आइन-ए-अक़बरी में मुग़ल शासन की सरहदों के भीतर किसे बढ़ावा देने का प्रयास किया गया था ?
- (a)कुलीनता की सनकों से प्रभावित सामाजिक असमरसता
- (b)प्रांतीय इकाइयों की केंद्रीय शासन से समाप्ति
- (c)शक्तिशाली शासक वर्ग के समर्थन से सामाजिक समरसता
- (d)मुग़ल आधिपत्य को समाप्त कर ग्रामीण गणतंत्रों के शासन की स्थापना
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) शक्तिशाली शासक वर्ग के समर्थन से सामाजिक समरसता । आइन-ए-अकबरी अबुल फ़ज़ल की रचना है और वह अकबरनामा का तीसरा तथा अंतिम भाग है । अबुल फ़ज़ल अकबर के दरबार का इतिहासकार ही नहीं, उसकी शासन-दृष्टि का सिद्धांतकार भी था, और यह ग्रंथ उसी दृष्टि को व्यवस्थित रूप में रखने के लिए लिखा गया । इसीलिए इसे केवल आँकड़ों का संग्रह मानकर पढ़ना भूल होगी : आँकड़े इस बात के प्रमाण के रूप में रखे गए हैं कि साम्राज्य सुव्यवस्थित है, उसकी भूमि नापी हुई है, उसका राजस्व निश्चित है, उसकी सेना गिनी हुई है और उसके अधिकारी श्रेणीबद्ध हैं । इस पूरी प्रस्तुति के पीछे जो विचार है वह यही है कि एक सुदृढ़ शासक वर्ग के सहारे साम्राज्य की सीमाओं के भीतर सामाजिक समरसता बनी रह सकती है — भिन्न मत, भिन्न संप्रदाय और भिन्न वर्ग अपने-अपने स्थान पर रहते हुए एक व्यवस्था में बँधे रह सकते हैं । यही अकबर की सुलह-ए-कुल अर्थात् पूर्ण शांति की नीति का वैचारिक आधार भी है, जिसे अबुल फ़ज़ल बार-बार दोहराता है : बादशाह किसी एक संप्रदाय का नहीं, सब प्रजा का संरक्षक है, और उसकी न्यायपूर्ण संप्रभुता के नीचे मतभेद टकराव में नहीं बदलते । ग्रंथ का ढाँचा इसी विचार के अनुरूप है । पहली पुस्तक शाही घराने और उसके विभागों का वर्णन करती है, दूसरी सेना तथा सेवकों का, तीसरी साम्राज्य के प्रांतों का — सूबों के आँकड़े, नापी गई भूमि, राजस्व की दरें और स्थानीय विवरण — चौथी भारत के धार्मिक, दार्शनिक और सामाजिक जीवन का, और पाँचवीं अकबर के कथनों तथा स्वयं अबुल फ़ज़ल के परिवार का । इसीलिए विकल्प (c) वही कहता है जो ग्रंथ अपने पूरे विन्यास से कहता है, और शेष तीनों उसके ठीक विपरीत दिशा में जाते हैं ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)कुलीनता की सनकों से प्रभावित सामाजिक असमरसता — यह विकल्प ग्रंथ के उद्देश्य को उलटकर रख देता है । दरबारी इतिहास कभी यह घोषित नहीं करता कि वह असमरसता को बढ़ावा देना चाहता है, और आइन तो विशेष रूप से व्यवस्था, क्रम और संतुलन की छवि गढ़ने के लिए लिखी गई है । अबुल फ़ज़ल की प्रस्तुति में कुलीन वर्ग अर्थात् मनसबदार सनक से नहीं, नियम से चलते हैं : उनका पद ज़ात और सवार की श्रेणियों से निश्चित होता है, उनकी नियुक्ति और स्थानांतरण बादशाह के हाथ में रहते हैं, और वे किसी क्षेत्र में जड़ें जमा न सकें इसके लिए उन्हें बदलते रहा जाता है । इस व्यवस्था का सारा प्रयोजन यही है कि कुलीनों की मनमानी पर अंकुश रहे । जो ग्रंथ अपने शासक वर्ग को अनुशासित दिखाना चाहता है, वह उसकी सनकों को अपना ध्येय नहीं बताएगा ।
