निम्नलिखित में से किसने प्रोटॉन की खोज की थी ?
- (a)जे.जे. थॉमसन
- (b)ई. गोल्डस्टीन
- (c)ई. रदरफोर्ड
- (d)जे. चैडविक
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) ई. गोल्डस्टीन । विद्यालय-स्तर की मानक पाठ्यपुस्तकें प्रोटॉन की खोज का श्रेय ई. गोल्डस्टीन को देती हैं, और इस प्रश्न का उत्तर उसी परिपाटी पर टिका है । प्रसंग विसर्जन नलिका के प्रयोगों का है । उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में वैज्ञानिक काँच की नलिकाओं में गैस का दाब बहुत कम करके उनमें उच्च विभवांतर लगाते थे और उससे निकलने वाली विकिरणों का अध्ययन करते थे । ऐसे ही प्रयोगों से पहले ऋणावेशित किरणों की पहचान हुई, जिन्हें कैथोड किरणें कहा गया, और उन्हीं से इलेक्ट्रॉन की खोज हुई । गोल्डस्टीन ने वर्ष 1886 में छिद्रयुक्त कैथोड का प्रयोग करके यह दिखाया कि उन छिद्रों के पीछे से एक और प्रकार की किरणें भी निकलती हैं, जो कैथोड किरणों की उलटी दिशा में चलती हैं । उन्हें कैनाल किरणें अथवा ऐनोड किरणें कहा गया, और वे धनावेशित निकलीं । इन किरणों का व्यवहार भीतर भरी गैस पर निर्भर करता था, और जब नलिका में हाइड्रोजन भरी जाती थी तब सबसे हल्का धनावेशित कण मिलता था — वही कण आगे चलकर प्रोटॉन कहलाया । उसका आवेश इलेक्ट्रॉन के आवेश के बराबर पर विपरीत चिह्न का होता है और उसका द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन से लगभग दो हज़ार गुना अधिक । यही परंपरा गोल्डस्टीन के प्रयोग को प्रोटॉन की खोज का आरंभ-बिंदु मानती है । अतः इस प्रश्न में विकल्प (b) ही उत्तर है । शेष तीन नामों को अलग करना इस प्रश्न में सबसे आसान भाग है, क्योंकि उनमें से हर एक किसी दूसरे कण या दूसरी खोज से जुड़ा है — एक इलेक्ट्रॉन से, एक नाभिक से, और एक न्यूट्रॉन से । इसलिए यदि तीनों कणों की खोज एक तालिका के रूप में याद हो, तो चौथा नाम अपने आप बच जाता है । यही आदत इस पूरे विषय में सबसे उपयोगी है : कण, वैज्ञानिक, वर्ष और प्रयोग — चारों को एक पंक्ति में जोड़कर रखिए, अलग-अलग नहीं ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)जे.जे. थॉमसन — जे.जे. थॉमसन का नाम प्रोटॉन से नहीं, इलेक्ट्रॉन से जुड़ा है, इसलिए यह विकल्प उत्तर नहीं है । उन्होंने वर्ष 1897 में कैथोड किरणों पर विद्युत् तथा चुंबकीय क्षेत्र लगाकर यह दिखाया कि वे ऋणावेशित कणों की धारा हैं और उनका आवेश-द्रव्यमान अनुपात नापा । यह पहला उपपरमाण्विक कण था जिसकी पहचान हुई, और उसी से यह सिद्ध हुआ कि परमाणु अविभाज्य नहीं है । उन्होंने परमाणु का एक आरंभिक प्रतिरूप भी सुझाया, जिसमें धनावेश एक गोले की तरह फैला हुआ माना गया और उसमें इलेक्ट्रॉन जड़े हुए । वह प्रतिरूप आगे चलकर छोड़ना पड़ा, क्योंकि नाभिक की खोज ने उसे अस्वीकार कर दिया । इस विकल्प का आकर्षण यही है कि विसर्जन नलिका के प्रयोग दोनों खोजों के पीछे हैं ।
- (c)ई. रदरफोर्ड — आयोग की कुंजी इस विकल्प को नहीं लेती । ई. रदरफोर्ड का प्रोटॉन से गहरा संबंध है और यह जान लेना उपयोगी है कि वह संबंध किस प्रकार का है । उन्होंने वर्ष 1911 में स्वर्ण पत्र पर अल्फा कणों की बौछार वाले प्रयोग से यह दिखाया कि परमाणु का लगभग सारा द्रव्यमान और सारा धनावेश एक अत्यंत छोटे केंद्र में सिमटा है, जिसे नाभिक कहा गया । इसके बाद, लगभग वर्ष 1917 से 1919 के बीच, उन्होंने नाइट्रोजन पर अल्फा कणों की बौछार करके हाइड्रोजन के नाभिक निकलते हुए देखे और यह निष्कर्ष निकाला कि हाइड्रोजन का नाभिक अन्य नाभिकों का भी एक घटक है ; उसी को उन्होंने प्रोटॉन नाम दिया । अर्थात् धनावेशित किरणों की पहचान का श्रेय एक परंपरा में गोल्डस्टीन को जाता है और नाभिक के घटक के रूप में प्रोटॉन की पहचान तथा नामकरण रदरफोर्ड से जुड़ा है ।
