क्या शेष परीक्षण (ट्रायल बैलेंस) के नामे और जमा पक्ष (डेबिट और क्रेडिट साइड) का योग समान होता है ?
- (a)नहीं, कभी-कभी उनके भिन्न होने का पर्याप्त कारण होता है ।
- (b)हाँ, हमेशा समान होता है ।
- (c)हाँ, सिवाय जहाँ शेष परीक्षण वर्ष के अंत में निकाला जाए ।
- (d)नहीं, क्योंकि यह तुलन-पत्र (बैलेंस शीट) नहीं है ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) नहीं, कभी-कभी उनके भिन्न होने का पर्याप्त कारण होता है । पहले प्रश्न की बनावट देख लीजिए, क्योंकि वह सामान्य से भिन्न है । यहाँ स्टेम एक हाँ-या-नहीं वाला प्रश्न है और चारों विकल्प उत्तर तथा उसका कारण दोनों एक साथ देते हैं । इसलिए हर विकल्प के आरंभ में जो हाँ या नहीं है वह उत्तर का अंश है — वह कोई निर्देश नहीं, और न ही यहाँ ऐसा कुछ ढूँढ़ना है जो सही न हो । अब विषय पर आइए । दोहरा लेखा प्रणाली का मूल नियम यह है कि हर लेनदेन में जितनी रक़म नामे होती है उतनी ही जमा, इसलिए यदि सारी प्रविष्टियाँ ठीक-ठीक की और चढ़ाई गई हों तो शेष परीक्षण के दोनों स्तंभों का योग बराबर आना चाहिए । पर यही तो जाँच का विषय है : शेष परीक्षण बनाया ही इसलिए जाता है कि यह देखा जा सके कि बहियों का अंकगणित ठीक बैठा या नहीं । यदि दोनों पक्ष सदा और स्वतः बराबर आते ही रहते, तो यह विवरण बनाने का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता । व्यवहार में योग कई बार नहीं मिलते, और जब नहीं मिलते तब उसका कोई न कोई निश्चित कारण होता है जिसे खोजा जा सकता है । ऐसे कारण प्रायः एकपक्षीय भूलें होती हैं — किसी प्रविष्टि का केवल एक पक्ष खाता-बही में चढ़ाना, एक पक्ष में रक़म ग़लत लिखना, किसी खाते का शेष निकालने में भूल, किसी खाते का शेष शेष परीक्षण में उतारना ही भूल जाना, किसी सहायक बही का जोड़ ग़लत लगाना, या शेष परीक्षण के स्तंभ का जोड़ ग़लत लगाना । ऐसी दशा में अंतर की रक़म अस्थायी रूप से उचंत खाता में डाल दी जाती है, ताकि काम आगे बढ़ सके, और भूल मिलते ही उसे ठीक करके उचंत खाता बंद कर दिया जाता है । अतः इस प्रश्न का उत्तर वही विकल्प है जो कहता है कि योग सदा समान नहीं होते और भिन्न होने का पर्याप्त कारण होता है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)हाँ, हमेशा समान होता है । — इस विकल्प में एक सच्चाई का अंश है, पर उसे अत्यंत निरपेक्ष रूप में कह दिया गया है और वहीं वह ग़लत हो जाता है । यह सही है कि दोहरा लेखा प्रणाली की अपेक्षा यही है कि दोनों पक्ष बराबर आएँ, और शुद्ध रूप से रखी गई बहियों में वे बराबर आते भी हैं । पर हमेशा शब्द इसे एक ऐसा नियम बना देता है जिसमें अपवाद ही न हो, जबकि व्यवहार में एकपक्षीय भूलें होती रहती हैं और उन्हीं के कारण योग नहीं मिलते । यदि योग सदा बराबर आते ही रहते तो शेष परीक्षण बनाने का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता, क्योंकि वह बनाया ही अंकगणितीय शुद्धता जाँचने के लिए जाता है । एक और बात ध्यान देने योग्य है : दोनों पक्ष मिल जाना भी पूर्ण शुद्धता का प्रमाण नहीं है, क्योंकि कई प्रकार की भूलें मिलान को छूती ही नहीं ।
