चालू देयताएँ कब देय होती हैं ?
- (a)एक वर्ष के भीतर
- (b)एक वर्ष के बाद, किंतु पाँच वर्षों के भीतर
- (c)पाँच वर्षों के भीतर
- (d)किसी आकस्मिकता के अधीन
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) एक वर्ष के भीतर । चालू देयता वह दायित्व है जिसका निपटान सामान्यतः एक वर्ष के भीतर करना होता है । यही उसकी पहचान है और यही उसे दीर्घकालीन अथवा ग़ैर-चालू देयता से अलग करता है, जिसका भुगतान एक वर्ष से आगे जाता है । उदाहरण से बात और साफ़ हो जाती है । चालू देयताओं में लेनदार अर्थात् व्यापारिक देय, देय विपत्र, बकाया व्यय जैसे अदत्त वेतन, किराया या बिजली का बिल, बैंक अधिविकर्ष, अल्पकालीन उधार, कर के लिए किया गया प्रावधान, अदावाकृत लाभांश और किसी दीर्घकालीन ऋण की वे किस्तें आती हैं जो आगामी वर्ष में देय हो जाती हैं । दूसरी ओर ऋणपत्र, बंधक ऋण और बैंकों से लिए गए दीर्घकालीन ऋण ग़ैर-चालू देयताएँ हैं । यह वर्गीकरण केवल शास्त्रीय बात नहीं है, चिट्ठे में उसका सीधा उपयोग है । कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची III चिट्ठे का जो प्रारूप देती है उसमें देयताएँ और परिसंपत्तियाँ दोनों चालू तथा ग़ैर-चालू में बाँटकर दिखाई जाती हैं । वहाँ चालू की कसौटी भी दी है — जिसका निपटान इकाई के सामान्य प्रचालन चक्र में हो जाए, या जो मुख्यतः व्यापार के प्रयोजन से रखी गई हो, या जो रिपोर्टिंग तिथि से बारह मास के भीतर देय हो, या जिसके निपटान को बारह मास से आगे टालने का इकाई को बिना शर्त अधिकार न हो । अर्थात् बारह मास वाली कसौटी सामान्य नियम है और प्रचालन चक्र उसका दूसरा पक्ष, जो उन उद्योगों के लिए रखा गया है जहाँ चक्र स्वयं एक वर्ष से लंबा होता है । विश्लेषण की दृष्टि से भी यह वर्ग महत्वपूर्ण है, क्योंकि कार्यशील पूँजी चालू परिसंपत्तियों में से चालू देयताएँ घटाकर निकाली जाती है और चालू अनुपात इन्हीं दोनों का अनुपात है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)एक वर्ष के बाद, किंतु पाँच वर्षों के भीतर — यह अवधि किसी मान्य वर्ग की पहचान नहीं है । लेखांकन में देयताओं का मूल विभाजन दो में है — चालू और ग़ैर-चालू — और उसकी रेखा एक वर्ष पर खिंचती है, पाँच वर्ष पर नहीं । जिस दायित्व का भुगतान एक वर्ष के बाद होना है वह ग़ैर-चालू देयता है, चाहे वह दो वर्ष में चुकाना हो या पंद्रह वर्ष में । पाँच वर्ष का अंक लेखांकन के इस प्रसंग में कहीं नहीं आता ; हाँ, वह श्रम विधि में मिलता है, जहाँ उपदान संदाय अधिनियम में पाँच वर्ष की निरंतर सेवा की शर्त है । विषय बदलते ही संख्याएँ भी बदल जाती हैं, इसलिए हर विषय की संख्याएँ अलग-अलग दर्ज कीजिए, अन्यथा एक विषय का अंक दूसरे विषय के प्रश्न में उत्तर जैसा लगने लगता है ।