- (d)जे. चैडविक — जे. चैडविक का नाम प्रोटॉन से नहीं, न्यूट्रॉन से जुड़ा है, इसलिए यह विकल्प उत्तर नहीं है । उन्होंने वर्ष 1932 में बेरीलियम पर अल्फा कणों की बौछार से निकलने वाली एक ऐसी विकिरण का अध्ययन किया जो अत्यंत भेदक थी और जिस पर विद्युत् या चुंबकीय क्षेत्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था । इससे उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि वह आवेशरहित कणों की धारा है, जिनका द्रव्यमान लगभग प्रोटॉन के बराबर है ; उन्हें न्यूट्रॉन कहा गया । न्यूट्रॉन की खोज ने परमाणु भार से जुड़ी उस पहेली को सुलझाया कि नाभिक का द्रव्यमान केवल प्रोटॉनों से क्यों नहीं समझाया जा सकता । इस प्रकार तीनों उपपरमाण्विक कणों की खोज तीन अलग-अलग नामों और तीन अलग-अलग प्रयोगों से जुड़ी है ।
अवधारणा
परमाणु की संरचना की कहानी विसर्जन नलिका से आरंभ होती है । कम दाब वाली गैस में उच्च विभवांतर लगाने पर कैथोड से ऋणावेशित किरणें निकलती हैं, जिनसे इलेक्ट्रॉन की पहचान हुई ; और छिद्रयुक्त कैथोड लगाने पर उसकी उलटी दिशा में धनावेशित कैनाल किरणें मिलीं, जिनसे धनावेशित कण की पहचान का मार्ग खुला । इसके बाद तीन प्रतिरूप एक-एक करके आते हैं । पहला प्रतिरूप धनावेश को पूरे परमाणु में फैला हुआ मानता था और इलेक्ट्रॉनों को उसमें जड़ा हुआ । दूसरा प्रतिरूप स्वर्ण पत्र वाले प्रयोग के बाद आया, जिसमें अधिकांश अल्फा कण सीधे निकल गए पर कुछ बहुत बड़े कोण पर मुड़ गए — इससे यह निकला कि परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त है और उसका सारा धनावेश तथा लगभग पूरा द्रव्यमान एक अत्यंत छोटे नाभिक में है । तीसरे चरण में न्यूट्रॉन की खोज हुई, जिससे नाभिक का द्रव्यमान समझ में आया । आधुनिक चित्र में नाभिक में प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन रहते हैं और इलेक्ट्रॉन उसके चारों ओर । प्रोटॉनों की संख्या परमाणु क्रमांक कहलाती है और वही तत्त्व की पहचान तय करती है ; प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन की कुल संख्या द्रव्यमान संख्या कहलाती है ।
‘किसने खोजा’ वाले प्रश्न परीक्षा में इसलिए आते हैं कि उनका उत्तर एक शब्द में दिया जा सकता है, पर विज्ञान के इतिहास में खोज प्रायः एक व्यक्ति की एक घटना नहीं होती — वह कई प्रयोगों की शृंखला होती है । प्रोटॉन इसका अच्छा उदाहरण है, और यही इस प्रश्न को कठिन बनाता है । एक परंपरा धनावेशित किरणों की पहचान को खोज मानती है और दूसरी नाभिक के घटक के रूप में उसकी पहचान तथा नामकरण को । विद्यालय-स्तर की मानक पुस्तकें पहली परंपरा पर चलती हैं, और आयोग की कुंजी भी वही लेती है । इसलिए ऐसे प्रश्नों में यह देखना चाहिए कि परीक्षा किस स्तर की पाठ्यपुस्तक का अनुसरण करती है । शेष दो विकल्प इससे कहीं अधिक सरल हैं, क्योंकि उनके नाम अन्य कणों से जुड़े हैं । यह भी ध्यान दीजिए कि हिन्दी स्तंभ में चारों नाम देवनागरी में लिप्यंतरित हैं और उनके आद्याक्षर देवनागरी अक्षरों के बाद पूर्ण विराम के साथ छपे हैं, जबकि अंग्रेज़ी स्तंभ में वे रोमन लिपि में हैं ।