- (b)प्रांतीय इकाइयों की केंद्रीय शासन से समाप्ति — आइन का पूरा तीसरा भाग ठीक इसके विपरीत काम करता है — वह प्रांतों को केंद्र से जोड़कर दिखाता है, अलग होते हुए नहीं । अकबर ने 1580 में साम्राज्य को सूबों में बाँटा और हर सूबे में सूबेदार, दीवान, बख़्शी, सद्र, फ़ौजदार और कोतवाल जैसे अधिकारी नियुक्त किए, जिनके अधिकार आपस में इस प्रकार बँटे थे कि कोई एक अधिकारी स्वतंत्र न हो जाए । आइन इन्हीं सूबों का ब्योरा देती है — नापी गई भूमि, राजस्व की दरें, स्थानीय उपज, जातियाँ और दूरियाँ — और यह ब्योरा ही केंद्र की पकड़ का प्रमाण है, क्योंकि जिसे नापा और लिखा जा सके उसी पर शासन किया जा सकता है । केंद्र से प्रांतों को अलग करना किसी दरबारी ग्रंथ का ध्येय हो ही नहीं सकता ।
- (d)मुग़ल आधिपत्य को समाप्त कर ग्रामीण गणतंत्रों के शासन की स्थापना — यह विकल्प केवल इसलिए रखा गया है कि विकल्पों में एक स्पष्ट रूप से असंभव वाक्य भी रहे । आइन-ए-अकबरी अकबर के अपने दरबार में, उसी के संरक्षण में, उसी के सबसे निकट के विचारक द्वारा लिखी गई है ; उसमें मुग़ल आधिपत्य समाप्त करने का प्रस्ताव खोजना उस ग्रंथ की प्रकृति ही न समझना है । इसके अतिरिक्त ग्रामीण गणतंत्र की धारणा उन्नीसवीं शताब्दी की देन है, जब औपनिवेशिक अधिकारियों और बाद में राष्ट्रवादी लेखकों ने भारतीय ग्राम को स्वायत्त और आत्मनिर्भर इकाई के रूप में चित्रित किया । सोलहवीं शताब्दी के दरबारी ग्रंथ पर उस धारणा को चढ़ाना काल-दोष है । ऐसे विकल्प वस्तुनिष्ठ परीक्षा में सबसे पहले काटे जाने चाहिए ।
अवधारणा
अकबरनामा अबुल फ़ज़ल की लिखी अकबर की सरकारी इतिहास-रचना है और उसके तीन भाग हैं । पहले दो भाग कालक्रम के अनुसार घटनाओं का विवरण देते हैं और तीसरा भाग आइन-ए-अकबरी कहलाता है, जो घटनाओं के बजाय व्यवस्था का विवरण है — प्रशासन, दरबार, सेना, राजस्व, प्रांत और समाज । यह ग्रंथ 1598 में, अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष में, पाँच बार संशोधन के बाद पूरा हुआ । इसके पाँच खंड हैं : मंज़िल-आबादी में शाही घराना और उसके कारख़ाने ; सिपह-आबादी में सैनिक तथा असैनिक सेवक और मनसबदारी व्यवस्था ; मुल्क-आबादी में साम्राज्य के सूबों का विस्तृत सांख्यिकीय विवरण, जिसमें नापी गई भूमि अर्थात् आराज़ी और राजस्व की दरें आती हैं ; चौथे खंड में भारत के धार्मिक, दार्शनिक और सामाजिक जीवन का वर्णन ; और पाँचवें में अकबर के कथन तथा लेखक का अपना परिचय । इसी ग्रंथ से मुग़ल राजस्व व्यवस्था की जानकारी मिलती है — ज़ब्त अथवा दहसाला पद्धति, जो टोडरमल से जुड़ी है और जिसमें दस वर्ष की उपज तथा क़ीमतों के औसत पर नक़दी में लगान तय होता था ।
