‘निर्गुण भक्ति’ का संबंध निम्नलिखित में से किससे है ?
- (a)शैव स्वरूप की उपासना
- (b)वैष्णव स्वरूप की उपासना
- (c)अवतार की उपासना
- (d)ईश्वर के निराकार स्वरूप की उपासना
उत्तर
क्यों
आयोग ने इस प्रश्न को निरस्त कर दिया । इसकी अंतिम उत्तर-कुंजी में, जहाँ शेष हर प्रश्न के सामने कोई अक्षर छपा है, वहाँ इसके सामने X छपा है, और कुंजी के मुख पर दर्ज है कि एक प्रश्न हटा दिया गया तथा शेष 119 प्रश्न ही मूल्यांकन में लिए गए । इसका सीधा अर्थ यह है कि इस प्रश्न पर चारों में से कोई विकल्प मान्य नहीं है और यहाँ किसी विकल्प को सही या ग़लत ठहराने का कोई आधार नहीं बचता । ध्यान देने योग्य बात यह है कि पुस्तिका में कहीं कोई संकेत नहीं है कि यह प्रश्न हटाया जाने वाला है — वह अपने पृष्ठ पर बिल्कुल वैसे ही छपा है जैसे उसके आगे-पीछे के प्रश्न, और परीक्षा देने वाले अभ्यर्थी ने उसे सामान्य प्रश्न की तरह ही हल किया होगा । यह बात केवल कुंजी में है, और आयोग ऐसे निर्णय का कारण प्रकाशित नहीं करता । इसलिए इसे इन चार वाक्यांशों में से किसी पर आयोग की टिप्पणी मत समझिए ; यह अंकन से जुड़ा तथ्य है, विषय-वस्तु पर निर्णय नहीं । अब विषय पर आइए, क्योंकि निर्गुण भक्ति की सामग्री हर उस पाठ्यक्रम में है जो मध्यकालीन भक्ति आंदोलन को छूता है, और उसे इस प्रश्न के कारण छोड़ देना अपना ही नुक़सान करना होगा । निर्गुण संस्कृत का सामासिक शब्द है — निर् अर्थात् बिना, और गुण अर्थात् विशेषता या लक्षण । निर्गुण भक्ति उस परमसत्ता की उपासना है जिसे किसी रूप, आकार, नाम, लिंग या अवतार में नहीं बाँधा जाता । उसकी साधना भीतर की है : गुरु का शब्द, नाम का स्मरण, सत्संग और लोकभाषा में गाया गया पद — मंदिर, मूर्ति, तीर्थ और पुरोहित के बिना । इसके सामने सगुण भक्ति है, जिसमें परमसत्ता रूप धारण करती है, उसका नाम और कथा होती है, और उसे मूर्ति में सजाया, भोग लगाया तथा दर्शन किया जाता है — राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा । यह भेद भक्ति आंदोलन से भी पुराना है और वेदांत से आता है, जहाँ निर्गुण ब्रह्म गुणों से परे सत्ता है और सगुण ब्रह्म अथवा ईश्वर वही सत्ता उपासना के योग्य रूप में । हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल को इसी आधार पर दो धाराओं में बाँटा जाता है — निर्गुण धारा, जिसकी ज्ञानाश्रयी शाखा में कबीर, रैदास, नानक और दादू दयाल आते हैं तथा प्रेमाश्रयी शाखा में जायसी जैसे सूफ़ी कवि ; और सगुण धारा, जिसकी रामभक्ति शाखा में तुलसीदास और कृष्णभक्ति शाखा में सूरदास तथा मीराबाई । एक सावधानी अंत में : ये कोटियाँ संप्रदाय की नहीं, दृष्टि की हैं । कबीर का राम वैष्णव नाम होते हुए भी निराकार है, शैव परंपरा में मूर्ति-पूजा भी है और मूर्ति से परे दार्शनिक धाराएँ भी, और एक ही कवि की एक रचना सगुण तथा दूसरी निर्गुण सुनाई दे सकती है । इस प्रश्न के चारों वाक्यांश भी एक ही स्तर के नहीं हैं — दो संप्रदाय का नाम लेते हैं, एक उपासना की एक पद्धति का, और एक ईश्वर की धारणा का ; इस मिश्रण को पहचानना आगे किसी भी ऐसे प्रश्न में काम आएगा ।
अवधारणा
