निम्नलिखित में से कौन भारत में अतिवादी राष्ट्रीय विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे ?
- (a)अश्विनी कुमार दत्त
- (b)विष्णुशास्त्री चिपलूणकर
- (c)कृष्ण कुमार मित्र
- (d)लाला लाजपत राय
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) कृष्ण कुमार मित्र । स्टेम में निषेध मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है, इसलिए यहाँ वह नाम ढूँढ़ना है जो अतिवादी अर्थात् गरमपंथी धारा का प्रतिनिधि नहीं माना जाता । कृष्ण कुमार मित्र बंगाल के ब्रह्म समाजी सुधारक और संजीवनी नामक साप्ताहिक के संपादक थे । उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में नरमपंथी धारा में गिना जाता है — वह धारा जो संवैधानिक साधनों, प्रार्थना-पत्र, प्रतिनिधिमंडल और प्रेस के माध्यम से लोकमत बनाने में विश्वास करती थी । यह ध्यान रखना आवश्यक है कि नरमपंथी होने का अर्थ निष्क्रिय होना नहीं है । संजीवनी उन आरंभिक पत्रों में थी जिन्होंने 1905 में बंगाल विभाजन की घोषणा के बाद विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया, और 1908 में मित्र उन नेताओं में थे जिन्हें सरकार ने निर्वासित कर दिया । अर्थात् वे स्वदेशी आंदोलन में सक्रिय भी थे और सरकार की दृष्टि में ख़तरनाक भी । फिर भी विचारधारा की दृष्टि से उनका स्थान नरमपंथी पक्ष में है, और प्रश्न विचारधारा की ही बात कर रहा है । दूसरी ओर शेष तीनों नाम अतिवादी धारा से जुड़े हैं । यही इस प्रश्न का ढाँचा है : चारों उसी काल के, चारों प्रतिष्ठित, और अंतर केवल उस धारा का जिससे वे जुड़े थे । ऐसे प्रश्नों में केवल नाम पहचान लेना पर्याप्त नहीं होता — हर नाम के आगे उसकी धारा भी दर्ज होनी चाहिए ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)अश्विनी कुमार दत्त — अश्विनी कुमार दत्त अतिवादी धारा के प्रमुख नामों में हैं, इसलिए वे निषेध का उत्तर नहीं बनते । वे बारीसाल के थे और स्वदेशी आंदोलन के सबसे प्रभावी जन-संगठनकर्ताओं में गिने जाते हैं । उनकी स्वदेश बांधव समिति ने गाँव-गाँव तक आंदोलन पहुँचाया, विवादों के निपटारे से लेकर राहत कार्य तक स्थानीय जीवन में हस्तक्षेप किया, और यही कारण है कि बारीसाल क्षेत्र में बहिष्कार सबसे गहराई तक पहुँचा । शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान रहा । 1908 में सरकार ने उन्हें भी निर्वासित कर दिया । जन-संगठन पर उनका यह बल ही उन्हें उस धारा से जोड़ता है जो प्रार्थना-पत्र से आगे बढ़कर सीधी कार्रवाई और लोक-संगठन पर विश्वास करती थी ।
- (b)विष्णुशास्त्री चिपलूणकर — विष्णुशास्त्री चिपलूणकर महाराष्ट्र में अतिवादी राष्ट्रीय विचार के आरंभिक प्रवर्तकों में गिने जाते हैं, इसलिए वे भी उत्तर नहीं हो सकते । वे मराठी के प्रखर निबंधकार थे और उनकी निबंधमाला ने पाश्चात्य श्रेष्ठता के दावों तथा उस सुधारवाद पर तीखे प्रहार किए जो अपनी परंपरा को हीन मानकर चलता था । उनका बल आत्मगौरव और आत्मनिर्भरता पर था, और उसी विचार से आगे चलकर वह भाषा बनी जिसे गरमपंथी राष्ट्रवाद कहा गया । शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने बाल गंगाधर तिलक और गोपाल गणेश आगरकर के साथ मिलकर न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की, जो आगे चलकर डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी और फ़र्ग्युसन कॉलेज तक पहुँची । उनका जीवन छोटा रहा, पर प्रभाव लंबा ।
