता के बाद के भूमि सुधारों से ही समाप्त हुई । दूसरी, स्वयं रैयतवाड़ी क्षेत्रों में साहूकारों, व्यापारियों और धनी किसानों के रूप में एक नया भू-स्वामी वर्ग खड़ा हो गया, जो पट्टे पर भूमि देकर वही काम करता था जो पहले ज़मींदार करता था । नाम बदला, ढाँचा नहीं ।
अवधारणा
औपनिवेशिक भारत में भू-राजस्व की तीन प्रमुख व्यवस्थाएँ थीं । स्थायी बंदोबस्त 1793 में कॉर्नवालिस ने बंगाल, बिहार और ओडिशा में लागू किया ; उसमें ज़मींदार को भूमि का स्वामी मान लिया गया और उससे वसूली जाने वाली रक़म सदा के लिए नियत कर दी गई । रैयतवाड़ी व्यवस्था मुख्यतः मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसियों में लागू हुई, जिसमें सरकार ने सीधे जोतने वाले किसान से बंदोबस्त किया ; मद्रास में इसका नाम टॉमस मुनरो से जुड़ा है और बंबई में एल्फ़िंस्टन से । उसमें लगान भूमि की माप और अनुमानित उपज के आधार पर तय होता था तथा तीस वर्ष जैसी अवधि पर पुनरीक्षित किया जाता था । महालवाड़ी व्यवस्था उत्तर भारत के क्षेत्रों में लागू हुई, जिसमें बंदोबस्त गाँव अथवा महाल की सामूहिक इकाई से किया जाता था और उसका दायित्व गाँव के मुखियों पर होता था । तीनों में कुछ बातें समान थीं — माँग ऊँची थी, नक़द में देय थी, और वसूली कठोर थी । इसी से किसानों की ऋणग्रस्तता बढ़ी, भूमि हस्तांतरणीय संपत्ति बन गई और वह उन लोगों के हाथ में जाने लगी जिनके पास पूँजी थी ।
इस विषय को समझने की कुंजी यह है कि घोषित उद्देश्य और वास्तविक परिणाम में अंतर होता है, और परीक्षा प्रायः परिणाम पूछती है । रैयतवाड़ी का घोषित उद्देश्य किसान को बिचौलिये से मुक्त करना था, पर परिणाम यह निकला कि बिचौलिया बदल गया — ज़मींदार के स्थान पर साहूकार और धनी किसान आ गए । यही अंतर स्थायी बंदोबस्त के प्रसंग में भी दिखता है, जहाँ नियत माँग से कृषि में निवेश की आशा की गई थी पर ज़मींदार ने प्रायः निवेश के बजाय उप-पट्टेदारी की लंबी शृंखला खड़ी कर दी । उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के किसान आंदोलनों को इसी पृष्ठभूमि में पढ़ा जाता है, और स्वतंत्रता के बाद के भूमि सुधारों — बिचौलियों की समाप्ति, पट्टेदारी सुधार और भूमि की अधिकतम सीमा — का तर्क भी वहीं से निकलता है ।
मुख्य तथ्य
- रैयतवाड़ी व्यवस्था में सरकार ने बीच के ज़मींदार के बिना सीधे जोतने वाले किसान से बंदोबस्त किया ; वह मुख्यतः मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसियों में लागू हुई ।
- लगान भूमि की माप और अनुमानित उपज के आधार पर तय होता था, वास्तविक फ़सल के आधार पर नहीं, और नियत अवधि पर पुनरीक्षित किया जाता था ।
- माँग ऊँची थी, नक़द में और निश्चित तिथि पर देय थी, इसलिए फ़सल ख़राब होने पर भी किसान को उधार लेना पड़ता था ।
- भूमि हस्तांतरणीय संपत्ति बन गई थी, इसलिए उसे बंधक रखा जा सकता था और ऋण न चुकाने पर बेची भी जा सकती थी ।
- परिणामस्वरूप अधिकांश भूमि साहूकारों, व्यापारियों और धनी किसानों के हाथ में चली गई, जिन्होंने उसे पट्टे पर देकर लगान वसूला ।