मध्यकालीन भारत की भक्ति परंपराओं को दो कसौटियों पर पढ़ा जाता है । पहली कसौटी ईश्वर की धारणा की है : सगुण, अर्थात् गुणों और रूप सहित, तथा निर्गुण, अर्थात् गुणों और रूप से परे । सगुण भक्ति किसी नामधारी देवता से जुड़ती है जिसकी कथा और मूर्ति होती है — तुलसीदास के राम, सूरदास, मीराबाई, चैतन्य और वल्लभाचार्य के कृष्ण, महाराष्ट्र के वारकरी संतों ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम के विट्ठल — और उसकी साधना में दर्शन, मूर्ति-पूजा, तीर्थ और उत्सव आते हैं । निर्गुण भक्ति निराकार परमसत्ता से जुड़ती है और उसकी साधना भीतर की है : नाम का स्मरण, गुरु का शब्द और लोकभाषा में गाया पद । दूसरी कसौटी सामाजिक है । निर्गुण संत बड़े भाग में कारीगर और तथाकथित निचली जातियों से आए — कबीर जुलाहे, रैदास चर्मकार, नामदेव दर्ज़ी, सेना नाई — और उनकी वाणी ने जाति की ऊँच-नीच, कर्मकांड के विशेषज्ञों तथा संस्कृत शास्त्रों के एकाधिकार पर सीधी चोट की । वे अकेले नहीं थे : दक्षिण के आळवार और नायनार संत छठी शताब्दी से यही काम कर रहे थे, बारहवीं शताब्दी के कर्नाटक में बसवण्णा का वीरशैव अथवा लिंगायत आंदोलन उठा, और उत्तर भारत में सूफ़ी सिलसिलों की प्रेम, पीर और लोकभाषा पर बल देने वाली धारा संतों के समानांतर बहती रही ।
निर्गुण भक्ति के प्रश्न प्रायः दो-तीन नामों और एक-दो ग्रंथों पर आकर टिकते हैं, इसलिए उन्हें एक साथ याद रखना चाहिए । कबीर की वाणी बीजक, कबीर ग्रंथावली और आदि ग्रंथ में सुरक्षित है और उसके तीन रूप गिनाए जाते हैं — साखी, सबद और रमैनी । गुरु नानक की शिक्षा का सार इक ओंकार में है, अर्थात् वह एक निराकार सृष्टिकर्ता । गुरु अर्जन देव ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन किया, जिसमें सिख गुरुओं की वाणी के साथ कबीर, रैदास, नामदेव और शेख फ़रीद जैसे संतों तथा सूफ़ियों की रचनाएँ भी सम्मिलित की गईं । यह संकलन स्वयं इस बात का प्रमाण है कि निर्गुण धारा किसी एक संप्रदाय की संपत्ति नहीं थी । परीक्षा की दृष्टि से यह विषय इसलिए लौटता है कि थोड़े शब्दों में बहुत सारी शब्दावली समेटता है — निर्गुण और सगुण, संत और सूफ़ी, आळवार और नायनार, अवतार और दर्शन — और वही शब्दावली भाषा, समाज-सुधार तथा बाद के आंदोलनों के प्रश्नों में भी काम आती है ।
मुख्य तथ्य
- निर्गुण का अर्थ है गुणों अथवा लक्षणों से रहित ; सगुण का अर्थ है गुणों सहित । यह भेद बताता है कि ईश्वर की कल्पना कैसे की गई है, न कि उपासक किस संप्रदाय का है ।
- निर्गुण भक्ति निराकार और अरूप परमसत्ता की उपासना है, जो गुरु के शब्द, नाम के स्मरण और भीतर की साधना से की जाती है, मूर्ति, मंदिर या कर्मकांड से नहीं ।
- सगुण भक्ति में परमसत्ता रूप, नाम और कथा धारण करती है — राम, कृष्ण, शिव, देवी — और मूर्ति-पूजा, अवतार तथा दर्शन उसकी स्वाभाविक शब्दावली हैं ।
- यह भेद वेदांत से आता है, जहाँ निर्गुण ब्रह्म गुणों से परे सत्ता है और सगुण ब्रह्म अथवा ईश्वर वही सत्ता उपासना के योग्य रूप में ।
- उत्तर भारत के प्रमुख निर्गुण संत हैं कबीर, गुरु नानक, रैदास और दादू दयाल ; प्रमुख सगुण कवि हैं तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई और चैतन्य ।