- (d)लाला लाजपत राय — लाला लाजपत राय तो अतिवादी धारा के सबसे प्रसिद्ध चेहरों में हैं, इसलिए यह विकल्प तुरंत कट जाता है । उन्हें बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ लाल-बाल-पाल की त्रयी में गिना जाता है, जो 1905 के बाद बहिष्कार और स्वदेशी को केवल बंगाल तक सीमित न रखकर पूरे देश का कार्यक्रम बनाने पर बल दे रही थी । पंजाब में 1907 के किसान आंदोलन के प्रसंग में सरदार अजीत सिंह के साथ उन्हें निर्वासित किया गया । आगे चलकर वे प्रवासी भारतीयों के बीच भी सक्रिय रहे, ट्रेड यूनियन आंदोलन से जुड़े, और 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में हुए लाठी प्रहार के बाद उनका निधन हुआ । उनका नाम इस सूची में केवल इसीलिए है कि वह पहचान में सबसे सरल है ।
अवधारणा
राष्ट्रीय आंदोलन के आरंभिक दशकों को दो धाराओं में बाँटकर पढ़ा जाता है । 1885 से लगभग 1905 तक का काल नरमपंथियों का माना जाता है, जिनका विश्वास संवैधानिक आंदोलन में था — प्रार्थना-पत्र, प्रतिनिधिमंडल, विधान परिषदों में प्रतिनिधित्व की माँग, और प्रेस तथा सभाओं से लोकमत तैयार करना । दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फ़िरोज़शाह मेहता, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और बदरुद्दीन तैयबजी इस धारा के प्रमुख नाम हैं, और उनकी सबसे बड़ी बौद्धिक देन धन के अपवहन का सिद्धांत तथा औपनिवेशिक शासन की आर्थिक आलोचना है । बंगाल विभाजन के बाद उभरी अतिवादी अथवा गरमपंथी धारा का विश्वास आत्मशक्ति, स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और जन-आंदोलन में था । तिलक, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष इसके प्रमुख नाम हैं ; बंगाल में अश्विनी कुमार दत्त जैसे संगठनकर्ता और महाराष्ट्र में विष्णुशास्त्री चिपलूणकर जैसे आरंभिक विचारक इसी परंपरा से जुड़े हैं । 1907 के सूरत अधिवेशन में दोनों धाराएँ अलग हो गईं और 1916 के लखनऊ अधिवेशन में फिर मिलीं ।
इस प्रश्न में एक सूक्ष्म बात है जो ध्यान देने योग्य है : स्वदेशी आंदोलन में भाग लेना और गरमपंथी धारा का होना एक ही बात नहीं है । बंगाल विभाजन के विरोध में नरमपंथी भी सक्रिय थे ; अंतर साधनों और लक्ष्य की भाषा का था । नरमपंथी बहिष्कार को बंगाल तक सीमित एक विशेष उपाय मानते थे और शासन में सुधार की माँग करते थे, जबकि गरमपंथी उसे पूरे देश का स्थायी कार्यक्रम बनाना चाहते थे और स्वराज को लक्ष्य के रूप में सामने रखते थे । 1908 में सरकार ने जिन नेताओं को निर्वासित किया उनमें दोनों धाराओं के लोग थे । इसलिए ऐसे प्रश्नों में यह मत मान लीजिए कि जिसे सरकार ने दंडित किया वह गरमपंथी ही रहा होगा । धारा का निर्णय विचार और साधनों से होता है, सरकार के व्यवहार से नहीं ।
मुख्य तथ्य
- कृष्ण कुमार मित्र बंगाल के ब्रह्म समाजी सुधारक और संजीवनी साप्ताहिक के संपादक थे, और उन्हें नरमपंथी धारा में गिना जाता है ।