आइन-ए-अकबरी को स्रोत के रूप में पढ़ते समय दो बातें साथ रखनी चाहिए । पहली, यह किसी तटस्थ पर्यवेक्षक की रचना नहीं, बादशाह की व्यवस्था को न्यायसंगत ठहराने वाली रचना है ; उसके आँकड़े मूल्यवान हैं पर उसकी दृष्टि सत्ता की है । दूसरी, इसके आँकड़े स्वयं भी असमान हैं — कहीं बहुत विस्तार है और कहीं ब्योरे अधूरे, और उनका जोड़ हर जगह मिलता भी नहीं । इतिहासकार इसी कारण उसे सावधानी से और अन्य स्रोतों के साथ मिलाकर पढ़ते हैं । फिर भी सोलहवीं शताब्दी के भारत की कृषि, राजस्व, प्रशासन और समाज पर इससे अधिक व्यवस्थित कोई एक स्रोत नहीं है, इसलिए मुग़ल काल के अधिकांश पाठ इसी पर टिके हैं । परीक्षा में इस ग्रंथ से प्रश्न प्रायः तीन दिशाओं से आते हैं — लेखक कौन था, यह किस बड़े ग्रंथ का भाग है, और इसका उद्देश्य अथवा विषय-वस्तु क्या थी ।
मुख्य तथ्य
- आइन-ए-अकबरी अबुल फ़ज़ल की रचना है और अकबरनामा का तीसरा तथा अंतिम भाग है ; यह घटनाओं का नहीं, व्यवस्था का विवरण देती है ।
- यह ग्रंथ 1598 में, अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष में, पाँच बार संशोधन के बाद पूरा हुआ ।
- इसके पाँच खंड हैं — शाही घराना, सेना तथा सेवक, साम्राज्य के सूबों का सांख्यिकीय विवरण, भारत का धार्मिक तथा सामाजिक जीवन, और अकबर के कथन ।
- ग्रंथ की मूल दृष्टि यह है कि एक सुदृढ़ शासक वर्ग के सहारे साम्राज्य के भीतर सामाजिक समरसता बनाए रखी जा सकती है ।
- यह दृष्टि अकबर की सुलह-ए-कुल अर्थात् पूर्ण शांति की नीति से जुड़ी है, जिसमें बादशाह किसी एक संप्रदाय का नहीं, सारी प्रजा का संरक्षक माना गया ।
- अकबर ने 1580 में साम्राज्य को सूबों में बाँटा ; हर सूबे में सूबेदार, दीवान, बख़्शी, सद्र, फ़ौजदार और कोतवाल के अधिकार आपस में बँटे रहते थे ।
- मनसबदारी व्यवस्था में अधिकारी का पद ज़ात से और उसके अश्वारोहियों की संख्या सवार से निश्चित होती थी ।
- ज़ब्त अथवा दहसाला राजस्व पद्धति टोडरमल से जुड़ी है, जिसमें दस वर्ष की उपज और क़ीमतों के औसत पर नक़दी में लगान तय किया जाता था ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- आइन-ए-अकबरी को स्वतंत्र ग्रंथ मान लेना । वह अकबरनामा का तीसरा भाग है, और प्रश्न प्रायः यही संबंध पूछते हैं ।
- लेखक के नाम में भ्रम । अकबरनामा अबुल फ़ज़ल ने लिखा ; बदायूँनी और निज़ामुद्दीन अहमद उसी काल के अन्य लेखक हैं ।
- आइन को तटस्थ आँकड़ों का संग्रह मान लेना । वह दरबार की दृष्टि से लिखा गया ग्रंथ है और उसका उद्देश्य व्यवस्था को न्यायसंगत ठहराना है ।
- ग्रामीण गणतंत्र जैसी उन्नीसवीं शताब्दी की धारणाओं को सोलहवीं शताब्दी के ग्रंथ पर चढ़ा देना ।
- ज़ात और सवार का अर्थ उलट देना । ज़ात पद की श्रेणी बताता है और सवार अश्वारोहियों की संख्या ।