- (c)पाँच वर्षों के भीतर — यदि पाँच वर्ष की सीमा मान ली जाए तो चालू देयता की पूरी उपयोगिता ही समाप्त हो जाएगी । इस वर्ग का प्रयोजन यह बताना है कि निकट भविष्य में इकाई पर कितना भुगतान-भार आने वाला है, ताकि यह देखा जा सके कि उसके पास उतनी नक़दी और शीघ्र नक़दी में बदलने योग्य परिसंपत्तियाँ हैं या नहीं । यही कारण है कि चालू अनुपात और तरल अनुपात इसी वर्ग पर टिके हैं और कार्यशील पूँजी भी इसी से निकलती है । पाँच वर्ष में देय दायित्व का इस विश्लेषण से कोई संबंध नहीं, क्योंकि उसके लिए इकाई के पास तैयारी का लंबा समय है । अतः यह विकल्प वर्ग की परिभाषा भी बदल देता है और उसके उपयोग को भी निरर्थक कर देता है ।
- (d)किसी आकस्मिकता के अधीन — यह वाक्य एक दूसरी धारणा का वर्णन है — आकस्मिक देयता का । आकस्मिक देयता वह संभावित दायित्व है जो किसी अनिश्चित भावी घटना के घटने पर ही उत्पन्न होगा, जैसे न्यायालय में लंबित कोई वाद, किसी के लिए दी गई गारंटी, या विवादित कर माँग । उसकी विशेषता यही है कि वह अभी दायित्व है ही नहीं, इसलिए उसे चिट्ठे के भीतर रक़म के रूप में नहीं दिखाया जाता, बल्कि लेखों की टिप्पणी के रूप में प्रकट किया जाता है । चालू देयता इसके ठीक विपरीत है : वहाँ दायित्व निश्चित है और केवल भुगतान का समय निकट है । दोनों को अलग रखने का सरल सूत्र यही है — चालू देयता में प्रश्न कब का है, आकस्मिक देयता में प्रश्न क्या होगा तो का ।
अवधारणा
चिट्ठे में देयताएँ और परिसंपत्तियाँ दोनों समय के आधार पर दो-दो वर्गों में बाँटी जाती हैं । चालू देयताएँ वे हैं जिनका निपटान सामान्य प्रचालन चक्र में या एक वर्ष के भीतर होना है — लेनदार, देय विपत्र, बकाया व्यय, बैंक अधिविकर्ष, अल्पकालीन उधार, कर का प्रावधान और दीर्घकालीन ऋण की आगामी किस्तें । ग़ैर-चालू देयताएँ वे हैं जो एक वर्ष से आगे जाती हैं — ऋणपत्र, बंधक और दीर्घकालीन ऋण । इसी प्रकार चालू परिसंपत्तियाँ वे हैं जो एक वर्ष में नक़दी में बदल जाने की आशा हो — रोकड़, बैंक शेष, देनदार, प्राप्य विपत्र, रहतिया और पूर्वदत्त व्यय — जबकि स्थायी परिसंपत्तियाँ भवन, मशीन और फ़र्नीचर जैसी दीर्घकालीन मदें हैं । कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची III कंपनियों के लिए यही प्रारूप निर्धारित करती है और चालू होने की कसौटी भी देती है । इसी वर्गीकरण से वित्तीय विश्लेषण के कई माप निकलते हैं : कार्यशील पूँजी अर्थात् चालू परिसंपत्तियाँ घटा चालू देयताएँ, चालू अनुपात, और तरल अनुपात जिसमें रहतिया तथा पूर्वदत्त व्यय छोड़ दिए जाते हैं ।
एक वर्ष की यह सीमा प्रयोग करते समय दो सावधानियाँ आवश्यक हैं । पहली, गिनती चिट्ठे की तिथि से होती है, दायित्व उत्पन्न होने की तिथि से नहीं ; इसीलिए दस वर्ष के ऋण की वह किस्त जो अगले बारह मास में देय है, चालू देयता के रूप में अलग दिखाई जाती है । दूसरी, प्रचालन चक्र वाली कसौटी उन उद्योगों के लिए रखी गई है जहाँ कच्चे माल से लेकर वसूली तक का चक्र स्वयं एक वर्ष से लंबा होता है, जैसे निर्माण या जहाज़रानी ; वहाँ चक्र के भीतर निपटने वाला दायित्व एक वर्ष से आगे होने पर भी चालू ही माना जाता है । परीक्षा में सामान्यतः बारह मास वाली सीधी कसौटी ही पूछी जाती है, पर यह जानना उपयोगी है कि नियम एकांगी नहीं है ।