- (c)हाँ, सिवाय जहाँ शेष परीक्षण वर्ष के अंत में निकाला जाए । — इस विकल्प में जो अपवाद रखा गया है उसका कोई आधार नहीं । शेष परीक्षण वर्ष के अंत में भी निकाला जा सकता है और किसी भी बीच की तिथि पर भी — मास के अंत में, तिमाही में, या किसी विशेष जाँच के लिए — और दोनों पक्षों के मिलने या न मिलने का प्रश्न हर बार एक जैसा ही रहता है । वस्तुतः वर्ष का अंत तो वह अवसर है जब यह विवरण सबसे नियमित रूप से बनाया जाता है, क्योंकि उसी के आधार पर अंतिम खाते तैयार होते हैं । अतः यह विकल्प ऐसा अपवाद गढ़ता है जो न सिद्धांत में है और न व्यवहार में । वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में ऐसे विकल्प पहचानना आसान है : वे कोई ऐसी शर्त जोड़ते हैं जिसका मूल धारणा से कोई तार्किक संबंध ही नहीं होता ।
- (d)नहीं, क्योंकि यह तुलन-पत्र (बैलेंस शीट) नहीं है । — इस विकल्प का पहला शब्द उस दिशा में जाता है जो ठीक है, पर उसके साथ दिया गया कारण असंगत है — और यहाँ कारण ही उत्तर का भाग है । शेष परीक्षण के दोनों पक्ष क्यों मिलते हैं या क्यों नहीं मिलते, इसका तुलन-पत्र से कोई संबंध नहीं । तुलन-पत्र स्वयं भी दो बराबर पक्षों वाला विवरण है, इसलिए यह कहना कि योग इसलिए भिन्न हो सकते हैं क्योंकि यह तुलन-पत्र नहीं है, तर्क की दृष्टि से कहीं नहीं पहुँचता । योग भिन्न होने का वास्तविक कारण एकपक्षीय भूलें हैं — एक ही पक्ष चढ़ाना, रक़म ग़लत लिखना, शेष निकालने या जोड़ लगाने में चूक । ऐसे विकल्पों से यह सीख मिलती है कि उत्तर-सहित-कारण वाले प्रश्नों में केवल पहले शब्द से निर्णय मत कीजिए ; दो विकल्प एक ही दिशा में जा सकते हैं और अंतर उनके कारण में होता है ।
अवधारणा
शेष परीक्षण के दोनों पक्षों का मिलान बहियों की अंकगणितीय शुद्धता की जाँच है, पूर्ण शुद्धता का प्रमाण नहीं । यह भेद इस विषय का सबसे उपयोगी भाग है । जो भूलें केवल एक पक्ष को प्रभावित करती हैं, वे मिलान बिगाड़ देती हैं — किसी प्रविष्टि का एक ही पक्ष चढ़ाना, एक पक्ष में रक़म ग़लत लिखना, किसी खाते का शेष निकालने में भूल, कोई शेष विवरण में उतारना भूल जाना, सहायक बही का जोड़ ग़लत लगाना, या स्तंभ का जोड़ ग़लत लगाना । दूसरी ओर कई भूलें ऐसी हैं जो दोनों पक्षों को समान रूप से प्रभावित करती हैं और इसलिए मिलान से पकड़ी ही नहीं जातीं । इनमें पूर्ण लोप की त्रुटि आती है, जिसमें प्रविष्टि कहीं दर्ज ही नहीं हुई ; सिद्धांत की त्रुटि, जिसमें पूँजीगत व्यय को आयगत मान लिया गया ; लेखन की वह त्रुटि जिसमें रक़म सही पर खाता उसी श्रेणी का दूसरा चुन लिया गया ; प्रतिपूरक त्रुटि, जिसमें दो भूलें एक-दूसरे को काट देती हैं ; और वह भूल जिसमें प्रविष्टि ग़लत सहायक बही में चली गई । जब योग नहीं मिलते तो अंतर की रक़म अस्थायी रूप से उचंत खाता में रखकर काम आगे बढ़ाया जाता है और भूल मिलते ही सुधार प्रविष्टि करके वह खाता बंद कर दिया जाता है ।
इस प्रश्न की बनावट ध्यान देने योग्य है । स्टेम एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर हाँ या नहीं में दिया जा सकता है, और चारों विकल्प उत्तर के साथ उसका कारण भी देते हैं । ऐसी बनावट में दो विकल्प एक ही दिशा में जा सकते हैं — यहाँ दो विकल्प नहीं से आरंभ होते हैं और दो हाँ से — इसलिए निर्णय पहले शब्द से नहीं, दिए गए कारण से करना पड़ता है । इसका अभ्यास लेखाशास्त्र में विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि वहाँ अनेक प्रश्न इसी शैली में बनते हैं । दूसरी बात, इस विषय में जो सबसे अधिक पूछा जाता है वह यही है कि कौन-सी त्रुटि मिलान को प्रभावित करती है और कौन-सी नहीं ; इसलिए दोनों सूचियाँ अलग-अलग बनाकर याद कीजिए ।