इतिहास इस प्रश्नपत्र का सबसे बड़ा खंड है और उसमें मध्यकाल से हर बार दो-तीन प्रश्न रहते हैं, जिनमें मुग़ल काल का हिस्सा सबसे बड़ा होता है । ऐसे प्रश्न प्रायः ग्रंथ और लेखक के जोड़े पर, या किसी ग्रंथ के उद्देश्य पर बनते हैं । इस प्रश्न का ढाँचा ध्यान देने योग्य है : चार में से तीन विकल्प उस ग्रंथ की मूल दृष्टि के विपरीत जाते हैं, इसलिए विषय-वस्तु ठीक-ठीक याद न हो तब भी यह पूछकर उत्तर तक पहुँचा जा सकता है कि दरबार में, बादशाह के संरक्षण में लिखा गया ग्रंथ किस दिशा में झुकेगा । यह तर्क हर दरबारी स्रोत पर लगता है, इसलिए उसे एक सामान्य औज़ार की तरह याद रखिए । साथ ही हर बड़े स्रोत के लिए तीन बातें एक पंक्ति में लिख लीजिए — लेखक, संरक्षक शासक और मुख्य विषय — क्योंकि प्रश्न प्रायः इन्हीं तीनों में से किसी एक पर आते हैं ।
संबंधित PYQ
EPFO_EOAO_2020_Q92खोलें व हल करें →Which one of the following statements about the situation in the Ryotwari areas is correct ?
- (a) A large amount of land passed into the hands of the money lenders, merchants and rich peasants, who usually utilised the services of the tenants.
- (b) Landless labourers became the land owners.
- (c) It stopped the practice of leasing out land to tenants at high prices.
- (d) Landlordism was totally destroyed.
उत्तर(a) A large amount of land passed into the hands of the money lenders, merchants and rich peasants, who usually utilised the services of the tenants.
इसी पेपर का भू-राजस्व संबंधी प्रश्न — रैयतवाड़ी क्षेत्रों में भूमि किसके हाथों में चली गई ।
EPFO_EOAO_2020_Q75खोलें व हल करें →Which one of the following was not recommended in Macaulay's 1835 Minute on Education ?
- (a) Teaching in English medium
- (b) ‘Liberal’ literary training
- (c) Teaching of Western texts alone at higher levels of education
- (d) Teaching of both Western and Oriental texts at higher levels of education
उत्तर(d) Teaching of both Western and Oriental texts at higher levels of education
इतिहास खंड का एक और स्रोत-आधारित प्रश्न — मैकॉले के 1835 के कार्यवृत्त की अनुशंसाएँ ।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
आइन-ए-अकबरी निम्नलिखित में से किस बड़े ग्रंथ का भाग है और उसके लेखक कौन थे ?
- (a)बादशाहनामा, अब्दुल हमीद लाहौरी
- (b)अकबरनामा, अबुल फ़ज़ल
- (c)तुज़्क-ए-जहाँगीरी, जहाँगीर
- (d)मुंतख़ब-उत-तवारीख़, बदायूँनी
उत्तर(b) अकबरनामा, अबुल फ़ज़ल — आइन-ए-अकबरी अकबरनामा का तीसरा तथा अंतिम भाग है ।
- practice — not a real PYQ
मुग़ल मनसबदारी व्यवस्था में किसी अधिकारी द्वारा रखे जाने वाले अश्वारोहियों की संख्या निम्नलिखित में से किससे निर्धारित होती थी ?
- (a)ज़ात
- (b)सवार
- (c)जागीर
- (d)दस्तूर
उत्तर(b) सवार — ज़ात पद की श्रेणी बताता था और सवार अश्वारोहियों की संख्या ।