मुख्य तथ्य
- ई. गोल्डस्टीन ने वर्ष 1886 में छिद्रयुक्त कैथोड वाले विसर्जन नलिका के प्रयोग से कैनाल किरणों अर्थात् ऐनोड किरणों की पहचान की, जो धनावेशित थीं ।
- इन किरणों में हाइड्रोजन गैस के साथ सबसे हल्का धनावेशित कण मिला, जिसे आगे चलकर प्रोटॉन कहा गया ; उसका आवेश इलेक्ट्रॉन के बराबर पर विपरीत चिह्न का होता है ।
- जे.जे. थॉमसन ने वर्ष 1897 में कैथोड किरणों के अध्ययन से इलेक्ट्रॉन की पहचान की और उसका आवेश-द्रव्यमान अनुपात नापा ।
- ई. रदरफोर्ड ने स्वर्ण पत्र वाले प्रयोग से नाभिक की खोज की और बाद में नाइट्रोजन पर अल्फा कणों की बौछार से हाइड्रोजन के नाभिक निकलते देखकर उसे प्रोटॉन नाम दिया ।
- जे. चैडविक ने वर्ष 1932 में न्यूट्रॉन की खोज की, जो आवेशरहित कण है और जिसका द्रव्यमान लगभग प्रोटॉन के बराबर होता है ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- तीनों कणों की खोज एक ही नाम से जोड़ लेना । इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन की खोज तीन अलग नामों और तीन अलग प्रयोगों से जुड़ी है ।
- नाभिक की खोज और प्रोटॉन की खोज को एक मान लेना । स्वर्ण पत्र वाला प्रयोग नाभिक दिखाता है, धनावेशित कण की पहचान उससे पहले की है ।
- प्रयोग का नाम भूलकर केवल वैज्ञानिक का नाम याद रखना । परीक्षा में कई बार प्रयोग बताकर वैज्ञानिक पूछा जाता है, इसलिए दोनों जोड़े में याद रखिए ।
परमाणु की संरचना पर प्रश्न चार साँचों में आते हैं । पहला साँचा यही है — किस कण की खोज किसने की, जहाँ चारों विकल्प उसी काल के वैज्ञानिक होते हैं । दूसरा साँचा प्रयोग का है : स्वर्ण पत्र वाला प्रयोग किसका था और उससे क्या निष्कर्ष निकला, या कैनाल किरणें किस प्रयोग में मिलीं । तीसरा साँचा गुणधर्म का है — किस कण का आवेश कितना है, किसका द्रव्यमान सबसे कम, और कौन नाभिक के भीतर रहता है । चौथा साँचा प्रतिरूपों का है, जिसमें किसी प्रतिरूप की कमी या उसे छोड़ने का कारण पूछा जाता है । चारों की तैयारी के लिए एक तालिका बनाइए जिसमें वैज्ञानिक, वर्ष, प्रयोग, खोजा गया कण और उसका एक गुणधर्म पाँच स्तंभों में हों । यह तालिका इसलिए भी उपयोगी है कि विज्ञान के इतिहास में खोज प्रायः शृंखलाबद्ध होती है, और तालिका उस शृंखला को क्रम में रख देती है ।
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उत्तर(a) 10^-10 m
इसी प्रश्नपत्र का परमाणु के आकार वाला प्रश्न, जो उसी संरचना का दूसरा पक्ष है — नाभिक और परमाणु के बीच का विशाल अनुपात, जो रदरफोर्ड के प्रयोग से ही सामने आया था ।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
कैथोड किरणों के अध्ययन से इलेक्ट्रॉन की पहचान करने का श्रेय निम्नलिखित में से किस वैज्ञानिक को दिया जाता है ?
- (a)ई. गोल्डस्टीन
- (b)जे.जे. थॉमसन
- (c)जे. चैडविक
- (d)नील्स बोर
उत्तर(b) जे.जे. थॉमसन — उन्होंने कैथोड किरणों पर विद्युत् तथा चुंबकीय क्षेत्र लगाकर दिखाया कि वे ऋणावेशित कणों की धारा हैं और उनका आवेश-द्रव्यमान अनुपात नापा ।
- practice — not a real PYQ
आवेशरहित उपपरमाण्विक कण न्यूट्रॉन की खोज का श्रेय निम्नलिखित में से किसे दिया जाता है ?
- (a)ई. रदरफोर्ड
- (b)जे. चैडविक
- (c)ई. गोल्डस्टीन
- (d)जे.जे. थॉमसन
उत्तर(b) जे. चैडविक — उन्होंने वर्ष 1932 में बेरीलियम पर अल्फा कणों की बौछार से निकली भेदक विकिरण का अध्ययन करके यह दिखाया कि वह आवेशरहित कणों की धारा है ।