मुख्य तथ्य
- शेष परीक्षण के दोनों पक्षों का योग बराबर आना दोहरा लेखा प्रणाली की अपेक्षा है, पर व्यवहार में वह सदा बराबर नहीं आता ।
- जब योग नहीं मिलते तब उसका कोई न कोई निश्चित कारण होता है, और वह प्रायः एकपक्षीय भूल होती है ।
- एकपक्षीय भूलों के उदाहरण — केवल एक पक्ष चढ़ाना, एक पक्ष में रक़म ग़लत लिखना, शेष निकालने या जोड़ लगाने में चूक ।
- अंतर की रक़म अस्थायी रूप से उचंत खाता में डाल दी जाती है और भूल मिलते ही सुधार प्रविष्टि करके वह खाता बंद कर दिया जाता है ।
- दोनों पक्ष मिल जाना पूर्ण शुद्धता का प्रमाण नहीं है ; कई प्रकार की भूलें मिलान को प्रभावित ही नहीं करतीं ।
- मिलान से न पकड़ी जाने वाली भूलें हैं — पूर्ण लोप की त्रुटि, सिद्धांत की त्रुटि, समान श्रेणी के दूसरे खाते में लेखन, और प्रतिपूरक त्रुटि ।
- शेष परीक्षण किसी भी तिथि पर बनाया जा सकता है ; वर्ष के अंत में वह सबसे नियमित रूप से बनता है क्योंकि उसी से अंतिम खाते तैयार होते हैं ।
- इस प्रश्न में विकल्प उत्तर और कारण दोनों देते हैं, इसलिए निर्णय आरंभिक हाँ या नहीं से नहीं, दिए गए कारण से होता है ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- उत्तर-सहित-कारण वाले विकल्पों में केवल पहले शब्द से निर्णय कर लेना । दो विकल्प एक ही दिशा में जा सकते हैं ।
- यह मान लेना कि दोनों पक्ष मिल जाने से बहियाँ पूर्णतः शुद्ध सिद्ध हो जाती हैं ।
- मिलान बिगाड़ने वाली और न बिगाड़ने वाली त्रुटियों की सूचियाँ आपस में मिला देना ।
- उचंत खाता को कोई स्थायी खाता समझ लेना ; वह भूल मिलते ही बंद कर दिया जाता है ।
- शेष परीक्षण को केवल वर्ष के अंत का विवरण मान लेना ; वह किसी भी तिथि पर बनाया जा सकता है ।
लेखाशास्त्र के प्रश्नों में शेष परीक्षण और त्रुटियाँ एक जुड़ा हुआ विषय हैं, और उनसे प्रश्न प्रायः तीन रूपों में आते हैं — विवरण क्या है, वह क्यों बनाया जाता है, और कौन-सी त्रुटि उससे पकड़ी जाती है या नहीं पकड़ी जाती । इस प्रश्न का रूप कुछ असामान्य है, क्योंकि यह उत्तर के साथ कारण भी माँगता है । ऐसे प्रश्नों में हल करने का क्रम यह रखिए : पहले स्वयं तय कीजिए कि उत्तर हाँ है या नहीं, फिर उसी दिशा वाले विकल्पों में से उसे चुनिए जिसका कारण सही हो । यदि दो विकल्प एक ही दिशा में हों तो उनमें से एक का कारण अवश्य असंगत होगा — यही उस विकल्प को काटने की कसौटी है । दूसरी उपयोगी आदत यह है कि निरपेक्ष शब्दों पर ध्यान दीजिए । हमेशा, कभी नहीं, केवल जैसे शब्द विकल्प को बहुत कठोर बना देते हैं, और लेखांकन जैसे व्यावहारिक विषय में ऐसा कठोर कथन प्रायः ग़लत निकलता है ; पर इसे भी नियम मत बनाइए, क्योंकि कुछ परिभाषाएँ सचमुच निरपेक्ष होती हैं ।
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निम्नलिखित में से कौन-सी त्रुटि शेष परीक्षण के मिलान को प्रभावित नहीं करती ?
- (a)किसी प्रविष्टि का केवल एक पक्ष चढ़ाना
- (b)किसी खाते का शेष विवरण में उतारना भूल जाना
- (c)किसी लेनदेन का बहियों में पूर्णतः लोप हो जाना
- (d)स्तंभ का जोड़ ग़लत लगाना
उत्तर(c) किसी लेनदेन का बहियों में पूर्णतः लोप हो जाना — इसमें दोनों पक्ष समान रूप से प्रभावित होते हैं, इसलिए मिलान नहीं बिगड़ता ।