- स्थायी बंदोबस्त 1793 में कॉर्नवालिस ने बंगाल, बिहार और ओडिशा में लागू किया, जिसमें ज़मींदार को स्वामी मानकर माँग सदा के लिए नियत कर दी गई ।
- महालवाड़ी व्यवस्था में बंदोबस्त गाँव अथवा महाल की सामूहिक इकाई से किया जाता था और दायित्व गाँव के मुखियों पर होता था ।
- उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दकन के किसानों का असंतोष इसी ऋणग्रस्तता से जुड़ा था, जिसके बाद सरकार को विशेष विधान लाना पड़ा ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- घोषित उद्देश्य और वास्तविक परिणाम को एक मान लेना । रैयतवाड़ी का उद्देश्य किसान को बिचौलिये से मुक्त करना था, परिणाम उलटा निकला ।
- यह मान लेना कि रैयतवाड़ी क्षेत्रों में कोई भू-स्वामी वर्ग रहा ही नहीं । वहाँ साहूकारों और धनी किसानों के रूप में नया वर्ग खड़ा हुआ ।
- ज़मींदारी को पूरे देश से समाप्त मान लेना । वह बंगाल, बिहार और ओडिशा में स्वतंत्रता के बाद के सुधारों तक चलती रही ।
- किस व्यवस्था का किस क्षेत्र से संबंध है, यह गड्डमड्ड कर देना ; प्रश्न प्रायः यही जोड़ा पूछते हैं ।
- पट्टेदारी को औपनिवेशिक काल से पहले की व्यवस्था मान लेना ; इस काल में वह विशेष रूप से बढ़ी ।
आधुनिक भारत के प्रश्नों में भू-राजस्व व्यवस्थाएँ एक स्थायी विषय हैं, और उनसे प्रश्न तीन रूपों में आते हैं — कौन-सी व्यवस्था किस क्षेत्र में और किसके नाम से जुड़ी है, उसकी विशेषताएँ क्या थीं, और उसका परिणाम क्या निकला । यह प्रश्न तीसरे प्रकार का है और वही सबसे अधिक सोच माँगता है, क्योंकि उसमें केवल तथ्य याद रखने से काम नहीं चलता ; यह समझना पड़ता है कि व्यवस्था की किन विशेषताओं से कौन-सा परिणाम निकला । इसलिए इस विषय को कारण और परिणाम की शृंखला के रूप में पढ़िए — ऊँची और नक़द माँग से ऋण, ऋण से भूमि का हस्तांतरण, हस्तांतरण से पट्टेदारी और खेतिहर मज़दूरी । एक बार यह शृंखला बन जाने पर इस श्रेणी के अधिकांश विकल्प स्वयं कट जाते हैं, क्योंकि ग़लत विकल्प प्रायः शृंखला की दिशा उलट देते हैं । दूसरी बात, ऐसे प्रश्नों में पूरी तरह, केवल और सदा जैसे शब्दों पर ध्यान दीजिए ; इतिहास के कथनों में ऐसे निरपेक्ष शब्द प्रायः उन्हें ग़लत बना देते हैं ।
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अभ्यास
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स्थायी बंदोबस्त 1793 में निम्नलिखित में से किसने और किन क्षेत्रों में लागू किया था ?
- (a)टॉमस मुनरो ने मद्रास में
- (b)कॉर्नवालिस ने बंगाल, बिहार और ओडिशा में
- (c)एल्फ़िंस्टन ने बंबई में
- (d)होल्ट मैकेंज़ी ने उत्तर भारत में
उत्तर(b) कॉर्नवालिस ने बंगाल, बिहार और ओडिशा में — इसी में ज़मींदार को स्वामी मानकर माँग सदा के लिए नियत की गई ।
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जिस भू-राजस्व व्यवस्था में बंदोबस्त गाँव अथवा महाल की सामूहिक इकाई से किया जाता था, वह निम्नलिखित में से कौन-सी है ?
- (a)रैयतवाड़ी
- (b)स्थायी बंदोबस्त
- (c)महालवाड़ी
- (d)जागीरदारी
उत्तर(c) महालवाड़ी — इसमें दायित्व गाँव के मुखियों पर होता था और यह उत्तर भारत के क्षेत्रों में लागू हुई ।