- संजीवनी उन आरंभिक पत्रों में थी जिन्होंने 1905 में बंगाल विभाजन की घोषणा के बाद विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया ।
- अश्विनी कुमार दत्त बारीसाल के थे और उनकी स्वदेश बांधव समिति ने स्वदेशी आंदोलन को गाँव-गाँव तक पहुँचाया ।
- विष्णुशास्त्री चिपलूणकर मराठी निबंधकार थे ; उनकी निबंधमाला ने आत्मगौरव पर बल दिया और महाराष्ट्र में गरमपंथी विचार की भूमि तैयार की ।
- चिपलूणकर ने तिलक और आगरकर के साथ मिलकर न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की, जो आगे डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी तक पहुँची ।
- लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल की त्रयी को लाल-बाल-पाल कहा जाता है ।
- नरमपंथी धारा का विश्वास संवैधानिक साधनों में था — प्रार्थना-पत्र, प्रतिनिधिमंडल और प्रेस से लोकमत बनाना ।
- गरमपंथी धारा का बल स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा, आत्मशक्ति और जन-आंदोलन पर था ; 1907 के सूरत अधिवेशन में दोनों अलग हो गईं ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- स्वदेशी आंदोलन में भागीदारी को गरमपंथी होने का प्रमाण मान लेना । दोनों धाराओं के लोग उसमें सक्रिय थे ।
- सरकार द्वारा निर्वासित किए जाने से धारा का निर्णय करना । 1908 में दोनों धाराओं के नेता निर्वासित हुए ।
- संपादक और उनके पत्र का जोड़ा भूल जाना । कृष्ण कुमार मित्र का पत्र संजीवनी था ।
- चिपलूणकर को केवल साहित्यकार मान लेना । उनका महत्व राजनीतिक विचार की भूमि तैयार करने में है ।
- नाम तो याद रखना पर उसके साथ धारा और क्षेत्र न जोड़ना ; ऐसे प्रश्न ठीक इसी चूक पर बनते हैं ।
राष्ट्रीय आंदोलन इस प्रश्नपत्र का सबसे बड़ा खंड है और उसमें व्यक्ति और धारा के मिलान वाले प्रश्न सबसे नियमित हैं । इस पेपर में यह ढाँचा तीन बार आया है — समाजवादी गुट, अपरिवर्तनवादी समूह और यह अतिवादी धारा वाला प्रश्न । ऐसे प्रश्नों की तैयारी का सबसे कारगर तरीक़ा एक तालिका है जिसमें हर धारा के सामने उसके तीन-चार प्रतिनिधि नाम, उनका क्षेत्र और उनका काल लिखा हो । इससे यह भी दिखने लगता है कि परीक्षक बाहरी नाम कैसे चुनता है : वह प्रायः उसी काल का, उसी प्रसिद्धि का और उसी आंदोलन में सक्रिय व्यक्ति होता है, केवल उसकी धारा अलग होती है । दूसरी उपयोगी आदत यह है कि निषेधात्मक प्रश्न को उलटकर पढ़िए — पहले यह तय कीजिए कि तीन नाम किस श्रेणी के हैं और तब बचा हुआ नाम स्वतः उत्तर बन जाएगा । तीसरी बात, संपादक और उनके पत्रों की एक छोटी सूची अलग से याद रखिए, क्योंकि इस काल के प्रश्न प्रायः वहीं से भी आते हैं ।
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मराठी निबंधमाला के लेखक और महाराष्ट्र में गरमपंथी विचार की भूमि तैयार करने वाले व्यक्ति निम्नलिखित में से कौन थे ?
- (a)गोपाल गणेश आगरकर
- (b)महादेव गोविंद रानडे
- (c)विष्णुशास्त्री चिपलूणकर
- (d)गोपाल कृष्ण गोखले
उत्तर(c) विष्णुशास्त्री चिपलूणकर — उन्होंने तिलक और आगरकर के साथ न्यू इंग्लिश स्कूल की भी स्थापना की ।