- कबीर की वाणी बीजक, कबीर ग्रंथावली और आदि ग्रंथ में मिलती है, और उसके तीन रूप गिनाए जाते हैं — साखी, सबद और रमैनी ।
- गुरु अर्जन देव ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन किया, जिसमें कबीर, रैदास, नामदेव और शेख फ़रीद की रचनाएँ भी सम्मिलित हैं ।
- हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल निर्गुण धारा — ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी शाखा — तथा सगुण धारा — रामभक्ति और कृष्णभक्ति शाखा — में बाँटा जाता है ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- निर्गुण और सगुण को आपस में उलट देना । शब्द तोड़कर देखिए — निर् अर्थात् बिना, स अर्थात् सहित, और गुण अर्थात् लक्षण ।
- यह मान लेना कि संप्रदाय से ही निर्णय हो जाएगा । शैव और वैष्णव दोनों परंपराओं में मूर्ति-पूजा भी है और निराकार धारणा भी ।
- भक्ति आंदोलन को एक संगठन और एक संस्थापक वाला आंदोलन समझ लेना । वह कई शताब्दियों में फैली अनेक क्षेत्रीय धाराओं का समूह है ।
- मध्यकालीन भक्ति की सामाजिक आलोचना को उन्नीसवीं शताब्दी के सुधार आंदोलनों से मिला देना । समानता है, पर काल और कारण अलग हैं ।
- यह मान लेना कि हर निचली जाति का संत निर्गुण था और हर ब्राह्मण कवि सगुण । यह प्रवृत्ति है, नियम नहीं ।
इस प्रश्नपत्र में इतिहास सबसे बड़ा एकल खंड है और उसका बड़ा भाग आधुनिक भारत तथा राष्ट्रीय आंदोलन से आता है, पर हर सिटिंग में मध्यकाल से भी कुछ प्रश्न रखे जाते हैं — दिल्ली सल्तनत, मुग़ल शासन तथा भक्ति और सूफ़ी परंपराओं पर । ऐसे प्रश्न प्रायः एक पंक्ति के स्मरण वाले होते हैं : कोई शब्द, कोई ग्रंथ या कोई व्यक्ति । भक्ति की शब्दावली — निर्गुण और सगुण, संत, अवतार, आळवार और नायनार — इस विषय का सबसे अधिक पूछा जाने वाला हिस्सा है, क्योंकि उसमें विकल्प छोटे वाक्यांश होते हैं और तर्क से काम नहीं चलता । इसलिए जोड़े बनाकर याद कीजिए : हर धारा के सामने उसके दो-तीन प्रतिनिधि नाम, हर नाम के सामने उसका ग्रंथ, और हर ग्रंथ के सामने उसका संकलन-वर्ष जहाँ वह प्रसिद्ध हो । हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थी को यहाँ एक लाभ है — हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल का यही विभाजन पढ़ाया जाता है, और वही ढाँचा इतिहास के प्रश्नों में सीधे काम आ जाता है ।
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अभ्यास
- practice — not a real PYQ
हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल की निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी शाखा का प्रतिनिधि कवि निम्नलिखित में से किसे माना जाता है ?
- (a)तुलसीदास
- (b)सूरदास
- (c)कबीर
- (d)मीराबाई
उत्तर(c) कबीर — वे निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं ।
- practice — not a real PYQ
गुरु अर्जन देव ने वर्ष 1604 में जिस ग्रंथ का संकलन किया और जिसमें कबीर, रैदास तथा नामदेव की वाणी भी सम्मिलित है, वह निम्नलिखित में से कौन-सा है ?
- (a)बीजक
- (b)आदि ग्रंथ
- (c)सूरसागर
- (d)रामचरितमानस
उत्तर(b) आदि ग्रंथ — इसी संकलन में सिख गुरुओं के साथ अनेक संतों और सूफ़ियों की रचनाएँ रखी गईं ।