मुख्य तथ्य
- चालू देयता वह दायित्व है जिसका निपटान सामान्यतः एक वर्ष के भीतर, अथवा इकाई के सामान्य प्रचालन चक्र में करना होता है ।
- चालू देयताओं के उदाहरण — लेनदार, देय विपत्र, बकाया व्यय, बैंक अधिविकर्ष, अल्पकालीन उधार और कर का प्रावधान ।
- किसी दीर्घकालीन ऋण की वे किस्तें जो आगामी बारह मास में देय हैं, चिट्ठे में चालू देयता के रूप में अलग दिखाई जाती हैं ।
- ग़ैर-चालू अथवा दीर्घकालीन देयताओं में ऋणपत्र, बंधक ऋण और बैंकों से लिए गए दीर्घकालीन ऋण आते हैं ।
- कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची III चिट्ठे का प्रारूप देती है और चालू तथा ग़ैर-चालू की कसौटी निर्धारित करती है ।
- कार्यशील पूँजी चालू परिसंपत्तियों में से चालू देयताएँ घटाकर निकाली जाती है ।
- चालू अनुपात चालू परिसंपत्तियों और चालू देयताओं का अनुपात है ; तरल अनुपात में रहतिया तथा पूर्वदत्त व्यय छोड़ दिए जाते हैं ।
- आकस्मिक देयता किसी अनिश्चित भावी घटना पर निर्भर संभावित दायित्व है और उसे चिट्ठे में नहीं, टिप्पणी में प्रकट किया जाता है ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- एक वर्ष की गिनती दायित्व उत्पन्न होने की तिथि से करना । गिनती चिट्ठे की तिथि से होती है ।
- दीर्घकालीन ऋण की आगामी किस्तों को भी ग़ैर-चालू में रख देना ; वे चालू देयता के रूप में अलग दिखाई जाती हैं ।
- आकस्मिक देयता को चालू देयता समझ लेना । पहली अनिश्चित घटना पर निर्भर है और चिट्ठे में रक़म के रूप में नहीं आती ।
- किसी दूसरे विषय की संख्या यहाँ लगा देना, जैसे उपदान संदाय अधिनियम की पाँच वर्ष की सेवा ।
- प्रचालन चक्र वाली कसौटी भूल जाना । लंबे चक्र वाले उद्योगों में एक वर्ष से आगे का दायित्व भी चालू हो सकता है ।
लेखाशास्त्र के प्रश्न इस पेपर में दो खंडों में आते हैं और उनमें से एक बड़ा भाग परिभाषा और वर्गीकरण का होता है । ऐसे प्रश्नों में विकल्प प्रायः समय की चार अवधियाँ या चार श्रेणियाँ होते हैं, और उत्तर वही है जो पाठ्यपुस्तक की परिभाषा से अक्षरशः मिलता हो । इसलिए तैयारी में परिभाषाओं को उन्हीं शब्दों में याद कीजिए जिनमें वे लिखी जाती हैं, और साथ में तीन-चार उदाहरण भी जोड़ लीजिए, क्योंकि प्रश्न कभी परिभाषा पूछता है और कभी उदाहरण । दूसरी उपयोगी आदत यह है कि हर जोड़े को आमने-सामने रखकर पढ़िए — चालू और ग़ैर-चालू देयता, चालू और स्थायी परिसंपत्ति, पूँजीगत और आयगत व्यय, आकस्मिक देयता और प्रावधान । जहाँ पाठ्यपुस्तक स्वयं दो धारणाओं को आमने-सामने रखती है, वहीं से प्रश्न बनता है और वहीं विकल्पों में अदला-बदली की जाती है । तीसरी बात, संख्याओं को विषय के साथ बाँधकर याद रखिए, क्योंकि इस पेपर में श्रम विधि और लेखाशास्त्र दोनों के प्रश्न पास-पास आते हैं ।
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उत्तर(a) चालू परिसंपत्तियाँ घटा चालू देयताएँ — यही कार्यशील पूँजी की परिभाषा है ।